गुस्ताख दिल

चोर भागा, बयान दौड़े… आस्था बीच में खड़ी रह गई! दानपात्र की गवाही

लेखक अनिल अनूप

जिस दिन मंदिर के दानपात्र से जुड़ी खबर सुर्खियाँ बनीं, उसी दिन मुझे पहली बार लगा कि हमारे देश में भगवान से ज़्यादा व्यस्त उनके प्रवक्ता रहते हैं। भगवान तो वर्षों से एक ही मुद्रा में बैठे हैं, लेकिन उनके नाम पर बोलने वालों की आवाज़ में ऐसा कंपन रहता है मानो सृष्टि का संचालन वही कर रहे हों। घटना घटी नहीं कि टीवी स्टूडियो सज गए, मोबाइल स्क्रीन चमक उठी और सोशल मीडिया ने फैसला भी सुना दिया। पुलिस को अभी घटनास्थल पर पहुँचने का समय चाहिए था, लेकिन देश की अदालतें अंगूठे से चलने लगी थीं। हर उंगली न्यायाधीश थी और हर टिप्पणी अंतिम फैसला।

मुझे लगा कि इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण गवाह तो दानपात्र ही होगा। सो मैं सीधे उसी के पास पहुँच गया। वह सामान्य दिनों की तरह शांत नहीं था। उसके चारों ओर पुलिस की पीली पट्टी थी, कैमरे थे और कुछ ऐसे चेहरे थे जिनके चेहरे पर दुख कम और कैमरे की दिशा का ध्यान ज़्यादा था। मैंने धीरे से पूछा, “कैसे हो?” उसने भारी आवाज़ में कहा, “पहले लोग मुझे श्रद्धा से भरते थे, अब शक से भर रहे हैं।”

मैंने कहा, “सुना है तुम्हारे साथ बड़ी घटना हो गई।”

वह बोला, “घटना तो मेरे साथ बाद में हुई, पहले इंसान के भीतर हुई थी। जिस दिन किसी ने यह तय कर लिया कि भगवान के नाम पर रखा पैसा भी अवसर है, उसी दिन चोरी हो गई थी। ताला तो बाद में टूटा है।”

मैं उसकी बात सुनकर चुप हो गया। सच भी यही है कि हर चोरी पहले चरित्र में होती है, बाद में तिजोरी में दिखाई देती है। लेकिन हम बड़े अजीब लोग हैं। हमें टूटा हुआ ताला दिखाई देता है, टूटा हुआ आदमी नहीं दिखाई देता। हम लोहे की मरम्मत तुरंत कर देते हैं, लेकिन चरित्र की मरम्मत के लिए कोई विभाग अब तक नहीं बना सके।

इतने में एक नेता जी आ पहुँचे। चेहरे पर चिंता ऐसी थी जैसे देश की सारी नैतिकता उनकी जेब में रखी हो और जेब कट गई हो। उन्होंने कैमरे की ओर देखकर कहा, “यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर हमला है। दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।”

दानपात्र मुस्कुराया। मैंने पूछा, “तुम हँस क्यों रहे हो?”

वह बोला, “यह वाक्य मैं पिछले बीस वर्षों से सुन रहा हूँ। केवल दोषी बदलते हैं, वाक्य नहीं बदलता। लगता है यह बयान सरकारी गोदाम में थोक के भाव छपता है। घटना चाहे पुल गिरने की हो, परीक्षा पत्र लीक होने की हो, घोटाले की हो या चोरी की—बस यही वाक्य निकालकर पढ़ दिया जाता है।”

तभी दूसरे नेता जी आए। उन्होंने पहले वाले नेता की बात का खंडन करते हुए कहा, “अगर हमारी सरकार होती तो ऐसा कभी नहीं होता।”

तीसरे नेता तुरंत बोले, “अगर हमारी सरकार न होती तो अब तक कुछ भी नहीं होता।”

दानपात्र मेरी ओर देखकर बोला, “तुम इंसानों की सबसे बड़ी खूबी जानते हो?”

मैंने कहा, “क्या?”

वह बोला, “तुम लोग चोर से पहले श्रेय और दोष बाँट लेते हो।”

उसी समय एक पत्रकार माइक लेकर मेरे सामने आ गया। उसने पूछा, “आपको क्या लगता है, इसके पीछे कौन है?”

