23 अक्टूबर 2026 5:33 पूर्वाह्न

बृजभूषण शरण सिंह की भावुक अपील: बच्चों के भविष्य के लिए कभी-कभी माता-पिता को लेने पड़ते हैं कठोर फैसले

बृजभूषण शरण सिंह श्रीराम कथा में बच्चों की परवरिश और माता-पिता की जिम्मेदारी पर संबोधन देते हुए, साथ में रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर।

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रिपोर्ट: दुर्गा प्रसाद शुक्ला

गोंडा। बच्चों का बेहतर भविष्य केवल उन्हें अच्छी शिक्षा, सुविधाएं और सुख-साधन उपलब्ध कराने से सुनिश्चित नहीं होता, बल्कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखना, उनकी संगति को समझना और जरूरत पड़ने पर उनके हित में कड़े निर्णय लेना भी अभिभावकों की जिम्मेदारी है। इसी संदेश के साथ भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने माता-पिता को बच्चों की परवरिश के प्रति सचेत रहने की सलाह दी है। सीतापुर जिले के सिधौली विधानसभा क्षेत्र में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान उन्होंने अपने परिवार से जुड़ा एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि किस तरह बच्चों के भविष्य की चिंता ने उन्हें बड़ा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया।

पूर्व सांसद का यह भाषण अब सामने आए वीडियो के कारण चर्चा में है। श्रीराम कथा के मंच से उन्होंने अभिभावकों को समझाया कि जीवन की व्यस्तताओं, सामाजिक प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाओं के बीच बच्चों की देखभाल को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके संबोधन में पारिवारिक जिम्मेदारी, अनुशासन और बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता साफ दिखाई दी। अपनी बात रखते समय वह भावुक भी नजर आए।

बच्चों के भविष्य के लिए लिया गांव लौटने का फैसला

बृजभूषण शरण सिंह ने श्रीराम कथा के दौरान अपने परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके बेटे प्रतीक भूषण सिंह और करण भूषण सिंह जब लखनऊ में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, तब परिवार शहर में रहता था। एक दिन वह लखनऊ स्थित अपने घर पहुंचे। वहां कुछ ऐसा देखने को मिला, जो उन्हें बच्चों के हित में उचित नहीं लगा। इसके बाद उन्होंने परिवार को गांव ले जाने का निर्णय कर लिया।

पूर्व सांसद के मुताबिक, उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि अब गांव चलकर रहेंगे। उनका यह फैसला सुनकर पत्नी ने बड़े मकान और वहां उपलब्ध सुविधाओं का हवाला देते हुए सवाल किया कि आखिर इतने बड़े घर को छोड़कर गांव जाने की क्या जरूरत है। शहर में बना मकान, उसकी सुविधाएं और वहां रहने की व्यवस्था छोड़ना आसान निर्णय नहीं था।

लेकिन बृजभूषण शरण सिंह के लिए उस समय मकान से अधिक महत्वपूर्ण बच्चों का भविष्य था। उन्होंने पत्नी के सामने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट करते हुए कहा कि मकान किसने बनवाया है? जब उन्होंने ही मकान बनवाया है, तो जरूरत पड़ने पर उसे गिरवाने का फैसला भी कर सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर गांव जाने के लिए मकान बाधा बन रहा है, तो जेसीबी बुलाकर उसे गिरवा दिया जाएगा।

उनके इस कथन का उद्देश्य केवल मकान छोड़ने की बात कहना नहीं था, बल्कि यह बताना था कि बच्चों के हितों के सामने भौतिक सुविधाओं को सर्वोपरि नहीं रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, जब माता-पिता को यह महसूस हो कि मौजूदा परिस्थितियां बच्चों के भविष्य के अनुकूल नहीं हैं, तो उन्हें बदलाव करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

शहर की सुविधाओं से ज्यादा जरूरी बच्चों की निगरानी

अपने अनुभव को साझा करते हुए पूर्व सांसद ने अभिभावकों को आगाह किया कि बच्चों को अच्छे कपड़े, भोजन, शिक्षा और रहने की सुविधा देना ही पर्याप्त नहीं है। माता-पिता की सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। बच्चों के साथ क्या हो रहा है, वे किन लोगों के संपर्क में हैं, पढ़ाई के प्रति कितने गंभीर हैं और उनका व्यवहार किस दिशा में बदल रहा है, इन बातों पर ध्यान देना अभिभावकों की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि माता-पिता चाहे अपने काम में कितने ही व्यस्त क्यों न हों, उनकी नजर बच्चों पर बनी रहनी चाहिए। बच्चों को सुविधाएं देने के साथ उनकी गतिविधियों की जानकारी रखना भी जरूरी है। कई बार परिवार यह मान लेता है कि अच्छे स्कूल में दाखिला दिला देने, पर्याप्त पैसे देने या शहर में बेहतर मकान उपलब्ध करा देने से बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि बच्चों को सही दिशा देने के लिए समय, संवाद और मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है।

बृजभूषण शरण सिंह का संदेश इसी जिम्मेदारी की ओर ध्यान आकर्षित करता है। बच्चों की परवरिश में लापरवाही का परिणाम तत्काल दिखाई दे या नहीं, लेकिन समय रहते उनकी समस्याओं को समझना और उचित कदम उठाना उनके व्यक्तित्व तथा भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

कभी-कभी कठोर निर्णय लेना भी जरूरी

अपने संबोधन में बृजभूषण शरण सिंह ने स्पष्ट किया कि माता-पिता को बच्चों की भलाई के लिए कभी-कभी ऐसे फैसले लेने पड़ते हैं, जो उस समय परिवार के दूसरे सदस्यों को कठिन या असुविधाजनक लग सकते हैं। उन्होंने अपने लखनऊ से गांव लौटने के फैसले को इसी सोच से जोड़कर प्रस्तुत किया।

