16 अक्टूबर 2026 6:01 अपराह्न

विश्व फेफड़ा दिवस 2026 : सांसों की सेहत पर सवाल, फेफड़ों को कितना सुरक्षित रख रहे हम?

विश्व फेफड़ा दिवस 2026 पर फेफड़ों की सेहत और प्रदूषण के प्रति जागरूकता, रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला और डॉ. अनिल कुमार दीक्षित

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रिपोर्ट : दुर्गा प्रसाद शुक्ला

देहरादून। शरीर के जिन अंगों पर जीवन की हर सांस टिकी है, उनकी सेहत को लेकर हम कितने जागरूक हैं? दिन-रात बिना रुके काम करने वाले फेफड़े हमारी हर सांस के साथ शरीर तक ऑक्सीजन पहुंचाते हैं, लेकिन प्रदूषण, धूल, धुआं, तंबाकू और बदलती जीवनशैली के बीच क्या हम वास्तव में अपने फेफड़ों की पर्याप्त देखभाल कर रहे हैं? विश्व फेफड़ा दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित एक जागरूकता गोष्ठी में इसी महत्वपूर्ण सवाल पर चर्चा हुई।

गोष्ठी में डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने लोगों को फेफड़ों की सेहत के प्रति सचेत करते हुए कहा कि स्वास्थ्य को लेकर देश में कई कानून और व्यवस्थाएं मौजूद हैं। मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम, 2022 जैसे कानून स्वास्थ्य के प्रति सरकारी स्तर पर गंभीरता को दर्शाते हैं, लेकिन सांस से जुड़ी बीमारियों और फेफड़ों की सुरक्षा को लेकर आम लोगों में अभी भी पर्याप्त जागरूकता की जरूरत है।

जिस सांस को सहज मानते हैं, उसी पर दें ध्यान

एक सामान्य व्यक्ति दिनभर में हजारों बार सांस लेता है। यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक है कि अधिकांश समय हमें इसका एहसास तक नहीं होता। लेकिन जिस हवा को हम शरीर के भीतर ले रहे हैं, उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है।

शहरों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, सड़क की मिट्टी, औद्योगिक प्रदूषण और घर के भीतर पैदा होने वाला धुआं लंबे समय में श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा तंबाकू का धुआं फेफड़ों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल है।

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डॉ. दीक्षित के मुताबिक फेफड़ों की बीमारी को लेकर समस्या यह भी है कि लोग अक्सर शुरुआती संकेतों को सामान्य समझकर टाल देते हैं। जब सांस फूलने या रोजमर्रा के काम में परेशानी जैसी स्थिति सामने आती है, तब तक बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी हो सकती है।

फेफड़ों की खराब सेहत के शुरुआती संकेतों को पहचानना जरूरी

फेफड़ों की समस्या हमेशा अचानक सामने नहीं आती। शरीर कई बार पहले से संकेत देने लगता है। लगातार बनी रहने वाली खांसी, बार-बार सांस फूलना, सीने में जकड़न, सांस लेते समय घरघराहट और सामान्य काम करते हुए पहले की तुलना में जल्दी थकान महसूस होना ऐसे संकेत हैं, जिन पर ध्यान देना चाहिए।

हालांकि, हर खांसी या सांस फूलने का अर्थ फेफड़ों की गंभीर बीमारी नहीं होता। मौसम में बदलाव, वायरल संक्रमण, एलर्जी या अन्य कारणों से भी ऐसी परेशानी हो सकती है। लेकिन यदि लक्षण लंबे समय तक बने रहें, बार-बार लौटें या धीरे-धीरे बढ़ने लगें तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

समय पर जांच से बीमारी की स्थिति को समझने और उचित उपचार की दिशा तय करने में मदद मिल सकती है।

केवल सिगरेट पीने वाला ही नहीं, आसपास रहने वाला भी प्रभावित हो सकता है

फेफड़ों की सेहत की चर्चा होते ही धूम्रपान का मुद्दा सामने आता है। सिगरेट और बीड़ी के धुएं में मौजूद हानिकारक पदार्थ फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन इसका प्रभाव केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।

बंद कमरे, वाहन या अन्य स्थानों पर किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किए जा रहे धूम्रपान के धुएं के संपर्क में आने वाले लोग भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए घर और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान से बचना विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और सांस संबंधी परेशानी वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण है।

धूल और प्रदूषण से बचाव भी फेफड़ों की सुरक्षा का हिस्सा

शहरी जीवन में धूल और धुएं से पूरी तरह बच पाना आसान नहीं है। सड़क निर्माण, भवन निर्माण, खुदाई और लगातार बढ़ते यातायात के कारण हवा में धूल और प्रदूषक कणों की मौजूदगी लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

