बेटी के ससुराल से आती ठंडी हवा का झोंका आखिर किसे कहते हैं?

पनगोत्रा की चिट्ठी अंक 8 में स्तंभकार केवल कृष्ण पनगोत्रा और बेटी के ससुराल से आती ठंडी हवा के झोंके पर आधारित पारिवारिक विषय

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लेखक: केवल कृष्ण पनगोत्रा

प्रिय पाठकों,

बेटी के ससुराल से जब कोई अच्छी खबर आती है तो मायके के आंगन में जैसे अचानक मौसम बदल जाता है। फोन की घंटी बजती है, बेटी की आवाज दूसरी तरफ से सुनाई देती है और मां के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ जाती है। पिता भले ही बहुत कुछ न कहें, लेकिन भीतर कहीं एक गहरी राहत उतरती है। भाई-बहन भी बेटी या बहन की आवाज में छिपी खुशी को पहचान लेते हैं। यही वह अनुभूति है जिसे हमारे समाज में कभी-कभी बड़े सुंदर ढंग से कहा जाता है—“बेटी के ससुराल से ठंडी हवा के झोंके आ रहे हैं।”

किसी शायर ने इसी भावना को कुछ यूं व्यक्त किया है—

बेटी के घर से जब भी कोई पैगाम आता है,
लगता है जैसे तपती धूप में कोई ठंडी हवा का जाम आता है।
खुश रहे मेरी गुड़िया सदा अपने आशियाने में,
बस इसी दुआ के साथ हर नया सुबह-शाम आता है।

बेटी के सुख की खबर मायके के लिए केवल एक सूचना नहीं होती। वह कई बार वर्षों की चिंता पर मरहम होती है। बेटी जब अपने घर में सम्मान से रहती है, पति के साथ समझदारी से जीवन चलाती है, ससुराल के सुख-दुख में संतुलन बनाकर चलती है और मायके से शिकायतों के बजाय सामान्य जीवन की बातें करती है तो मां-बाप के मन में एक भरोसा पैदा होता है—हमारी बेटी अपने घर में ठीक है।

लेकिन सवाल यह है कि अगर बेटी के ससुराल से ठंडी हवा के बजाय गर्म थपेड़े आने लगें तो? तब कहानी बदल जाती है।

मायके में फोन की घंटी चिंता पैदा करने लगती है। बेटी की आवाज में पहले जैसी सहजता नहीं रहती। हर बातचीत किसी शिकायत से शुरू होती है और किसी आशंका पर खत्म होती है। कभी व्यवहार को लेकर शिकायत, कभी आर्थिक दबाव, कभी अपमान का दुख, कभी पति-पत्नी के बीच किसी तीसरे की दखलंदाजी। धीरे-धीरे मायके को लगता है कि बेटी जिस घर को अपना घर समझकर गई थी, वहां उसे अपनापन नहीं मिल रहा।

आखिर बेटी के ससुराल वाले करते क्या हैं?

हर परिवार एक जैसा नहीं होता और हर विवाद को ससुराल पक्ष की गलती मान लेना भी उचित नहीं है। फिर भी कुछ व्यवहार ऐसे हैं जो किसी भी रिश्ते को भीतर से कमजोर कर सकते हैं।

बात-बात पर बहू की कमियां निकालना, उसके काम को हमेशा कमतर बताना, दूसरों के सामने उसे नीचा दिखाना, उसके हर निर्णय पर सवाल उठाना और पति-पत्नी के निजी मामलों में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करना रिश्ते में कड़वाहट पैदा कर सकता है।

किसी महिला को उसके मायके से काट देने की धमकी देना, फोन पर बातचीत को नियंत्रित करना, उसके अपने माता-पिता और भाई-बहनों से संबंधों को संदेह की नजर से देखना या घर का वातावरण इतना तनावपूर्ण बना देना कि वह हर समय डर में रहे—ये किसी स्वस्थ पारिवारिक जीवन के संकेत नहीं हैं।

