22 अक्टूबर 2026 8:22 अपराह्न

शुक्ला जी कहिन : गांव मा विकास लापता, चुनाव मा नेताजी आपे-आप हाजिर!

जनगणदूत के साप्ताहिक व्यंग्य स्तंभ शुक्ला जी कहिन में दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर, दुलहापुर बनकट गोंडा की ग्रामीण राजनीति, चुनावी वादों, विकास कार्यों और गांव की चौपाल का चित्रण।

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

✍️ दुर्गा प्रसाद शुक्ला की प्रस्तुति

आलेख- संपादकीय विभाग

संपादकीय इंट्रो: ग्रामीण भारत की असली तस्वीर केवल सरकारी आंकड़ों, चुनावी भाषणों और विकास के दावों में नहीं, बल्कि गांव की चौपाल, चाय की दुकान और आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देती है। इसी अनदेखी दुनिया की आवाज को पाठकों तक पहुंचाने के लिए जनगणदूत का नया साप्ताहिक व्यंग्य स्तंभ ‘शुक्ला जी कहिन’ प्रत्येक गुरुवार को प्रस्तुत किया जाएगा। हमारे वरिष्ठ संस्थापक सहयोगी दुर्गा प्रसाद शुक्ला इस स्तंभ में ग्रामीण राजनीति, पंचायत व्यवस्था, विकास कार्यों, संस्कृति, सामाजिक समस्याओं तथा अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़ी चर्चाओं को स्थानीय बोलचाल, हास्य और व्यंग्य के अंदाज में सामने रखेंगे। स्तंभ की शुरुआत उनके गृह ग्राम दुलहापुर बनकट, जिला गोंडा से हो रही है, जहां चुनावी वादों और विकास की हकीकत के बीच आम ग्रामीण की उम्मीदें भी हैं और सवाल भी।

✍️ दुर्गा प्रसाद शुक्ला की प्रस्तुति

आलेख- संपादकीय विभाग

साप्ताहिक व्यंग्य स्तंभ — शुक्ला जी कहिन

गांव की चौपाल: विकास बाबू कब अइहैं?

का हो दद्दा! का हाल बा? गांव मा सब कुशल-मंगल त बा न! सड़किया बनत बा कि अबहिन कागजै पर दौड़त बा? नाली मा पानी बहत बा कि पानी के इंतजार मा नाली खुदै सूख के तपस्या करै लाग बा? अउर प्रधान जी के दरवज्जे पर जनता के भीड़ बा कि चुनाव के मौसम देख के नेताजी खुदै जनता के दरवज्जे पर दस्तक देय लाग हैं?

अरे भइया, जरा ठहरो! ई सवाल हम यूंही नहीं पूछ रहे। हम हैं दुर्गा प्रसाद शुक्ला, अउर आज से हर हफ्ते आपसे बतियाएंगे अपने नए साप्ताहिक स्तंभ ‘शुक्ला जी कहिन’ मा। यहां न भाषण के भारी-भरकम गठरी मिलेगी, न सरकारी विज्ञप्ति के नीरस पकवान। यहां मिलेगी गांव की माटी की खुशबू, चौपाल की चुहल, चाय की दुकान का चटखारा अउर राजनीति के उन किस्सन पर हंसी, जिनका असर गांव के हर घर तक पहुंचत है।

हमरी कोशिश बस इत्ते भर है कि गांव की उन बातन को सामने लाया जाए, जिन पर बड़े-बड़े मंचन पर चर्चा कम होती है, मगर जिनके बिना ग्रामीण भारत की असली तस्वीर अधूरी रह जाती है। हंसी-हंसी मा ऐसी बात कहि जाए कि सुनै वाला मुस्कुराए भी अउर सोचै पर मजबूर भी हो जाए। तो चलिए, आज की चौपाल जमाते हैं हमारे अपने गृह ग्राम दुलहापुर बनकट, जिला गोंडा मा। मुद्दा है गांव का विकास, चुनावी माहौल और राजनीति के वो रंग, जिनके आगे गिरगिट भी अपनी रंग बदलै की कला पर दोबारा विचार करै लाग!

चुनावी बयार: नेता जी के दरवाजे पर जनता, जनता के दरवाजे पर नेता!

