पुस्तक: लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल
लेखक: प्रो. अनिल कुमार दीक्षित एवं डॉ. गगनदीप कौर
प्रकाशक: इंटेग्रिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली
प्राक्कथन: श्री संजय बंसल, फाउंडर प्रेसिडेंट, देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी, देहरादून
समीक्षा : अनिल अनूप
डिजिटल युग में मीडिया कानून को समझने की जरूरी कोशिश
पत्रकारिता की दुनिया जिस तेजी से बदल रही है, उतनी तेजी शायद किसी अन्य संचार माध्यम ने नहीं देखी। कभी समाचार का सबसे प्रभावशाली माध्यम अखबार हुआ करता था, फिर रेडियो और टेलीविजन ने सूचना की दुनिया को विस्तार दिया और अब डिजिटल मीडिया ने समाचार के उत्पादन, प्रसारण और उपभोग की पूरी प्रक्रिया को लगभग पुनर्परिभाषित कर दिया है। मोबाइल फोन की स्क्रीन आज एक ऐसा मंच बन चुकी है, जहां खबर लिखी भी जाती है, प्रकाशित भी होती है और कुछ ही क्षणों में लाखों लोगों तक पहुंच भी जाती है।
इसी बदलते मीडिया परिदृश्य में कानून, अधिकार, जिम्मेदारी, नैतिकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल इसी व्यापक और समकालीन विमर्श को केंद्र में रखने वाली पुस्तक के रूप में सामने आती है। मीडिया लॉ के जाने-माने अध्येताओं प्रो. अनिल कुमार दीक्षित और डॉ. गगनदीप कौर द्वारा लिखित यह पुस्तक पत्रकारिता और कानून के बीच संबंधों को डिजिटल युग की चुनौतियों के संदर्भ में समझने का प्रयास करती है।
पुस्तक का प्राक्कथन देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी, देहरादून के फाउंडर प्रेसिडेंट श्री संजय बंसल ने लिखा है। शिक्षा, संस्थान निर्माण और सार्वजनिक जीवन में अपनी सक्रिय भूमिका के लिए पहचाने जाने वाले संजय बंसल का प्राक्कथन पुस्तक की विषयवस्तु के प्रति एक गंभीर अकादमिक दृष्टिकोण का संकेत देता है।
प्रिंट से पिक्सल तक का सफर
इस पुस्तक के शीर्षक में ही इसके पूरे सरोकार का संकेत छिपा है—“जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल।” यह केवल तकनीकी बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि पत्रकारिता के चरित्र, जिम्मेदारियों और कानूनी दायरे में आए व्यापक परिवर्तन का संकेत है।
प्रिंट पत्रकारिता के दौर में समाचार प्रकाशित होने से पहले संपादकीय स्तर पर कई प्रक्रियाओं से गुजरता था। समाचार पत्र का एक निश्चित संस्करण होता था और प्रकाशित सामग्री को वापस लेना या संशोधित करना आसान नहीं था। डिजिटल पत्रकारिता ने इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है। अब समाचार निरंतर अपडेट हो सकता है, सोशल मीडिया पर तुरंत साझा हो सकता है और पाठक स्वयं भी सूचना के निर्माण एवं प्रसार की प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है।
इस बदलाव ने पत्रकारिता को अधिक लोकतांत्रिक और व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ कानूनी जोखिम भी बढ़े हैं। कॉपीराइट, मानहानि, निजता, फेक न्यूज, डिजिटल साक्ष्य, साइबर अपराध, ऑनलाइन अभिव्यक्ति, सोशल मीडिया की जवाबदेही और डेटा से जुड़े प्रश्न अब पत्रकारिता की रोजमर्रा की चुनौतियों का हिस्सा हैं।
ऐसे समय में मीडिया कानून की समझ केवल कानून के विद्यार्थियों के लिए आवश्यक नहीं रह गई है। पत्रकार, संपादक, डिजिटल कंटेंट निर्माता, मीडिया संस्थान, सोशल मीडिया संचालक और पत्रकारिता के विद्यार्थी—सभी के लिए इसकी जानकारी महत्वपूर्ण हो गई है।
मीडिया की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी का संतुलन
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह उपमा मीडिया की शक्ति और जिम्मेदारी दोनों को रेखांकित करती है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता तक तथ्यपरक सूचना पहुंचाना, सत्ता से सवाल करना, सामाजिक समस्याओं को सामने लाना और जनहित के मुद्दों पर सार्वजनिक विमर्श तैयार करना है।
लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ असीमित स्वतंत्रता नहीं है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इसके साथ कुछ वैधानिक सीमाएं भी निर्धारित हैं। यही वह क्षेत्र है जहां मीडिया कानून पत्रकारिता को उसकी स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही के बीच संतुलन समझने में मदद करता है।
लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा का महत्व इसी बिंदु पर विशेष रूप से दिखाई देता है। डिजिटल पत्रकारिता में किसी सूचना को प्रकाशित करना जितना आसान हुआ है, उतना ही आसान उसका व्यापक प्रसार भी हो गया है। किसी गलत सूचना का प्रभाव कुछ मिनटों में हजारों या लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए डिजिटल पत्रकारिता में कानूनी सावधानी का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
मीडिया नैतिकता : पत्रकारिता की विश्वसनीयता की आधारशिला
मीडिया कानून को समझने के साथ मीडिया नैतिकता को समझना भी जरूरी है। कानून यह निर्धारित करता है कि क्या वैधानिक है, जबकि नैतिकता पत्रकार को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि क्या प्रकाशित करना जिम्मेदार और जनहितकारी है।
मीडिया नैतिकता का मूल अर्थ है—समाचार, सूचना या मनोरंजन सामग्री को प्रस्तुत करते समय सत्य, निष्पक्षता, जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनशीलता का ध्यान रखना। एक जिम्मेदार पत्रकार केवल यह नहीं देखता कि उसके पास कोई सूचना है या नहीं, बल्कि यह भी देखता है कि सूचना कितनी विश्वसनीय है, उसका स्रोत क्या है और उसे प्रकाशित करने से समाज या किसी व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
यही कारण है कि पत्रकारिता में सत्यता और सटीकता को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। किसी खबर को प्रकाशित करने से पहले तथ्य-जांच, स्रोतों की पुष्टि और संबंधित पक्ष का दृष्टिकोण जानना आवश्यक है। डिजिटल मीडिया में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है क्योंकि ‘पहले खबर देने’ की होड़ में कई बार सत्यापन की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।
निष्पक्षता और पूर्वाग्रह से दूरी
पत्रकारिता का दूसरा महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत है निष्पक्षता। किसी समाचार को राजनीतिक विचारधारा, व्यक्तिगत पसंद, आर्थिक हित अथवा किसी दबाव के आधार पर प्रभावित नहीं होना चाहिए।
डिजिटल मीडिया में यह चुनौती और जटिल हो गई है। सोशल मीडिया एल्गोरिद्म अक्सर लोगों को उनकी पसंद से जुड़ी सामग्री अधिक दिखाते हैं। इससे सूचना के अलग-अलग समूह और विचारों के अलग-अलग संसार बन सकते हैं। ऐसे वातावरण में पत्रकार के लिए तथ्य और राय के बीच अंतर स्पष्ट रखना बेहद जरूरी है।
एक पत्रकार अपनी टिप्पणी दे सकता है, लेकिन समाचार को टिप्पणी की तरह प्रस्तुत करना और टिप्पणी को समाचार की तरह पेश करना दोनों अलग बातें हैं। मीडिया कानून और मीडिया नैतिकता की समझ इस अंतर को स्पष्ट करने में मदद करती है।
निजता का अधिकार और डिजिटल पत्रकारिता
डिजिटल युग में निजता का प्रश्न बेहद संवेदनशील हो गया है। किसी व्यक्ति की तस्वीर, वीडियो, निजी बातचीत या व्यक्तिगत जानकारी कुछ ही सेकंड में वायरल हो सकती है। यही कारण है कि पत्रकारिता में निजता के अधिकार का सम्मान महत्वपूर्ण है।
किसी सार्वजनिक व्यक्ति और निजी नागरिक की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं। जनहित और निजी जीवन के बीच अंतर समझना पत्रकार की जिम्मेदारी है। केवल इसलिए कि कोई सामग्री सोशल मीडिया पर उपलब्ध है, यह जरूरी नहीं कि उसे बिना संदर्भ या अनुमति के दोबारा प्रकाशित करना नैतिक या कानूनी रूप से उचित हो।
