22 अक्टूबर 2026 2:18 अपराह्न

यूपी सिंचाई विभाग में 16 करोड़ का कथित घोटाला : 344 कथित कर्मचारियों के नाम पर भुगतान, जांच के दायरे पर सवाल

यूपी सिंचाई विभाग में 16 करोड़ रुपये के कथित एरियर घोटाले की खबर, 344 कथित कर्मचारियों के नाम पर भुगतान और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर।

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जनगणदूत | विशेष समाचार
रिपोर्टर: दुर्गा प्रसाद शुक्ला

मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश। यूपी सिंचाई विभाग घोटाला। उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में कथित वित्तीय अनियमितता का एक गंभीर मामला सामने आया है। मिर्जापुर कैनाल डिविजन के लघु डाल पम्प कैनाल खंड में 344 कथित कर्मचारियों के नाम पर लगभग 16 करोड़ रुपये के एरियर भुगतान का मामला ऑडिट जांच में सामने आने की जानकारी है। बताया जा रहा है कि संबंधित लोगों की विभाग में नियुक्ति नहीं हुई थी, इसके बावजूद उनके नाम पर ट्रेजरी में खाते खुलवाकर भुगतान किया गया। महालेखाकार प्रयागराज की ऑडिट टीम के सामने मामला आने के बाद विभाग में हलचल मच गई। एकाउंटेंट जितेंद्र कुमार को निलंबित किए जाने और उनके साथ एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराए जाने की जानकारी सामने आई है।

यूपी सिंचाई विभाग घोटाले के इस मामले ने सरकारी भुगतान प्रणाली, वित्तीय निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि यदि 344 लोगों की नियुक्ति का रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, तो उनके नाम पर एरियर की गणना और भुगतान किस आधार पर हुआ? क्या बिल तैयार करने, उनका सत्यापन करने और भुगतान की मंजूरी देने वाली पूरी प्रक्रिया की जांच होगी? फिलहाल इन सवालों के जवाब आधिकारिक जांच और दस्तावेजों की पड़ताल से ही स्पष्ट हो सकेंगे।

यूपी सिंचाई विभाग घोटाला: ऑडिट में सामने आया 16 करोड़ के भुगतान का मामला

प्राप्त जानकारी के अनुसार, महालेखाकार प्रयागराज की दस सदस्यीय ऑडिट टीम ने वर्तमान वित्तीय वर्ष के अभिलेखों की जांच 14 अक्तूबर से शुरू की थी। जांच के दौरान 16 अक्तूबर को लगभग 16 करोड़ रुपये के कथित फर्जी एरियर भुगतान का मामला सामने आया। आरोप है कि लघु डाल पम्प कैनाल खंड के 344 ऐसे लोगों के नाम पर भुगतान किया गया, जिनकी विभाग में नियुक्ति नहीं हुई थी। भुगतान के लिए ट्रेजरी में खाते खुलवाए जाने की बात भी सामने आई है।

ऑडिट टीम की जांच में मामला सामने आने के बाद मिर्जापुर कैनाल डिविजन के अधिकारियों के बीच हलचल तेज हो गई। बताया गया है कि अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार ने 18 अक्तूबर को शहर कोतवाली में एकाउंटेंट जितेंद्र कुमार और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। इसके बाद एकाउंटेंट को निलंबित कर दिया गया। हालांकि, अभी यह स्पष्ट होना बाकी है कि कथित भुगतान की पूरी प्रक्रिया में किन-किन लोगों की भूमिका थी और सरकारी धन के लेन-देन की जांच में आगे क्या तथ्य सामने आते हैं।

344 कथित कर्मचारियों के नाम पर एरियर भुगतान कैसे हुआ?

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिन 344 लोगों के नाम पर भुगतान किए जाने का आरोप है, उनकी विभाग में नियुक्ति नहीं हुई थी। ऐसे में जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि उनके नाम, बैंक खातों और सेवा विवरण से संबंधित जानकारियां कहां से जुटाई गईं। यह भी स्पष्ट करना होगा कि एरियर भुगतान के बिल किसने तैयार किए, उनमें दर्ज विवरणों का सत्यापन किसने किया और भुगतान से पहले किन अधिकारियों ने स्वीकृति दी।

नियमानुसार एरियर किसी कर्मचारी को पूर्व अवधि में देय, लेकिन बाद में भुगतान की जाने वाली बकाया राशि होती है। इसकी गणना और भुगतान के लिए संबंधित कर्मचारी की पात्रता, सेवा संबंधी अभिलेख, स्वीकृत देय राशि और जरूरी वित्तीय अनुमोदन की जांच अपेक्षित होती है। यदि किसी व्यक्ति की नियुक्ति का रिकॉर्ड ही नहीं है, तो उसके नाम पर एरियर की पात्रता किस आधार पर तय की गई, यह जांच का केंद्रीय प्रश्न है।

