जौनपुर

जौनपुर संस्कृत सम्मेलन: राष्ट्र निर्माण में संस्कृतज्ञों के अवदान पर हुआ मंथन, विद्वानों ने साझा किए विचार

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में श्री गौरी शंकर संस्कृत महाविद्यालय, सुजानगंज में आयोजित शास्त्रीय सम्मेलन में जौनपुर की गौरवशाली संस्कृत परंपरा और राष्ट्र निर्माण में संस्कृतज्ञों की भूमिका पर विस्तृत चर्चा हुई।

 रामकीर्ति यादव की रिपोर्ट

सुजानगंज (जौनपुर)। राष्ट्र निर्माण में संस्कृतज्ञों का अवदान विषय पर उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में श्री गौरी शंकर संस्कृत महाविद्यालय, सुजानगंज में एक दिवसीय शास्त्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता से जुड़े विद्वानों ने संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन तथा राष्ट्र निर्माण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से अपने विचार रखे।

जौनपुर की विद्वत परंपरा पूरे देश के लिए प्रेरणा

मुख्य अतिथि रघुवीर स्वायत्तशासी महाविद्यालय, थलोई के प्राचार्य डॉ. अश्वनी कुमार गुप्त ने कहा कि जौनपुर सदियों से संस्कृत अध्ययन और अध्यापन का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां की विद्वत परंपरा ने देशभर में विशिष्ट पहचान बनाई है। उन्होंने आधुनिक पाणिनि के रूप में विख्यात श्री राम प्रसाद त्रिपाठी के व्याकरण क्षेत्र में दिए गए योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका कार्य आज भी संस्कृत विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणास्रोत है।

जगद्गुरुओं और मनीषियों की तपोभूमि है जौनपुर

सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. जय प्रकाश तिवारी ने कहा कि जौनपुर ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध जनपद है। उन्होंने इसे जगद्गुरुओं और संस्कृत मनीषियों की तपोभूमि बताते हुए पद्मविभूषण जगद्गुरु रामभद्राचार्य के संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण में किए जा रहे कार्यों की सराहना की।

अनेक महान संस्कृत विद्वानों को किया गया याद

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. विनय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि जौनपुर की पहचान केवल ऐतिहासिक धरोहरों से नहीं, बल्कि इसकी समृद्ध विद्वत परंपरा से भी है। उन्होंने जगद्गुरु वासुदेवानंद सरस्वती, जगद्गुरु रामभद्राचार्य, प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र, प्रो. आद्या प्रसाद मिश्र, प्रो. राम सेवक दुबे, पं. देवतादीन चतुर्वेदी, श्री राम शिरोमणि तिवारी, चंद्रदेव मणि त्रिपाठी, जगद्गुरु श्री देवनायकाचार्य, प्रो. जनार्दन प्रसाद मणि, पं. राम मनोरथ तिवारी, प्रो. जयप्रकाश नारायण त्रिपाठी, प्रो. उमाशंकर, प्रो. रामचंद्र द्विवेदी तथा प्रो. अमित शुक्ला सहित अनेक विद्वानों के योगदान को रेखांकित किया।

उन्होंने बताया कि जनपद के अनेक संस्कृत विद्वानों ने विभिन्न विश्वविद्यालयों में कुलपति एवं अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्व निभाकर शिक्षा जगत में उल्लेखनीय पहचान बनाई है।

नई पीढ़ी तक संस्कृत पहुंचाने पर जोर

वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत केवल धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा नहीं, बल्कि विज्ञान, दर्शन, साहित्य, योग, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परंपरा का विशाल भंडार है। नई पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने के लिए आधुनिक तकनीक और प्रभावी शिक्षण पद्धतियों का उपयोग समय की आवश्यकता है।

शोध-पत्रों ने बढ़ाई सम्मेलन की गरिमा

सम्मेलन में आयुषी सिंह, उमेश चंद्र तिवारी, संदीप कुमार तिवारी तथा इन्द्रदेव द्विवेदी ने शोध-पत्र प्रस्तुत करते हुए जौनपुर की संस्कृत परंपरा और राष्ट्र निर्माण में संस्कृतज्ञों के योगदान पर विस्तृत प्रकाश डाला। उपस्थित विद्वानों ने शोध-पत्रों की सराहना की।

वरिष्ठ वक्ताओं ने रखे विचार

वरिष्ठ पत्रकार श्याम शंकर पाण्डेय, आचार्य विनोद कुमार त्रिपाठी, पंडित शिवानन्द चौबे तथा जितेन्द्र कुमार सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा संस्कृत में निहित है। उन्होंने संस्कृत शिक्षा को अधिक व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख बनाने पर बल दिया।

प्रभावी संचालन के साथ हुआ समापन

कार्यक्रम का संचालन आचार्य खगेन्द्र कुमार मिश्र एवं आचार्य अखिलेश मणि त्रिपाठी ने संयुक्त रूप से किया। अंत में सभी अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

सम्मेलन का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि संस्कृत भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए ऐसे शास्त्रीय आयोजनों की निरंतरता बनाए रखी जाएगी। वक्ताओं ने विश्वास व्यक्त किया कि जौनपुर की समृद्ध संस्कृत विरासत भविष्य में भी राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा बनी रहेगी।

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