पति-पत्नी के बीच असहमति होना सामान्य बात है। दो अलग-अलग परिवारों और संस्कारों से आए दो व्यक्तियों के विचार हर विषय पर एक जैसे हों, यह आवश्यक भी नहीं। लेकिन असहमति और अपमान में बहुत अंतर है। मतभेद और मानसिक दबाव एक चीज नहीं हैं। परिवार में अनुशासन और किसी की स्वतंत्रता छीन लेना भी एक बात नहीं है।

इसलिए बेटी के ससुराल से आने वाली “ठंडी हवा” का अर्थ यह नहीं कि वहां कभी झगड़ा नहीं होता। इसका अर्थ यह है कि झगड़ों के बावजूद रिश्ते में सम्मान बचा हुआ है, बातचीत की गुंजाइश है और बेटी को यह विश्वास है कि वह अपने घर में सुरक्षित तथा सम्मानित है। लेकिन इस कहानी का दूसरा पहलू भी है।

आखिर मायके वाले क्या करते हैं?

यह सवाल पूछना भी उतना ही जरूरी है। हमारे समाज में बेटी के प्रति प्रेम स्वाभाविक है। मां-बाप ने उसे जन्म दिया, पाला-पोसा, उसकी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसकी बीमारी में रातें जागीं और विवाह के बाद भी उसका सुख-दुख अपने दिल से जोड़कर रखा। इसलिए बेटी की परेशानी सुनकर मायके का बेचैन होना स्वाभाविक है। लेकिन प्रेम और हस्तक्षेप के बीच एक बहुत महीन रेखा होती है। जब वह रेखा पार हो जाती है तो मायके का प्रेम कभी-कभी बेटी के वैवाहिक जीवन पर दबाव बन सकता है।

बेटी ने पति से किसी छोटी बात पर बहस की और तुरंत मायके फोन कर दिया। मायके ने पूरी कहानी सुने बिना फैसला सुना दिया। भाई ने बहन की शिकायत सुनकर बहनोई को फोन कर दिया। मां ने बेटी को समझाने के बजाय कहा कि “तुम्हें ऐसा नहीं सहना चाहिए।” अगले दिन पिता भी नाराज हो गए। फिर एक मामूली घरेलू विवाद धीरे-धीरे दो परिवारों का विवाद बन गया।

क्या यह हमेशा उचित है? शायद नहीं।

पति-पत्नी के बीच हर छोटी बात का पंच फैसला मायके में नहीं होना चाहिए। यदि दो वयस्क लोग अपना घर चला रहे हैं तो उन्हें निर्णय लेने का अवसर भी मिलना चाहिए। बेटी को हर छोटी परेशानी पर मायके की अदालत में पेश करना उसके अपने विवेक को कमजोर कर सकता है।

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यहां सावधानी बहुत जरूरी है। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि बेटी को किसी गंभीर अन्याय, हिंसा, उत्पीड़न या खतरे की स्थिति में चुप रहना चाहिए। जहां सुरक्षा और सम्मान का सवाल हो, वहां मायका पीछे नहीं हट सकता। लेकिन सामान्य वैवाहिक मतभेदों को युद्ध का मैदान बना देना भी समझदारी नहीं।

जब बेटी हर बात मायके बताने लगे

आज मोबाइल फोन ने रिश्तों के बीच की दूरी कम कर दी है। यह अच्छी बात है। बेटी मां से कभी भी बात कर सकती है, भाई को फोन कर सकती है, वीडियो कॉल कर सकती है। लेकिन सुविधा के साथ एक नई समस्या भी आई है—हर छोटी घटना का तत्काल प्रसारण।

सुबह चाय देर से मिली। पति ने किसी बात पर नाराजगी जताई। सास ने किसी काम को दोबारा करने के लिए कहा। पति ने बाजार जाने से मना कर दिया। ननद ने कोई टिप्पणी कर दी।