यूपी सिंचाई विभाग के इस कथित घोटाले में केवल भुगतान पाने वाले खातों की पहचान पर्याप्त नहीं होगी। बिल तैयार करने वाले कर्मचारियों, अभिलेखों का परीक्षण करने वाले अधिकारियों और भुगतान की प्रक्रिया में शामिल सभी संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच जरूरी है। इसके लिए नियुक्ति आदेशों, सेवा पुस्तिकाओं, भुगतान बिलों, बैंक खातों और ट्रेजरी रिकॉर्ड का आपस में मिलान किया जाना चाहिए।

दस खंडों के एरियर भुगतान की जिम्मेदारी भी जांच के घेरे में

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मिर्जापुर कैनाल डिविजन के अधिशासी अभियंता को अन्य दस खंडों के कर्मचारियों के एरियर भुगतान के लिए आहरण एवं वितरण अधिकारी यानी डीडीओ के अधिकार दिए गए हैं। संबंधित व्यवस्था के तहत लिपिक और एकाउंटेंट कर्मचारियों के एरियर बिल तैयार करते हैं। इसके बाद बिल अधिशासी अभियंता के हस्ताक्षर के लिए भेजे जाते हैं और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने पर ट्रेजरी के माध्यम से भुगतान किया जाता है।

ऐसे में यह जांचना आवश्यक है कि कथित अनियमित भुगतान के बिल किसने तैयार किए, किसने उनका परीक्षण किया और किस स्तर पर उन्हें स्वीकृति मिली। यदि भुगतान से पहले नियुक्ति और सेवा संबंधी दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया गया, तो इसकी वजह और जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कहीं निर्धारित वित्तीय नियंत्रणों की अनदेखी तो नहीं हुई।

हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी केवल उसके पद के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों, हस्ताक्षरों, आदेशों, डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक भूमिका की जांच जरूरी है। लगभग 16 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में निष्पक्ष जांच का दायरा भुगतान प्रक्रिया के प्रत्येक चरण तक पहुंचना चाहिए, ताकि किसी जिम्मेदार व्यक्ति को अनुचित लाभ न मिले और किसी निर्दोष को बिना प्रमाण दोषी न ठहराया जाए।

क्या सरकारी खाते में रकम जमा कराकर मामले को दबाने की कोशिश हुई?

इस मामले से जुड़ी एक अन्य चर्चा यह है कि कथित गड़बड़ी सामने आने के बाद शासकीय मद में इससे अधिक धनराशि जमा कराए जाने की बात कही जा रही है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि और विस्तृत वित्तीय विवरण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय जांच का विषय माना जाना चाहिए। संबंधित खाते की प्रविष्टियों, रकम जमा करने की तारीख, धन के स्रोत और भुगतान से उसके संबंध की पड़ताल आवश्यक है।

यदि कोई राशि वापस जमा कराई गई है, तो इससे मूल भुगतान की वैधता का प्रश्न अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि सरकारी धन किस आधार पर निकाला गया, किन खातों में पहुंचा और वापस जमा कराई गई राशि का कथित भुगतान से क्या संबंध है। धन की वापसी और अनियमित भुगतान की जिम्मेदारी निर्धारित करना अलग-अलग विषय हैं। दोनों पर दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

क्या यूपी सिंचाई विभाग के दूसरे डिविजनों में भी हुई गड़बड़ी?

मिर्जापुर में कथित एरियर घोटाले का मामला सामने आने के बाद अब सिंचाई विभाग के दूसरे डिविजनों में किए गए भुगतानों की जांच का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। ऑडिट टीम के एक सदस्य के हवाले से अन्य डिविजनों में भी ऐसी गड़बड़ी की आशंका जताए जाने की जानकारी है। हालांकि, अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि दूसरे डिविजनों में भी इसी तरह का घोटाला हुआ है।

इसके बावजूद, सरकारी धन की सुरक्षा के लिए अन्य खंडों के एरियर भुगतान का परीक्षण किया जाना चाहिए। नियुक्ति आदेशों, सेवा पुस्तिकाओं, भुगतान सूचियों, बैंक खातों और ट्रेजरी रिकॉर्ड का मिलान करके यह पता लगाया जा सकता है कि सभी भुगतान वास्तविक कर्मचारियों को हुए या नहीं। विशेष रूप से उन मामलों की जांच उपयोगी होगी, जिनमें कम समय में बड़ी संख्या में नए खाते जोड़े गए हों, भुगतान की रकम असामान्य हो या कर्मचारी के सेवा रिकॉर्ड और भुगतान विवरण में अंतर मिले।

