पनगोत्रा की चिट्ठी — 11वां अंक ; अगर शादी ऐसी होती है तो कुंवारा मर जाना अच्छा है!

पनगोत्रा की चिट्ठी 11 — विचार, संवाद, समाज और जीवन के सच्चे पहलू

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लेखक: केवल कृष्ण पनगोत्रा, जम्मू-कश्मीर

प्रिय पाठकों,

क्या आप कभी ऐसे युवक की मनःस्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जिसकी शादी की उम्र हो चुकी हो, परिवार और रिश्तेदार उसके विवाह की चिंता करते हों, उसके सामने अच्छे रिश्ते आते हों, लेकिन वह हर बार शादी की बात सुनते ही एक ही वाक्य कहकर बात टाल दे—“अगर शादी ऐसी होती है तो मेरे लिए कुंवारा ही मर जाना अच्छा है!” सामान्य परिस्थितियों में सुनने पर यह वाक्य किसी युवक की जिद, विवाह संस्था से उसकी नाराजगी या आधुनिक जीवन के प्रति उसकी कोई व्यक्तिगत प्रतिक्रिया लग सकता है, लेकिन हर निर्णय के पीछे कोई न कोई अनुभव छिपा होता है। कई बार व्यक्ति अपने जीवन में जो देखता है, वही उसके भविष्य के प्रति उसकी धारणा बना देता है। प्रेम नाम के जिस युवक की चर्चा मैं आज की इस चिट्ठी में कर रहा हूं, उसके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उसने विवाह के बारे में किताबों में पढ़कर या किसी विचारधारा से प्रभावित होकर निर्णय नहीं लिया था, बल्कि उसने अपने बहुत करीब एक ऐसा वैवाहिक जीवन देखा था, जिसमें दो लोग साथ रहते हुए भी सुखी नहीं थे। उसके लिए विवाह सात फेरों, रिश्तेदारों की बधाइयों और सामाजिक प्रतिष्ठा का नाम नहीं रह गया था, बल्कि वह रोज-रोज के तनाव, विवाद, मनमुटाव और मानसिक अशांति की तस्वीर बन चुका था।

हर इंसान किसी न किसी सामाजिक दायरे का हिस्सा होता है। हमारा सामाजिक सर्किल केवल रिश्तेदारों या मित्रों का समूह नहीं होता, बल्कि वही स्थान है जहां हम दूसरों के जीवन को देखते हैं, उनसे संवाद करते हैं, उनके अनुभवों से सीखते हैं और कभी-कभी बिना जाने अपने जीवन के फैसलों के लिए उदाहरण भी तलाश लेते हैं। शरीर के लिए अस्थि-पिंजर जितना जरूरी है, सामाजिक जीवन के लिए मनुष्यों और संबंधों का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कोई व्यक्ति नौकरी करता हो, व्यापार करता हो, गांव में रहता हो या शहर में, वह किसी न किसी सामाजिक दायरे से जुड़ता ही है। उसी दायरे में उसे अच्छे परिवार मिलते हैं, अच्छे रिश्ते दिखाई देते हैं, सफल लोग मिलते हैं और कभी-कभी ऐसे रिश्ते भी सामने आते हैं जो व्यक्ति को भीतर तक विचलित कर देते हैं। प्रेम के जीवन में उसके बड़े भाई और भाभी का वैवाहिक संबंध ऐसा ही उदाहरण बन गया था।

जब मैं सरकारी नौकरी में था, तब हमारे सामाजिक दायरे में प्रेम नाम का एक युवक था। नाम बदलकर लिख रहा हूं, क्योंकि उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिस्थिति पर विचार करना है जिसने एक युवक के मन में विवाह को लेकर इतना गहरा भय पैदा कर दिया। परिवार में दो भाई थे। बड़े भाई की शादी हो चुकी थी और छोटा भाई प्रेम अविवाहित था। उस समय हमारे बीच प्रेम के अविवाहित रहने की चर्चा अक्सर होती थी। लोग उसे शादी के लिए समझाते, रिश्तों की बातें करते और कभी मजाक में तो कभी गंभीरता से पूछते कि आखिर वह विवाह से क्यों बच रहा है। लेकिन प्रेम के पास अपने निर्णय का एक स्पष्ट कारण था। उसने अपने बड़े भाई और भाभी के बीच होने वाले लगातार विवादों को बहुत नजदीक से देखा था। दोनों का रिश्ता किसी निर्णायक मोड़ तक पहुंचकर खत्म भी नहीं हुआ था और सुखी वैवाहिक जीवन में बदल भी नहीं पाया था। दोनों साथ थे, परिवार भी चल रहा था, बच्चे भी हो गए, लेकिन उनके बीच का तनाव समाप्त नहीं हुआ। प्रेम के लिए यह स्थिति विवाह की सबसे डरावनी तस्वीर थी—एक ऐसा रिश्ता जिसे न पूरी तरह छोड़ा जा रहा था और न ही दिल से निभाया जा रहा था।