मैंने कहा, “भाई, मुझे नहीं मालूम।”

वह निराश हो गया। बोला, “फिर आप किस काम के प्रत्यक्षदर्शी हैं?”

आजकल पत्रकार को प्रत्यक्षदर्शी नहीं, प्रत्यक्ष भविष्यवक्ता चाहिए। जिसने घटना देखी हो, वह कम काम का है; जिसने बिना देखे पूरी कहानी गढ़ ली हो, वही प्राइम टाइम की शोभा बढ़ाता है। अब खबरें कम बनती हैं, कथाएँ ज़्यादा बनती हैं। हर चैनल अपने-अपने रामायण का नया संस्करण लिख रहा होता है, जिसमें रावण वही होता है जो दूसरे दल में बैठा हो।

मैंने देखा कि पुलिस अधिकारी बड़ी गंभीरता से सीसीटीवी फुटेज देख रहे थे। एक अधिकारी बोले, “हम हर कोण से जाँच कर रहे हैं।”

दानपात्र ने धीरे से मेरे कान में कहा, “काश, कभी आदमी अपने भीतर का कोण भी देख लेता।”

उसकी बात में जितनी सादगी थी, उतनी ही क्रूर सच्चाई भी। हम कैमरों के कोण बदलने में करोड़ों खर्च कर देते हैं, लेकिन नीयत का कोण सीधा करने के लिए हमारे पास न बजट है, न योजना। अब तो ऐसा लगता है कि ईमानदारी भी किसी निविदा के जरिए खरीदी जाएगी। जो सबसे कम बोली लगाएगा, उसे चरित्र निर्माण का ठेका मिल जाएगा।

इतने में एक अधिकारी ने घोषणा की कि सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की जाएगी। नए कैमरे लगेंगे, नए ताले लगेंगे, नए सेंसर लगेंगे। मैंने पूछा, “क्या नए इंसान भी लगाए जाएँगे?” उन्होंने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैंने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा का पाठ्यक्रम बदल देने की मांग कर दी हो। हमारे यहाँ हर समस्या का समाधान मशीन से शुरू होता है और प्रेस विज्ञप्ति पर समाप्त हो जाता है। बीच में जो आदमी खड़ा होता है, वह हमेशा फाइल के पीछे छिप जाता है।

इसी दौरान एक बुज़ुर्ग श्रद्धालु चुपचाप आए। उन्होंने जेब से दस रुपये निकाले और दानपात्र में डाल दिए। मैंने पूछा, “बाबा, आपको डर नहीं लगता कि कहीं यह भी…?”

उन्होंने मेरी बात पूरी होने से पहले ही मुस्कुराकर कहा, “बेटा, मैं भगवान को देता हूँ, हिसाब भगवान से रखता हूँ। बीच में कोई अपना चरित्र बेच दे, तो वह उसका घाटा है, मेरा नहीं।”

मैं कुछ क्षण तक उन्हें जाता हुआ देखता रहा। लगा कि इस देश की सबसे बड़ी पूँजी अभी भी बैंक में नहीं, ऐसे लोगों के विश्वास में जमा है। लेकिन यही विश्वास अगर बार-बार चोट खाएगा, तो एक दिन दानपात्र खाली नहीं होगा, लोगों के मन खाली हो जाएँगे। और मन खाली हो जाए तो मंदिरों की सबसे ऊँची शिखर भी समाज की आत्मा को नहीं बचा सकते।

मैं वापस मुड़ने लगा तो दानपात्र ने मुझे आवाज़ दी। उसने कहा, “अभी मत जाओ। असली तमाशा तो तब शुरू होगा, जब चोर से ज़्यादा चर्चा जाँच समिति की होगी और जाँच समिति से ज़्यादा चर्चा बयान समिति की। इस देश में चोरी की उम्र छोटी होती है, लेकिन बयानों की उम्र बहुत लंबी होती है।”

मैं रुक गया। मुझे लगा, आज दानपात्र केवल लोहे का डिब्बा नहीं है; वह इस देश की सबसे ईमानदार गवाही दे रहा है।