बताया गया है कि वित्तीय वर्ष 2024-25 के एरियर का भुगतान वर्ष 2026 में किया जाना था। इसलिए जांच में एरियर की गणना, भुगतान की स्वीकृति, संबंधित वित्तीय वर्ष के अभिलेख और धनराशि के वास्तविक लाभार्थियों का सत्यापन भी शामिल होना चाहिए। व्यापक जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल एक खंड तक सीमित है या भुगतान व्यवस्था में ऐसी कमियां हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है।

सरकारी धन की सुरक्षा के लिए जरूरी है पारदर्शी जांच

यूपी सिंचाई विभाग में कथित वित्तीय अनियमितता जैसे मामलों की रोकथाम के लिए घटना सामने आने के बाद कार्रवाई करना ही पर्याप्त नहीं है। भुगतान प्रणाली में ऐसे नियंत्रण जरूरी हैं, जिनसे फर्जी नामों पर बिल तैयार करना और उन्हें मंजूरी दिलाना कठिन हो। प्रत्येक कर्मचारी की नियुक्ति, सेवा स्थिति, बैंक खाते और एरियर की पात्रता का परस्पर सत्यापन किया जाना चाहिए। बिल तैयार करने और स्वीकृत करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए तथा डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

इसके साथ ही, संदिग्ध खातों में पहुंची रकम का पता लगाना, वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना और वित्तीय दस्तावेजों को सुरक्षित रखना जांच की प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए। यदि जांच में सरकारी धन के गबन या धोखाधड़ी के साक्ष्य मिलते हैं, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। अन्य अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका सामने आने पर उनके विरुद्ध भी साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।

जांच की प्रगति, सत्यापित वित्तीय नुकसान, धन की वसूली और जिम्मेदारी तय किए जाने के बारे में नियमानुसार जानकारी सार्वजनिक करना भी महत्वपूर्ण है। इससे जनता को पता चलेगा कि मामले में केवल शुरुआती कार्रवाई हुई है या भुगतान व्यवस्था की खामियों को दूर करने के लिए ठोस कदम भी उठाए जा रहे हैं।

अधिशासी अभियंता ने कही कठोर कार्रवाई की बात

मिर्जापुर कैनाल डिविजन के अधिशासी अभियंता प्रमोद कुमार के अनुसार, मामले का ऑडिट कराया जा रहा है। उनका कहना है कि जांच में जो भी अनियमितता सामने आएगी, उसके आधार पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि एकाउंटेंट जितेंद्र कुमार और एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। यदि मामले में अन्य कर्मचारियों की संलिप्तता सामने आती है, तो उनके खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच कितनी व्यापक रहती है और कथित भुगतान से जुड़े सभी दस्तावेजों की पड़ताल की जाती है या नहीं। क्या 344 लोगों के नाम पर हुए भुगतान की पूरी सूची का सत्यापन होगा? क्या ट्रेजरी और बैंक रिकॉर्ड से वास्तविक लाभार्थियों की पहचान की जाएगी? क्या भुगतान प्रक्रिया में शामिल सभी जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित होगी? इन सवालों के जवाब जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही मिल सकेंगे।

सबसे बड़ा सवाल: क्या जांच केवल एकाउंटेंट तक सीमित रहेगी?

यूपी सिंचाई विभाग में सामने आया कथित 16 करोड़ रुपये का एरियर घोटाला केवल एफआईआर और निलंबन तक सीमित रहने वाला मामला नहीं होना चाहिए। यदि 344 लोगों के नाम पर भुगतान हुआ और उनकी नियुक्ति का रिकॉर्ड नहीं मिला, तो यह जानना आवश्यक है कि बिल किस आधार पर तैयार हुए, सत्यापन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई और सरकारी धन किन खातों तक पहुंचा। साथ ही, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और किसी को बिना पर्याप्त साक्ष्य दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

सरकारी धन जनता के पैसे से आता है और उसकी प्रत्येक निकासी का हिसाब देना प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसलिए इस मामले में पारदर्शी जांच, दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर जवाबदेही, संदिग्ध धन की पड़ताल और जरूरत पड़ने पर दूसरे डिविजनों का ऑडिट जरूरी है। जांच के निष्कर्ष ही बताएंगे कि मिर्जापुर में सामने आया कथित घोटाला एक सीमित वित्तीय अनियमितता है या भुगतान व्यवस्था में मौजूद व्यापक कमियों का संकेत।

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