इन सभी घटनाओं को अगर उसी क्षण मायके पहुंचा दिया जाए और हर घटना पर वहां से प्रतिक्रिया आने लगे तो घर के भीतर की छोटी-छोटी बातें बड़ी होती चली जाती हैं।

एक समझदार महिला यह पहचानती है कि कौन सी बात तत्काल बताना जरूरी है और कौन सी बात घर के भीतर बातचीत से सुलझाई जा सकती है।

यहां “समझदार महिला” का अर्थ यह नहीं कि वह अन्याय सहती रहे। बल्कि समझदारी का अर्थ है—स्थिति की गंभीरता को पहचानना और उसी अनुपात में प्रतिक्रिया देना।

पति-पत्नी का घर आखिर किसका है?

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। विवाह के बाद बेटी का एक नया घर बनता है। वहां पति-पत्नी को मिलकर अपना जीवन गढ़ना होता है। परिवार के बुजुर्ग मार्गदर्शन दे सकते हैं, अनुभव साझा कर सकते हैं, लेकिन हर निर्णय अपने हाथ में लेने की कोशिश रिश्ते की स्वायत्तता को कमजोर करती है।

यदि पति-पत्नी हर निर्णय के लिए अलग-अलग अपने माता-पिता से अनुमति लेने लगें तो फिर उनका अपना परिवार कब बनेगा? घर का बजट क्या होगा? कहां रहना है? बच्चों की पढ़ाई कैसी होगी? किससे कितना मिलना-जुलना है? किस समस्या को कैसे हल करना है?

इन विषयों पर माता-पिता की सलाह महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन अंतिम निर्णय पति-पत्नी की आपसी समझ से होना अधिक स्वस्थ है।

अब आती है वह कहानी, जिसने मुझे यह बात समझाई

यह कहानी मेरे देखे-सुने अनुभवों पर आधारित है। पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं। मान लीजिए उस लड़की का नाम नीलम है और उसके पति का नाम सुरेश।

नीलम की शादी लगभग चार दशक पहले हुई थी। सुरेश के पिता परिस्थितियों के कारण अपनी बहन के घर आकर रहने लगे थे। उनकी बहन के पति का निधन हो चुका था और उनके चार बेटे अभी इतने बड़े नहीं हुए थे कि परिवार की जमीन-जायदाद और अन्य जिम्मेदारियां संभाल सकें।

सुरेश के पिता ने केवल बहन और उसके बच्चों को सहारा नहीं दिया बल्कि परिवार की संपत्ति और जिम्मेदारियों को भी तब तक संभाला जब तक चारों भांजे अपने पैरों पर खड़े होने लायक नहीं हो गए।

इस तरह एक ही छत के नीचे मामा का एक बेटा और बुआ के चार बेटे बड़े हुए। समय बीता।

चारों भांजों की शादियां हुईं। उन्होंने अपने मामा के लिए अपनी ही जमीन पर मकान बनवाया। सुरेश की भी शादी हो गई। वह अपनी पत्नी नीलम, बच्चों और माता-पिता के साथ रहने लगा। उधर बुआ के चारों बेटे भी अपने-अपने मकानों में रहने लगे। लेकिन रिश्ते कागज पर अलग होने के बावजूद दिल से अलग नहीं हुए थे।

बुआ के चारों बेटे अक्सर लोगों से कहते सुने जाते—“मामा का लड़का हमारा पांचवां भाई है।” यह केवल बोलने की बात नहीं थी। चार दशक की साझा स्मृतियों ने रिश्ते को रक्त संबंधों से आगे एक भावनात्मक संबंध बना दिया था।

फिर समय ने करवट ली। बुआ का निधन हो गया। परिवार ने अपनी परंपरा और धार्मिक-सामाजिक मान्यताओं के अनुसार मृत्यु उपरांत होने वाले कर्मकांड पूरे किए। इसी क्रम में आई रस्म पगड़ी

