साहित्यिक पत्रकारिता

ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती : रोटी की तलाश में निकला था, रास्ते में शब्द मिल गए

ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती’ केवल एक साप्ताहिक स्तंभ नहीं, बल्कि एक अनाम भारतीय के जीवन-संघर्ष, आत्मसम्मान, संवेदनाओं और जिजीविषा की सत्यगाथा है। इसमें कल्पना नहीं, जीवन के वे यथार्थ प्रसंग हैं, जिन्हें समय ने गढ़ा और अनुभवों ने परखा। इस श्रृंखला का उद्देश्य किसी व्यक्ति, परिवार या परिस्थिति को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि संघर्षों से जन्मे उन जीवन-सत्यों को पाठकों तक पहुँचाना है, जो निराशा के अंधेरे में भी उम्मीद का दीप जलाए रखते हैं। यदि इस यात्रा के किसी मोड़ पर आपको अपना ही कोई अक्स दिखाई दे, तो समझिए यह संवाद अपने उद्देश्य तक पहुँच गया।

लेखक अनिल अनूप

कभी-कभी रात का सन्नाटा इतना गहरा होता है कि आदमी को अपनी साँसों की आवाज़ भी परायी लगने लगती है। उम्र जब सात दशक पार कर लेती है, तब नींद भी वैसी नहीं रहती जैसी युवावस्था में हुआ करती थी। आँखें बंद रहती हैं, लेकिन भीतर यादों का एक शहर जागता रहता है। उस शहर में कोई ट्रैफिक नहीं होता, कोई शोर नहीं होता, फिर भी वहाँ सबसे अधिक भीड़ होती है—बीते हुए दिनों की भीड़।

मैं अक्सर उस भीड़ में बिना किसी पते के भटकने लगता हूँ।

कुछ चेहरे मुस्कुरा देते हैं, कुछ चुपचाप निकल जाते हैं और कुछ ऐसे भी मिलते हैं, जिनसे नज़र मिलाने का साहस आज भी नहीं जुटा पाता। यह उम्र आदमी को भूलना नहीं सिखाती, बल्कि यादों के साथ समझौता करना सिखाती है। बहुत लोगों ने मुझसे पूछा कि जीवन ने मुझे सबसे बड़ा पुरस्कार क्या दिया। मैं हर बार मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि पुरस्कारों की सूची बनाना आसान है, लेकिन उन दिनों की सूची बनाना बहुत कठिन है, जब जेब में पैसे नहीं थे, फिर भी आत्मसम्मान बचा हुआ था। दुनिया अक्सर सफलता का हिसाब पूछती है, संघर्ष का नहीं।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी कभी बैंक में जमा नहीं हुई। वह धीरे-धीरे मेरे भीतर जमा होती रही। उसका नाम था—अनुभव।

मैं किसी बड़े घर में पैदा नहीं हुआ था और न ही मेरे हिस्से में कोई तैयार रास्ता आया। मेरे सामने भी वही प्रश्न थे, जो उस समय लाखों नौजवानों के सामने होते थे—घर कैसे चलेगा? रोटी कहाँ से आएगी? जिम्मेदारियाँ कैसे निभेंगी? इन प्रश्नों के सामने सपनों की आवाज़ अक्सर धीमी पड़ जाती है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ।

उम्र कोई उन्नीस वर्ष के आसपास रही होगी। यह वही उम्र होती है जब अधिकतर युवक अपने भविष्य के रंगीन नक्शे बनाते हैं। मैं भी बनाना चाहता था, लेकिन मेरे सामने सफ़ेद काग़ज़ से पहले खाली थाली दिखाई देती थी।

जीवन ने बहुत जल्दी समझा दिया कि कविता से पहले कमाई जरूरी है। इसलिए मैंने काम तलाशना शुरू किया। जहाँ काम मिला, वहाँ गया। कभी दिहाड़ी मजदूर बनकर दिनभर पसीना बहाया। कभी ईंट, गारा और धूल के बीच शाम ढलते देखी। कभी फैक्ट्री की मशीनों के शोर में खड़े-खड़े पूरा दिन निकाल दिया। बाद में जिम्मेदारियाँ बढ़ीं तो सुपरवाइजर भी बना। पद बदलते रहे, कपड़े बदलते रहे, लेकिन एक चीज़ कभी नहीं बदली—रोटी की अनिवार्यता।