बयानपुराण और जांच समिति का महात्म्य

दानपात्र की बात अभी मेरे कानों में गूंज ही रही थी कि मंदिर परिसर में अचानक हलचल बढ़ गई। किसी ने फुसफुसाकर कहा, “जांच समिति आ गई।” मैंने गर्दन घुमाई तो लगा मानो किसी बारात का स्वागत हो रहा हो। आगे अधिकारी, पीछे अधिकारी, उनके पीछे सलाहकार, सलाहकारों के पीछे नोट्स लिखने वाले और सबसे पीछे वे लोग, जिनका काम केवल यह बताना होता है कि कौन किससे कितना महत्वपूर्ण है। मुझे लगा, अगर चोर को पता चल गया होगा कि उसके कारण इतनी बड़ी व्यवस्था सक्रिय हो गई है, तो वह भी कहीं बैठकर भावुक हो गया होगा।

समिति के अध्यक्ष ने आते ही गंभीर चेहरा बनाया। गंभीर चेहरा हमारे यहां योग्यता का पहला प्रमाण माना जाता है। उन्होंने दानपात्र को ऐसे देखा, जैसे डॉक्टर मरीज को नहीं, मेडिकल कॉलेज के प्रश्नपत्र को देखता है। फिर बोले, “हर पहलू की निष्पक्ष जांच होगी।”

दानपात्र धीरे से हंसा। मैंने पूछा, “अब क्यों हंस रहे हो?”

वह बोला, “जब भी कोई कहता है कि जांच निष्पक्ष होगी, मुझे डर लगने लगता है। निष्पक्षता की घोषणा जितनी ऊंची होती है, रिपोर्ट उतनी ही मोटी होती है। रिपोर्ट मोटी होते-होते इतनी भारी हो जाती है कि सच उसके नीचे दब जाता है। बाद में रिपोर्ट अलमारी में रख दी जाती है और अलमारी पर ताला लगा दिया जाता है। इस देश में कई सच ताले के भीतर इसलिए नहीं हैं कि वे अपराध हैं, बल्कि इसलिए हैं कि वे रिपोर्ट बन चुके हैं।”

इतने में एक बाबू फाइल लेकर आया। उसने फाइल खोली तो उसमें कागज कम और नोटिंग ज्यादा थी। पहली नोटिंग में लिखा था—”विषय अत्यंत गंभीर है।” दूसरी में लिखा था—”उच्च स्तर से निर्देश अपेक्षित।” तीसरी में लिखा था—”अगली बैठक में विचार होगा।” मैंने पूछा, “अभी तक क्या हुआ?” बाबू बोला, “अभी तक प्रक्रिया हुई है।” हमारे यहां प्रक्रिया इतनी विशाल है कि परिणाम अक्सर उसके पीछे कहीं खो जाता है।

उधर मीडिया ने अपना अलग मंदिर बना लिया था। फर्क बस इतना था कि यहां घंटी की जगह ब्रेकिंग न्यूज बजती थी। हर चैनल दावा कर रहा था कि उसके पास सबसे बड़ा खुलासा है। मुझे आश्चर्य हुआ कि पुलिस को जितनी जानकारी नहीं थी, उससे कहीं ज्यादा जानकारी हर चैनल के एंकर के पास थी। लगता था जैसे चोर ने चोरी करने से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो और पुलिस को छोड़कर सबको निमंत्रण भेजा हो।

एक एंकर गरज रहा था, “देश जानना चाहता है कि आखिर जिम्मेदार कौन है?”

मैंने मन ही मन कहा, “देश यह भी जानना चाहता है कि इतनी ऊंची आवाज़ में बोलने से सच जल्दी निकलता है या पड़ोसी का टीवी बंद हो जाता है।”

आजकल बहस में तथ्य उतने जरूरी नहीं रह गए, जितनी आवाज़ जरूरी हो गई है। जो सबसे ऊंचा बोलता है, वही सबसे सही मान लिया जाता है। लगता है लोकतंत्र का नया सिद्धांत बन गया है—’माइक जिसकी ओर होगा, सत्य उसी का होगा।’

मंदिर के बाहर कुछ लोग खड़े बहस कर रहे थे। एक बोला, “सुरक्षा बढ़ा दो।” दूसरा बोला, “प्रबंधन बदल दो।” तीसरा बोला, “कानून और सख्त कर दो।” मैंने पूछा, “और आदमी?” तीनों ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे मैंने किसी सरकारी विज्ञापन में असुविधाजनक प्रश्न पूछ लिया हो। हम हर बार दीवार ऊंची कर देते हैं, लेकिन चरित्र की नींव गहरी करने की बात आते ही विषय बदल देते हैं।

इतने में बयान बाबू प्रकट हुए। यह बड़े विचित्र प्राणी हैं। घटना कहीं भी हो, सबसे पहले वहीं पहुंचते हैं। मैंने पूछा, “आप कौन?”

