विदेश में नौकरी का सपना बना मौत का सफर : रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूर्वांचल के 11 परिवारों से छीने उनके बेटे
एजेंटों के झांसे में विदेश पहुंचे युवाओं की दर्दनाक कहानी, वर्दी और बैज का ही करना पड़ा अंतिम संस्कार
जगदंबा उपाध्याय की रिपोर्ट
आजमगढ़। बेहतर भविष्य, ऊंची तनख्वाह और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने का सपना लेकर घर से निकले पूर्वांचल के कई युवाओं की जिंदगी रूस-यूक्रेन युद्ध की भेंट चढ़ गई। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और मऊ जिलों के कुल 11 युवाओं की रूस की ओर से लड़ाई के दौरान मौत हो चुकी है, जबकि एक अन्य युवक के बारे में अब तक कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है। इन घटनाओं ने दोनों जिलों के दर्जनों परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि कई परिवारों को अपने बेटों का अंतिम दर्शन तक नसीब नहीं हुआ और उन्हें केवल उनकी वर्दी, टोपी, बैज और मृत्यु प्रमाण पत्र के सहारे अंतिम संस्कार करना पड़ा।
रोजगार के सपने ने बदली जिंदगी की दिशा
पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी लंबे समय से बड़ी समस्या रही है। ऐसे में जब विदेश में आकर्षक वेतन वाली नौकरी का प्रस्ताव मिलता है तो अधिकांश युवा बिना अधिक जांच-पड़ताल के उस पर भरोसा कर लेते हैं। यही भरोसा आजमगढ़ और मऊ के कई युवाओं के लिए सबसे बड़ी त्रासदी बन गया।
परिजनों के अनुसार वर्ष 2024 की शुरुआत में कुछ युवाओं से संपर्क कर उन्हें रूस में प्लंबर, सुरक्षा गार्ड और अन्य तकनीकी कार्यों में नौकरी दिलाने का भरोसा दिया गया। बताया गया कि वहां उन्हें लगभग दो लाख रुपये प्रतिमाह तक का वेतन मिलेगा। बेहतर कमाई की उम्मीद में कई युवाओं ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
एजेंटों के जाल में फंसे दर्जनों युवक
परिवारों का आरोप है कि मऊ निवासी एक एजेंट ने आजमगढ़ और मऊ के लगभग 13 युवाओं को अपने भरोसे में लिया। युवाओं के पासपोर्ट बनवाए गए और उन्हें दिल्ली स्थित एक अन्य एजेंट के माध्यम से रूस भेज दिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में युवाओं और उनके परिवारों से पैसे भी लिए गए।
रूस पहुंचने के बाद युवाओं को पहले कुछ दिनों तक प्रशिक्षण दिया गया। परिवारों का कहना है कि उन्हें यह बताया गया था कि यह नौकरी से जुड़ी सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में भेज दिया गया। यहीं से उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हुई।
युद्ध क्षेत्र में भेजे जाने के बाद टूटा संपर्क
रूस पहुंचने के शुरुआती कुछ सप्ताह तक अधिकांश युवाओं की अपने घरवालों से बातचीत होती रही। परिवारों को भरोसा था कि उनके बेटे सुरक्षित हैं और नौकरी कर रहे हैं। लेकिन कुछ समय बाद अचानक फोन आने बंद हो गए।
संपर्क टूटने के बाद परिवारों की चिंता लगातार बढ़ती गई। कई परिजनों ने एजेंटों से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। धीरे-धीरे अलग-अलग माध्यमों से युवाओं की मौत और घायल होने की खबरें सामने आने लगीं।
अब तक 11 युवाओं की मौत की पुष्टि
उपलब्ध जानकारी के अनुसार मऊ जिले के चार और आजमगढ़ जिले के सात युवाओं की रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान मौत की पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा एक युवक अभी भी लापता बताया जा रहा है।
कुछ युवाओं के पार्थिव शरीर या अवशेष भारत लाए जा सके, जबकि कई मामलों में ऐसा संभव नहीं हो पाया। कुछ घायल युवक किसी तरह वापस अपने घर लौटे, जिनकी आपबीती सुनकर पूरे इलाके में शोक और आक्रोश फैल गया।
वर्दी, टोपी और बैज ही बने अंतिम निशानी
