खास बात

दण्ड से धर्म तक : उत्तर प्रदेश में कानून के राज का नया अध्याय

चुन्नीलाल प्रधान की खास रिपोर्ट

महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को राजधर्म का जो उपदेश दिया था, वह केवल प्राचीन शासन व्यवस्था का सिद्धांत नहीं था, बल्कि हर युग के सुशासन का शाश्वत सूत्र है- “दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड अवभिरक्षी।” अर्थात् राज्य का दण्ड, अर्थात् कानून का स्वामी शासन ही समाज संचालित करता है और उसकी रक्षा भी करता है। जब समाजसेवा है, तब भी कानून जागता रहता है। यही कारण है कि भारतीय शास्त्र में दण्ड को धर्म का स्वरूप माना गया है।

आज यदि उत्तर प्रदेश की चर्चा देश में कानून-व्यवस्था के नये प्रतिमान के रूप में हो रही है, तो उसके पीछे केवल पुलिसिया कार्रवाई नहीं है, बल्कि शासन की वह विचारधारा स्पष्ट है जो अपराध और राजनीति के पुराने गठजोड़ को चुनौती देने का साहस दिखाती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य ने जिस “जीरो टॉलरेंस” नीति को शामिल किया है, उसमें अपराधी के अंदर कानून का भय और सामान्य नागरिक के अंदर सुरक्षा का विश्वास पैदा हुआ है। यह परिवर्तन केवल सरकारी नहीं, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी है।

कभी उत्तर प्रदेश का नाम सामने आने पर ही लोगों के मन में दंगा, माफिया, रंगदारी, अजमेर और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त सदस्यता की छवि उभरती थी। व्यापारी राज्य में आने से मठवासी थे, व्यापारी असुरक्षित महसूस करते थे और महिलाएं सार्वजनिक जीवन में भय के साये में थीं। राजनीतिक के लिए अपराधी अक्सर “वोट प्रबंधन” का साधन बन गये थे। ऐसे में वातावरण में लॉ व्यवस्था में केवल यूक्रेनी भाषा का आगमन हुआ था। टाउन में न्याय नहीं, डेमोक्रेट मॉस्को था। गरीब और घटिया नागरिकों के लिए जस्टिस एक दूर का सपना था।

राज्य की यह स्थिति केवल सार्वभौमिक विफलता नहीं थी, बल्कि लोकतांत्रिक तानाशाही का संकेत था। लोकतंत्र तब कमजोर हो जाता है जब नागरिक राज्य पर विश्वास खत्म हो जाता है। जब जनता का कहना था कि अपराधी कानून ऊपर है और पीड़ित को न्याय नहीं मिल रहा है, तब संविधान की आत्मा आहत है। उत्तर प्रदेश लंबे समय तक इसी संकट से घिरा रहा। लेकिन पिछले नौ वर्षों में जो बदलाव आया, उसकी यह धारणा धीरे-धीरे बदलती गई।

इस परिवर्तन का सबसे बड़ा आधार है- “अपराधी की कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं, कोई राजनीतिक पहचान नहीं।” यह बिल्कुल सरल दिखता है, व्यवहार में संदेश ही कठिन था। क्योंकि दशकों से उनका अपराध और राजनीति का ऐसा गठजोड़ बन गया था जिसमें सत्य परिवर्तन के साथ “वफ़ादारी” को बदल दिया गया था, लेकिन प्रभाव बना रहा। पहली बार ऐसा सामने आया कि सरकार ने माफिया और सहयोगी अपराध के खिलाफ सीधी कार्रवाई को राजनीतिक खतरे के बजाय शासन की आजादी दी।

माफियाओं की अवैध संपत्ति पर बुलडोजर एक्शन, इलेक्ट्रानिक एक्ट का व्यापक उपयोग, आपराधिक फिल्मों के खिलाफ अभियान और पुलिस को खुला संदेश कि कानून से समझौता नहीं होगा- इन सबने सामूहिक अपराध जगत की मनोवृत्ति बदल दी। यह केवल “कठोरता” नहीं था, बल्कि कानून की दृश्यमान उपस्थिति थी। अपराधी वर्ग में यह भावना बनी है कि अब सत्ता संरक्षण उन्हें बचा नहीं पाएगा। उनका इशारा वहीं था जहां शासन और जनता के बीच टूट विश्वास का जुड़ाव शुरू हुआ था।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के दस्तावेज़ इस बदलाव की पुष्टि करते हैं। उत्तर प्रदेश के प्रतिवेदन मानचित्र पर अपराध दर राष्ट्रीय औसत से नीचे केवल योग्यता उपलब्धि नहीं है, बल्कि संस्थागत संस्कृति में बदलाव का संकेत है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण महिलाओं के विरुद्ध अपवित्रता में दोषसिद्धि दर की स्थापना है। किसी भी राज्य की वास्तविक परीक्षा से यह पता चलता है कि वह न्याय निष्कासन में शामिल होने में असमर्थ है। अपराध दर्ज होना पर्याप्त नहीं है, अपराधी को सजा मिलना ही न्याय व्यवस्था की सफलता है।

महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में उत्तर प्रदेश में जो माहौल बना है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एंटी रोमियो स्क्वाड से लेकर महिला स्मारक के खिलाफ फास्ट ट्रैक जांच, मिशन शक्ति अभियान और कार्मिक पुलिसिंग की कोशिशों ने समाज में यह संदेश दिया कि महिलाओं का अपराध अब “सामान्य” नहीं माना जाएगा। किसी भी वैज्ञानिक समाज की पहचान यही है कि उनकी बेटियां निर्भय शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी कर सकती हैं। जब एक लड़की देर शाम भी बिना भय के घर लौटी, तब उसने कहा कि कानून का शासन केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी दिखाई देता है।