विशेष रूप से अपराध, दुर्घटना, यौन अपराध, बच्चों से जुड़े मामलों और संवेदनशील सामाजिक घटनाओं की रिपोर्टिंग में पत्रकारिता को अत्यधिक सावधानी बरतनी होती है। पीड़ित की पहचान, तस्वीर या निजी जानकारी सार्वजनिक करने से होने वाली संभावित क्षति को ध्यान में रखना जरूरी है।
मानहानि और समाचार की जिम्मेदारी
पत्रकारिता में मानहानि कानून का महत्व लंबे समय से रहा है। डिजिटल मीडिया ने इसकी गंभीरता और बढ़ा दी है क्योंकि ऑनलाइन प्रकाशित सामग्री लंबे समय तक उपलब्ध रह सकती है और बहुत तेजी से फैल सकती है।
किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में गंभीर आरोप प्रकाशित करने से पहले तथ्य और स्रोत की विश्वसनीयता की जांच आवश्यक है। आरोप और सिद्ध तथ्य के बीच अंतर बनाए रखना पत्रकारिता की बुनियादी आवश्यकता है।
“आरोप लगाया गया”, “पुलिस के अनुसार”, “शिकायत में कहा गया” और “अदालत ने दोषी ठहराया”—इन अभिव्यक्तियों के कानूनी और पत्रकारिता संबंधी अर्थ अलग-अलग होते हैं। एक जिम्मेदार पत्रकार को भाषा की इस बारीकी को समझना चाहिए।
फेक न्यूज और गलत सूचना की चुनौती
डिजिटल मीडिया के सबसे बड़े संकटों में फेक न्यूज और misinformation प्रमुख हैं। सोशल मीडिया के कारण अब सूचना का उत्पादन केवल पेशेवर मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं रहा। कोई भी व्यक्ति फोटो, वीडियो या टेक्स्ट के माध्यम से सूचना को लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है।
समस्या तब गंभीर होती है जब पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़ दिया जाए, किसी बयान को संदर्भ से काट दिया जाए या किसी अपुष्ट दावे को तथ्य की तरह प्रस्तुत कर दिया जाए।
इस स्थिति में डिजिटल पत्रकारिता का पहला सिद्धांत होना चाहिए—वायरल होने से पहले सत्यापन।
एक जिम्मेदार मीडिया संस्थान को स्रोत की पहचान, तस्वीर और वीडियो की प्रामाणिकता, तारीख, स्थान तथा संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया की जांच करनी चाहिए। पुस्तक का डिजिटल युग पर केंद्रित दृष्टिकोण इस बदलती पत्रकारिता संस्कृति की जरूरतों को समझने की दिशा में उपयोगी प्रतीत होता है।
कॉपीराइट और डिजिटल सामग्री
इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री को मुफ्त समझ लेना भी डिजिटल पत्रकारिता की एक बड़ी भूल है। तस्वीर, लेख, वीडियो, ग्राफिक्स, संगीत और अन्य रचनात्मक सामग्री पर कॉपीराइट अधिकार लागू हो सकते हैं।
पत्रकारिता के विद्यार्थियों और डिजिटल कंटेंट निर्माताओं के लिए यह समझना आवश्यक है कि किसी वेबसाइट या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री उपलब्ध होने मात्र से उसके पुनर्प्रकाशन का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता।
स्रोत का उल्लेख करना अच्छी पत्रकारिता की आदत है, लेकिन केवल क्रेडिट देना हमेशा कॉपीराइट संबंधी सभी प्रश्नों का समाधान नहीं करता। इसलिए मीडिया पेशेवरों के लिए कॉपीराइट कानून की मूल समझ अत्यंत आवश्यक है।
सोशल मीडिया ने बदल दी पत्रकारिता की गति
आज पत्रकारिता की गति अभूतपूर्व है। पहले अखबार के अगले संस्करण या टेलीविजन बुलेटिन का इंतजार करना पड़ता था। अब मोबाइल फोन पर घटना के कुछ ही क्षण बाद सूचना उपलब्ध हो सकती है।
लेकिन गति के साथ एक विरोधाभास भी पैदा हुआ है—जितनी तेजी से खबर पहुंचती है, उतनी ही तेजी से गलती भी फैलती है।
डिजिटल पत्रकारिता में क्लिक, व्यूज, शेयर और ट्रेंडिंग की प्रतिस्पर्धा कई बार पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर दबाव डालती है। सनसनीखेज शीर्षक, अधूरी जानकारी और भ्रामक थंबनेल दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन इससे मीडिया की विश्वसनीयता कमजोर होती है। यहीं कानून और नैतिकता दोनों पत्रकारिता को उसकी मूल भूमिका की याद दिलाते हैं।
संपादकों के लिए क्यों उपयोगी है यह पुस्तक?
