जौनपुर

ऊर्जा बचत की नई मिसाल बना पूर्वांचल विश्वविद्यालय ; साझा परिवहन, साइकिल और पैदल संस्कृति को मिला बढ़ावा

रामकीर्ति यादव की रिपोर्ट

जौनपुर प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा ऊर्जा संरक्षण, पेट्रोल-डीजल की बचत और संसाधनों के संयमित उपयोग को लेकर लगातार दिए जा रहे आह्वान का असर अब शैक्षणिक संस्थानों में भी दिखाई देने लगा है। वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय ने इस दिशा में ऐसी पहल शुरू की है, जिसकी चर्चा अब पूरे जनपद में हो रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 18 मई से लागू की गई नई व्यवस्था के पहले ही दिन परिसर का माहौल पूरी तरह बदला हुआ नजर आया। अधिकारी, शिक्षक और कर्मचारी निजी वाहनों की बजाय साझा परिवहन, बाइक, साइकिल और पैदल चलकर कार्यालय पहुंचे।

कुलपति प्रो. वंदना सिंह ने पेश की मिसाल

विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. वंदना सिंह ने इस अभियान की अगुवाई करते हुए खुद उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने आवासीय परिसर से कार्यालय तक सहयोगियों के साथ सामूहिक रूप से पहुंचकर यह संदेश दिया कि ऊर्जा बचत केवल सरकारी निर्देश नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।

महिला नेतृत्व की इस संवेदनशील पहल ने शिक्षकों और कर्मचारियों को भी प्रेरित किया। प्रो. वंदना सिंह का मानना है कि यदि छोटी दूरी तय करने के लिए लोग निजी कारों का कम उपयोग करें और साझा परिवहन या पैदल चलने की आदत अपनाएं, तो इससे न केवल ईंधन की बचत होगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी मदद मिलेगी।

अधिकारियों ने बदली अपनी दिनचर्या

सोमवार को विश्वविद्यालय परिसर में सामान्य दिनों से बिल्कुल अलग दृश्य देखने को मिला। जहां पहले अधिकांश अधिकारी निजी कारों से कार्यालय पहुंचते थे, वहीं अब कई लोग साझा वाहनों का उपयोग करते नजर आए।

परीक्षा नियंत्रक डॉ. विनोद कुमार सिंह अपने सहयोगी जितेंद्र कुमार पांडेय के साथ बाइक से विश्वविद्यालय पहुंचे। कुलसचिव केश लाल विभागीय कर्मचारियों को साथ लेकर कार्यालय आए, जबकि डिप्टी रजिस्ट्रार अजीत प्रताप सिंह स्वयं बाइक चलाकर कार्यालय पहुंचे।

इस बदलाव ने कर्मचारियों के बीच सकारात्मक संदेश दिया कि यदि अधिकारी खुद पहल करें, तो व्यवहारिक परिवर्तन तेजी से संभव हो सकता है।

पैदल और साइकिल संस्कृति को मिला बढ़ावा

विश्वविद्यालय परिसर में रहने वाले कई शिक्षक और कर्मचारी पैदल या साइकिल से अपने विभागों तक पहुंचते दिखाई दिए। सुबह के समय परिसर में वाहनों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही और वातावरण में सादगी तथा अनुशासन महसूस किया गया।

कई कर्मचारियों ने कहा कि यदि नियमित रूप से इस प्रकार की व्यवस्था लागू रहती है, तो इससे आर्थिक बचत के साथ-साथ स्वास्थ्य लाभ भी होगा। कुछ कर्मचारियों ने इसे “फिटनेस और फ्यूल सेविंग” दोनों के लिए बेहतर कदम बताया।

पहले ही जारी हो चुके थे ऊर्जा बचत के निर्देश

विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऊर्जा संरक्षण को लेकर पहले ही व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए थे। कुलसचिव कार्यालय की ओर से जारी आदेश में बिजली की खपत कम करने, कार्यालय संचालन को व्यवस्थित बनाने और अनावश्यक संसाधनों के उपयोग को सीमित करने पर जोर दिया गया था।

इन निर्देशों में अवकाश व्यवस्था, कक्षाओं के समय निर्धारण और विभागीय कार्य प्रणाली में बदलाव जैसे महत्वपूर्ण बिंदु शामिल किए गए थे। प्रशासन का उद्देश्य केवल ईंधन बचत नहीं बल्कि समग्र संसाधन प्रबंधन को प्रभावी बनाना है।

पांच दिवसीय व्यवस्था और वर्क फ्रॉम होम पर जोर

नई व्यवस्था के तहत पांच दिवसीय कार्यालय संचालन प्रणाली को प्रभावी रूप से लागू करने की तैयारी की गई है। इसके साथ ही आवश्यक परिस्थितियों में “वर्क फ्रॉम होम” व्यवस्था को भी बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि इससे ऊर्जा की खपत में कमी आएगी और कर्मचारियों के समय तथा संसाधनों की भी बचत होगी।

परीक्षा कार्यों के बीच भी जारी रही पहल

इस समय विश्वविद्यालय में परीक्षा फॉर्म भरने, परीक्षाओं और मूल्यांकन कार्यों का दबाव बना हुआ है। इसके बावजूद प्रशासन द्वारा ऊर्जा बचत अभियान को प्राथमिकता देना चर्चा का विषय बना हुआ है।

कर्मचारियों का कहना है कि इतने व्यस्त समय में भी यदि विश्वविद्यालय प्रशासन पर्यावरण और ऊर्जा संरक्षण के प्रति गंभीर है, तो यह निश्चित रूप से दूरदर्शी सोच का संकेत है।

छात्रों में भी दिखा उत्साह

विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच भी इस पहल को लेकर उत्साह देखा गया। कई विद्यार्थियों ने कहा कि जब अधिकारी और शिक्षक खुद साइकिल, बाइक या साझा परिवहन का उपयोग कर रहे हैं, तो छात्रों को भी अनावश्यक वाहन उपयोग से बचना चाहिए। कुछ छात्रों ने परिसर में नियमित साइकिल अभियान और “नो व्हीकल डे” जैसे कार्यक्रम शुरू करने की मांग भी रखी।

सामाजिक बदलाव की ओर बढ़ता विश्वविद्यालय

विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएं समाज को दिशा देने का काम करती हैं। ऐसे में यदि यहां से ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण संतुलन का संदेश जाएगा, तो उसका असर व्यापक स्तर पर दिखाई देगा।

पूर्वांचल विश्वविद्यालय की यह पहल केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक चेतना और व्यवहारिक बदलाव का उदाहरण बनती नजर आ रही है। जौनपुर के शैक्षणिक और सामाजिक हलकों में अब इस अभियान की चर्चा हो रही है। लोग इसे प्रधानमंत्री की ऊर्जा बचत अपील को जमीन पर उतारने वाला व्यवहारिक मॉडल बता रहे हैं।

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