हालाँकि यह भी सच है कि कानूनी व्यवस्था का प्रश्न केवल अपराध पर नियंत्रण सीमित नहीं होता है। यह आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और राजनीतिक सिद्धांत से भी गहराई तक जाता है। जहां अपराध और अराजकता का माहौल होता है, वहां पर्यटक नहीं आते। उद्योग नहीं शामिल. नहीं बढ़ रहे रोजगार के अवसर। व्यावसायिक प्रयोगशालाएँ सीमित हो जाती हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में सुरक्षा मित्रता के साथ ही निवेश का नया दौर शुरू हुआ। एक्सप्रेसवे, डिफेंसिव दस्तावेज़, डेटा सेंटर, एयरपोर्ट और औद्योगिक उपकरण का केवल विकास ही नहीं है, बल्कि कानून व्यवस्था पर विश्वास का भी महत्व है।

किसी भी राज्य में निवेशक को केवल कर छूट नहीं मिलती है, बल्कि यह देखने को मिलता है कि वहां कानून का राज कितना मजबूत है। उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि उनकी संपत्ति सुरक्षित रहेगी, कर्मचारी भयमुक्त रहेंगे और विवाद की स्थिति में प्रशासन के सदस्य भूमिका निभाएंगे। उत्तर प्रदेश में यह बात पक्की हो गई है कि शासन व्यवस्था संस्थाओं के दबाव में कोई बदलाव नहीं आएगा। यही कारण है कि कभी “बीमारू राज्य” कहे जाने वाला प्रदेश अब देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। लंबे समय तक उत्तर प्रदेश की पहचान अपराध और राजनीतिक हिंसा से जुड़ी रही। फ़िल्मों, मीडिया रिपोर्टों और राष्ट्रीय चर्चाओं में राज्य को बार-बार नकारात्मक संदर्भ देखने को मिले। लेकिन आज प्रदेश में बड़े धार्मिक आयोजनों, मस्जिदों, निवेश सम्मेलनों और डिजिटल प्रशासन के लिए चर्चा होती है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। इसके पीछे कॉन्स्टेंटिस्ट पर्यवेक्षक, राजनीतिक इच्छाशक्ति और क्वांटम की संस्कृति विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।

फिर भी यह कहा गया है कि साईटरी छुट्टी हो गई है। साइबर क्राइम तेजी से बढ़ रहे हैं। डिजिटल सूची, डेटा चोरी और ऑफ़लाइन वित्तीय अपराध नई चुनौतियां उभर कर सामने आ रही हैं। पुलिस बल का आधुनिकीकरण, फोरेंसिक विज्ञान का व्यापक उपयोग और तकनीकी शिक्षण की अभी भी बहुत बड़ी आवश्यकता है। कोर्ट में शामिल दस्तावेजों की संख्या कम करना, जांच दस्तावेजों की गुणवत्ता में सुधार और पुलिस सुधारों को सिद्धांतों के रूप में आने वाले वर्षों में बड़ी चुनौती मिलेगी।

इसके अलावा, व्यवस्था व्यवस्था का वास्तविक अर्थ केवल निर्धारित नहीं है, बल्कि आदेश भी है। यदि पुलिस का व्यवहार नागरिकों के प्रति मानवीय नहीं होगा, तो भय और विश्वास के बीच संतुलन नहीं बनेगा। एक आदर्श शासन वही होता है जिसमें अपराधी कानून से डर लगता है, लेकिन सामान्य नागरिक पुलिस इसे देखकर निंदनीय महसूस करती है। उत्तर प्रदेश में अब इसी तरह दूसरे चरण की शुरुआत होगी, जहां कानून की स्थापना के साथ न्याय की करुणा भी दिखाई देगी।

डॉ. भीमराव कॉम ने कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे तो सफल नहीं हो सकते। उत्तर प्रदेश में आज जो परिवर्तन दिखाई दे रहा है, वह एकमात्र इच्छाशक्ति का परिणाम है। पहली बार ऐसा महसूस हुआ कि सत्य और कानून के बीच की दूरी कम है। अपराधी किट भी प्रभावशाली क्यों नहीं है, उसकी कार्रवाई संभव है। लोकतंत्र में यही सबसे बड़ा विश्वास होता है।

उत्तर प्रदेश की यह यात्रा केवल एक राज्य की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। यदि तीन विशाल, जटिल और सामाजिक रूप से भिन्न राज्य में कानून का शासन स्थापित किया जा सकता है, तो इस देश के लिए अन्य राज्यों में भी प्रेरणा बन सकती है। क्योंकि अंततः किसी भी वैज्ञानिक समाज की संस्था सड़क, भवन या परिभाषा पर नहीं, बल्कि न्याय और सुरक्षा पर टिकी होती है।

आने वाली पीढ़ियां इस दौर को उस समय की याद दिलाती हैं जब उत्तर प्रदेश में भय और अराजकता की छाया से बाहर कानून आधारित शासन की नई पहचान गढ़ी थी। जहां “दंड” केवल दमन का प्रतीक नहीं है, बल्कि नागरिक सुरक्षा, सामाजिक न्याय और विकास का आधार बना है। यही राजधर्म का वास्तविक अर्थ भी है- ऐसा शासन जिसमें राज्य की शक्ति का उपयोग जनता की रक्षा के लिए हो, न कि सत्ता की रक्षा के लिए।

और शायद यही वह क्षण है जब भीष्म पितामह की हजारों साल पुरानी वाणी आज के उत्तर प्रदेश में फिर से जीवंत होती है – जब सब सो जाते हैं, तब भी कानून जागता रहता है।

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