छत्तीसगढ़ की लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है भोजली पर्व
छत्तीसगढ़ अपनी समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकगीतों और पारंपरिक पर्वों के कारण पूरे देश में विशिष्ट पहचान रखता है। इन्हीं लोकपर्वों में भोजली पर्व का विशेष स्थान है। यह केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, सामाजिक एकता और महिला शक्ति का अद्भुत संगम भी है। सावन-भादो के पावन मौसम में मनाया जाने वाला यह पर्व हर वर्ग के लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है।
भोजली पर्व के दौरान महिलाएं और युवतियां मिट्टी की टोकरी या पात्र में गेहूं, जौ अथवा अन्य अनाज बोकर उसकी नियमित पूजा-अर्चना करती हैं। निर्धारित दिनों तक इन पौधों की सेवा के बाद लोकगीतों, पारंपरिक वेशभूषा और सामूहिक उत्सव के साथ उनका विसर्जन किया जाता है। यह परंपरा समृद्धि, हरियाली, अच्छी फसल, भाईचारे और सुख-शांति की कामना का प्रतीक मानी जाती है।
भोजली पर्व का संक्षिप्त इतिहास
लोक परंपराओं के जानकारों के अनुसार भोजली पर्व सदियों से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रहा है। ग्रामीण अंचलों में इसका विशेष महत्व है, जहाँ कृषि और प्रकृति को जीवन का आधार माना जाता है। इस पर्व का संबंध वर्षा ऋतु, हरियाली और नई फसल की कामना से जुड़ा हुआ है।
समय के साथ यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोकगीत, लोकनृत्य, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और सामाजिक सौहार्द का उत्सव बन गया। आज भोजली पर्व छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का ऐसा प्रतीक बन चुका है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता माना जा रहा है।
21 वर्षों की निरंतर यात्रा बनी प्रेरणा
भोजली महोत्सव समिति, तोरवा द्वारा पिछले 21 वर्षों से लगातार इस महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस यात्रा की शुरुआत उस समय हुई, जब संसाधनों की कमी के बावजूद एक युवा ने केवल लोकसंस्कृति के संरक्षण का सपना देखा।
समिति के संस्थापक अध्यक्ष शंकर यादव ने लगभग दो दशक पहले बिना किसी बड़े आर्थिक साधन या सरकारी सहयोग के इस महोत्सव की नींव रखी। उस समय यह आयोजन सीमित स्तर पर होता था, लेकिन उनकी लगन, मेहनत और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता ने इसे धीरे-धीरे व्यापक पहचान दिलाई।
आज यह आयोजन न केवल क्षेत्रीय बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ रहा है। हर वर्ष बड़ी संख्या में कलाकार, सामाजिक कार्यकर्ता, लोकसंस्कृति प्रेमी और आम नागरिक इसमें भाग लेकर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।
चुनौतियां भी आईं, लेकिन नहीं रुका सफर
किसी भी सामाजिक और सांस्कृतिक अभियान की तरह इस यात्रा में भी अनेक चुनौतियां सामने आईं। जहां सकारात्मक कार्य होते हैं, वहां आलोचनाएं और शिकायतें भी स्वाभाविक रूप से सामने आती हैं। भोजली महोत्सव भी इससे अछूता नहीं रहा।
समिति के संस्थापक अध्यक्ष शंकर यादव का मानना है कि किसी भी बड़े उद्देश्य की राह आसान नहीं होती। कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और विभिन्न प्रकार की बाधाओं के बावजूद महोत्सव का आयोजन हर वर्ष लगातार होता रहा। यही निरंतरता इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
सांस्कृतिक आयोजनों का उद्देश्य केवल कार्यक्रम करना नहीं होता, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ना, नई पीढ़ी में परंपराओं के प्रति सम्मान विकसित करना और लोककला को जीवंत बनाए रखना भी होता है।
नई पीढ़ी को मिलेगा संस्कृति से जुड़ने का संदेश