आज का संपादक केवल भाषा और खबर की गुणवत्ता का जिम्मेदार नहीं है। उसे कानूनी जोखिमों की भी जानकारी होनी चाहिए। किसी खबर का शीर्षक, फोटो का चयन, वीडियो का उपयोग, आरोपों की भाषा, सोशल मीडिया पोस्ट और पाठकों की टिप्पणियां—सभी अलग-अलग स्तर पर कानूनी प्रश्न पैदा कर सकते हैं।
एक संपादक को यह निर्णय लेना पड़ सकता है कि किसी संवेदनशील खबर में कौन-सी जानकारी प्रकाशित की जाए और कौन-सी नहीं। ऐसे निर्णयों में मीडिया कानून और नैतिकता का ज्ञान बेहद उपयोगी साबित होता है।
इस दृष्टि से यह पुस्तक पत्रकारिता और कानून के बीच व्यावहारिक पुल बनाने वाली उपयोगी सामग्री के रूप में देखी जा सकती है।
विधि और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी पाठ
कानून के विद्यार्थियों के लिए मीडिया कानून एक महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है, क्योंकि इसमें संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानहानि, निजता, कॉपीराइट, साइबर कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े अनेक विषय एक साथ आते हैं।
वहीं पत्रकारिता के विद्यार्थी यदि अपने पेशे की कानूनी सीमाओं और अधिकारों को प्रारंभिक स्तर पर ही समझ लें तो भविष्य में वे अधिक जिम्मेदार मीडिया पेशेवर बन सकते हैं।
यही कारण है कि लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल को पत्रकारिता के विद्यार्थियों के साथ-साथ विधि के छात्र-छात्राओं के लिए भी उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में देखा जा सकता है।
पुस्तक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता
इस पुस्तक की सबसे बड़ी प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि आज पत्रकारिता और डिजिटल तकनीक को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। पत्रकारिता अब केवल अखबार के पन्नों तक सीमित नहीं है। वेबसाइट, मोबाइल एप, सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म, पॉडकास्ट और अन्य डिजिटल माध्यम पत्रकारिता के नए मंच बन चुके हैं।
इस परिवर्तन ने पत्रकारिता के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है—तकनीक की गति के साथ कानून और नैतिकता की समझ कैसे विकसित हो?
इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश इस पुस्तक को समकालीन मीडिया विमर्श से जोड़ती है।
भाषा, कानून और पत्रकारिता का त्रिकोण
मीडिया कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि इसका संबंध केवल कानून की पुस्तकों से नहीं, बल्कि भाषा से भी है। पत्रकार द्वारा चुना गया एक शब्द किसी व्यक्ति की सामाजिक छवि को प्रभावित कर सकता है।
“आरोपी”, “दोषी”, “संदिग्ध”, “अभियुक्त” और “दोषमुक्त”—इन शब्दों का इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। इसी तरह किसी घटना को “सनसनीखेज” बनाने के बजाय तथ्यपरक तरीके से प्रस्तुत करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखता है।
इसलिए अच्छे पत्रकार के लिए भाषा का ज्ञान जितना जरूरी है, उतना ही कानूनी शब्दावली और उसके प्रभाव को समझना भी आवश्यक है।
डिजिटल युग में जवाबदेही सबसे बड़ा प्रश्न
मीडिया की स्वतंत्रता लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जवाबदेही उसकी विश्वसनीयता की बुनियाद है। यदि मीडिया अपनी गलती स्वीकार करता है, तथ्य सुधारता है और पाठकों को सही जानकारी उपलब्ध कराता है, तो उसकी विश्वसनीयता मजबूत होती है।
इसके विपरीत गलत खबर को हटाकर बिना स्पष्टीकरण के आगे बढ़ जाना पाठकों के विश्वास को नुकसान पहुंचा सकता है। डिजिटल मीडिया में correction और clarification की संस्कृति विकसित करना इसलिए महत्वपूर्ण है।
मीडिया नैतिकता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यही है कि गलती होने पर उसे स्वीकार किया जाए और आवश्यक सुधार किया जाए।
पुस्तक समीक्षा : एक समग्र मूल्यांकन
समग्र रूप से देखा जाए तो लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल आज के बदलते मीडिया परिवेश में मीडिया कानून की भूमिका को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में सामने आती है।
प्रो. अनिल कुमार दीक्षित और डॉ. गगनदीप कौर ने पुस्तक के माध्यम से जिस विषय को केंद्र में रखा है, वह आज केवल अकादमिक चर्चा का विषय नहीं है। यह प्रत्येक पत्रकार, संपादक और डिजिटल मीडिया पेशेवर के दैनिक काम का हिस्सा बन चुका है।