उस समय मैंने जाना कि भूख किसी का परिचय नहीं पूछती। वह यह नहीं देखती कि तुम्हारे भीतर कवि छिपा है, लेखक पल रहा है या कोई कलाकार साँस ले रहा है। उसे केवल इतना चाहिए कि शाम तक चूल्हा जल जाए।

लेकिन शायद ईश्वर मनुष्य के भीतर एक ऐसा कोना छोड़ देता है, जहाँ परिस्थितियाँ भी प्रवेश नहीं कर पातीं। मेरे भीतर वह कोना शब्दों का था।

दिनभर मजदूरी करने के बाद भी न जाने कहाँ से इतनी ताकत बच जाती थी कि रात को कागज़ सामने रख देता। कभी दो पंक्तियाँ लिखता, कभी दो पन्ने। कई बार थकान इतनी होती कि कलम हाथ में पकड़े-पकड़े ही नींद आ जाती, लेकिन दूसरे दिन फिर वही क्रम शुरू हो जाता।

आज सोचता हूँ, वह जिद थी या प्रेम? शायद दोनों। क्योंकि जिस आदमी को लिखने से कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा हो, फिर भी वह लिखता रहे, तो समझ लीजिए कि वह शब्दों से नहीं, अपने अस्तित्व से जुड़ा हुआ है।

मैंने कभी लेखक बनने की घोषणा नहीं की। मैं केवल लिखता रहा। मुझे यह भी नहीं पता था कि जो कुछ मैं कागज़ पर उतार रहा हूँ, उसे कभी कोई पढ़ेगा भी या नहीं। लेकिन एक विचित्र संतोष था कि जो बातें किसी से कह नहीं पाता, वे कागज़ सुन लेता था।

कागज़ बहुत धैर्यवान होता है। वह बीच में टोकता नहीं। तर्क नहीं करता। निर्णय नहीं सुनाता। बस चुपचाप आपकी पूरी बात अपने भीतर रख लेता है। शायद इसी कारण दुनिया की सबसे सच्ची आत्मकथाएँ पहले कागज़ से जन्म लेती हैं, पाठकों से बाद में मिलती हैं।

उन दिनों मेरे पास न कोई साहित्यिक मंच था, न परिचय, न कोई ऐसा व्यक्ति जो मेरा हाथ पकड़कर कहता कि लिखते रहो, एक दिन लोग तुम्हें पढ़ेंगे। मेरे पास केवल विश्वास था। और सच कहूँ तो कई बार वह भी डगमगा जाता था। क्योंकि सुबह मजदूरी, दोपहर जिम्मेदारियाँ और रात लेखन—यह क्रम शरीर से ज़्यादा मन को थका देता है।

लेकिन तभी जीवन ने पहली बार मेरे कंधे पर हाथ रखा। ऐसा हाथ, जिसने कोई चमत्कार नहीं किया, लेकिन यह विश्वास जरूर दिला दिया कि लिखे गए शब्द कभी व्यर्थ नहीं जाते। उस दिन डाकिए ने एक साधारण-सा लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में दिया था। वह किसी सरकारी दफ़्तर का पत्र नहीं था। न किसी रिश्तेदार की चिट्ठी। उसमें कुछ और था…

कुछ ऐसा, जिसने पहली बार मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि शायद शब्द भी आदमी की तकदीर का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं।

मैंने काँपते हाथों से वह लिफ़ाफ़ा खोला… और फिर… लिफ़ाफ़ा खोलते समय मेरी धड़कन कुछ तेज़ थी। यह डर नहीं था, उम्मीद भी नहीं थी। शायद यह उस आदमी की स्थिति थी, जो जीवन से बहुत बड़ी अपेक्षाएँ रखना पहले ही छोड़ चुका हो। अंदर एक पत्र था।

शब्द बहुत अधिक नहीं थे, लेकिन उनका वजन इतना था कि बरसों की थकान कुछ देर के लिए हल्की पड़ गई। मेरे भेजे हुए लेख को प्रकाशित करने की स्वीकृति थी। उस समय यह केवल एक सूचना नहीं थी, बल्कि उस युवक के लिए पहला प्रमाण था कि रातों की जागी हुई आँखें व्यर्थ नहीं गईं।

