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इप्टा का 84वां स्थापना दिवस : जन संस्कृति के जरिए सामाजिक बदलाव का संदेश

चाईबासा में जनगीतों और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के साथ मनाया गया स्थापना दिवस समारोह

तरुण मोहम्मद की रिपोर्ट

चाईबासा में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के कलाकारों ने रविवार 25 मई को संगठन का 84वां स्थापना दिवस उत्साह और जनसरोकारों के साथ मनाया। गांधी टोला स्थित संतोषी मंदिर के निकट आयोजित इस कार्यक्रम में कलाकारों, संस्कृति कर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर जन संस्कृति की ताकत और सामाजिक चेतना के महत्व को रेखांकित किया।

कार्यक्रम को “जन संस्कृति दिवस” के रूप में आयोजित किया गया, जिसमें जनगीत, विचार गोष्ठी और सांस्कृतिक संवाद के माध्यम से समाज में बढ़ते भ्रष्टाचार, शोषण और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ आवाज बुलंद करने का संकल्प लिया गया।

इप्टा केवल नाट्य संस्था नहीं, जन आंदोलन है : तरुण मुहम्मद

इस अवसर पर बोलते हुए इप्टा चाईबासा के संस्थापक तरुण मुहम्मद ने संगठन की ऐतिहासिक भूमिका और उसके वैचारिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय जन नाट्य संघ देश की उन सांस्कृतिक संस्थाओं में शामिल है, जिसने कला और संस्कृति को आम जनता के संघर्षों से जोड़ा।

उन्होंने कहा कि इप्टा केवल मंचीय प्रस्तुतियों तक सीमित संस्था नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक जन आंदोलन है, जिसका उद्देश्य समाज में जागरूकता पैदा करना और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करना है।

तरुण मुहम्मद ने कहा कि आज के दौर में जब समाज विभिन्न प्रकार की विषमताओं, भ्रष्टाचार और शोषण से जूझ रहा है, तब संस्कृति कर्मियों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि कलाकारों को अपनी रचनात्मकता और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से सामाजिक बदलाव की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जन संस्कृति का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करना भी है।

गांवों में जाकर जन जागरण कर रहे हैं इप्टा कलाकार

कार्यक्रम में इप्टा के पूर्व अध्यक्ष राज किशोर साहू ने कहा कि चाईबासा इप्टा लगातार ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर जन जागरण का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि शहरों के साथ-साथ गांवों में भी सांस्कृतिक चेतना फैलाने की आवश्यकता है, क्योंकि समाज की असली तस्वीर गांवों में दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि इप्टा के कलाकार नुक्कड़ नाटक, जनगीत और सांस्कृतिक अभियानों के माध्यम से लोगों को सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में कला के जरिए शिक्षा, सामाजिक समानता, महिला अधिकार, भ्रष्टाचार विरोध और लोकतांत्रिक मूल्यों का संदेश पहुंचाया जा रहा है।

राज किशोर साहू ने कहा कि संस्कृति समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम है और इप्टा इसी उद्देश्य के साथ लगातार कार्य कर रहा है।

“इंकलाब चाहिए” जनगीत ने बांधा समां

स्थापना दिवस समारोह के दौरान इप्टा चाईबासा के अध्यक्ष कैसर परवेज और उनके साथियों ने प्रसिद्ध जनगीत “इंकलाब चाहिए” प्रस्तुत किया। इस गीत ने पूरे वातावरण को जन चेतना और सामाजिक सरोकारों की ऊर्जा से भर दिया।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने जनगीतों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। कलाकारों ने गीतों और संवादों के माध्यम से सामाजिक बदलाव की आवश्यकता और जनता की भागीदारी का संदेश दिया।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान उपस्थित लोगों ने भी कलाकारों का उत्साहवर्धन किया और कहा कि ऐसी गतिविधियां समाज को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कई वरिष्ठ सदस्य और कलाकार रहे मौजूद

इप्टा के स्थापना दिवस कार्यक्रम में संगठन से जुड़े कई वरिष्ठ सदस्य और कलाकार मौजूद रहे। कार्यक्रम में संस्थापक तरुण मुहम्मद, अध्यक्ष कैसर परवेज, सचिव संजय चौधरी, वरिष्ठ सदस्य राज किशोर साहू, किशोर साव, कोषाध्यक्ष शिव शंकर राम, श्यामल दास, अनु पूर्ति, सुमन गोप, राज कुमारी, पप्पू मछुआ सहित अनेक सदस्य उपस्थित रहे। सभी वक्ताओं ने इप्टा की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने और जन संस्कृति को मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया।

इप्टा की सांस्कृतिक विरासत आज भी प्रासंगिक

भारतीय जन नाट्य संघ की स्थापना ऐसे समय में हुई थी जब देश सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा था। इप्टा ने अपने नाटकों, गीतों और सांस्कृतिक आंदोलनों के माध्यम से जनता की आवाज को मंच प्रदान किया।

आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में इप्टा सामाजिक सरोकारों और जन आंदोलनों से जुड़े मुद्दों को कला के माध्यम से उठाता रहा है। चाईबासा में आयोजित यह कार्यक्रम भी इसी सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा है।

संस्कृति कर्मियों का मानना है कि वर्तमान समय में समाज को जोड़ने, लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने और युवाओं को सकारात्मक दिशा देने में जन संस्कृति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।

 

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