इंटेग्रिटी पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक को ऐसे समय में सामने आना भी महत्वपूर्ण है जब भारत में डिजिटल मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। पुस्तक की विषयवस्तु का महत्व केवल पत्रकारिता संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि कानून, संचार, मीडिया अध्ययन और डिजिटल कंटेंट से जुड़े व्यापक पाठक वर्ग के लिए भी इसकी उपयोगिता बनती है।
जिम्मेदार पत्रकारिता की ओर एक जरूरी कदम
पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल है, लेकिन पत्रकारिता के मूल मूल्य—सत्य, निष्पक्षता, जनहित, स्वतंत्रता और जवाबदेही—आज भी वही हैं। तकनीक ने माध्यम बदल दिया है, लेकिन पत्रकारिता की सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बदली।
प्रिंट से पिक्सल तक की यात्रा ने मीडिया को तेज, व्यापक और अधिक प्रभावशाली बनाया है। अब चुनौती यह है कि इस प्रभाव का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ कैसे किया जाए। इसी संदर्भ में मीडिया कानून और मीडिया नैतिकता की समझ पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल का केंद्रीय महत्व इसी आवश्यकता से जुड़ता है। यह पुस्तक पत्रकारिता को केवल खबर लिखने का पेशा मानने के बजाय उसे कानून, नैतिकता और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से जोड़कर देखने की जरूरत पर बल देती है।
विधि के छात्र-छात्राओं, पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, पत्रकारों, संपादकों तथा डिजिटल मीडिया से जुड़े पेशेवरों के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी अध्ययन सामग्री साबित हो सकती है। विशेषकर उन लोगों के लिए, जो यह समझना चाहते हैं कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां तक है, पत्रकार की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है और कानून की सीमा कहां लागू होती है, यह पुस्तक प्रासंगिक संदर्भ प्रस्तुत करती है।
आज जब एक मोबाइल स्क्रीन किसी खबर को दुनिया के किसी भी कोने तक पहुंचा सकती है, तब पत्रकारिता की शक्ति के साथ उसकी जिम्मेदारी को समझना भी उतना ही आवश्यक है। इसी अर्थ में यह पुस्तक प्रिंट से पिक्सल तक पत्रकारिता की यात्रा को कानून और नैतिकता के आईने में देखने का एक सार्थक प्रयास कही जा सकती है।


























4 Responses
This Book carries all legal issues in todays professional initiatives on journalism journey, National and International perspectives.
This book on law of media will certainly enhance the knowledge of intellectuals in this field giving time for social cause.
Thank you Editor of Jangandoot.com Shri Anil anup ji for publishing this Book review 👓🌿
इस बात पर कोई दो राय नहीं कि लॉ ऑफ मीडिया इन द डिजिटल एरा – जर्नलिज्म जर्नी फ्रॉम प्रिंट टू पिक्सल की विषयवस्तु बहुत ही विस्तृत और व्यापक है। इस बात का अंदाजा पुस्तक की समीक्षा से लग जाता है।
जनगनदूत डॉट कॉम के संपादक अनिल अनूप जी ने जिस जिम्मेदारी और गहन अध्ययन के बाद पुस्तक समीक्षा को शब्द दिए हैं, अपने आप में सराहनीय और चुनौतीपूर्ण प्रयास है।
अनिल अनूप जी ने समीक्षा के अंतिम पैराग्राफ में पुस्तक की उपयोगिता के विषय में लिख कर पुस्तक की आवश्यकता को बड़े प्रभावी ढंग से उजागर किया है – ‘विधि के छात्र-छात्राओं, पत्रकारिता एवं जनसंचार के विद्यार्थियों, पत्रकारों, संपादकों तथा डिजिटल मीडिया से जुड़े पेशेवरों के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी अध्ययन सामग्री साबित हो सकती है। विशेषकर उन लोगों के लिए, जो यह समझना चाहते हैं कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहां तक है, पत्रकार की जिम्मेदारी कहां से शुरू होती है और कानून की सीमा कहां लागू होती है, यह पुस्तक प्रासंगिक संदर्भ प्रस्तुत करती है।’
अनिल अनूप जी पुस्तक की व्यापक समीक्षा के लिए बधाई के पात्र हैं
एक ऐसी पुस्तक जो पत्रकारिता के समस्त विधिक आयामों को समग्र रूप से प्रस्तुत करती है 🌹 लेखक को बधाई एवं समीक्षा लिखने के लिए श्री अनूप जी को साधुवाद 🌿