उन्नाव

यूपी का ‘धुरंधर’ गांव, जिसके पास 32 साल तक रही विधायकी का दबदबा : गाँव ने रचा इतिहास

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जिन्होंने समय-समय पर बड़े नेताओं को जन्म दिया, लेकिन उन्नाव जिले का एक छोटा सा गांव लउआ अपने आप में राजनीतिक इतिहास का अनोखा उदाहरण बन गया। यह ऐसा गांव है, जिसने करीब 32 वर्षों तक पुरवा विधानसभा की राजनीति पर अपना प्रभाव कायम रखा। यहां के दो नेताओं ने आठ बार विधानसभा चुनाव जीतकर न केवल अपने गांव का नाम रोशन किया, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी मजबूत पहचान बनाई।

पुरवा विधानसभा क्षेत्र के हिलौली ब्लॉक में स्थित लउआ गांव लंबे समय तक राजनीतिक शक्ति का केंद्र बना रहा। 1985 से लेकर 2012 तक इस गांव के नेताओं का ऐसा दबदबा रहा कि जनता ने लगातार बारी-बारी से इन्हीं चेहरों को विधानसभा भेजा। खास बात यह रही कि दोनों नेता अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े रहे, लेकिन जनता के बीच उनकी पकड़ कभी कमजोर नहीं हुई।

पुरवा विधानसभा में बना लउआ गांव का राजनीतिक किला

उन्नाव जिले की छह विधानसभा सीटों में पुरवा सीट को हमेशा राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना गया है। यहां जातीय और सामाजिक समीकरण चुनावी परिणामों को गहराई से प्रभावित करते रहे हैं। पिछड़ा वर्ग बहुल इस विधानसभा क्षेत्र में लोधी और यादव मतदाताओं की संख्या अधिक है, जबकि सवर्ण और मुस्लिम मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

इन्हीं समीकरणों के बीच लउआ गांव ने ऐसा राजनीतिक इतिहास लिखा, जिसकी चर्चा आज भी क्षेत्र में होती है। 1952 से लेकर 2022 तक पुरवा विधानसभा में कुल 18 चुनाव हुए, जिनमें से आठ बार विधायक बनने का गौरव केवल इसी गांव को मिला। यह उपलब्धि प्रदेश की राजनीति में बेहद दुर्लभ मानी जाती है।

हृदय नारायण दीक्षित ने बनाई वैचारिक राजनीति की पहचान

हृदय नारायण दीक्षित का नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा पुरवा विधानसभा से शुरू की और जल्द ही क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना ली।

वर्ष 1985 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़कर पहली बार जीत हासिल की। इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। 1989 में जनता दल, 1991 में जनता पार्टी और 1993 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर उन्होंने जीत दर्ज की और लगातार चार बार विधायक बनने का रिकॉर्ड बनाया।

हृदय नारायण दीक्षित केवल चुनाव जीतने वाले नेता नहीं रहे, बल्कि उन्हें वैचारिक राजनीति का मजबूत चेहरा माना गया। उनकी संगठन क्षमता, संसदीय ज्ञान और प्रभावशाली भाषण शैली ने उन्हें प्रदेश स्तर पर खास पहचान दिलाई। बाद में वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और 2017 में भगवंत नगर विधानसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतकर फिर विधानसभा पहुंचे।

राजनीतिक जीवन में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब मानी गई, जब उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा का अध्यक्ष बनाया गया। संसदीय परंपराओं की गहरी समझ के कारण उन्हें एक विद्वान राजनेता के रूप में देखा जाता है। उन्हें पद्मश्री सम्मान से भी नवाजा जा चुका है।

उदय राज यादव बने समाजवादी राजनीति का मजबूत चेहरा

लउआ गांव के दूसरे बड़े नेता उदय राज यादव रहे, जिन्होंने समाजवादी राजनीति के जरिए जनता के बीच मजबूत पकड़ बनाई। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से सीधा संवाद कायम किया और अपनी सादगीपूर्ण शैली से मतदाताओं का भरोसा जीता।

उदय राज यादव ने 1996, 2002, 2007 और 2012 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर पुरवा विधानसभा से चुनाव लड़ा और लगातार चार बार जीत हासिल की। उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा आम जनता रही। क्षेत्र में किसी भी सामाजिक या व्यक्तिगत समस्या में उनकी सक्रिय मौजूदगी उन्हें जनता के और करीब ले गई।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उदय राज यादव की सबसे बड़ी ताकत उनका जनसंपर्क रहा। वे केवल चुनावी समय में नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में जनता के बीच मौजूद रहते थे। यही कारण था कि समाजवादी पार्टी की विचारधारा के साथ-साथ उनकी व्यक्तिगत छवि भी क्षेत्र में बेहद मजबूत बनी रही।

हालांकि 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। माना जाता है कि प्रदेश में भाजपा की मजबूत लहर और बदलते राजनीतिक समीकरणों का असर इन चुनावों में साफ दिखाई दिया।

पार्टी नहीं, व्यक्तित्व पर भरोसा करती रही जनता

पुरवा विधानसभा की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि यहां मतदाता अक्सर पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार के व्यक्तित्व और जनसंपर्क को महत्व देते रहे। यही कारण रहा कि अलग-अलग विचारधाराओं से जुड़े होने के बावजूद हृदय नारायण दीक्षित और उदय राज यादव दोनों को लगातार जनता का समर्थन मिलता रहा।

क्षेत्रीय राजनीति को करीब से समझने वाले लोग बताते हैं कि दोनों नेताओं की शैली अलग थी, लेकिन जनता से जुड़ाव बेहद मजबूत था। हृदय नारायण दीक्षित जहां वैचारिक राजनीति और संगठनात्मक कौशल के लिए पहचाने गए, वहीं उदय राज यादव जमीन से जुड़े जननेता की छवि के कारण लोकप्रिय बने।

32 साल तक कायम रहा गांव का दबदबा

1985 से लेकर 2012 तक पुरवा विधानसभा की राजनीति में लउआ गांव का दबदबा लगातार कायम रहा। यह केवल राजनीतिक जीत का सिलसिला नहीं था, बल्कि जनता और नेताओं के बीच विश्वास का भी प्रतीक था।

प्रदेश की राजनीति में बहुत कम ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं, जहां एक ही गांव के दो नेता इतने लंबे समय तक विधानसभा की राजनीति को प्रभावित करते रहे हों। यही कारण है कि लउआ गांव को आज भी पुरवा विधानसभा का “धुरंधर गांव” कहा जाता है।

आज भी चर्चा में रहता है लउआ गांव

भले ही समय के साथ राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हों और नए चेहरे सामने आ रहे हों, लेकिन लउआ गांव का राजनीतिक इतिहास आज भी चर्चा का विषय बना हुआ है। क्षेत्र के बुजुर्ग आज भी उस दौर को याद करते हैं, जब इस गांव के नेताओं की पहचान केवल राजनीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि जनता के सुख-दुख से भी जुड़ी हुई थी।

पुरवा विधानसभा की राजनीति में लउआ गांव की कहानी यह साबित करती है कि यदि कोई नेता जनता के बीच लगातार सक्रिय रहे और लोगों से सीधा संवाद बनाए रखे, तो राजनीतिक प्रभाव दशकों तक कायम रखा जा सकता है।

 

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