मैंने उस कागज़ को कई बार पढ़ा। हर बार लगा, जैसे कोई कह रहा हो—“चलते रहो, तुम्हारा रास्ता बिल्कुल गलत नहीं है।”

आज के समय में शायद यह बात सामान्य लगे। मोबाइल पर एक संदेश आता है, ईमेल आता है, कुछ ही क्षणों में उत्तर मिल जाता है। लेकिन उस दौर में डाकिए की साइकिल की घंटी भी कई लोगों के लिए भविष्य की दस्तक होती थी। मैंने उस दिन किसी से कोई घोषणा नहीं की। न मिठाई बाँटी। न अपने बारे में कोई बड़ा सपना देखा। बस रात को बहुत देर तक सो नहीं पाया। पहली बार लगा कि रोटी कमाने वाला आदमी भी शब्दों से अपनी पहचान बना सकता है। लेकिन जीवन ने फिर वही किया, जो वह अक्सर करता है।

जैसे ही आदमी थोड़ा-सा मुस्कुराना सीखता है, वह उसकी अगली परीक्षा तैयार कर देता है। लेखन से सम्मान मिला, लेकिन उससे घर का खर्च नहीं चलता था। सुबह फिर वही काम था। दोपहर वही भागदौड़। शाम वही थकान। और रात को फिर वही कागज़। कई बार मन में प्रश्न उठता था—क्या यह सब कभी बदल पाएगा?

फिर भीतर से एक दूसरी आवाज़ आती—“बदलना तुम्हारा काम नहीं, लिखना तुम्हारा काम है।” शायद उसी आवाज़ ने मुझे बचाए रखा। मैंने धीरे-धीरे एक और बात समझी। जीवन में सबसे कठिन काम सफलता प्राप्त करना नहीं होता। सबसे कठिन काम है—संघर्ष के दिनों में अपने स्वभाव को बचाए रखना।

मैंने ऐसे लोगों को देखा, जो अभावों से नहीं, अभावों की कड़वाहट से हार गए। परिस्थितियाँ उनसे रोटी नहीं छीन सकीं, लेकिन उनका धैर्य छीन ले गईं। मैं यह दावा नहीं करूँगा कि मैं हमेशा मजबूत रहा। नहीं। कई रातें ऐसी भी आईं, जब लगा कि शायद कलम छोड़ देना ही बेहतर है। लेकिन हर बार कोई न कोई साधारण-सी घटना मुझे फिर लिखने के लिए मजबूर कर देती। कभी सड़क किनारे बैठा कोई बुज़ुर्ग। कभी खेत से लौटता किसान। कभी रिक्शा खींचते आदमी के चेहरे पर उभरती मुस्कान। कभी स्कूल जाते बच्चों की चहल-पहल। मुझे लगता था कि दुनिया केवल बड़ी घटनाओं से नहीं चलती। उसका असली इतिहास तो छोटे-छोटे लोगों के कंधों पर लिखा जाता है। शायद इसी कारण मेरे लेखों में बड़े लोग कम आए, साधारण लोग ज़्यादा आए।

मैंने पाया कि जिन लोगों को समाज “आम आदमी” कहकर आगे बढ़ जाता है, उनकी ज़िंदगी में असाधारण कथाएँ छिपी होती हैं। उन्हीं कथाओं ने मेरी कलम को दिशा दी। धीरे-धीरे लिखना आदत नहीं, साधना बन गया। मैं किसी साहित्यिक सभा का नियमित सदस्य नहीं था। न किसी बड़े लेखक का शिष्य। मेरे गुरु दो ही थे—जीवन और समाज। दोनों कठोर भी थे और उदार भी। वे हर दिन कुछ न कुछ सिखाते थे। लेकिन उनकी फीस बहुत भारी थी—समय, संघर्ष और धैर्य।

इसी बीच जीवन ने मेरे सामने एक ऐसा दृश्य रखा, जिसे उस समय मैंने एक सामान्य घटना समझकर आगे बढ़ जाना चाहा। यदि उस दिन कोई मुझसे पूछता कि यह घटना तुम्हारे जीवन में क्या बदल देगी, तो मैं हँस देता। क्योंकि वह घटना देखने में बिल्कुल साधारण थी।

