यात्रा वृत्तांत

गर्मी से राहत नहीं, सुकून की तलाश में पत्नीटॉप पहुँचे केवल कृष्ण पनगोत्रा

कठुआ की तपिश छोड़ धुंध से ढकी ठंडी वादियों का रुख किया

रजनी वर्मा, ब्यूरो चीफ (जम्मू-कश्मीर), जनगणदूत

पटनीटॉप (जम्मू-कश्मीर)। जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले में समुद्र तल से लगभग 2,024 मीटर (6,640 फीट) की ऊँचाई पर स्थित पटनीटॉप उत्तर भारत के सबसे मनोहारी पर्वतीय पर्यटन स्थलों में से एक है। घने देवदार और चीड़ के जंगल, बादलों की अठखेलियाँ, शीतल हवाएँ और हिमालय की मनोहारी वादियाँ इसे प्रकृति प्रेमियों, लेखकों, चिंतकों और पर्यटकों का प्रिय ठिकाना बनाती हैं। जम्मू से लगभग 110 किलोमीटर दूर स्थित यह पर्वतीय स्थल गर्मियों में भी सुकूनभरी ठंडक और अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव कराता है।

पहाड़ों की अपनी एक भाषा होती है। वे बिना बोले बहुत कुछ कह देते हैं। बादल यहाँ केवल आकाश में नहीं रहते, बल्कि धरती पर उतर आते हैं। देवदार की शाखाएँ केवल झूमती नहीं, बल्कि आने वाले प्रत्येक अतिथि का मौन स्वागत करती प्रतीत होती हैं। और जब कोई ऐसा व्यक्ति यहाँ पहुँचे, जो शब्दों का साधक हो, साहित्य का यात्री हो और संवेदनाओं का सच्चा रचनाकार हो, तब पटनीटॉप उसे केवल एक पर्यटक की तरह नहीं, बल्कि अपने आत्मीय अतिथि की तरह स्वीकार करता है।

आज सुबह जब मुझे यह समाचार मिला कि जनगणदूत साहित्य मंडली के सम्मानित सदस्य, वरिष्ठ साहित्यप्रेमी और जनगणदूत परिवार के आत्मीय सदस्य पनगोत्रा जी अपनी धर्मपत्नी के साथ पटनीटॉप पहुँचे हैं, तो ऐसा लगा मानो इन वादियों ने किसी अपने के आने की प्रतीक्षा पूरी कर ली हो।

कठुआ की तपती गर्मी और जम्मू की उमस से राहत पाने के लिए उनका यह निर्णय केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि प्रकृति की गोद में लौटने का एक शांत और आत्मिक प्रयास था। ऐसे लोग जब पहाड़ों तक पहुँचते हैं तो वे केवल दृश्य नहीं देखते, बल्कि उन्हें महसूस करते हैं। यही संवेदनशीलता उन्हें दूसरों से अलग बनाती है।

सुबह का समय था। पूरा पटनीटॉप धुंध की सफेद चादर में लिपटा हुआ था। दूर तक कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। हवा इतनी ठंडी थी कि हाथ अनायास ही जेबों में चले जाते थे। जुलाई के महीने में भी वातावरण में अद्भुत ताजगी थी। हल्की-हल्की फुहारें चेहरे को छू रही थीं और देवदार की शाखाओं से मोतियों जैसी पानी की बूंदें टपक रही थीं।

इसी मनोहारी वातावरण में जब पनगोत्रा जी और उनकी धर्मपत्नी पहुँचे तो उनके साथ मौजूद मित्रों ने बताया कि उन्हें केवल गर्मी से ही नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही मानसिक थकान से भी राहत मिलती हुई महसूस हो रही है।

मैंने दूर से उन्हें देखा। वे उन पर्यटकों की तरह नहीं थे जो सबसे पहले मोबाइल कैमरा निकालते हैं। उन्होंने पहले चारों ओर देखा, प्रकृति को महसूस किया, गहरी साँस लेकर शीतल हवा को अपने भीतर उतारा और फिर मुस्कराकर एक-दूसरे की ओर देखा।

शायद पहाड़ों का पहला संस्कार ही यही है—पहले उन्हें महसूस करो, फिर उन्हें कैमरे में कैद करो।

पत्रकार होने के नाते मैं प्रतिदिन अनेक लोगों के आने-जाने की खबरें लिखती हूँ। कोई नेता आता है, कोई अधिकारी, कोई कलाकार। लेकिन किसी साहित्य साधक का आगमन अलग होता है। वह केवल किसी स्थान तक नहीं पहुँचता, बल्कि उस स्थान की आत्मा से जुड़ जाता है। पनगोत्रा जी की यही विशेषता उन्हें अलग पहचान देती है।