डुग्गर क्षेत्र, विशेषकर जम्मू में, कई परिवारों में मृत्यु के बाद होने वाली इस रस्म का अपना सामाजिक और पारिवारिक महत्व रहा है। परंपरा के विभिन्न रूप अलग-अलग क्षेत्रों में हो सकते हैं। जिस परंपरा की मैं बात कर रहा हूं, उसमें बेटी के मायके की ओर से दामाद के सिर पर पगड़ी बांधने की रस्म को परिवार की जिम्मेदारी और सम्मान से जोड़कर देखा जाता है।

बुआ के चारों बेटों के ससुराल वाले अपने-अपने दामाद के लिए पगड़ी लेकर पहुंचे। लेकिन सुरेश के ससुराल से कोई नहीं आया। क्यों?

नीलम के मायके वालों का तर्क था कि सुरेश बुआ के चारों बेटों का रिश्ते और व्यवहार में भाई जैसा जरूर है, लेकिन रक्त संबंध से सगा भाई नहीं है। इसलिए उन्होंने इस रस्म को अपने दामाद के लिए आवश्यक नहीं माना। तर्क अपनी जगह था।

लेकिन भावनाएं अपनी जगह थीं। नीलम को यह बात बहुत बुरी लगी। उसके लिए बुआ के चारों बेटे केवल उसके पति के रिश्तेदार नहीं थे। वे उसके परिवार का हिस्सा थे। जिस परिवार को उसका पति भाई जैसा मानता था, उसी परिवार की मां के निधन पर उसके मायके की ओर से एक पगड़ी न पहुंचना उसे भीतर तक चुभ गया।

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फिर नीलम ने जो किया, वही इस चिट्ठी की असली कहानी है

रस्म पगड़ी के दो-चार दिन बाद नीलम ने पति सुरेश से कहा— “चलो, मायके चलते हैं।” सुरेश ने पूछा—“क्यों?” नीलम ने कहा—“अपने भाइयों से बात करनी है।” सुरेश ने समझाया कि बात को बढ़ाना ठीक नहीं होगा। लेकिन नीलम नहीं मानी। दोनों मायके पहुंचे। नीलम ने भाइयों के सामने अपनी नाराजगी रखी। विशेषकर बड़े भाई से वह बेहद खफा थी।

उसका सवाल सीधा था— क्या आप इतने गरीब हो गए हैं कि अपने बहनोई के लिए एक पगड़ी भी नहीं ला सकते थे? भाई को पहली बार गुस्सा आया। आखिर बहन उसे इस तरह क्यों डांट रही है?

लेकिन कुछ देर बाद जब उसने बहन की नाराजगी के पीछे छिपे भाव को समझने की कोशिश की तो उसका गुस्सा धीरे-धीरे संतोष में बदल गया।

उसे लगा—यह नाराजगी ही तो बेटी के ससुराल से आने वाली ठंडी हवा का झोंका है। क्योंकि नीलम अपने मायके की तरफ से अपने ससुराल के रिश्ते को छोटा नहीं होने देना चाहती थी। वह अपने पति के परिवार को अपने मायके के सामने कमतर दिखाने नहीं आई थी। बल्कि वह चाहती थी कि उसके मायके वाले भी उस रिश्ते का उतना ही सम्मान करें जितना वह स्वयं करती है। यही बात उस बड़े भाई को भीतर तक छू गई।

उसे समझ आया कि बहन का वैवाहिक जीवन शायद केवल बड़े-बड़े सुखों से नहीं बना है। उसमें छोटे-छोटे विश्वास भी हैं। उन विश्वासों में एक विश्वास यह भी है कि उसका पति जिस परिवार को अपना मानता है, वह भी उसके लिए अपना परिवार है।

क्या यही सफल दांपत्य जीवन का एक संकेत है?