समिति का कहना है कि आधुनिक जीवनशैली और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोकपर्वों से युवाओं का जुड़ाव कम होता जा रहा है। ऐसे समय में भोजली महोत्सव का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना भी है।
इस वर्ष आयोजित होने वाले महोत्सव में युवाओं और बच्चों को लोकसंस्कृति, लोकगीत, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामाजिक मूल्यों से जोड़ने पर विशेष जोर दिया जाएगा। आयोजकों का मानना है कि यदि युवा अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझेंगे तो भविष्य में इन परंपराओं का संरक्षण और अधिक प्रभावी ढंग से हो सकेगा।
29 अगस्त 2026 को होगा भव्य आयोजन
भोजली महोत्सव समिति के अनुसार इस वर्ष का आयोजन 29 अगस्त 2026 (शनिवार) को दोपहर 12 बजे से प्रारंभ होगा। कार्यक्रम पूरे उत्साह और पारंपरिक गरिमा के साथ आयोजित किया जाएगा।
इस दौरान भोजली पूजा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, लोकगीत, पारंपरिक कार्यक्रम तथा विभिन्न प्रतियोगितियों का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, कलाकारों और संस्कृति प्रेमियों के शामिल होने की संभावना है।
विजेताओं को मिलेगा नगद पुरस्कार
आयोजन समिति ने बताया कि महोत्सव में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इस वर्ष भी नगद पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इससे प्रतिभाओं को मंच मिलने के साथ-साथ लोकसंस्कृति के प्रति युवाओं का आकर्षण भी बढ़ेगा।
समिति का मानना है कि पुरस्कार केवल सम्मान का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने की प्रेरणा भी हैं।
यहां होगा आयोजन और विसर्जन
भोजली महोत्सव का मुख्य आयोजन तथा भोजली विसर्जन कार्यक्रम तोरवा भोजली घाट, पटेल मोहल्ला, वार्ड क्रमांक 41, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) में आयोजित किया जाएगा।
हर वर्ष की तरह इस बार भी पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए श्रद्धा और उत्साह के साथ भोजली विसर्जन किया जाएगा। आयोजन स्थल पर सुरक्षा, व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियां भी व्यापक स्तर पर की जा रही हैं।
बैठक में इन पदाधिकारियों की रही उपस्थिति
आयोजन की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए आयोजित बैठक में समिति के अनेक पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे। इनमें संरक्षक श्री चन्दन यादव, सलाहकार संजय सिंह ठाकुर, उपाध्यक्ष सुरेश दास मानिकपुरी, मीडिया प्रभारी बृजभूषण सरवन, सदस्य मनीष यादव, मनीष पटेल, सहसचिव गोपाल यादव, सदस्य कन्हैया पटेल, सह मीडिया प्रभारी पवन यादव, सदस्य जतिन विश्वकर्मा सहित भोजली महोत्सव समिति के अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
बैठक में आयोजन की रूपरेखा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी, प्रतिभागियों की व्यवस्था, पुरस्कार वितरण तथा अन्य व्यवस्थाओं पर विस्तार से चर्चा की गई।
लोकसंस्कृति के संरक्षण का सशक्त माध्यम
आज जब वैश्वीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण अनेक लोकपरंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही हैं, तब ऐसे सांस्कृतिक आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
भोजली महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण, युवा जागरूकता और सामूहिक सहभागिता का भी सशक्त मंच है। पिछले 21 वर्षों की इसकी निरंतर यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो सीमित संसाधनों में भी बड़े सांस्कृतिक आंदोलन खड़े किए जा सकते हैं।
समिति को उम्मीद है कि इस वर्ष का आयोजन भी पिछले वर्षों की तरह सफल रहेगा और अधिक से अधिक लोग इसमें शामिल होकर छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति के संरक्षण में अपनी भागीदारी निभाएंगे।

























