संसद परिसर में शिक्षा नीति और छात्र आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार पर अखिलेश यादव का तीखा हमला
संसद के मॉनसून सत्र के दौरान समाजवादी पार्टी अध्यक्ष ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग दोहराई, छात्र आंदोलन पर हुई कार्रवाई को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।
दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
संसद के मॉनसून सत्र के दौरान राजनीतिक माहौल उस समय और गर्म हो गया जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार शिक्षा मंत्री पर कार्रवाई करने से बच रही है, क्योंकि उसे इस बात का डर है कि यदि उन्होंने इस्तीफा दिया तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकते हैं।
अखिलेश यादव ने संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि विपक्ष लगातार शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों से जुड़े मुद्दों को उठा रहा है, लेकिन सरकार इन सवालों का संतोषजनक जवाब देने के बजाय उन्हें टालने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण होती है और यदि किसी मंत्री के कार्यकाल पर लगातार सवाल उठ रहे हैं तो नैतिक आधार पर उन्हें स्वयं पद छोड़ देना चाहिए।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर सरकार पर साधा निशाना
सपा अध्यक्ष ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर इस्तीफे का दबाव इसलिए नहीं बना पा रही है क्योंकि उन्हें आशंका है कि यदि उन्होंने पद छोड़ दिया तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो सरकार की मुश्किलें बढ़ा देंगे।
उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह जनता और छात्रों के सवालों का स्पष्ट उत्तर दे। यदि लगातार विवाद पैदा हो रहे हैं तो सरकार को जवाबदेह होना चाहिए, लेकिन वर्तमान सरकार जवाब देने के बजाय मुद्दों को दबाने का प्रयास कर रही है।
छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई को बताया दुर्भाग्यपूर्ण
अखिलेश यादव ने हाल ही में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जिन युवाओं और छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन किया, उनके साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया, वह बेहद चिंताजनक है।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद शायद ही कभी ऐसा देखने को मिला हो कि अपनी बात रखने आए छात्रों के साथ इस तरह की सख्ती बरती गई हो। उन्होंने दावा किया कि कई छात्रों के सिर में गंभीर चोटें आईं, कुछ के सिर पर टांके लगाने पड़े, जबकि कई युवाओं के हाथ और पैर तक फ्रैक्चर हो गए।
सपा अध्यक्ष ने कहा कि बड़ी संख्या में छात्र दूर-दराज़ के राज्यों और शहरों से अपनी मांगों को लेकर राजधानी पहुंचे थे, लेकिन उनकी बात सुनने के बजाय उनके खिलाफ बल प्रयोग किया गया।
आंसू गैस और लाठीचार्ज पर उठाए सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आंदोलन कर रहे छात्रों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए और उन्हें तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया गया। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का समाधान बातचीत के माध्यम से निकाला जाना चाहिए, न कि पुलिस बल के सहारे।
उन्होंने कहा कि सरकार यदि युवाओं की समस्याओं को गंभीरता से सुनती और संवाद स्थापित करती तो ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती। उनके अनुसार छात्रों की मांगों को समझने के बजाय प्रशासनिक कार्रवाई करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का किया जिक्र
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ वीडियो का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि वीडियो में कुछ ऐसे लोग दिखाई दे रहे हैं जो वर्दी में नहीं थे, लेकिन प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते नजर आए।
उन्होंने कहा कि यदि किसी भी प्रदर्शन में सादे कपड़ों में मौजूद लोग हिंसक कार्रवाई करते दिखाई देते हैं तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी केवल अधिकृत एजेंसियों की होती है और किसी भी प्रकार की अनधिकृत कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।
लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की मांग
सपा प्रमुख ने कहा कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान समय में विरोध की आवाज़ों को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि विपक्ष पहले भी इस मुद्दे पर सरकार का विरोध करता रहा है और आगे भी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रहेगा। उनका कहना था कि जनता की आवाज़ को बलपूर्वक नहीं दबाया जा सकता।
सरकार से की नैतिक जिम्मेदारी निभाने की अपील
अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह आंदोलनकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाए। उन्होंने कहा कि यदि सरकार जनता का विश्वास खो चुकी है तो उसे नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता जनता की सेवा के लिए होती है, इसलिए सरकार को जनता और युवाओं की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।
संसद के पहले दिन हुआ था प्रदर्शन
गौरतलब है कि मॉनसून सत्र के पहले दिन विभिन्न छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों द्वारा संसद की ओर शांति मार्च निकालने का प्रयास किया गया था। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर सरकार जवाब दे तथा छात्रों की समस्याओं का समाधान सुनिश्चित किया जाए।
पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने की खबरें सामने आईं। इस दौरान कई प्रदर्शनकारियों के घायल होने की भी सूचनाएं मिलीं। घटना के बाद विपक्षी दलों ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए, जबकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई किए जाने की बात कही।
राजनीतिक बयानबाजी से गर्माया मॉनसून सत्र
मॉनसून सत्र की शुरुआत के साथ ही शिक्षा व्यवस्था, छात्रों के आंदोलन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिल रही है। विपक्ष जहां सरकार को छात्रों के प्रति असंवेदनशील बता रहा है, वहीं केंद्र सरकार अपने कदमों को कानून और सुरक्षा व्यवस्था के अनुरूप बता रही है।
आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर इन मुद्दों पर बहस और तेज होने की संभावना है। विपक्ष इस विषय को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाने की तैयारी में है, जबकि सरकार अपने पक्ष को मजबूती से रखने का प्रयास कर रही है। ऐसे में मॉनसून सत्र के आगामी दिनों में शिक्षा, छात्र आंदोलन और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बने रह सकते हैं।