यह बात लगभग तीन दशक पुरानी होगी। उस समय हमारे ग्रामीण सामाजिक वातावरण में तलाक या वैवाहिक अलगाव जैसी घटनाएं आज की तुलना में बहुत कम सुनाई देती थीं। किसी दंपती के अलग रहने की खबर पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन जाती थी। सामाजिक प्रतिष्ठा, परिवार की इज्जत और बच्चों का भविष्य जैसे सवाल इतने भारी माने जाते थे कि पति-पत्नी अपने रिश्ते को किसी भी तरह खींचते रहने को मजबूर होते थे। प्रेम के भाई और भाभी का जीवन भी इसी सामाजिक मनोविज्ञान का उदाहरण था। उनके बीच मतभेद थे, तनाव था, लेकिन तलाक के बारे में दोनों परिवार शायद सोच भी नहीं सकते थे। उस समय प्रेमी के साथ मिलकर मंगेतर या पति की हत्या जैसी घटनाएं हमारी सामान्य सामाजिक चर्चा का हिस्सा नहीं थीं। कभी-कभार दहेज हत्या जैसी कोई घटना सामने आती तो समाज हिल जाता था और कई दिनों तक उसकी चर्चा होती रहती थी। आज परिस्थितियां बदली हैं। वैवाहिक विवादों के अनेक रूप सार्वजनिक जीवन में सामने आ रहे हैं। दहेज से जुड़ी हिंसा, घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, विवाहेतर संबंध, पति-पत्नी के बीच अविश्वास और कभी-कभी दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे पर लगाए जाने वाले गंभीर आरोप अब समाचारों और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन इस बदलाव को केवल इस नजरिए से देखना कि “आज के लोग रिश्ते निभाना नहीं जानते” भी पूरी तस्वीर नहीं है। समाज बदला है, व्यक्ति की आकांक्षाएं बदली हैं, आर्थिक परिस्थितियां बदली हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि अब पति-पत्नी दोनों अपने व्यक्तित्व और अधिकारों के प्रति पहले से अधिक जागरूक हैं। यह बदलाव अपने आप में गलत नहीं है। समस्या वहां शुरू होती है जहां अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। विवाह में दो स्वतंत्र व्यक्तित्व आते हैं। दोनों की अपनी पसंद, अपनी अपेक्षाएं, अपने सपने और अपने परिवार होते हैं। यदि विवाह के बाद दोनों एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे को बदलने लगें, यदि संवाद की जगह आरोप लेने लगें, यदि सम्मान की जगह अहंकार आ जाए और यदि परिवार सहयोगी बनने के बजाय रिश्ते को नियंत्रित करने लगे, तो आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा भी उस घर को सुखी नहीं बना सकती।

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विवाह टूटने या वैवाहिक जीवन के तनावपूर्ण होने के कई कारण हो सकते हैं। आपसी संवाद की कमी, व्यक्तिगत अहं, आर्थिक तनाव, एक-दूसरे के प्रति अविश्वास, परिवारों का गैरजरूरी हस्तक्षेप, बदलती जीवनशैली, नौकरी और करियर का दबाव तथा विवाहेतर संबंध जैसे कारण किसी भी रिश्ते की नींव को कमजोर कर सकते हैं। लेकिन मेरी आज की चिट्ठी का उद्देश्य इन सभी कारणों की अलग-अलग व्याख्या करना नहीं है। इन सबके पीछे एक बड़ा सवाल छिपा हुआ है—हम विवाह को आखिर समझते क्या हैं? क्या विवाह केवल दो परिवारों को जोड़ने वाला सामाजिक आयोजन है? क्या वह आर्थिक और सामाजिक हैसियत बढ़ाने का माध्यम है? क्या शादी जीवन का सबसे बड़ा इवेंट है, जिसे शानदार तरीके से दिखाना जरूरी है? या फिर विवाह दो मनुष्यों के बीच ऐसी जीवन-साझेदारी है, जिसमें दोनों को सुख-दुख, सफलता-असफलता और बदलती परिस्थितियों में एक-दूसरे का साथ निभाना होता है?