उन्होंने सीना चौड़ा करके कहा, “मैं बयान बाबू हूँ। देश में जितनी घटनाएं होती हैं, उनमें से आधी मैं संभालता हूँ और बाकी आधी सोशल मीडिया।”

“आपका काम क्या है?”

“बहुत कठिन काम है। घटना चाहे कोई भी हो, मुझे तुरंत ऐसा वाक्य तैयार करना होता है जिससे लगे कि सब कुछ नियंत्रण में है, जबकि किसी को कुछ पता न हो।”

मैंने पूछा, “फिर?”

वे बोले, “फिर विपक्ष उसका खंडन करता है। उसके बाद हमारा दूसरा बयान आता है। फिर उनका तीसरा। देखते-देखते घटना पीछे छूट जाती है और बयान आगे निकल जाते हैं।”

मुझे लगा, सचमुच इस देश में कई बार चोर नहीं भागता, उसे बयान ढक लेते हैं। बयान इतने अधिक हो जाते हैं कि अपराध दिखाई ही नहीं देता। जैसे बरसात में नदी का पानी मिट्टी से भर जाता है, वैसे ही हर घटना बयान से भर जाती है।

मैंने दानपात्र से कहा, “तुम्हें क्या लगता है, इस बार कुछ बदलेगा?”

उसने कुछ देर चुप रहकर उत्तर दिया, “जरूर बदलेगा।”

मैंने उत्साहित होकर पूछा, “क्या?”

वह बोला, “सीसीटीवी का मॉडल बदलेगा, ताले का डिज़ाइन बदलेगा, सुरक्षा एजेंसी बदलेगी, प्रेस विज्ञप्ति की भाषा बदलेगी। बस एक चीज़ शायद नहीं बदलेगी—वह है आदमी के भीतर बैठा लालच।”

उसका उत्तर सुनकर मुझे लगा कि यह लोहे का डिब्बा नहीं, दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक है।

उसी समय मंदिर में आरती शुरू हो गई। घंटियां बजने लगीं। लोग हाथ जोड़कर खड़े हो गए। कुछ देर के लिए कैमरे भी शांत हो गए। मैंने देखा, भगवान के सामने सबके सिर झुके हुए थे। मन में एक अजीब-सा प्रश्न उठा—अगर इंसान सचमुच हर दिन इतनी श्रद्धा से सिर झुकाता है, तो फिर उठते ही उसका चरित्र इतना सीधा क्यों नहीं रहता?

शायद यही हमारे समय का सबसे कठिन प्रश्न है। मंदिरों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन मन के मंदिरों की मरम्मत कोई नहीं कर रहा। बाहर की आरती तेज होती जा रही है, भीतर का अंधेरा भी उतनी ही तेजी से फैलता जा रहा है।

मैंने वापस लौटने के लिए कदम बढ़ाए ही थे कि दानपात्र ने फिर आवाज़ दी—”जल्दी मत जाओ। अभी राजनीति का मुख्य पात्र मंच पर आया ही कहाँ है! अभी देखना, कैसे हर दल इस चोरी में अपना-अपना लाभ खोजेगा। यहां चढ़ावा कम चोरी हुआ है, अवसर ज्यादा पैदा हुआ है।”

मैं ठिठक गया। मुझे समझ आ गया कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। असली व्यंग्य तो अब शुरू होने वाला है।

राजनीति का प्रसाद और चरित्र का चढ़ावा

दानपात्र ठीक कह रहा था। आरती की लौ अभी बुझी भी नहीं थी कि राजनीति ने अपने जूते बाहर उतारने की ज़हमत भी नहीं उठाई और सीधे मंदिर में प्रवेश कर गई। मुझे लगा, शायद वह दर्शन करने आई होगी। लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि उसे भगवान से नहीं, घटना से काम है। आजकल राजनीति तीर्थयात्रा पर नहीं जाती, अवसरयात्रा पर निकलती है। जहाँ हादसा, वहीं हाज़िरी; जहाँ विवाद, वहीं विचार; और जहाँ कैमरा, वहीं करुणा।

सबसे पहले एक दल आया। उसने कहा, “यह पूरी व्यवस्था की विफलता है।” उसके पीछे दूसरा दल आया। उसने कहा, “यह विपक्ष की साज़िश है।” तीसरा बोला, “मुद्दा चोरी नहीं, उसके पीछे की मानसिकता है।” चौथा बोला, “आप लोग असली सवाल से ध्यान भटका रहे हैं।”

मैंने धीरे से दानपात्र से पूछा, “असली सवाल कौन-सा है?”