मेरे विचार से इसे कोई वैज्ञानिक या सार्वभौमिक “मानक” नहीं कहा जा सकता। हर परिवार की परिस्थितियां अलग होती हैं। लेकिन व्यवहार के स्तर पर यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है कि महिला अपने विवाह के बाद केवल पति के साथ नहीं बल्कि उसके रिश्तों और जिम्मेदारियों को भी सम्मान देने लगी है।

यदि पत्नी पति के परिवार की हर बात को मायके में शिकायत बनाकर ले जाती है तो दोनों परिवारों के बीच दूरी बढ़ सकती है। लेकिन यदि वह अपने मायके की गलती को भी गलती कहने का साहस रखती है तो यह रिश्ते में परिपक्वता का संकेत है। यदि वह पति की हर बात से सहमत होती है, तो यह समझदारी नहीं। यदि वह पति की हर बात मायके में रिपोर्ट करती है, तो यह भी समझदारी नहीं। समझदारी बीच का रास्ता है।

समझदार महिला की पहचान क्या हो सकती है?

एक समझदार महिला अपने मायके को भूलती नहीं, लेकिन अपने ससुराल को भी मायके की शाखा बनाने की कोशिश नहीं करती। वह माता-पिता से प्रेम करती है, लेकिन पति-पत्नी के हर निर्णय में माता-पिता को निर्णायक बनाने से बचती है। वह अपने भाई को सम्मान देती है, लेकिन भाई से यह उम्मीद नहीं करती कि वह उसके वैवाहिक जीवन का हर फैसला करे। वह ससुराल की गलत बात को गलत कह सकती है, लेकिन हर सामान्य मतभेद को मायके की पंचायत में नहीं ले जाती। वह मायके की गलती पर भी पर्दा डालने के बजाय उसे स्वीकार कर सकती है।

वह अपने पति के सामने बार-बार यह साबित करने की कोशिश नहीं करती कि उसका मायका उससे बड़ा, बेहतर और अधिक शक्तिशाली है। वह ससुराल वालों को मायके के मुकाबले कमतर आंकने की कोशिश नहीं करती। और सबसे महत्वपूर्ण—वह यह समझती है कि विवाह के बाद उसका नया घर किसी पुराने घर की शाखा नहीं, बल्कि उसका अपना नया संसार है।

लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी भी है

इस पूरे विचार को इस तरह नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि बेटी को हर हाल में ससुराल बचाने के लिए चुप रहना चाहिए।

नहीं।

यदि किसी महिला के साथ हिंसा हो रही है, गंभीर उत्पीड़न हो रहा है, दहेज के लिए दबाव बनाया जा रहा है, उसे धमकाया जा रहा है, उसकी स्वतंत्रता छीनी जा रही है या उसके जीवन और सुरक्षा पर वास्तविक खतरा है तो ऐसे मामले को “घर की छोटी बात” कहकर दबाना गलत है। ऐसे समय मायका बेटी के साथ खड़ा होना ही चाहिए।

ठंडी हवा का अर्थ कभी भी यह नहीं कि बेटी दर्द में भी मुस्कुराती रहे। ठंडी हवा का अर्थ है—सम्मान, भरोसा, सुरक्षा, संवाद और अपनापन। जहां ये चीजें नहीं हैं वहां समस्या को पहचानना भी जरूरी है।

बेटी और मायके के बीच कैसी हो बातचीत?

मां-बाप को भी बेटी से केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि “ससुराल में सब ठीक है न?” उन्हें यह भी पूछना चाहिए—

“तुम खुश हो?” “तुम्हें अपनी बात कहने की आजादी है?” “तुम दोनों अपने फैसले खुद ले पाते हो?” “तुम्हें सम्मान मिलता है?” और बेटी को भी हर बातचीत में शिकायतों की सूची नहीं खोलनी चाहिए।

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उसे यह समझना होगा कि माता-पिता उम्र के साथ अधिक भावुक हो जाते हैं। बेटी के एक छोटे से दुख को वे कई बार दस गुना बड़ा महसूस करते हैं। इसलिए बेटी को भी अपनी बात बताते समय परिस्थिति, संदर्भ और समाधान पर ध्यान देना चाहिए।

रिश्ते में ठंडी हवा कैसे बनी रहे?