आज विवाह समारोह पहले से कहीं अधिक भव्य हो गए हैं। बड़े होटल, मैरिज लॉन, बैंक्वेट हॉल, महंगी सजावट, डिजाइनर कपड़े, आभूषण, विशेष भोजन, फोटोशूट और सोशल मीडिया पर तस्वीरों की लंबी श्रृंखला—शादी का आयोजन अब कई परिवारों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन भी बन गया है। इसमें कोई बुराई नहीं कि माता-पिता अपनी बेटी या बेटे की शादी धूमधाम से करें और अपनी क्षमता के अनुसार खुशी मनाएं। समस्या तब पैदा होती है जब शादी का बाहरी प्रदर्शन विवाह के वास्तविक उद्देश्य से बड़ा हो जाता है। विवाह के लिए परिवार लाखों रुपये खर्च कर देते हैं, लेकिन भावी दंपती के स्वभाव, व्यवहार, मानसिकता, पारिवारिक संस्कार और भविष्य की अपेक्षाओं पर पर्याप्त बातचीत नहीं होती। शादी की तारीख तय करने से पहले पंडित, बैंक्वेट हॉल, कैटरर, फोटोग्राफर और कपड़ों की सूची तैयार हो जाती है, लेकिन यह चर्चा शायद ही होती है कि पति-पत्नी भविष्य में मतभेद होने पर एक-दूसरे से किस तरह संवाद करेंगे।

प्रेम के भाई की शादी को बाहर से देखें तो उसमें कोई बड़ी कमी नजर नहीं आती थी। लड़का अच्छा था, उसके पास नौकरी थी, जमीन-जायदाद थी, समाज में सम्मान था और आर्थिक स्थिति भी संतोषजनक थी। परिवार की ओर से भी विवाह में कोई ऐसी स्पष्ट कमी दिखाई नहीं देती थी जिसे भविष्य के संकट का कारण माना जा सके। यहां तक कि कुंडली भी अच्छी बताई गई थी। फिर सवाल उठता है कि जब नौकरी थी, संपत्ति थी, सामाजिक सम्मान था और कुंडली का मिलान भी ठीक था, तो विवाह का परिणाम सुखद क्यों नहीं रहा? यही वह प्रश्न है जिसे हमें विवाह की पूरी व्यवस्था पर विचार करते समय गंभीरता से पूछना चाहिए। क्योंकि जीवन केवल नौकरी, जमीन, पैसा और कुंडली के सहारे नहीं चलता। एक सफल वैवाहिक जीवन के लिए स्वभाव, संवेदनशीलता, संवाद, धैर्य, पारस्परिक सम्मान और परिवारों की सीमाओं की समझ भी उतनी ही जरूरी है।

हम अक्सर विवाह तय करते समय लड़के की नौकरी, वेतन, संपत्ति और परिवार की सामाजिक हैसियत देखते हैं तथा लड़की की शिक्षा, रूप-रंग, परिवार और नौकरी जैसी चीजों पर चर्चा करते हैं। लेकिन क्या हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि दोनों तनाव की स्थिति में कैसा व्यवहार करते हैं? क्या हम यह देखते हैं कि उनमें से कोई अत्यधिक नियंत्रक तो नहीं? क्या वे दूसरे की असहमति का सम्मान कर सकते हैं? क्या दोनों घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए तैयार हैं? क्या दोनों करियर और परिवार के बीच संतुलन की वास्तविकता समझते हैं? क्या उन्हें इस बात का अंदाजा है कि विवाह के बाद दोनों परिवारों के बीच कितनी दूरी और कितनी निकटता उचित होगी? शायद इन प्रश्नों की जगह हम अब भी बहुत कुछ बाहरी चीजों से तय करते हैं। यही कारण है कि कई बार विवाह के बाद वे बातें सामने आती हैं जिनकी कल्पना विवाह से पहले किसी ने नहीं की होती।