वह बोला, “यही तो कोई पूछ ही नहीं रहा।”

मुझे अचानक लगा कि हमारे यहां हर घटना का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि वह बहुत जल्दी किसी दल की हो जाती है। सड़क टूटे तो राजनीति, पुल गिरे तो राजनीति, परीक्षा लीक हो तो राजनीति, मंदिर में चोरी हो तो भी राजनीति। केवल आदमी की ईमानदारी कभी राजनीति का मुद्दा नहीं बनती। शायद इसलिए कि उस पर भाषण देना कठिन है और वोट मिलना उससे भी कठिन।

इसी बीच एक सज्जन बड़े गर्व से बोले, “दोषियों को किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा।”

मैंने पूछा, “और अगर दोषी चरित्र निकला तो?”

वे मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने लोकतंत्र के पाठ्यक्रम में अनुपस्थित प्रश्न पूछ लिया हो। हमारे यहां व्यक्ति पकड़ना आसान है, प्रवृत्ति पकड़ना कठिन। अदालत आदमी को सज़ा दे सकती है, लेकिन लालच को कौन-सी जेल भेजे?

मंदिर के बाहर खड़े एक बुज़ुर्ग मुस्कुराकर बोले, “बेटा, पहले लोग मंदिर जाकर अपने पाप छोड़ आते थे। अब कुछ लोग शायद पाप लेकर ही मंदिर जाते हैं।”

मैंने कहा, “बाबा, यह बहुत कठोर बात है।”

वे बोले, “सच हमेशा थोड़ा कठोर होता है। झूठ ही मुलायम तकिए की तरह आराम देता है।”

उनकी बात सुनकर मुझे अपने बचपन का मंदिर याद आया। तब दादी कहती थीं, “भगवान सब देख रहे हैं।” आज लगता है कि भगवान अब भी देख रहे हैं, लेकिन आदमी कैमरे को देखकर ज़्यादा डरता है। कैमरा बंद होते ही नैतिकता भी छुट्टी पर चली जाती है। शायद इसलिए अब हर जगह कैमरे बढ़ रहे हैं और चरित्र घट रहा है।

मैंने कल्पना की कि अगर एक दिन भगवान स्वयं प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दें तो क्या होगा?

पत्रकार पूछेगा, “प्रभु, इस पूरे मामले पर आपका आधिकारिक बयान क्या है?”

भगवान शायद मुस्कुराकर कहें, “मैंने मनुष्य को विवेक दिया था, प्रेस नोट नहीं।”

दूसरा पत्रकार पूछे, “क्या आप किसी पर कार्रवाई करेंगे?”

भगवान उत्तर दें, “मैं कर्म का हिसाब रखता हूँ, प्रेस विज्ञप्ति का नहीं।”

तीसरा पूछे, “आपका राजनीतिक संदेश क्या है?”

भगवान शायद वहीं माइक छोड़कर चले जाएँ। क्योंकि जिनके नाम पर लोग लड़ रहे हैं, उन्होंने तो जीवन भर जोड़ने की शिक्षा दी थी।

उधर जांच समिति की रिपोर्ट भी लगभग तैयार थी। रिपोर्ट का आकार देखकर मुझे लगा कि चोरी शायद रुपये की नहीं, कागज़ की हुई है। इतने पन्नों में अगर सच थोड़ा-सा भी बच गया होगा तो उसे ढूँढ़ने के लिए अलग समिति बनानी पड़ेगी। हमारे यहां रिपोर्टें अक्सर अपराध से लंबी और परिणाम से छोटी होती हैं। वे पढ़ने के लिए नहीं, रखने के लिए बनाई जाती हैं।

दानपात्र ने मेरी ओर देखकर कहा, “तुम जानते हो, मैं सबसे ज़्यादा किससे डरता हूँ?”

मैंने कहा, “चोर से?”

वह बोला, “नहीं।”

“तो फिर?”

