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सरकारी फंड का बंदरबांट या सिस्टम की खामी? मदरसों में रिश्तेदारों की नियुक्तियों पर उठे गंभीर सवाल

ठाकुर बख्श सिंह की रिपोर्ट

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सहायता प्राप्त मदरसों में नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता नजर आ रहा है। सरकारी अनुदान से संचालित इन शिक्षण संस्थानों में कथित रूप से भाई-भतीजावाद, पारिवारिक नियुक्तियों और नियमों की अनदेखी के आरोपों ने प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला तब और गंभीर हो गया जब इन आरोपों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) में शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत के बाद आयोग ने राज्य सरकार से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है, जिससे पूरे प्रकरण पर निगाहें टिक गई हैं।

शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए बनाए गए नियमों के बावजूद कुछ सहायता प्राप्त मदरसों में कथित तौर पर ऐसे नियुक्ति आदेश जारी किए गए, जिनमें प्रबंधन से जुड़े लोगों के परिवारजन लाभान्वित हुए। आरोप है कि कहीं पत्नी को नौकरी मिली, कहीं बेटा, बेटी, दामाद, बहू और अन्य रिश्तेदार सरकारी वेतन पाने वाले पदों पर नियुक्त कर दिए गए। इन दावों ने मदरसा शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिकायत से खुला विवाद का नया अध्याय

मामले को राष्ट्रीय स्तर पर तब तूल मिला जब सामाजिक कार्यकर्ता तल्हा अंसारी ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कई सहायता प्राप्त मदरसों में नियुक्ति प्रक्रिया को प्रभावित कर परिवार के सदस्यों को लाभ पहुंचाया गया। शिकायतकर्ता का दावा है कि चयन प्रक्रिया के दौरान योग्यता और पारदर्शिता की बजाय पारिवारिक संबंधों को प्राथमिकता दी गई।

आयोग ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। इसके बाद संबंधित विभागों और जिला प्रशासन ने उपलब्ध अभिलेखों की समीक्षा शुरू कर दी है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही सामने आएंगे।

मदरसा विनियमावली क्या कहती है?

विशेषज्ञों के अनुसार मदरसा विनियमावली 2016 में नियुक्तियों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सहायता प्राप्त संस्थानों में भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी रहे।

नियमों के अनुसार प्रबंधन समिति से सीधे जुड़े निकट संबंधियों की नियुक्ति को लेकर प्रतिबंधात्मक प्रावधान मौजूद हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में नियमों को दरकिनार करने के लिए तकनीकी रास्ता अपनाया गया। आरोप है कि नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान कुछ प्रबंधकों ने औपचारिक रूप से पद छोड़ दिया और चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद फिर से प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल ली। यदि जांच में ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं होगा, बल्कि सरकारी अनुदान प्राप्त संस्थानों में पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करेगा।

कई जिलों के मदरसे जांच के घेरे में

शिकायत में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के सहायता प्राप्त मदरसों का उल्लेख किया गया है। बाराबंकी, जौनपुर, बस्ती, कुशीनगर सहित कई जिलों के कुछ मदरसों के नाम जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं।

आरोप है कि कुछ संस्थानों में एक ही परिवार के कई सदस्य अलग-अलग पदों पर कार्यरत हैं। इनमें शिक्षक, लिपिक, सहायक कर्मचारी और अन्य प्रशासनिक पद शामिल बताए गए हैं। कुछ मामलों में एक ही दिन परिवार के कई सदस्यों की नियुक्ति होने की बात भी सामने आई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि चयन प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष रही होती तो इतनी बड़ी संख्या में एक ही परिवार के लोगों का चयन होना संदेह पैदा करता है। यही कारण है कि अब नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेजों और चयन प्रक्रिया की बारीकी से जांच की जा रही है।

सरकारी धन के उपयोग पर भी उठे सवाल

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सरकारी धन से जुड़ा है। सहायता प्राप्त मदरसों के कर्मचारियों का वेतन सरकारी अनुदान से दिया जाता है। ऐसे में यदि किसी नियुक्ति में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो इसका सीधा प्रभाव सरकारी खजाने पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल भर्ती अनियमितता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की श्रेणी में भी आ सकता है। यही कारण है कि मामले की संवेदनशीलता लगातार बढ़ती जा रही है।

विदेश में रहने वालों को वेतन मिलने के आरोप

शिकायत में कुछ और चौंकाने वाले आरोप भी लगाए गए हैं। दावा किया गया है कि कुछ मामलों में ऐसे कर्मचारियों को भी नियमित वेतन मिलता रहा जो लंबे समय से विदेश में रह रहे थे। आरोप यह भी है कि विदेश यात्रा के दौरान भी कुछ लोगों को उपस्थिति रजिस्टर में ड्यूटी पर दर्शाया गया।

यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा। हालांकि संबंधित अधिकारियों का कहना है कि इन दावों की सत्यता की जांच की जा रही है और जांच पूरी होने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा।

अधिकारियों का क्या कहना है?

मदरसा बोर्ड और शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि NHRC अथवा अन्य माध्यमों से प्राप्त प्रत्येक शिकायत की नियमानुसार जांच कराई जाती है। अधिकारियों के अनुसार यदि किसी स्तर पर अनियमितता या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो संबंधित जिला प्रशासन और विभागीय अधिकारी आवश्यक कार्रवाई करते हैं।

अधिकारियों का यह भी कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। दस्तावेजों के डिजिटलीकरण, अभिलेखों की जांच और प्रशासनिक निगरानी को मजबूत करने का प्रयास किया गया है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अनियमितता की संभावना कम हो सके।

शिक्षा व्यवस्था की साख पर असर

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता होती है। यदि नियुक्तियों में पारदर्शिता को लेकर संदेह पैदा होता है तो इसका असर छात्रों, अभिभावकों और समाज के विश्वास पर पड़ता है।

मदरसे समाज के एक बड़े वर्ग को शिक्षा उपलब्ध कराते हैं। ऐसे में नियुक्तियों को लेकर उठे विवाद केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और भरोसे से भी जुड़े हुए हैं। इसलिए जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरी होना आवश्यक माना जा रहा है।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

फिलहाल पूरे मामले में अंतिम निर्णय जांच रिपोर्ट आने के बाद ही संभव होगा। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की निगरानी और राज्य सरकार द्वारा मांगी गई रिपोर्ट के चलते संबंधित संस्थानों की गतिविधियां जांच एजेंसियों के दायरे में आ गई हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो संबंधित संस्थानों और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। वहीं यदि जांच में आरोप निराधार पाए जाते हैं तो इससे संस्थानों को राहत मिलेगी। लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने सहायता प्राप्त मदरसों में नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है।

सरकारी अनुदान से चलने वाले शैक्षणिक संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। अब सबकी निगाहें जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि आरोपों में कितना दम है और आगे क्या कार्रवाई होगी।

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