अपराध

मासूम की हत्या पर आया ऐतिहासिक फैसला, अदालत ने सुनाई फांसी की सजा

40 दिनों में मुकदमे का निपटारा, अदालत ने कहा- यह दुर्लभ से दुर्लभतम अपराध

रिपोर्ट: चुन्नीलाल प्रधान

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है, जहां फिरोजाबाद की जिला एवं सत्र न्यायालय ने डेढ़ वर्षीय मासूम बच्चे की निर्मम हत्या के मामले में दोषी को फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अभियोजन पक्ष की मजबूत दलीलों के आधार पर आरोपी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक को दोषी ठहराते हुए इस अपराध को “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी का मामला माना।

इस मामले की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि घटना के बाद पुलिस, अभियोजन और न्यायालय ने असाधारण गति से कार्रवाई करते हुए महज 40 दिनों के भीतर मुकदमे को अंतिम निर्णय तक पहुंचा दिया। इसे प्रदेश में त्वरित न्याय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

फैसला सुनते ही टूट गया दोषी

शुक्रवार को भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच आरोपी को अदालत में पेश किया गया। जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने जैसे ही अपना फैसला सुनाते हुए दोषी को फांसी की सजा सुनाई, कोर्ट रूम का माहौल गंभीर हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार निर्णय सुनते ही दोषी मानसिक रूप से विचलित हो गया और उसने अदालत परिसर में खुद को थप्पड़ मारना शुरू कर दिया। वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने तत्काल स्थिति को संभाला और आरोपी को अपनी सुरक्षा में बाहर ले गए।

सड़क पर मासूम की बेरहमी से की गई थी हत्या

यह दिल दहला देने वाली घटना 30 मई 2026 को फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद थाना क्षेत्र स्थित यादव कॉलोनी में हुई थी। आरोप है कि बदायूं निवासी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक ने डेढ़ साल के मासूम आरव को सड़क पर उठाकर कई बार जमीन पर पटक दिया। गंभीर चोटों के कारण मासूम की मौके पर ही मौत हो गई।

घटना इतनी भयावह थी कि आसपास मौजूद लोग स्तब्ध रह गए। मासूम की दर्दनाक मौत की खबर फैलते ही पूरे इलाके में शोक और आक्रोश का माहौल बन गया। स्थानीय लोगों ने आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की थी।

पुलिस ने दिखाई तत्परता

घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। प्रारंभिक जांच में जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने तेजी से विवेचना पूरी की। अधिकारियों ने इस मामले को प्राथमिकता देते हुए सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं को निर्धारित समय में पूरा कराया।

पुलिस की सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वारदात के केवल छह दिन के भीतर अदालत में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल कर दिया गया। इसमें घटना से जुड़े भौतिक साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य महत्वपूर्ण प्रमाण शामिल किए गए।

अभियोजन पक्ष ने पेश किए मजबूत साक्ष्य

शासकीय अधिवक्ता राजीव प्रियदर्शी ने अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से प्रभावी पैरवी की। उन्होंने बताया कि मामले में कुल 13 प्रत्यक्षदर्शी एवं अन्य महत्वपूर्ण गवाहों के बयान अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इन गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों ने अभियोजन पक्ष के मामले को मजबूत आधार प्रदान किया।

वहीं बचाव पक्ष अदालत के समक्ष केवल एक गवाह ही प्रस्तुत कर सका। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों, गवाहों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करने के बाद आरोपी को दोषी करार दिया।

फास्ट ट्रैक सुनवाई बनी मिसाल

इस मुकदमे की सुनवाई सामान्य प्रक्रिया से अलग तेज गति से की गई। अदालत ने लगातार सुनवाई करते हुए अनावश्यक विलंब नहीं होने दिया। यही कारण रहा कि लगभग 40 दिनों के भीतर पूरे मुकदमे का निस्तारण हो गया और अंतिम फैसला सुनाया गया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि गंभीर और संवेदनशील मामलों में समयबद्ध सुनवाई से न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत होता है। इस मामले में पुलिस, अभियोजन और न्यायपालिका के समन्वय ने त्वरित न्याय का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत किया है।

समाज को दिया कड़ा संदेश

अदालत के इस फैसले को केवल एक आरोपी को सजा देने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे समाज के लिए एक सशक्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। मासूम बच्चों के खिलाफ होने वाले जघन्य अपराधों के प्रति न्यायपालिका की सख्त सोच इस निर्णय में स्पष्ट दिखाई देती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में त्वरित जांच, मजबूत साक्ष्य और समयबद्ध सुनवाई अपराधियों में कानून का भय पैदा करने के साथ-साथ पीड़ित परिवारों को समय पर न्याय दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पीड़ित परिवार को न्याय मिलने की उम्मीद पूरी

घटना के बाद से ही पीड़ित परिवार न्याय की मांग कर रहा था। पूरे मुकदमे के दौरान परिवार की नजर अदालत की कार्यवाही पर बनी रही। अब अदालत द्वारा दोषी को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद परिजनों ने इसे न्याय की दिशा में बड़ा कदम माना है।

हालांकि भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुसार निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा पर आगे उच्च न्यायालय सहित अन्य न्यायिक स्तरों पर कानूनी प्रक्रिया भी पूरी की जाएगी। इसके बाद ही सजा का अंतिम क्रियान्वयन संभव होगा।

फिरोजाबाद के मासूम आरव हत्याकांड में आया यह फैसला न्यायपालिका की संवेदनशीलता, पुलिस की तत्परता और अभियोजन पक्ष की प्रभावी पैरवी का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। छह दिन में चार्जशीट और मात्र 40 दिनों में निचली अदालत का फैसला यह दर्शाता है कि यदि सभी एजेंसियां समन्वित तरीके से कार्य करें तो गंभीर अपराधों में त्वरित न्याय संभव है। अदालत द्वारा इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” श्रेणी का अपराध मानते हुए सुनाई गई फांसी की सजा समाज में यह स्पष्ट संदेश देती है कि मासूमों के विरुद्ध बर्बर अपराध करने वालों के प्रति कानून किसी भी प्रकार की नरमी बरतने के पक्ष में नहीं है।

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