कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
लखनऊ। अपराध की दुनिया में गिरोहों के काम करने के अलग-अलग तरीके सामने आते रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में सामने आए पंखिया गैंग की कहानी अपने तौर-तरीकों के कारण अलग बताई जा रही है। पुलिस के अनुसार, यह गिरोह दिन के समय संभावित ठिकानों की रेकी करता था और रात में हाईवे के किनारे बने घरों को निशाना बनाकर चोरी और लूट की वारदातों को अंजाम देता था। खास बात यह बताई गई कि लूट की रकम का एक हिस्सा गिरोह के सदस्य धार्मिक आयोजनों और मंदिरों में दान-पुण्य के काम में खर्च करते थे।
पुलिस के मुताबिक, इस गिरोह का नेटवर्क उत्तर प्रदेश के कई जिलों से लेकर राजस्थान तक फैला हुआ था। 22 सितंबर 2026 को इटावा में हुई पुलिस कार्रवाई के बाद गिरोह के सरगना समेत छह आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस की जांच में गिरोह के खिलाफ बड़ी संख्या में आपराधिक मामलों की जानकारी सामने आने की बात कही गई है। अधिकारियों के अनुसार, गिरोह के सदस्य बेहद योजनाबद्ध तरीके से वारदात करते थे और घटना के बाद तेजी से दूसरे स्थान पर चले जाते थे।
पंखिया गैंग का नाम कैसे पड़ा?
पुलिस और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस गिरोह का संबंध बरेली और शाहजहांपुर की सीमा क्षेत्र में स्थित पंखियाखेड़ा गांव से बताया जाता है। गिरोह से जुड़े लोगों की जातीय पहचान पंखिया बताई गई है, जिसके कारण इसे पंखिया गैंग के नाम से जाना जाने लगा।
बताया जाता है कि इस समुदाय के पूर्वज जंगलों में शहद निकालकर अपना जीवनयापन करते थे। समय के साथ गिरोह के कुछ परिवारों की पीढ़ियां चोरी और लूट के अपराध में शामिल होती चली गईं। हालांकि, किसी समुदाय के सभी लोगों को अपराध से जोड़ना उचित नहीं है; पुलिस की कार्रवाई विशेष रूप से गिरफ्तार आरोपियों और उनके कथित आपराधिक नेटवर्क से संबंधित है।
उत्तर प्रदेश से राजस्थान तक बताया गया नेटवर्क
पुलिस के अनुसार, पंखिया गैंग का नेटवर्क उत्तर प्रदेश के कई जिलों तक फैला था। इसमें इटावा, सीतापुर, हरदोई, शाहजहांपुर, मुजफ्फरनगर, लखनऊ, कुशीनगर, पीलीभीत और बदायूं जैसे जिलों के नाम सामने आए हैं। इसके अलावा राजस्थान के भरतपुर तक गिरोह के संपर्क होने की बात कही गई है।
इस तरह अलग-अलग जिलों में मौजूद संपर्कों का इस्तेमाल गिरोह के सदस्य वारदात के लिए करते थे। किसी नए इलाके में पहुंचने के बाद सीधे चोरी या लूट करने के बजाय पहले वहां के भौगोलिक और सामाजिक हालात को समझने की कोशिश की जाती थी। पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य संभावित घरों और रास्तों की जानकारी जुटाने के बाद वारदात की योजना बनाते थे।
दिन में रेकी, रात में वारदात
पंखिया गैंग के कथित काम करने का तरीका बेहद योजनाबद्ध बताया गया है। पुलिस के मुताबिक, गिरोह के सदस्य दिन के समय इलाके में घूमकर ऐसे घरों की पहचान करते थे, जिन्हें रात में निशाना बनाया जा सके। खासतौर पर हाईवे के किनारे या मुख्य मार्गों के आसपास स्थित घर इनके निशाने पर रहते थे।
रेकी पूरी होने के बाद गिरोह के सदस्य किराये की कार से निर्धारित स्थान पर पहुंचते थे। इसके बाद रात के समय चोरी या लूट की वारदात को अंजाम दिया जाता था। वारदात के बाद आरोपी उसी वाहन या दूसरे सुरक्षित रास्ते से वहां से निकल जाते थे।
पुलिस को इटावा के इकदिल क्षेत्र में हुई कुछ वारदातों की जांच के दौरान इस गिरोह से जुड़े सुराग मिलने की बात कही गई। मानिकपुर मोड़ के पास 7 अगस्त को एक फौजी के घर हुई चोरी और इसी क्षेत्र में हुई एक अन्य चोरी की घटना की जांच में भी पुलिस ने गिरोह की संलिप्तता के संकेत मिलने की बात कही है।
छह सदस्यों पर 86 गंभीर मुकदमों का दावा
इटावा पुलिस के अनुसार, गिरोह के छह सदस्यों के खिलाफ कुल 86 संगीन आपराधिक मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। गिरफ्तार आरोपियों में पुलिस ने गिरोह के सरगना रमेश कश्यप, मुनीश कुमार जाटव, अनीस अहमद, वसीम, मुकद्दर अली उर्फ पंखिया और इरफान अहमद के नाम बताए हैं।
इटावा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बृजेश कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों का संबंध बदायूं से बताया गया है। पुलिस अब आरोपियों से पूछताछ कर उनके नेटवर्क, पूर्व की वारदातों और चोरी के माल को ठिकाने लगाने के तरीकों की जानकारी जुटाने में लगी है।
लूट की रकम का दस हिस्सों में बंटवारा
पंखिया गैंग के बारे में सामने आई जानकारी का सबसे असामान्य पहलू लूट की रकम का कथित बंटवारा बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य लूट या चोरी से हासिल रकम को दस हिस्सों में बांटते थे।