इसके लिए किसी बड़े सिद्धांत की जरूरत नहीं। एक-दूसरे की इज्जत कीजिए। गलती हो तो स्वीकार कीजिए। हर विवाद को परिवारों की लड़ाई मत बनाइए। मायके को सलाहकार बनाइए, न्यायाधीश नहीं। ससुराल को परिवार बनाइए, अदालत नहीं।

पति-पत्नी के बीच संवाद बनाए रखिए। और सबसे जरूरी—अपने साथी के परिवार के प्रति वही सम्मान रखिए जिसकी अपेक्षा आप अपने परिवार के लिए करती हैं।

क्योंकि विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं है; यह दो पारिवारिक संस्कृतियों का भी मिलन है। इसमें दोनों तरफ से समझदारी की जरूरत होती है।

आखिर “ठंडी हवा का झोंका” है क्या?

अब शुरुआत में कही बात पर लौटते हैं।

बेटी के ससुराल से आने वाली ठंडी हवा कोई फोन कॉल भर नहीं है। यह बेटी की आवाज में दिखाई देने वाली सहजता है। यह उसके चेहरे की निश्चिंतता है। यह उसके पति के प्रति सम्मान है। यह ससुराल के अच्छे-बुरे को समझने की उसकी क्षमता है। यह अपने मायके से प्रेम करते हुए अपने नए घर के प्रति जिम्मेदारी स्वीकार करना है।

और कभी-कभी यह वह डांट भी होती है जो बेटी अपने मायके वालों को इसलिए लगाती है क्योंकि वह चाहती है कि उसके मायके वाले उसके ससुराल के रिश्तों का भी उतना ही सम्मान करें जितना वह स्वयं करती है।

नीलम की वह नाराजगी मेरे लिए इसी अर्थ में ठंडी हवा का झोंका थी। उसने अपने मायके से कहा था कि मेरे पति के रिश्तों को छोटा मत समझो।

उसने अपने भाइयों को याद दिलाया था कि बहन का घर अब केवल वह घर नहीं है जहां उसने बचपन बिताया था। उसका एक दूसरा घर भी है, जिसके सुख-दुख से वह भावनात्मक रूप से जुड़ चुकी है। और शायद यही परिपक्व दांपत्य जीवन की एक खूबसूरत निशानी है।

एक छोटी-सी बात मायके वालों के नाम

बेटी की शादी कर देने का अर्थ यह नहीं कि जिम्मेदारी समाप्त हो गई। लेकिन यह भी नहीं कि जिम्मेदारी का अर्थ बेटी के घर का संचालन अपने हाथ में लेना है। बेटी को सहारा दीजिए। उसकी बात सुनिए। उसे गलत लगे तो समझाइए।

वह सही हो तो उसके साथ खड़े रहिए। लेकिन हर बार उसकी ओर से लड़ने से पहले यह जरूर पूछिए—क्या यहां वास्तव में लड़ने की जरूरत है या बेटी और दामाद को स्वयं बात सुलझाने का अवसर देना चाहिए? और बेटियों से भी एक विनम्र आग्रह है— मायका आपका था, है और रहेगा।

लेकिन विवाह के बाद आपका घर भी आपका ही है। अपने मायके को अपने ससुराल के विरुद्ध खड़ा करने के बजाय दोनों परिवारों के बीच पुल बनने की कोशिश कीजिए। क्योंकि पुल बनने में ताकत लगती है, दीवार बनने में नहीं।

कभी बेटी के ससुराल से फोन आए और दूसरी तरफ से उसकी हंसी सुनाई दे तो मां उस आवाज को ध्यान से सुने। कभी बेटी पति के साथ किसी छोटे से सुख की बात करे तो पिता उसे केवल औपचारिक सूचना न समझें।

कभी बेटी मायके की किसी गलती पर नाराज हो जाए तो भाई पहले अपने अहंकार को किनारे रखकर उसकी नाराजगी का अर्थ समझने की कोशिश करे। क्योंकि हर नाराजगी दुश्मनी नहीं होती। कभी-कभी नाराजगी में भी प्रेम छिपा होता है। कभी डांट में भी रिश्ते की चिंता होती है।

