सीतापुर

मनरेगा भुगतान पर उठे सवाल, ग्राम पंचायत में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग

सुनील शुक्ला की रिपोर्ट

महोली। विकास क्षेत्र की एक ग्राम पंचायत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। एक ग्रामीण द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए शपथ-पत्र के आधार पर आरोप लगाया गया है कि ग्राम प्रधान ने अपने परिवार के दो सदस्यों के नाम पर जॉब कार्ड बनवाकर फर्जी मस्टर रोल के माध्यम से सरकारी धन का भुगतान कराया। शिकायत में पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई है। हालांकि ग्राम प्रधान ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे व्यक्तिगत विवाद का परिणाम बताया है।

शिकायत के बाद प्रशासनिक हलकों में बढ़ी चर्चा

ग्राम पंचायत पीतमपुर ग्रंट से जुड़े इस मामले ने स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का दौर तेज कर दिया है। शिकायतकर्ता अरुण कुमार वर्मा ने जिलाधिकारी डॉ. राजा गणपति आर को शपथ-पत्र के साथ विस्तृत शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना के क्रियान्वयन के दौरान गंभीर अनियमितताएं की गई हैं।

शिकायत में कहा गया है कि ग्राम प्रधान अखिलेश कुमार ने अपने पिता और पत्नी के नाम पर जॉब कार्ड बनवाकर उन्हें अकुशल श्रमिक के रूप में दर्शाया और फर्जी मस्टर रोल तैयार कर सरकारी धन का भुगतान प्राप्त किया गया।

पिता के नाम पर सैकड़ों मानव दिवस का भुगतान होने का आरोप

शिकायतकर्ता के अनुसार ग्राम प्रधान के पिता अर्जुन के नाम पर जारी जॉब कार्ड संख्या यूपी-29-002-047-001/194 का उपयोग करते हुए उन्हें मनरेगा कार्यों में अकुशल मजदूर के रूप में दर्शाया गया। आरोप है कि इस जॉब कार्ड के माध्यम से 387 मानव दिवस का भुगतान कराया गया।

शिकायत में दावा किया गया है कि संबंधित व्यक्ति ने वास्तविक रूप से कार्य नहीं किया, बल्कि दस्तावेजों में नाम दर्ज कर सरकारी राशि का भुगतान कराया गया। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो इसे सरकारी धन के दुरुपयोग और मनरेगा नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में माना जा सकता है।

पत्नी के नाम पर भी भुगतान का आरोप

शिकायत में ग्राम प्रधान की पत्नी अनीता का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि उनके नाम पर जारी जॉब कार्ड संख्या यूपी-29-002-047-001/812 के आधार पर उन्हें भी अकुशल श्रमिक दिखाया गया और 162 मानव दिवस का भुगतान कराया गया।

दोनों मामलों को मिलाकर कुल 549 मानव दिवस के भुगतान का आरोप लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि इस माध्यम से लगभग 1.25 लाख रुपये की सरकारी धनराशि का भुगतान कराया गया, जिसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

जिलाधिकारी से निष्पक्ष जांच की मांग

अरुण कुमार वर्मा ने अपने शपथ-पत्र में जिलाधिकारी से अनुरोध किया है कि मामले की जांच किसी सक्षम जिलास्तरीय अधिकारी से कराई जाए। उनका कहना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए तथा सरकारी धन की वसूली भी सुनिश्चित की जाए।

शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना गरीब और जरूरतमंद ग्रामीण परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संचालित की जाती है। यदि योजना में फर्जीवाड़ा होता है तो इसका सीधा नुकसान वास्तविक लाभार्थियों को उठाना पड़ता है।

क्या कहते हैं मनरेगा के नियम?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत जॉब कार्ड केवल उन ग्रामीण परिवारों को जारी किया जाता है जो स्वेच्छा से अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक होते हैं। कार्य करने वाले प्रत्येक श्रमिक की उपस्थिति मस्टर रोल में दर्ज की जाती है और उसी के आधार पर भुगतान किया जाता है।

यदि किसी व्यक्ति के नाम पर बिना कार्य कराए भुगतान कराया जाता है या फर्जी मस्टर रोल तैयार किया जाता है तो यह योजना के नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है। ऐसे मामलों में जांच के बाद संबंधित अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के विरुद्ध विभागीय तथा कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।

ग्राम प्रधान ने आरोपों को बताया निराधार

दूसरी ओर ग्राम प्रधान अखिलेश कुमार ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को असत्य और निराधार बताया है। उनका कहना है कि शिकायतकर्ता पहले उनके साथ था, लेकिन आपसी मतभेद और अनबन के बाद अब इस प्रकार की शिकायतें की जा रही हैं।

प्रधान का कहना है कि उन्होंने किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता नहीं की है और यदि प्रशासन जांच कराता है तो सच्चाई स्वयं सामने आ जाएगी। उन्होंने विश्वास जताया कि जांच में उनके खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं होंगे।

जांच के बाद ही स्पष्ट होगी स्थिति

फिलहाल पूरा मामला शिकायत के स्तर पर है और प्रशासन की ओर से जांच की प्रक्रिया शुरू होने की प्रतीक्षा की जा रही है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है अथवा शिकायत व्यक्तिगत विवाद का परिणाम है।

यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि आरोप असत्य पाए जाते हैं तो शिकायतकर्ता के दावों की भी वैधानिक समीक्षा की जाएगी।

ग्रामीणों की निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर

ग्राम पंचायत में सामने आए इस प्रकरण के बाद ग्रामीणों की नजर अब जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है। लोगों का मानना है कि मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना में पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। निष्पक्ष जांच से न केवल वास्तविक स्थिति सामने आएगी बल्कि सरकारी योजनाओं के प्रति लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा।

 

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