जनगणदूत साहित्य मंडली में उनके विचारोत्तेजक लेख वर्षों से प्रकाशित होते रहे हैं। उनके शब्दों में जीवन की सादगी है, अनुभव की गहराई है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके लेखन में बनावट या दिखावे का कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि पाठक उनसे सहज रूप से जुड़ जाते हैं।

जनगणदूत परिवार उन्हें केवल लेखक नहीं मानता, बल्कि परिवार के सदस्य, मित्र और आत्मीय सहयोगी के रूप में सम्मान देता है। यह रिश्ता किसी औपचारिक परिचय का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की आत्मीयता और विश्वास की नींव पर खड़ा है।

आज जब वे पटनीटॉप पहुँचे तो मुझे लगा कि यह केवल एक लेखक का आगमन नहीं, बल्कि शब्दों और प्रकृति का अद्भुत मिलन है।

इन दिनों पटनीटॉप अपने सबसे सुंदर रूप में है। सुबह धुंध, दोपहर हल्की धूप, शाम को फिर बादलों का साम्राज्य और रात में ऐसी ठंडक कि हल्का गर्म वस्त्र भी आवश्यक लगने लगता है। यहाँ की हवा में देवदार की सुगंध घुली रहती है। ऐसा महसूस होता है जैसे पूरा जंगल आपके साथ चल रहा हो।

यहाँ आने वाला हर व्यक्ति कुछ न कुछ छोड़ जाता है—अपनी थकान, अपना तनाव और अपनी बेचैनी। बदले में वह अपने साथ ले जाता है शांति, ताजगी और नई ऊर्जा।

मेरा विश्वास है कि पनगोत्रा जी भी यहाँ से केवल सुकून ही नहीं, बल्कि अनेक नई अनुभूतियाँ साथ लेकर जाएँगे। यही अनुभूतियाँ किसी दिन किसी लेख, संस्मरण या साहित्यिक रचना का रूप लेकर पाठकों तक अवश्य पहुँचेंगी। यही एक लेखक की सबसे बड़ी पूँजी होती है।

दिन भर धुंध का खेल चलता रहा। कभी पहाड़ सामने दिखाई देते, तो अगले ही क्षण सब कुछ सफेद धुंध में खो जाता। ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं आँख-मिचौली खेल रही हो।

पनगोत्रा जी बार-बार इस दृश्य को निहार रहे थे। उनकी धर्मपत्नी भी इस अनुपम सौंदर्य का भरपूर आनंद ले रही थीं। दोनों के चेहरों पर सहज प्रसन्नता थी—वैसी प्रसन्नता, जो केवल प्रकृति की गोद में ही मिल सकती है।

उन्हें देखकर मेरे मन में एक विचार आया। हम पत्रकार प्रतिदिन समाचार लिखते हैं, लेकिन कुछ घटनाएँ समाचार नहीं होतीं, वे स्मृतियाँ बन जाती हैं। आज का दिन भी वैसा ही था।

कठुआ की गर्मी से पटनीटॉप की शीतल वादियों तक का यह सफर केवल दूरी तय करना नहीं था, बल्कि मन की गति बदल देने वाला अनुभव था।

यही कारण है कि हर वर्ष हजारों लोग यहाँ आते हैं। कोई परिवार के साथ, कोई मित्रों के साथ, कोई अकेला और कोई अपने भीतर के लेखक से मिलने।

मैंने मुस्कराकर उनसे पूछा, “पटनीटॉप कैसा लग रहा है?”

उन्होंने सहज भाव से उत्तर दिया, “गर्मी को तो यहीं छोड़ जाना चाहता हूँ।” उनका यह छोटा-सा उत्तर पूरी यात्रा का सबसे सुंदर परिचय बन गया।

पटनीटॉप सचमुच ऐसी जगह है जहाँ पहुँचकर लगता है कि मौसम भी इंसान का मित्र हो सकता है। यहाँ की हवा किसी आत्मीय साथी की तरह कंधे पर हाथ रखती है। धुंध किसी माँ की तरह चेहरे को ढक लेती है। देवदार किसी पुराने मित्र की तरह साथ चलते हैं और यहाँ की खामोशी बहुत कुछ कह जाती है।

साहित्य का संबंध सदैव प्रकृति से रहा है। कालिदास, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, निराला और अज्ञेय जैसे साहित्यकारों को प्रकृति ने ही नई दृष्टि और नई संवेदनाएँ दीं। पटनीटॉप भी वर्षों से लेखकों और कलाकारों का मौन साथी रहा है।

मुझे पूरा विश्वास है कि जब पनगोत्रा जी यहाँ से लौटेंगे तो उनके पास केवल तस्वीरें नहीं होंगी। उनके पास अनुभव होंगे, संवेदनाएँ होंगी और शायद कोई नई रचना भी होगी, जिसकी प्रतीक्षा जनगणदूत साहित्य मंडली के पाठक अवश्य करेंगे।

एक ब्यूरो चीफ होने के नाते मैं समाचार लिख सकती हूँ, लेकिन आज मैंने समाचार नहीं लिखा। आज मैंने पटनीटॉप की ओर से एक आत्मीय स्वागत-पत्र लिखा है।

प्रिय पनगोत्रा जी,

पटनीटॉप की वादियाँ आपका स्वागत करती हैं। देवदारों ने आपके सम्मान में अपनी शाखाएँ झुका दी हैं। धुंध ने आपके लिए अपनी सफेद चादर बिछा दी है। शीतल हवाओं ने आपकी यात्रा की थकान अपने साथ ले जाने का वादा किया है।

आप यहाँ कुछ दिन ठहरिए। हर सुबह को महसूस कीजिए। हर शाम को अपनी स्मृतियों में बसाइए। हर बादल से मित्रता कीजिए और लौटते समय इस पर्वत की थोड़ी-सी शांति अपने शब्दों में भी साथ ले जाइए, ताकि वह जनगणदूत के पाठकों तक भी पहुँच सके।

क्योंकि कुछ यात्राएँ केवल यात्राएँ नहीं होतीं—वे साहित्य बन जाती हैं। अंत में, पटनीटॉप की ओर से बस इतनी-सी शुभकामना—

“यहाँ आने वाले हर यात्री का स्वागत होता है, लेकिन जो शब्दों से प्रेम करता है, उसे यह पहाड़ अपना बना लेता है।”

आज पनगोत्रा जी और उनकी धर्मपत्नी इन वादियों के बीच हैं। कल वे लौट जाएँगे, लेकिन उनकी मुस्कान, देवदारों के बीच बिताए वे पल और प्रकृति के प्रति उनका सम्मान इस पर्वतीय नगर की स्मृतियों में लंबे समय तक जीवित रहेगा।

जनगणदूत साहित्य मंडली के लिए यह यात्रा केवल एक पर्यटन प्रसंग नहीं, बल्कि साहित्य, मित्रता और प्रकृति के अद्भुत संगम का ऐसा अध्याय है, जिसे आने वाले वर्षों तक स्नेह और सम्मान के साथ याद किया जाएगा।

2 Comments

  1. रजनी वर्मा जी का यह लेख पढ़ते समय लगा ही नहीं कि मैं कोई यात्रा-वृत्तांत पढ़ रहा हूँ, बल्कि ऐसा महसूस हुआ जैसे स्वयं पटनीटॉप की वादियों में घूम रहा हूँ। लेख में समाचार भी है, साहित्य भी है और प्रकृति का सौंदर्य भी। सबसे अच्छी बात यह लगी कि लेखिका ने पनगोत्रा जी की यात्रा को महज पर्यटन नहीं बनने दिया, बल्कि उसे संवेदनाओं और आत्मीय रिश्तों का दस्तावेज़ बना दिया।

    हाँ, एक बात जरूर कहूँगा—अब पटनीटॉप वालों को भी सावधान हो जाना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि पनगोत्रा जी वहाँ से लौटकर ऐसी शानदार रचना लिख दें कि लोग पहले उनकी कलम पढ़ने जाएँ और बाद में पटनीटॉप घूमने!

    जनगणदूत साहित्य मंडली की यही खूबी है कि यहाँ समाचारों के बीच साहित्य साँस लेता है और रिश्तों की गर्माहट भी बनी रहती है। रजनी वर्मा जी की भाषा सहज, चित्रात्मक और पाठक को अंत तक बाँधे रखने वाली है। ऐसे लेख हिंदी पत्रकारिता में कम ही पढ़ने को मिलते हैं।

    — श्याम किशोर वर्मा
    अलीगढ़, उत्तर प्रदेश

    1. सबसे पहले शर्मा जी आपको लेख गौर से पढ़ने और उससे भी ज्यादा गंभीरता से टिप्पणी करने के लिए साधुवाद।
      आपको बताने की आवश्यकता नहीं है कि पनगोत्रा साहब इन पत्रों को बहुत गौर करते हैं और इसमें कोई दो राय नही कि अगले अंकों में कहीं भी ये हम सबको पटनीटॉप का सैर घर बैठे करा दें🤓🤓

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