और कभी बहन की अपने मायके को सुनाई गई फटकार ही इस बात का प्रमाण होती है कि वह अपने वैवाहिक घर को दिल से अपना चुकी है। यही वह क्षण है जब तपती हुई चिंताओं के बीच मायके को सचमुच महसूस होता है— बेटी के ससुराल से ठंडी हवा का झोंका आ रहा है।

तो प्रिय पाठकों, इस सप्ताह की “पनगोत्रा की चिट्ठी” में मैंने किसी एक परिवार को सही या गलत साबित करने की कोशिश नहीं की। उद्देश्य केवल इतना है कि बेटी, मायका, पति और ससुराल—इन चारों के बीच रिश्तों की उस महीन रेखा को समझा जाए जहां प्रेम कब अधिकार बन जाता है और चिंता कब हस्तक्षेप, इसका पता ही नहीं चलता।

रिश्ते तभी लंबे चलते हैं जब उनमें प्रेम के साथ विवेक भी हो।

बेटी को मायके की जरूरत हमेशा रहेगी। ससुराल को भी बेटी के अपनत्व की जरूरत रहेगी। और पति-पत्नी को सबसे ज्यादा जरूरत होगी—एक-दूसरे पर भरोसे की।

आखिर घर वही तो है जहां व्यक्ति अपने मन की बात कह सके, अपनी गलती स्वीकार कर सके, अपने रिश्तों का सम्मान कर सके और जरूरत पड़ने पर अपने लोगों को अपने साथ खड़ा पा सके।

अगले रविवार तक राम-राम, नमस्कार, सत श्री अकाल, अल्लाह हाफिज!

केवल कृष्ण पनगोत्रा
स्वतंत्र लेखक, जम्मू-कश्मीर

यायावर
Author: यायावर

यायावर

5 Responses

  1. अरे पनगोत्रा सर जी, आपने तो ‘ठंडी हवा’ का भी पूरा मौसम विभाग खोल दिया! 😄

    अंक 8 पढ़ते-पढ़ते लगा कि बेटी के ससुराल से आने वाली ठंडी हवा सिर्फ एसी की हवा नहीं होती, कभी-कभी मायके वालों को लगने वाली बेटी की डांट भी बड़ी सुहानी ठंडक दे जाती है! 😄 आपने नीलम की नाराजगी के बहाने रिश्तों की ऐसी बारीक गाँठ पकड़ ली, जिसे हम अक्सर हंसी-मजाक में टाल जाते हैं।

    सबसे मजेदार बात तो यह लगी कि बेचारे भाई को पहले बहन की डांट सुनकर लगा होगा—“अरे! हमने ऐसा क्या अपराध कर दिया कि बहन मायके में ही चार्जशीट लेकर आ गई?” 😄 लेकिन बाद में समझ आया कि बहन नाराज नहीं, अपने ससुराल के रिश्तों की ‘ब्रांड एंबेसडर’ बनी हुई है!

    आपकी चिट्ठी की खूबी यही है कि गंभीर बात को भी आपने उपदेश की लाठी लेकर नहीं समझाया। रिश्तों की गर्मी, मायके की ममता और ससुराल के सम्मान के बीच आपने ऐसी ठंडी हवा चलाई कि पाठक को मुस्कुराते हुए सोचना पड़ता है—“भई, शादी के बाद बेटी सिर्फ पता नहीं बदलती, कभी-कभी रिश्तों का पूरा नक्शा ही अपडेट कर देती है!” 😂

    और हां, मायके वालों के लिए संदेश भी खूब है—बेटी की हर शिकायत पर तुरंत ‘ऑपरेशन बहनोई’ शुरू करने की जरूरत नहीं! पहले चाय पीजिए, पूरी बात सुनिए, फिर फैसला कीजिए। 😄

    पनगोत्रा जी, अंक 8 पढ़कर लगा कि आपकी चिट्ठी अब सचमुच घर-घर की खिड़की बनती जा रही है। कभी उसमें से पहाड़ की हवा आती है, कभी रिश्तों की धूप और कभी ऐसी ठंडी बयार कि मन कह उठे—अगली चिट्ठी कब आ रही है?

