‘सतलुज’ देखने के बाद हर किसी के मन में एक सवाल : कौन था असल जिंदगी का ‘सुरजीत सिंह सुग्गा’?
जानिए अजीत सिंह संधू की पूरी कहानी
रिपोर्ट: अंजनी कुमार त्रिपाठी
फिल्म ‘सतलुज’ रिलीज होने के बाद सबसे ज्यादा जिस किरदार की चर्चा हो रही है, वह है एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा। फिल्म देखने वाले लगभग हर दर्शक के मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर यह किरदार किस वास्तविक व्यक्ति से प्रेरित है। दरअसल, फिल्म में दिखाया गया सुरजीत सिंह सुग्गा का चरित्र पंजाब पुलिस के तत्कालीन अधिकारी अजीत सिंह संधू से प्रेरित माना जाता है। आतंकवाद विरोधी अभियानों, मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण प्रकरण से जुड़े विवादों के कारण उनका नाम पंजाब के इतिहास के सबसे चर्चित और विवादित पुलिस अधिकारियों में शामिल रहा। आइए जानते हैं उस अधिकारी की पूरी कहानी, जिसने पंजाब के सबसे अशांत दौर में पुलिस की कमान संभाली और बाद में खुद कई गंभीर आरोपों के केंद्र में आ गया।
चार साल तक अटकी रही फिल्म, फिर बदले नाम से हुई रिलीज
करीब चार वर्षों तक सेंसर बोर्ड की मंजूरी का इंतजार करने के बाद यह फिल्म ‘पंजाब 95’ के बजाय ‘सतलुज’ नाम से 3 जुलाई 2026 को रिलीज हुई। फिल्म का कथानक 1984 से 1995 के बीच के पंजाब पर आधारित है, जब राज्य आतंकवाद, उग्रवाद और बड़े पुलिस अभियानों के दौर से गुजर रहा था। फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, जबकि सुविंदर विक्की ने एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा का किरदार निभाया है।
कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
जसवंत सिंह खालड़ा एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जिन्होंने कथित तौर पर उन हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल की, जिन्हें बिना पहचान के श्मशान घाटों में जलाया गया था। उन्होंने श्मशान घाटों के रजिस्टरों में दर्ज नामों और दस्तावेजों के आधार पर कई ऐसे मामलों को सामने लाने का प्रयास किया, जिन पर बाद में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई।
फिल्म में यही संघर्ष कहानी का मुख्य आधार है। खालड़ा की जांच उन्हें ऐसे तथ्यों तक पहुंचाती है, जो कथित तौर पर पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
असल जिंदगी का सुरजीत सिंह सुग्गा था अजीत सिंह संधू
फिल्म का एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा वास्तविक जीवन के पुलिस अधिकारी अजीत सिंह संधू से प्रेरित बताया जाता है। अजीत सिंह संधू पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी थे और उन्होंने आतंकवाद से सबसे अधिक प्रभावित रहे तरनतारन जिले में पुलिस प्रमुख के रूप में कार्य किया था।
उनका नाम जसवंत सिंह खालड़ा अपहरण मामले में प्रमुख आरोपियों में शामिल हुआ। हालांकि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई, इसलिए अदालत उनके खिलाफ अंतिम फैसला नहीं दे सकी।
पीपीएस से आईपीएस तक का तेज सफर
उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के अनुसार अजीत सिंह संधू ने अपने करियर की शुरुआत पंजाब पुलिस सेवा (पीपीएस) से की थी। जून 1986 में सेवा में आने के बाद उन्हें सितंबर 1990 में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) में पदोन्नति मिल गई।
आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कुछ अधिकारियों को विशेष प्रक्रिया के तहत आईपीएस में शामिल किया गया था। संधू भी उन्हीं अधिकारियों में शामिल थे, जिन्हें अपेक्षाकृत कम समय में यह पदोन्नति मिली।
तरनतारन में मिली सबसे कठिन जिम्मेदारी
1991 के आसपास तरनतारन पंजाब का सबसे संवेदनशील जिला माना जाता था। यहां आतंकवादी गतिविधियां लगातार बढ़ रही थीं और कई अधिकारी वहां तैनाती से बचना चाहते थे।
इसी दौरान अजीत सिंह संधू ने जिले के पुलिस प्रमुख का पद संभाला। समर्थकों ने उन्हें आतंकवाद के खिलाफ सख्त अधिकारी बताया, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने उनके कार्यकाल के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों, हिरासत में प्रताड़ना, अपहरण और अवैध हत्याओं जैसे गंभीर आरोप लगाए।
खालड़ा अपहरण मामला क्यों बना ऐतिहासिक?
जसवंत सिंह खालड़ा ने जब कथित तौर पर हजारों अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक किए, उसके कुछ समय बाद 6 सितंबर 1995 को उन्हें उनके घर से अगवा कर लिया गया।
बाद में इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपी गई। लंबी जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। हालांकि अजीत सिंह संधू की मृत्यु मुकदमे के अंतिम निर्णय से पहले हो जाने के कारण उनके खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
रेलवे ट्रैक पर मिला था शव
23 मई 1997 को अजीत सिंह संधू का शव रेलवे ट्रैक के पास मिला था। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उनके पास एक कथित सुसाइड नोट भी मिला था, जिसमें लिखा था कि अपमान के साथ जीवन जीने से बेहतर मृत्यु है।
उस समय उनके खिलाफ अनेक कानूनी मामले लंबित बताए जाते थे। हालांकि उनकी मृत्यु के कारण इन मामलों में उनके खिलाफ अंतिम न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं आ सका।
फिल्म में क्यों है इस किरदार की इतनी चर्चा?
फिल्म में एसएसपी सुरजीत सिंह सुग्गा को एक बेहद कठोर, निर्दयी और प्रभावशाली पुलिस अधिकारी के रूप में दिखाया गया है। कहानी में यह भी दर्शाया गया है कि आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कई निर्दोष लोगों को भी आतंकवादी बताकर मार दिए जाने और बाद में उनके शवों को लावारिस बताकर अंतिम संस्कार कर दिए जाने के आरोप लगे।
इन्हीं कथित घटनाओं की कड़ियां जोड़ते हुए जसवंत सिंह खालड़ा श्मशान घाटों के रजिस्टरों तक पहुंचते हैं और वहां दर्ज रिकॉर्ड के आधार पर हजारों मामलों की जानकारी सामने लाने का प्रयास करते हैं।
फिल्म के बाद फिर छिड़ी बहस
‘सतलुज’ के रिलीज होने के बाद पंजाब के उस दौर को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे मानवाधिकारों की लड़ाई की कहानी मानता है, जबकि दूसरा पक्ष आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों द्वारा झेली गई कठिन परिस्थितियों को भी उतना ही महत्वपूर्ण बताता है।
फिल्म ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि आतंकवाद से लड़ाई के दौरान कानून, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
‘सतलुज’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि पंजाब के इतिहास के सबसे संवेदनशील अध्यायों में से एक को सामने लाने का प्रयास है। फिल्म का सुरजीत सिंह सुग्गा वास्तविक जीवन के अजीत सिंह संधू से प्रेरित माना जाता है, जबकि जसवंत सिंह खालड़ा का संघर्ष आज भी मानवाधिकार आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। हालांकि इस पूरे दौर से जुड़े कई मामलों पर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्याएं हैं, लेकिन इतना तय है कि पंजाब का वह दौर आज भी इतिहास, न्याय और मानवाधिकार की बहस का अहम हिस्सा बना हुआ है।