चुनाव का मौसम आते ही गांव की हवा बदलने लगती है। जो नेताजी साल भर फोन उठाने में व्यस्त रहते हैं, वे अचानक इतने खाली हो जाते हैं कि हर गली, हर मोहल्ले और हर दरवाजे पर पहुंचने लगते हैं। कल तक जिनके दरवाजे पर फरियादी घंटों खड़े रहते थे, आज वही नेताजी हाथ जोड़कर कह रहे हैं—“चाचा, आशीर्वाद बनाए रखिहैं!”

लल्लन काका भी अब पुराने वाले लल्लन नहीं रहे। नेताजी आए तो बोले, “बैठा बेटा, पानी पिया। बाकिर एक बात बतावा—पिछली दफा जे नल लगवावे का वादा किहे रहे, ओकर का भवा?” नेताजी मुस्कुराए। बोले, “काका, योजना प्रक्रिया मा है।” काका ने पूछा, “अच्छा! त पानी कब आई?” नेताजी बोले, “बहुत जल्द!” काका ने फिर पूछा, “ई बहुत जल्द के उमिर कितनी है बेटा? पिछली बार से अब तक त हमार पोता स्कूल जाए लाग, ओकर उमिर भी बढ़ गई!” अब नेताजी के मुस्कुराए की बारी थी, लेकिन इस बार मुस्कान कुछ फीकी पड़ गई।

भाइयों, चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, मगर उत्सव तभी सार्थक है जब जनता अपने सवाल पूछे और जनप्रतिनिधि अपने काम का हिसाब दें। गांव का मतदाता केवल जाति, बिरादरी, रिश्तेदारी या चुनावी नारों से नहीं, बल्कि अपने रोजमर्रा के अनुभवों से भी फैसला कर सकता है। कौन सड़क बनवाया? कहां नाली बनी? किस पात्र परिवार को सरकारी योजना का लाभ मिला? पंचायत में किन कामों पर कितना पैसा खर्च हुआ? इन सवालों का जवाब मिलना चाहिए। आखिर जनता का वोट कोई उधार का सिक्का थोड़े है, जिसे लेकर पांच साल तक हिसाब-किताब बंद कर दिया जाए!

पंचायत की राजनीति: कुर्सी छोटी, गणित बड़ा!

दुलहापुर बनकट की पंचायत हो या किसी बड़े शहर की राजनीति, कुर्सी का आकर्षण हर जगह निराला है। कुर्सी लकड़ी की हो या लोहे की, उस पर बैठते ही आदमी का वजन कभी-कभी बढ़ जाता है। शरीर का नहीं, विचारों का! गांव की चौपाल पर एक दिन बहस छिड़ गई कि पंचायत का असली विकास किससे होता है। कोई बोला—सड़क से, कोई बोला—नाली से, कोई बोला—पानी से। तभी एक बुजुर्ग ने हंसते हुए कहा, “भइया, विकास इन सब से होत है, बाकिर सबसे पहिले विकास की नीयत मा होय के चाही!” बात सुनकर सब चुप।

सच पूछिए तो पंचायत लोकतंत्र की सबसे नजदीकी पाठशाला है। यहां फैसलों का असर सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ता है। इसलिए ग्रामसभा की बैठक केवल सरकारी खानापूर्ति न बने। गांव के लोगों को पता होना चाहिए कि उनके नाम पर कौन-सी योजना आई, किस काम के लिए कितना बजट स्वीकृत हुआ और काम पूरा हुआ या नहीं। अगर किसी काम में गड़बड़ी का संदेह हो तो सवाल पूछना गलत नहीं। लेकिन बिना प्रमाण किसी पर आरोप लगाना भी उचित नहीं। जांच हो, दस्तावेज देखे जाएं, संबंधित पक्ष की बात सुनी जाए और फिर निष्कर्ष निकले। यही तरीका गांव की राजनीति को चुगली से निकालकर जवाबदेही की राह पर ले जाएगा।

और हां, प्रधान जी को भी यह समझना होगा कि जनता के सवाल विरोध नहीं, लोकतंत्र की जरूरत हैं। जो प्रतिनिधि सवाल सुनकर नाराज हो जाए, उसे चाय की दुकान पर बैठकर ननकऊ भइया से लोकतंत्र का एक छोटा-सा पाठ जरूर पढ़ लेना चाहिए!