    ढेरों बधाई और शुभकामनाएं। लिखते रहिए, हम पाठक भी आपकी चिट्ठी के इंतजार में अपनी कुर्सी खिड़की के पास खिसकाए बैठे हैं। 😄🌿

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा(कठुआ) जम्मू-कश्मीर says:

      रजनी वर्मा ‘डोगरा’ को चिट्ठी पसंद आने का अर्थ है- प्रथम श्रेणी में पास!

    2. केवल कृष्ण पनगोत्रा कठुआ जम्मू कश्मीर says:

      रजनी वर्मा डोगरा को चिट्ठी पसंद आने का अर्थ है – प्रथम श्रेणी में पास!
      कोशिश यही रहती है रजनी कि कुछ अच्छा ही होता रहे और दुनिया जीने लायक हो।

  2. अच्छा लगा, मगर एक छोटी-सी शिकायत भी है! 😊

    पनगोत्रा की चिट्ठी—अंक 8 पढ़कर सबसे पहले यही लगा कि लेखक ने रोजमर्रा के रिश्तों की एक साधारण-सी बात को बहुत सहजता से पाठक के सामने रख दिया है। भाषा में अपनापन है और प्रसंग ऐसा कि पढ़ते-पढ़ते लगता है जैसे किसी परिचित घर की बातचीत सुन रहे हों। यही इस लेख की सबसे बड़ी खूबी है।

    खास तौर पर रिश्तों की नोकझोंक को बिना अनावश्यक गंभीरता दिए जिस चुलबुले अंदाज में प्रस्तुत किया गया है, वह मन को भाता है। लेख पढ़कर मुस्कान भी आती है और बीच-बीच में अपने आसपास के रिश्तों की याद भी हो जाती है। लेखक की नजर छोटी-छोटी मानवीय बातों पर है, यही उनकी लेखनी को अलग पहचान देती है।

    लेकिन एक छोटी-सी कमी जरूर खली। कुछ जगह लगा कि प्रसंग को थोड़ा और विस्तार मिल सकता था। पात्रों की मनःस्थिति और उनकी आपसी बातचीत को दो-चार पंक्तियां और मिलतीं तो लेख का प्रभाव शायद और गहरा होता। कहीं-कहीं बात जल्दी समेट दी गई है, जबकि वही प्रसंग पाठक को और देर तक अपने साथ ले जा सकता था। 😊

    फिर भी, यह कमी लेख की सहजता को कम नहीं करती। बल्कि सच कहूं तो यही सहजता इसकी असली ताकत है। पनगोत्रा जी ने भारी-भरकम शब्दों या उपदेशों के बजाय जिंदगी की छोटी-सी खिड़की खोलकर पाठक को भीतर झांकने का मौका दिया है।

    बैंगलोर से मेरी पाठकीय फरमाइश बस इतनी है—अगली चिट्ठी में कहानी थोड़ी और लंबी हो, पात्र थोड़ा और बोलें और हम पाठकों को थोड़ा और मुस्कुराने का मौका मिले। 😄

    अंक 8 के लिए बहुत-बहुत बधाई। ऐसी चिट्ठियां पढ़ते हुए लगता है कि साहित्य अभी भी हमारे रोजमर्रा के जीवन के बीच आराम से बैठा चाय पी रहा है। 🌿

    1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

      आकांक्षा नैय्यर जी,
      चिट्ठी पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। आपका सुझाव सर-आंखों पर लेकिन यह आशंका भी रहती है कि पाठक ज्यादा लम्बी रचना से ऊब न जाएं कहीं!
      अनूप जी ने आप जैसे बौद्धिक पाठकों से संवाद का अवसर दिया है।

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