देवरिया

भाटपार रानी में मोहर्रम की नौवीं और दसवीं पर निकला मातमी जुलूस

गूंजे ‘या हुसैन’ के नारे, दिखी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

इरफान अली लारी की रिपोर्ट

देवरिया। जनपद के भाटपार रानी कस्बे में माहे मोहर्रम की नौवीं और दसवीं तारीख पर अकीदतमंदों ने पूरे धार्मिक उत्साह, अनुशासन और श्रद्धा के साथ मातमी जुलूस निकाला। जुलूस के दौरान “या हुसैन”, “हक मौला या हुसैन” और “कर्बला हम जाएंगे” के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। इस अवसर पर न केवल मुस्लिम समुदाय बल्कि हिंदू समाज के लोगों ने भी बढ़-चढ़कर सहभागिता की, जिससे क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहजीब की एक सुंदर मिसाल देखने को मिली।

जामा मस्जिद में पेश इमाम ने बयान की मोहर्रम की अहमियत

मोहर्रम की दसवीं तारीख को जुमे की नमाज के दौरान भाटपार रानी जामा मस्जिद में पेश इमाम हाफिज व कारी ने अपने संबोधन में कर्बला की ऐतिहासिक घटना और इमाम हुसैन की शहादत की हकीकत को विस्तार से बयान किया। उन्होंने कहा कि कर्बला का संदेश केवल एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत के लिए है। यह अन्याय, अत्याचार और जुल्म के खिलाफ सत्य, न्याय और मानवता की रक्षा के लिए संघर्ष का प्रतीक है।

उन्होंने लोगों से आपसी प्रेम, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि इमाम हुसैन का जीवन त्याग, धैर्य और इंसाफ की सबसे बड़ी मिसाल है, जिससे हर व्यक्ति को प्रेरणा लेनी चाहिए।

रंग-बिरंगे ताजियों ने आकर्षित किया लोगों का ध्यान

मोहर्रम के अवसर पर कस्बे एवं आसपास के गांवों से आए ताजियादारों ने आकर्षक और कलात्मक ताजियों का निर्माण कराया था। अलग-अलग डिजाइनों और पारंपरिक शैली में बनाए गए ताजियों ने श्रद्धालुओं और दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

विशेष रूप से भाटपार रानी के वार्ड संख्या-7 स्थित चिकटोली (आंकड़ा नंबर-1) के ताजिए ने अपनी अनूठी बनावट और कलात्मक स्वरूप के कारण लोगों का दिल जीत लिया। स्थानीय लोगों द्वारा तैयार किए गए इस ताजिए की सुंदरता को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े और उसकी सराहना करते नजर आए।

खिलाड़ियों ने पारंपरिक करतबों से बांधा समां

चिकटोली के खिलाड़ियों ने मातमी जुलूस के दौरान पारंपरिक खेलों और हैरतअंगेज करतबों का शानदार प्रदर्शन किया। “या हुसैन” और “कर्बला हम जाएंगे” के नारों के बीच खिलाड़ियों ने अनुशासित ढंग से अपने हुनर का प्रदर्शन कर उपस्थित लोगों की खूब तालियां बटोरीं।

जुलूस आर्य चौक, दुर्गा मंदिर मार्ग, स्टेशन रोड और बेलपार चौराहे से गुजरते हुए कर्बला मैदान की ओर बढ़ा। पूरे मार्ग पर श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों ने जुलूस का स्वागत किया तथा शांति और सौहार्द का परिचय दिया।

कर्बला मैदान में जुटे सैकड़ों ताजियादार

कर्बला मैदान (मैदाने महशर) में भाटपार रानी के अलावा सोहनपार, दुबौली, मेहरौना, स्टेशन रोड, लिटिहा, बिशनपुरा, जसुई समेत कई गांवों से आए ताजियादार अपने-अपने ताजियों और खिलाड़ियों के साथ पहुंचे। यहां विभिन्न अखाड़ों के खिलाड़ियों ने पारंपरिक युद्धकला, लाठी, तलवार और अन्य धार्मिक खेलों का प्रदर्शन किया, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग मौजूद रहे।

हर ताजिए की अपनी अलग पहचान और कलात्मक विशेषता देखने को मिली। श्रद्धालु देर शाम तक कर्बला मैदान में मौजूद रहकर धार्मिक आयोजन का हिस्सा बने रहे।

इमाम हुसैन की शहादत को किया याद

निर्धारित समय पर ताजियादारों और श्रद्धालुओं ने कर्बला की घटना को याद करते हुए कुरआन पाक की आयतों का पाठ किया और अमन, शांति तथा देश की खुशहाली के लिए दुआएं मांगीं। इस दौरान वातावरण पूरी तरह गमगीन हो गया और लोगों ने इमाम हुसैन तथा उनके साथियों की कुर्बानी को श्रद्धापूर्वक याद किया।

श्रद्धालुओं ने कहा कि इमाम हुसैन ने सत्य और इंसाफ की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, इसलिए उनकी शहादत पूरी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत है। दुआओं के बाद लोग “हक मौला या हुसैन” और “इस्लाम के चिराग में फूल हैं हुसैन, ता-हश्र यह चिराग रहेगा जला हुआ” जैसे नारों के साथ भावुक माहौल में अपने-अपने घरों को लौटे।

सुरक्षा व्यवस्था रही पूरी तरह चाक-चौबंद

मोहर्रम के जुलूस को शांतिपूर्ण और सुरक्षित ढंग से संपन्न कराने के लिए भाटपार रानी थाना प्रभारी देवेंद्र कुमार सिंह पुलिस बल के साथ पूरे समय मौजूद रहे। जुलूस के मार्ग पर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे। पुलिस लगातार निगरानी करती रही ताकि किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या अप्रिय घटना न हो।

प्रशासन की सतर्कता और स्थानीय लोगों के सहयोग से पूरा आयोजन शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। पुलिस अधिकारियों ने भी नागरिकों के सहयोग की सराहना करते हुए सभी से भविष्य में भी इसी तरह सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की।

भाईचारे और एकता का संदेश देकर संपन्न हुआ आयोजन

भाटपार रानी में निकला मोहर्रम का मातमी जुलूस केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि इसने सामाजिक एकता, आपसी प्रेम और भाईचारे का भी मजबूत संदेश दिया। हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने एक-दूसरे के साथ मिलकर आयोजन को सफल बनाया, जिससे क्षेत्र की गंगा-जमुनी संस्कृति और सामाजिक समरसता की परंपरा और मजबूत होती दिखाई दी।

मोहर्रम का यह आयोजन श्रद्धा, अनुशासन और सामाजिक सौहार्द का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर लोगों के दिलों में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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