“उस दिन से, जब लोग मेरे सामने आकर सोचेंगे कि चढ़ावा डालें या नहीं। जिस दिन श्रद्धा हिसाब-किताब करने लगेगी, समझ लेना कि मेरी हार नहीं, समाज की हार होगी।”

उसकी बात मेरे भीतर उतर गई। सचमुच, चढ़ावा कभी रुपये का नहीं होता; वह विश्वास का होता है। दस रुपये डालने वाला भी उतनी ही श्रद्धा रखता है, जितनी लाखों चढ़ाने वाला। इसलिए चोरी का मूल्य रकम से नहीं, टूटे हुए भरोसे से तय होता है।

मैंने आख़िरी बार मंदिर की ओर देखा। घंटियाँ बज रही थीं, आरती चल रही थी, श्रद्धालु कतार में थे। जीवन अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। तभी लगा कि शायद भगवान को अपने मंदिर की नहीं, अपने आदर्शों की अधिक चिंता होगी। मंदिर पत्थर से बनता है, लेकिन मर्यादा मनुष्य के आचरण से बनती है। अगर आचरण ही दरक जाए, तो संगमरमर की दीवारें भी उसे नहीं संभाल सकतीं।

लौटते समय दानपात्र ने अंतिम बात कही—”मेरे लिए नए ताले मत खरीदो, नए संस्कार पैदा करो। कैमरे बढ़ाने से पहले चरित्र बचाओ। क्योंकि ताला चोर को रोक सकता है, लालच को नहीं।”

मैं मंदिर की सीढ़ियाँ उतर आया। पीछे मुड़कर देखा तो लगा, भगवान पहले की तरह शांत बैठे हैं। शायद उन्हें विश्वास है कि मनुष्य कभी न कभी अपने भीतर झाँकना सीख जाएगा। लेकिन तब तक इस देश में चोर भागते रहेंगे, बयान दौड़ते रहेंगे और आस्था बीच सड़क पर खड़ी होकर दोनों को देखती रहेगी।

और शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है—हम भगवान के घर की सुरक्षा पर बहस कर रहे हैं, जबकि सबसे बड़ी सेंध इंसान के चरित्र में लग चुकी है। यही सेंध भर गई, तो दानपात्र भी सुरक्षित रहेगा और आस्था भी। वरना ताले बदलते रहेंगे, समितियाँ बनती रहेंगी, बयान गूंजते रहेंगे और हर नई चोरी के बाद हम फिर उसी पुराने वाक्य से शुरुआत करेंगे—“दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” फर्क सिर्फ इतना होगा कि अगली बार यह वाक्य कोई और पढ़ रहा होगा।

2 Comments

  1. केवल कृष्ण पनगोत्रा स्वतंत्र लेखक-पत्रकार जम्मू-कश्मीर says:

    अनूप जी,
    चोरी को लेकर बहुत कुछ सुन और पढ़ लिया मगर आप जैसा ‘अंदाज-ए-बयां’ मुश्किल से मिलता है।
    हम भगवान के घर की सुरक्षा पर बहस कर रहे हैं, जबकि सबसे बड़ी सेंध इंसान के चरित्र में लग चुकी है।
    इससे ज्यादा ठीक बात और क्या हो सकती है!
    केवल कृष्ण पनगोत्रा

    1. आदरणीय केवल कृष्ण पनगोत्रा जी,

      आपकी संवेदनशील और मर्मस्पर्शी टिप्पणी के लिए हृदय से आभार।

      लेख के भाव को आपने जिस गहराई से ग्रहण किया, वह किसी भी लेखक के लिए सबसे बड़ा सम्मान है। सच यही है कि मंदिरों की दीवारों में लगी सेंध से कहीं अधिक खतरनाक वह दरार है, जो मनुष्य के चरित्र, नैतिकता और सामाजिक चेतना में पड़ती जा रही है। यदि हम उस सेंध को भरने का साहस नहीं जुटा सके, तो ताले बदलने से भी समाज सुरक्षित नहीं होगा।

      आप जैसे वरिष्ठ लेखक-पत्रकार की यह प्रतिक्रिया मेरे लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ एक नैतिक जिम्मेदारी का भी स्मरण कराती है कि लेखनी केवल घटनाओं का वर्णन न करे, बल्कि समाज के अंतर्मन को भी झकझोरे।

      आपके स्नेह, विश्वास और शुभेच्छाओं के लिए पुनः हृदय से धन्यवाद। कृपया आगे भी इसी आत्मीयता के साथ अपना मार्गदर्शन देते रहिए।
      सादर प्रणाम।
      — अनिल अनूप

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