ऐसे वातावरण में लंबे समय तक काम करने वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। कार्यस्थल पर उपलब्ध सुरक्षा उपकरणों का सही इस्तेमाल करना, धूल वाले वातावरण में अनावश्यक संपर्क कम करना और घर में हवा के उचित आवागमन की व्यवस्था रखना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

घर के भीतर भी धुएं के स्रोतों को कम करना जरूरी है। रसोई और अन्य स्थानों में पर्याप्त वेंटिलेशन होने से घर के अंदर की हवा की गुणवत्ता बेहतर रखने में मदद मिल सकती है।

बच्चों के फेफड़ों की सेहत पर भी विशेष ध्यान जरूरी

बच्चों के फेफड़ों का विकास बचपन से होता है। ऐसे में उन्हें तंबाकू के धुएं और अनावश्यक प्रदूषण से दूर रखना अभिभावकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

घर के अंदर धूम्रपान नहीं करना, बच्चों को धुएं वाले वातावरण से दूर रखना और लगातार खांसी या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि बच्चे को बार-बार श्वसन संबंधी समस्या हो रही है तो चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

क्या है गुब्बारा टेस्ट, क्या इससे फेफड़ों की क्षमता पता चलती है?

गोष्ठी में फेफड़ों की कार्यक्षमता को लेकर गुब्बारा टेस्ट का भी उल्लेख किया गया। सामान्य तौर पर गुब्बारे में सांस छोड़ने की प्रक्रिया से व्यक्ति अपनी सांस छोड़ने की क्षमता का एक मोटा अंदाजा लगाने की कोशिश कर सकता है।

इसके लिए सामान्य आकार का नया गुब्बारा लिया जा सकता है। व्यक्ति आराम से बैठकर नाक से गहरी सांस ले और फिर गुब्बारे में मुंह के जरिए एक बार में हवा छोड़ने की कोशिश करे। इससे यह देखा जा सकता है कि गुब्बारा कितनी आसानी से फूलता है।

हालांकि, यह बात समझना जरूरी है कि गुब्बारा फुलाना फेफड़ों की बीमारी की चिकित्सकीय जांच नहीं है। इससे किसी बीमारी की पुष्टि या खंडन नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को गुब्बारा फुलाने में परेशानी होती है तो इसका कारण कई अन्य स्थितियां भी हो सकती हैं।

फूंक मारते समय तेज खांसी, सीने में दर्द, चक्कर या सांस लेने में अधिक परेशानी महसूस हो तो प्रयास रोक देना चाहिए। लगातार सांस संबंधी समस्या होने पर पल्मोनोलॉजिस्ट यानी फेफड़ों के विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच कराना उचित है।

फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए रोजमर्रा में अपनाएं ये सावधानियां

फेफड़ों की बेहतर सेहत के लिए किसी एक दिन की कोशिश पर्याप्त नहीं है। इसके लिए जीवनशैली में लगातार सावधानी बरतना जरूरी है। तंबाकू से दूरी बनाना, धूल और धुएं के संपर्क को कम करना, प्रदूषित वातावरण में आवश्यक सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल करना और घर में पर्याप्त वेंटिलेशन रखना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

नियमित शारीरिक गतिविधि भी समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर अनावश्यक रूप से लंबे समय तक बाहर रहने से बचना और शरीर में दिखाई देने वाले असामान्य संकेतों पर ध्यान देना भी जरूरी है।

सांस चल रही है, इसका मतलब फेफड़े पूरी तरह स्वस्थ हैं—यह जरूरी नहीं

फेफड़ों की खासियत यह है कि वे बिना किसी विशेष निर्देश के लगातार अपना काम करते रहते हैं। शायद यही वजह है कि हम उनकी अहमियत को तब महसूस करते हैं जब सांस लेने में कठिनाई शुरू होती है।

विश्व फेफड़ा दिवस 2026 का संदेश इसी ओर ध्यान दिलाता है कि फेफड़ों की देखभाल बीमारी होने के बाद शुरू करने के बजाय पहले से करनी चाहिए। वर्ष 2026 के लिए बताया गया संदेश “जीवनभर फेफड़ों की सेहत” है। इसका मूल भाव यही है कि फेफड़ों की सुरक्षा किसी एक दिन, किसी एक उम्र या किसी एक बीमारी तक सीमित विषय नहीं है।

स्वच्छ हवा, तंबाकू से दूरी, प्रदूषण से बचाव, कार्यस्थल पर सुरक्षा और लगातार बने रहने वाले लक्षणों पर चिकित्सकीय सलाह—ये सभी फेफड़ों की देखभाल का हिस्सा हैं।

विश्व फेफड़ा दिवस पर सबसे जरूरी सवाल यही है कि जिस हवा के सहारे हमारी जिंदगी चल रही है, क्या हम अपने फेफड़ों को उस हवा के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए पर्याप्त सावधानी बरत रहे हैं?

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