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे भावुक दृश्य तब सामने आया जब चार युवाओं के परिवारों को उनके पार्थिव शरीर के स्थान पर केवल उनकी सैन्य वर्दी, टोपी, बैज, रूसी ध्वज और मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त हुए।
बताया गया कि पंजाब के जालंधर निवासी एक व्यक्ति अपने भाई का शव लेने रूस पहुंचे थे। इसी दौरान मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास से उन्हें पूर्वांचल के चार अन्य युवाओं के निधन की जानकारी मिली। चूंकि उनके शव उपलब्ध नहीं थे, इसलिए दूतावास ने उनकी वर्दी, टोपी, बैज और अन्य स्मृति चिह्न सौंप दिए।
बाद में ये सभी सामान संबंधित परिवारों तक पहुंचाए गए। जब परिजनों ने इन्हीं निशानियों के साथ अपने बेटों का अंतिम संस्कार किया तो पूरे गांव का माहौल गमगीन हो गया। अंतिम विदाई के इस दर्दनाक दृश्य ने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
पूरे क्षेत्र में पसरा मातम
आजमगढ़ और मऊ के जिन गांवों से ये युवक गए थे, वहां आज भी मातम का माहौल है। जिन परिवारों ने अपने इकलौते बेटे या घर के कमाऊ सदस्य को खोया है, उनके सामने आर्थिक और सामाजिक दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि विदेश में नौकरी के नाम पर युवाओं को जिस तरह युद्ध क्षेत्र में भेजा गया, वह बेहद गंभीर मामला है। लोगों का मानना है कि यदि समय रहते सही जानकारी मिल जाती तो शायद कई परिवार इस दुख से बच सकते थे।
एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग
घटना के बाद स्थानीय लोगों और परिजनों में भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि विदेश में नौकरी का झांसा देकर युवाओं को युद्ध जैसे खतरनाक माहौल में भेजने वाले एजेंटों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
लोगों ने सरकार से मांग की है कि ऐसे गिरोहों की पहचान कर उनके खिलाफ कड़ी सजा सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी युवक रोजगार के नाम पर इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार न बने।
साथ ही यह भी मांग उठी है कि विदेश में नौकरी के लिए जाने वाले युवाओं का उचित सत्यापन हो और उन्हें पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए। यदि किसी देश में युद्ध जैसी स्थिति हो तो वहां रोजगार के नाम पर भेजे जाने पर विशेष निगरानी रखी जाए।
युवाओं के लिए बड़ी सीख
यह घटना केवल आजमगढ़ और मऊ तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के युवाओं के लिए एक गंभीर चेतावनी है। विदेश में नौकरी के आकर्षक प्रस्ताव स्वीकार करने से पहले संबंधित कंपनी, एजेंसी और सरकारी अनुमति की पूरी जांच करना बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अधिक वेतन के लालच में बिना सत्यापन के किसी एजेंट पर भरोसा करना जानलेवा साबित हो सकता है। विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावास और अधिकृत भर्ती एजेंसियों के माध्यम से ही रोजगार संबंधी प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने हजारों परिवारों की जिंदगी बदल दी है। लेकिन आजमगढ़ और मऊ के इन परिवारों का दर्द इसलिए और गहरा है क्योंकि वे अपने बेटों का अंतिम दर्शन तक नहीं कर सके। रोजगार की तलाश में घर से निकले युवा कभी वापस नहीं लौटे और उनके परिवारों के हिस्से आई केवल वर्दी, टोपी, बैज और यादें।
यह दर्दनाक घटना प्रशासन, सरकार और समाज सभी के लिए एक बड़ा संदेश है कि विदेश में रोजगार के नाम पर चल रहे अवैध नेटवर्क पर समय रहते रोक लगाना आवश्यक है। साथ ही युवाओं को भी जागरूक होकर केवल अधिकृत माध्यमों से ही विदेश में रोजगार के अवसर तलाशने चाहिए, ताकि किसी अन्य परिवार को ऐसी असहनीय पीड़ा का सामना न करना पड़े।