इन हिस्सों में से एक हिस्सा धार्मिक गतिविधियों पर खर्च करने की बात सामने आई है। गिरोह के सदस्य कथित तौर पर मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाते, भंडारे कराते, भजन और जागरण जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में पैसा लगाते तथा कुछ रकम धार्मिक आयोजनों के लिए दान करते थे।
पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्यों की सोच थी कि अपराध से अर्जित रकम का कुछ हिस्सा धार्मिक कार्यों में लगाने से उनके ऊपर अपराध का नकारात्मक असर कम होगा। अपराध और धार्मिक गतिविधियों के इस विरोधाभासी मेल ने जांच अधिकारियों के सामने भी इस गिरोह की कार्यप्रणाली का एक अलग पहलू रखा है।
चिड़ियों की आवाज से साथियों को करते थे सतर्क
पंखिया गैंग के काम करने के तरीके से जुड़ी एक और बात पुलिस जांच और मीडिया रिपोर्टों में सामने आई है। बताया गया कि गिरोह का सदस्य वसीम चिड़ियों जैसी आवाज निकालकर अपने साथियों को संकेत देता था।
इन आवाजों का इस्तेमाल कथित तौर पर सामान्य बातचीत के बजाय संकेत देने के लिए किया जाता था। जब कोई खतरा दिखाई देता या आसपास किसी व्यक्ति की गतिविधि संदिग्ध लगती, तो आवाज के जरिए दूसरे सदस्यों को सतर्क किया जाता था।
गिरोह के सदस्यों के बीच कुछ विशेष संकेतों और कोडवर्ड के इस्तेमाल की बात भी कही गई है। इस तरह सामान्य व्यक्ति के लिए उनकी बातचीत को समझना मुश्किल होता था और गिरोह के सदस्य आपस में तेजी से सूचना साझा कर लेते थे।
चोरी के गहने खपाने के लिए सुनार से संपर्क
पुलिस के अनुसार, चोरी के बाद सबसे बड़ी चुनौती चोरी किए गए सामान को बेचकर नकदी हासिल करना होती है। पंखिया गैंग ने कथित तौर पर इस समस्या का भी रास्ता निकाल रखा था।
गिरोह में अनीस नाम के एक व्यक्ति के शामिल होने की बात कही गई है, जिसे पुलिस ने सुनार बताया है। आरोप है कि वह सैलून चलाने की आड़ में चोरी के गहनों को खपाने में मदद करता था।
जांच में पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि गिरोह ने अब तक कितनी वारदातों में चोरी के आभूषण और अन्य सामान हासिल किया और उन्हें कहां-कहां बेचा गया। चोरी के माल की बरामदगी और उसके खरीदारों तक पहुंचना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
हाईवे किनारे के घर क्यों बनते थे निशाना?
पुलिस की जांच के अनुसार, हाईवे या मुख्य सड़कों के किनारे स्थित घर गिरोह के लिए इसलिए सुविधाजनक हो सकते थे क्योंकि वहां से वारदात के बाद तेजी से निकलने के लिए वाहन उपलब्ध रहते थे। किराये की कार का इस्तेमाल करने से आरोपियों की अपनी पहचान वाले वाहनों का उपयोग कम होता था।
दिन में रेकी करने के बाद रात में वारदात करना भी इसी रणनीति का हिस्सा बताया गया है। पहले घर और आसपास के क्षेत्र की जानकारी हासिल की जाती थी और फिर अपेक्षाकृत कम आवाजाही वाले समय में चोरी या लूट की जाती थी।
इटावा पुलिस की कार्रवाई से खुला नेटवर्क
इटावा के इकदिल इलाके में पुलिस की कार्रवाई के बाद पंखिया गैंग का कथित नेटवर्क सामने आया। पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ के आधार पर दूसरे जिलों में हुई घटनाओं की कड़ियां जोड़ने की कोशिश शुरू की है।
जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि गिरोह में कितने लोग सक्रिय थे, कौन रेकी करता था, कौन वारदात में शामिल होता था, चोरी का माल कौन खपाता था और लूट की रकम का बंटवारा किस तरह किया जाता था।
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग जिलों में दर्ज मामलों को इस नेटवर्क से जोड़कर देखना है। यदि पूछताछ और साक्ष्यों से इन कड़ियों की पुष्टि होती है तो कई पुरानी चोरी और लूट की घटनाओं के खुलासे की संभावना बन सकती है।
अपराध और दान-पुण्य का विरोधाभासी चेहरा
पंखिया गैंग की कहानी का सबसे उल्लेखनीय पहलू यही है कि जिस रकम को कथित तौर पर चोरी और लूट से हासिल किया जाता था, उसी रकम का एक हिस्सा धार्मिक गतिविधियों में खर्च करने की बात सामने आई है। मंदिर में चढ़ावा, भंडारा, जागरण या भागवत जैसे आयोजनों में पैसा लगाने के पीछे गिरोह की अपनी धारणा बताई गई है।
हालांकि, धार्मिक कार्यों में पैसा खर्च करने से चोरी या लूट की कानूनी और सामाजिक प्रकृति नहीं बदलती। पुलिस की कार्रवाई में सामने आए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों और अदालत के निर्णय के आधार पर होगा।
फिलहाल इटावा पुलिस की कार्रवाई ने ऐसे गिरोह की कार्यप्रणाली पर ध्यान खींचा है, जो दिन में संभावित ठिकानों की पहचान करता था, रात में वारदात को अंजाम देता था, चोरी के माल को खपाने के लिए अलग नेटवर्क का इस्तेमाल करता था और कथित तौर पर लूट की रकम का एक हिस्सा धार्मिक आयोजनों में लगाता था। पुलिस अब गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर इस पूरे नेटवर्क की और परतें खोलने में जुटी है।