संस्कृति और चौपाल: गांव की असली संसद

दुलहापुर बनकट की पहचान केवल चुनावी जोड़-घटाव से नहीं है। गांव की असली ताकत उसकी संस्कृति, आपसी सहयोग, लोकगीत, मेल-मिलाप और बुजुर्गों के अनुभव में बसती है। कभी चौपाल पर खेती-बारी की चर्चा होती थी, कभी किसी के घर शादी-ब्याह की तैयारी में पूरा गांव जुट जाता था। कहीं रामलीला की तैयारी, कहीं धार्मिक आयोजन, कहीं बच्चों की पढ़ाई और कहीं खेत में पानी लगाने की चिंता—यही गांव की जिंदगी का असली रंग है।

अब समय बदल रहा है। मोबाइल फोन ने दुनिया को जेब में पहुंचा दिया है। गांव की खबर शहर तक और शहर की खबर गांव तक पल भर में पहुंच जाती है। लेकिन इसी के साथ अफवाह भी तेजी से फैलती है। किसी ने आधी बात सुनी, दूसरे ने उसमें अपना मसाला डाला और तीसरे ने उसे पक्की खबर बनाकर पूरे गांव में बांट दिया। रामखेलावन की चाय की दुकान पर एक दिन ऐसी ही चर्चा चल रही थी। भोला मास्टर ने समझाया, “भइया, मोबाइल पर आई हर बात सच नहीं होत। पहिले जांचा, फिर माना।” लल्लन काका बोले, “मास्टर, अब त झूठ भी फोटो लगाकर आवत है!” सब हंस पड़े।

मगर काका की बात में गंभीरता थी। ग्रामीण समाज में मेल-जोल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि अफवाहों के बजाय भरोसेमंद सूचना पर ध्यान दिया जाए। गांव की संस्कृति तभी मजबूत होगी जब असहमति के बावजूद लोग एक-दूसरे का सम्मान करना सीखें।

अपराध और भ्रष्टाचार: चर्चा हो, मगर सबूत के साथ!

अब जरा बात उस विषय की, जिसका नाम सुनते ही गांव की चौपाल पर आवाजें कुछ धीमी और चेहरे कुछ गंभीर हो जाते हैं—अपराध और भ्रष्टाचार। गांव हो या जिला मुख्यालय, कानून-व्यवस्था और सरकारी कामकाज की पारदर्शिता आम आदमी की जिंदगी से सीधे जुड़े मुद्दे हैं। कहीं जमीन के विवाद की चर्चा होती है, कहीं सरकारी काम में देरी की शिकायत सामने आती है, कहीं लोगों को किसी दफ्तर में अपना काम कराने के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं।

लेकिन शुक्ला जी की चौपाल में एक नियम पक्का है—बात होगी, बेबात बदनामी नहीं होगी। किसी घटना की जानकारी मिले तो उसकी पुष्टि जरूरी है। शिकायत हो तो संबंधित विभाग तक पहुंचनी चाहिए। मामला गंभीर हो तो पुलिस, प्रशासन या उचित शिकायत व्यवस्था का सहारा लेना चाहिए। केवल सुनी-सुनाई बात को सच मानकर किसी का नाम उछाल देना पत्रकारिता नहीं, जल्दबाजी है।

दुलहापुर बनकट से जिला मुख्यालय गोंडा तक प्रशासनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि नागरिकों की शिकायतें सुनी जाएं, कानून का पालन हो और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचे। वहीं नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे गलत काम के खिलाफ आवाज उठाएं, मगर तथ्य और मर्यादा के साथ। हमारा व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर चोट करने के लिए है जो जनता के काम को पीछे और निजी स्वार्थ को आगे रखती है। क्योंकि भाई, भ्रष्टाचार पर हंसना आसान है, उसे रोकने के लिए सवाल पूछना और प्रमाण जुटाना थोड़ा कठिन। लेकिन बदलाव की शुरुआत उसी कठिन काम से होती है।

जिला मुख्यालय की दौड़: फाइल चली कि चाय पीने रुकी?