उनकी बात का केंद्रीय भाव यह था कि अभिभावकों को बच्चों के भविष्य के मामले में केवल भावनाओं या सुविधाओं के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। यदि किसी परिस्थिति में बदलाव जरूरी हो, तो परिवार को उस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा, अनुशासन और मानसिक विकास को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम कभी-कभी तत्काल कठिन लग सकता है, लेकिन उसका उद्देश्य दूरगामी हित होना चाहिए।

हालांकि, बच्चों के लिए कठोर निर्णय लेने का अर्थ केवल उन पर पाबंदियां लगाना नहीं है। बेहतर परवरिश में बच्चों की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें निर्णयों के पीछे का कारण बताना भी जरूरी है। अनुशासन तभी प्रभावी होता है, जब उसके साथ विश्वास, स्नेह और संवाद बना रहे।

प्रतीक भूषण और करण भूषण का भी किया जिक्र

बृजभूषण शरण सिंह ने अपने भाषण में अपने दोनों बेटों का उल्लेख करते हुए परिवार के अनुभव को श्रोताओं के सामने रखा। प्रतीक भूषण सिंह उत्तर प्रदेश की गोंडा सदर विधानसभा सीट से विधायक हैं। वह जिले की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और लगातार दो बार इस सीट से विधायक चुने जा चुके हैं।

वहीं, करण भूषण सिंह कैसरगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कैसरगंज सीट से बृजभूषण शरण सिंह के स्थान पर करण भूषण सिंह को उम्मीदवार बनाया था। पहलवानों से जुड़े विवाद और उसके बाद बने राजनीतिक माहौल के बीच पार्टी ने यह फैसला किया था। चुनाव में करण भूषण सिंह ने जीत हासिल की और लोकसभा पहुंचे।

पूर्व सांसद ने इन दोनों बेटों का उदाहरण देते हुए गांव लौटने के अपने निर्णय को परिवार के जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया। हालांकि, उनके भाषण का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक उपलब्धियों का बखान करने के बजाय अभिभावकों को यह समझाना था कि बच्चों के भविष्य को लेकर समय रहते सजग रहना कितना महत्वपूर्ण है।

श्रीराम कथा के मंच से परिवार और संस्कारों का संदेश

यह संबोधन सीतापुर जिले के सिधौली विधानसभा क्षेत्र में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान सामने आया। इस धार्मिक आयोजन का आयोजन भाजपा विधायक मनीष रावत की ओर से किया गया था। बृजभूषण शरण सिंह ने कथा के मंच से अपने निजी जीवन का प्रसंग सुनाकर पारिवारिक जिम्मेदारियों और बच्चों की परवरिश पर विचार रखे।

धार्मिक आयोजनों में रामायण और श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से परिवार, कर्तव्य, अनुशासन और संस्कारों की चर्चा होती रही है। ऐसे मंच पर पूर्व सांसद ने अपने अनुभव के आधार पर माता-पिता की भूमिका को रेखांकित किया। उनका कहना था कि बच्चों के जीवन में सही दिशा बनाए रखने के लिए परिवार का ध्यान और समय दोनों आवश्यक हैं।

उनकी भावुक अभिव्यक्ति ने इस विषय को और प्रभावी बना दिया। भाषण का वीडियो सामने आने के बाद बच्चों की परवरिश, अभिभावकों की जिम्मेदारी और परिवार के लिए लिए जाने वाले कठिन निर्णयों को लेकर उनकी टिप्पणी चर्चा का विषय बनी हुई है।

बच्चों को सुविधाओं के साथ समय देना भी जरूरी

आज के दौर में माता-पिता की दिनचर्या पहले से अधिक व्यस्त हो गई है। नौकरी, कारोबार, सामाजिक दायित्व और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच बच्चों के साथ पर्याप्त समय बिताना कई परिवारों के लिए चुनौती बन जाता है। ऐसे में बच्चों की जरूरतों को केवल आर्थिक संसाधनों तक सीमित कर देना उचित नहीं है।

बच्चों की पढ़ाई, मित्रों की संगति, मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल तथा उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों को समझना जरूरी है। यदि बच्चा किसी परेशानी से गुजर रहा है, तो उसे डांटने से पहले उसकी बात सुनना और समस्या की जड़ तक पहुंचना अधिक उपयोगी हो सकता है। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जिसमें बच्चे बिना डर के अपनी बात कह सकें और सही मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें।

बृजभूषण शरण सिंह की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि बच्चों की परवरिश में माता-पिता की भूमिका किसी भी सुविधा या संपत्ति से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनके अनुसार, बच्चों के भविष्य की चिंता केवल परीक्षा के परिणाम या करियर चुनने के समय नहीं होनी चाहिए, बल्कि बचपन से ही उनकी आदतों, व्यवहार और सोच को समझने का प्रयास किया जाना चाहिए।

अंततः बच्चों का बेहतर भविष्य तैयार करने में आर्थिक संसाधनों के साथ समय, संस्कार, अनुशासन और भावनात्मक सहयोग की भी अहम भूमिका होती है। माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने का अवसर दें, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें सही रास्ता दिखाने के लिए जिम्मेदारी से हस्तक्षेप भी करें। सीतापुर की श्रीराम कथा में बृजभूषण शरण सिंह द्वारा साझा किया गया पारिवारिक प्रसंग इसी जिम्मेदारी की याद दिलाता है।

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