न वहाँ कोई भीड़ थी। न कोई शोर। न कोई समाचार बनने लायक बात। बस एक स्त्री थी… उसकी गोद में दो छोटे बच्चे थे। उसके पास खड़ा एक पुरुष था, जिसे देखकर पहली नज़र में ही समझ में आ जाता था कि उसका मन इस दुनिया की सामान्य गति से बहुत दूर भटक चुका है।

मैं कुछ पल के लिए ठिठका। फिर आगे बढ़ गया। लेकिन पता नहीं क्यों, कुछ कदम चलने के बाद मेरे पैर अपने-आप रुक गए। मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह दृश्य वहीं था। पर अब कुछ बदल चुका था।बदला हुआ दृश्य नहीं था… बदल गया था मेरा मन।

उस क्षण मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह एक क्षणिक मुलाक़ात नहीं, बल्कि मेरे जीवन की सबसे लंबी कहानी की पहली पंक्ति बनने जा रही है।

मैंने एक गहरी साँस ली… और उनकी ओर बढ़ गया…

रास्ते अक्सर यही सिखाते हैं कि जो सामने है, उसे पार कर लो। हर चेहरे के पास रुक जाओगे तो अपनी मंज़िल तक कभी नहीं पहुँचोगे। शायद उसी सीख का असर था कि मैं भी कुछ कदम आगे निकल आया। लेकिन उस दिन न जाने क्या हुआ। ऐसा लगा जैसे किसी ने पीछे से मेरा नाम लेकर नहीं, मेरे भीतर बैठे आदमी को पुकार लिया हो। मैं ठिठक गया। कदम आगे बढ़ना चाहते थे, मन पीछे लौटना चाहता था।

ज़िंदगी में ऐसे क्षण बहुत कम आते हैं, जब आदमी अपने पैरों से नहीं, अपने विवेक से चलता है। उस दिन मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैंने मुड़कर फिर एक बार उस छोटे-से दृश्य को देखा। एक स्त्री… दो मासूम बच्चे… और उनके साथ खड़ा एक ऐसा पुरुष, जिसकी आँखें इस दुनिया में होकर भी शायद इस दुनिया में नहीं थीं। दृश्य बिल्कुल साधारण था।

इतना साधारण कि राह चलते सौ में से निन्यानवे लोग बिना देखे निकल जाते। मैं भी निकल सकता था। शायद निकल जाना ही व्यावहारिक होता। क्योंकि उस परिवार से मेरा कोई संबंध नहीं था। न मैं उनका रिश्तेदार था। न पड़ोसी। न कोई परिचित। फिर भी, न जाने क्यों उस दिन पहली बार मुझे लगा कि कुछ रिश्ते परिचय से नहीं, संवेदना से बनते हैं।

मैं उनके पास नहीं गया। मैंने कोई बातचीत नहीं की। मैंने कोई प्रश्न नहीं पूछा। मैं केवल उन्हें देखकर अपने रास्ते लौट आया। लेकिन उस दिन रास्ता मेरे साथ नहीं लौटा। वह वहीं कहीं छूट गया था। पूरे दिन काम करता रहा। लोग मिलते रहे। बातें होती रहीं। हँसी भी आई होगी, लेकिन अब याद नहीं। जो याद है, वह केवल एक चेहरा है। फिर दूसरा। फिर दो छोटे बच्चे। और फिर वह खोई हुई आँखों वाला आदमी।

रात आई। बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। लेकिन नींद नहीं आई। पहली बार नहीं, कई बार ऐसा हुआ था कि किसी घटना ने मुझे भीतर तक छुआ हो। मगर उस रात कुछ अलग था। मैं अपने-आप से एक ही सवाल पूछता रहा— “यदि मैं भी बाकी लोगों की तरह आगे बढ़ गया, तो फिर मेरे और उन बाकी लोगों में अंतर क्या रह जाएगा?”

यह सवाल किसी और ने नहीं पूछा था। न समाज ने। न परिवार ने। न किसी मित्र ने। यह प्रश्न मेरे अपने भीतर ने मुझसे पूछा था।

और आदमी दुनिया के हर सवाल का जवाब टाल सकता है… अपने भीतर उठे सवाल का नहीं। आधी रात बीत गई। मैं करवटें बदलता रहा। मन बार-बार समझाता— “तुम्हारा उनसे क्या संबंध है?” लेकिन मन के किसी कोने से दूसरी आवाज़ आती— “शायद अभी कोई संबंध नहीं है… लेकिन क्या हर संबंध जन्म से ही होता है?” मैं नहीं जानता था कि उस रात मैं किस निर्णय की ओर बढ़ रहा हूँ। मैं केवल इतना जानता था कि मन अब पहले जैसा शांत नहीं रहा।

सुबह होने में अभी देर थी। लेकिन मेरे भीतर एक सुबह उतर चुकी थी। मैंने तय कर लिया— मैं उन्हें फिर खोजूँगा। कोई बड़ी वजह नहीं थी। कोई योजना नहीं थी। कोई भविष्य नहीं दिख रहा था। बस इतना लग रहा था कि यदि इस बार भी मैं अनदेखा करके निकल गया, तो शायद सारी उम्र अपने ही भीतर आँख मिलाकर नहीं जी पाऊँगा।

उस समय मुझे यह बिल्कुल नहीं मालूम था कि मैं किसी व्यक्ति को खोजने नहीं निकल रहा हूँ। मैं अपने जीवन के उस अध्याय की ओर पहला कदम बढ़ा रहा था, जिसे लिखने में समय को आधी सदी से भी अधिक लगने वाली थी।

उस रात मैंने पहली बार जाना— कुछ मुलाक़ातें इंसान तय नहीं करता… समय तय करता है।

और अगली सुबह… मैं उसी रास्ते पर फिर निकल पड़ा…

“यह श्रृंखला वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित है। इसमें सभी व्यक्तियों की पहचान और स्थान गोपनीय रखने के लिए आवश्यक परिवर्तन किए गए हैं।”

(अगले बुधवार — दूसरा अंक : “वह स्त्री, जिसने मुझे मेरे ही भीतर से मिलवाया”)

4 Comments

  1. “आज ‘ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती’ का पहला अंक पढ़ते-पढ़ते कई बार मेरी आँखें भर आईं। मैं गाँव की एक साधारण महिला हूँ। जीवन ने कम उम्र में ही वैधव्य का दुःख दिया, लेकिन इस लेख ने महसूस कराया कि दुःख किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं होता। हर इंसान अपने हिस्से का संघर्ष लेकर जी रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई उसे रोकर कहता है और कोई मुस्कुराकर जीता है।

    इस लेख में कहीं भी उपदेश नहीं है, फिर भी हर पंक्ति जीवन जीने का साहस देती है। लेखक ने अपने दर्द को हथियार नहीं बनाया, बल्कि उसे रोशनी में बदल दिया। मुझे सबसे अधिक यह बात छू गई कि कुछ मुलाकातें इंसान नहीं, समय तय करता है। यह वाक्य शायद मेरे अपने जीवन पर भी उतना ही लागू होता है।

    मैं चाहूँगी कि यह स्तंभ केवल पढ़ा ही न जाए, बल्कि घर-घर पहुँचे। क्योंकि आज के समय में जब लोग छोटी-छोटी परेशानियों से टूट जाते हैं, तब ऐसे लेख मन को संभालने का काम करते हैं। अगले बुधवार का इंतज़ार रहेगा। मुझे विश्वास है कि यह श्रृंखला हजारों नहीं, लाखों लोगों के मन में उम्मीद का एक नया दीप जलाएगी।”

    — ममता टांक
    आंगनबाड़ी सेविका
    तिलकामांझी चौक, भागलपुर (बिहार)

  2. “मैं वर्षों से फिल्म और मीडिया जगत से जुड़ा हूँ। अनगिनत कहानियाँ पढ़ीं, सैकड़ों पटकथाएँ देखीं, लेकिन ‘ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती’ का पहला अंक पढ़कर जो अनुभूति हुई, वह अलग थी। इसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें जीवन को सजाया नहीं गया, बल्कि जिया हुआ सच पूरी सादगी और ईमानदारी से सामने रखा गया है।

    लेखक ने कहीं भी सहानुभूति बटोरने की कोशिश नहीं की, बल्कि संघर्ष को इतनी सहजता से शब्द दिए हैं कि पाठक अनायास ही खुद को उस यात्रा का हिस्सा महसूस करने लगता है। यही किसी भी श्रेष्ठ लेखन की सबसे बड़ी पहचान होती है।

    पहले अंक का अंतिम भाग तो लंबे समय तक मन में ठहर जाने वाला है। ‘कुछ मुलाक़ातें इंसान तय नहीं करता, समय तय करता है’—यह पंक्ति किसी फिल्म के संवाद की तरह नहीं, बल्कि जीवन के गहरे अनुभव से निकला सत्य लगती है।

    मुझे पूरा विश्वास है कि यदि इसी स्तर की संवेदनशीलता और सत्यनिष्ठा आगे भी बनी रही, तो यह श्रृंखला केवल एक लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ नहीं रहेगी, बल्कि हिंदी साहित्य और डिजिटल पत्रकारिता में एक उल्लेखनीय दस्तावेज़ के रूप में अपनी पहचान बनाएगी। अगले अंक की प्रतीक्षा अभी से शुरू हो गई है।”

    — समीर
    फिल्म सिटी, मुंबई

  3. “भारतीय सेना में तीन दशक से अधिक सेवा के दौरान मैंने युद्धक्षेत्र में घायल सैनिकों का दर्द भी देखा है और उनके अदम्य साहस को भी। इसीलिए मैं यह विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि शरीर पर लगे घावों से अधिक गहरे घाव मन पर लगते हैं। ‘ज़िंदगी, तुम अभी हार नहीं सकती’ का पहला अंक पढ़ते समय बार-बार यही अनुभूति हुई कि लेखक ने जीवन के मानसिक संघर्षों को बिना शोर, बिना शिकायत और बिना किसी को दोषी ठहराए जिस संयम के साथ अभिव्यक्त किया है, वह अत्यंत दुर्लभ है।

    इस लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सच्चाई है। इसमें न कृत्रिम भावुकता है, न उपदेशों का बोझ। हर पंक्ति यह संदेश देती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य का धैर्य और आत्मसम्मान उसे फिर से खड़ा होने की शक्ति देते हैं।

    प्रथम अंक का समापन लंबे समय तक मन में गूंजता रहता है। ‘कुछ मुलाक़ातें इंसान तय नहीं करता, समय तय करता है’—यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। मुझे पूरा विश्वास है कि यह श्रृंखला अनेक पाठकों के भीतर आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का संचार करेगी। मैं अगले अंक की प्रतीक्षा एक पाठक के रूप में ही नहीं, बल्कि एक ऐसे सैनिक के रूप में भी करूँगा जिसने जीवन में कभी हार मानना नहीं सीखा।”

    — डॉ. नरोत्तमदास
    सेवानिवृत्त सैन्य चिकित्सक
    गांधीनगर, जम्मू

  4. अनूप जी,
    इस अंक से मुझे ऐसा लगा जैसे बतौर लेखक आप अपनी नहीं बल्कि कुछ कुछ मेरे अनुभव लिख रहे हैं। जैसे इस अंक का निम्न भाग:

    ‘जिस आदमी को लिखने से कोई आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा हो, फिर भी वह लिखता रहे, तो समझ लीजिए कि वह शब्दों से नहीं, अपने अस्तित्व से जुड़ा हुआ है।

    मैंने कभी लेखक बनने की घोषणा नहीं की। मैं केवल लिखता रहा। मुझे यह भी नहीं पता था कि जो कुछ मैं कागज़ पर उतार रहा हूँ, उसे कभी कोई पढ़ेगा भी या नहीं। लेकिन एक विचित्र संतोष था कि जो बातें किसी से कह नहीं पाता, वे कागज़ सुन लेता था।

    कागज़ बहुत धैर्यवान होता है। वह बीच में टोकता नहीं। तर्क नहीं करता। निर्णय नहीं सुनाता। बस चुपचाप आपकी पूरी बात अपने भीतर रख लेता है। शायद इसी कारण दुनिया की सबसे सच्ची आत्मकथाएँ पहले कागज़ से जन्म लेती हैं, पाठकों से बाद में मिलती हैं।’
    अगले अंकों के इन्तजार के साथ!
    केवल कृष्ण पनगोत्रा

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