गांव का कोई काम जब पंचायत स्तर पर नहीं सुलझता तो मामला ब्लॉक पहुंचता है। वहां से आगे बढ़े तो जिला मुख्यालय गोंडा की राह पकड़ता है। फिर शुरू होता है आवेदन, दस्तखत, मुहर, कागज और तारीखों का ऐसा सफर कि फरियादी सोचने लगता है—“हम काम करावै आए हैं कि सरकारी दफ्तरन की परिक्रमा करै?”

एक काल्पनिक फरियादी की सुनिए। वह आवेदन लेकर पहुंचा और पूछा, “बाबू साहेब, काम कब होई?” जवाब मिला, “फाइल चल रही है।” फरियादी ने भोलेपन से पूछ लिया, “साहेब, फाइल पैदल चलत है कि मोटरसाइकिल पर? जरा बता दीजिए, हम भी पीछे-पीछे चल लें!” बाबू साहेब मुस्कुराए, फरियादी मुस्कुराया, मगर काम का जवाब फिर भी नहीं मिला।

यह किस्सा किसी खास दफ्तर या कर्मचारी पर आरोप नहीं, बल्कि उस आम अनुभव पर हल्का व्यंग्य है जिसमें लोगों को अपने काम की स्थिति जानने के लिए स्पष्ट सूचना नहीं मिल पाती। प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता हो, आवेदन की स्थिति पता चले और तय समय में काम पूरा हो, तो जनता का भरोसा भी बढ़ेगा और दफ्तरों की छवि भी सुधरेगी। जिला मुख्यालय की खबर केवल बड़ी बैठकों और बड़े अधिकारियों के दौरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि गांव से आया साधारण आदमी अपनी समस्या लेकर पहुंचा तो उसकी सुनवाई हुई या नहीं। आखिर लोकतंत्र की असली परीक्षा बड़े मंचों पर नहीं, आम नागरिक के काम के वक्त होती है।

अबकी चौपाल का सवाल: विकास चाहिए कि केवल विकास की चर्चा?

दुलहापुर बनकट की इस पहली नमूना चौपाल में हम किसी को विजेता या खलनायक घोषित नहीं करेंगे। हमारा मकसद है गांव की जिंदगी को गांव की ही भाषा में समझना, उन सवालों को उठाना जिन्हें अक्सर बड़ी खबरों की चमक में जगह नहीं मिलती। हम पूछेंगे कि गांव की सड़क कैसी है, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा कैसी है, युवाओं के रोजगार की स्थिति क्या है, सरकारी योजनाओं का लाभ किसे मिल रहा है और पंचायत से लेकर जिला मुख्यालय तक आम आदमी की सुनवाई कैसे हो रही है।

हम चुनावी माहौल की चर्चा करेंगे, मगर किसी दल का प्रचार करने के लिए नहीं। संस्कृति की बात करेंगे, मगर अतीत का गुणगान करके वर्तमान की समस्याएं छिपाने के लिए नहीं। अपराध और भ्रष्टाचार पर लिखेंगे, मगर किसी अपुष्ट आरोप को सच बनाकर पेश करने के लिए नहीं। हमारी भाषा में गांव का ठेठपन रहेगा, बात में हास्य रहेगा और व्यंग्य में चुटकी भी होगी। पर कोशिश यही रहेगी कि हंसी के पीछे छिपा सवाल पाठक तक पहुंचे।

तो दद्दा, अगली बार जब आप चाय की दुकान पर बैठें और कोई कहे कि गांव का विकास हो रहा है, तो बस इतना पूछ लीजिएगा—“अच्छा भइया, विकास कहां तक पहुंचा? सड़क तक, नाली तक, स्कूल तक कि अभी भाषणै तक?” जवाब चाहे जो मिले, चौपाल की चर्चा जरूर आगे बढ़ाइए। काहे कि गांव की आवाज सुनी जाएगी, तभी गांव की तस्वीर बदलेगी।

बाकी, शुक्ला जी कहिन—बात में दम हो, तो ठहाका भी बदलाव का काम करता है!

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें