संपादकीय लेख
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संपादकीय
जब घर जला तो शेर अमर हो गया : बशीर बद्र, दंगे और हमारी सामूहिक विफलता
अनिल अनूप, संपादक भारतीय उपमहाद्वीप की साहित्यिक परंपरा में कुछ शायर ऐसे होते हैं जिनकी रचनाएं केवल कागज पर लिखे…
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संपादकीय
हिंदी पत्रकारिता दिवस : पत्रकार बढ़े, लेकिन क्या पत्रकारिता बची रह गई है?
✍️ लेखक: अनिल अनूप (संपादकीय) हर वर्ष 30 मई को देशभर में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। कई लोग…
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यात्रा वृत्तांत
कचौड़ी गली : एक जमाना, जो स्मृतियों की गलियों में आज भी सांस लेता है
अनिल अनूप, संपादक कोक स्टूडियो में रेखा भारद्वाज की आवाज में गूंजती भोजपुरी की ऐतिहासिक कजरी “पिया चल गईला रंगून…
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खास बात
मुस्कुराइए… आप लखनऊ में हैं! मगर इस शहर की आँखों में कुछ सवाल अब भी बाकी हैं…
अंजनी कुमार की पत्नी रात का सफ़र अपने अंतिम पर्यवेक्षण की ओर बढ़ रहा था। ट्रेन की अलौकिक हो रही…
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विचार
औकात….? इंसान की हैसियत का सच, समाज का छल और आत्मसम्मान की अंतिम लड़ाई
✍️अनिल अनूप एक शब्द बहुत आसानी से लोगों के जंहा पर चढ़ जाता है – “औकात”। किसी को सपने में…
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