प्रेम के भाई के मामले में भी समस्या धीरे-धीरे बढ़ी। उनके माता-पिता बड़े बेटे की शादी से पहले ही इस दुनिया से जा चुके थे। शादी के बाद ससुराल पक्ष की अपेक्षाएं बढ़ती गईं। प्रेम के अनुसार और परिवार के अनुभवों के मुताबिक, कथित तौर पर पत्नी के मायके की ओर से दामाद की संपत्ति और पारिवारिक मामलों में हस्तक्षेप की कोशिशें होने लगीं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसी एक परिवार के अनुभव को सभी मायके या सभी ससुराल पक्षों पर लागू नहीं किया जा सकता। बेटी के माता-पिता का अपनी बेटी के जीवन में भावनात्मक जुड़ाव स्वाभाविक है और जरूरत पड़ने पर उसका साथ देना भी उनका अधिकार और कर्तव्य है। लेकिन जब भावनात्मक सहयोग धीरे-धीरे वैवाहिक निर्णयों में नियंत्रण और हस्तक्षेप का रूप ले ले, तब समस्या पैदा होती है। पति-पत्नी के बीच की छोटी-छोटी बातों में मायके या ससुराल की राय निर्णायक बनने लगे तो दो लोगों का निजी रिश्ता धीरे-धीरे दो परिवारों की प्रतिस्पर्धा में बदल सकता है।

प्रेम के भाई के घर में कथित तौर पर यही परिस्थिति बनती चली गई। पहले बाहरी हस्तक्षेप की कोशिश हुई, फिर जब उस तरीके से बात नहीं बनी तो पति-पत्नी के बीच के रिश्ते को प्रभावित करने वाली परिस्थितियां पैदा होती गईं। घर में विवाद बढ़ने लगे। हर विवाद के पीछे एक नया कारण था और हर कारण के पीछे किसी न किसी पक्ष की नाराजगी। समय गुजरता गया, बच्चे भी हो गए, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुए। ऐसी स्थिति सबसे कठिन होती है, क्योंकि बच्चे होने के बाद पति-पत्नी के फैसले केवल उनके व्यक्तिगत फैसले नहीं रह जाते। दोनों अपने बच्चों के भविष्य, सामाजिक स्थिति और मानसिक विकास को भी ध्यान में रखते हैं। यही वजह है कि कई दंपती रिश्ते में गहरी कड़वाहट होने के बावजूद अलग होने का फैसला नहीं कर पाते। वे साथ रहते हैं, लेकिन भीतर से टूटे रहते हैं।

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ऐसे परिवारों को देखकर बाहर का व्यक्ति अक्सर कहता है कि “इनका घर तो चल रहा है।” लेकिन घर चलना और घर में सुख होना दो अलग बातें हैं। घर में खाना बन सकता है, बच्चे स्कूल जा सकते हैं, लोग सामाजिक समारोहों में साथ दिखाई दे सकते हैं, त्योहार मनाए जा सकते हैं और रिश्तेदारों के सामने मुस्कुराया भी जा सकता है; फिर भी पति-पत्नी के बीच संवाद मर चुका हो सकता है। यही अदृश्य तनाव परिवार का सबसे बड़ा संकट बनता है। कई बार बच्चे भी उस वातावरण को महसूस करते हैं। वे माता-पिता की आवाज का उतार-चढ़ाव समझते हैं, उनके बीच की दूरी महसूस करते हैं और धीरे-धीरे रिश्तों के बारे में अपनी धारणाएं बना लेते हैं। संभव है कि प्रेम के मन में विवाह के प्रति भय पैदा होने की एक वजह यह भी रही हो कि उसने अपने घर के वातावरण में विवाह का वह पक्ष देखा जिसे समाज आमतौर पर दूसरों से छिपाने की कोशिश करता है।

आज सोशल मीडिया और समाचारों के दौर में विवाह संबंधी विवादों की अनेक घटनाएं सामने आती हैं। कभी पति पर पत्नी को प्रताड़ित करने का आरोप लगता है, कभी पत्नी पर पति को मानसिक या आर्थिक रूप से परेशान करने का आरोप सामने आता है। कहीं दहेज का मामला होता है, कहीं संपत्ति विवाद, कहीं विवाहेतर संबंध और कहीं दोनों परिवारों के बीच ऐसा संघर्ष जो अंततः पति-पत्नी के रिश्ते को निगल जाता है। इन घटनाओं पर चर्चा करते समय हमें किसी एक पक्ष को पहले से दोषी मान लेने की आदत से बचना चाहिए। हर मामला अलग होता है और हर आरोप की अपनी तथ्यात्मक जांच आवश्यक होती है। लेकिन इन घटनाओं से एक सामाजिक सवाल जरूर पैदा होता है—क्या हम अपने बच्चों को विवाह के लिए भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से तैयार कर रहे हैं?

शादी से पहले लड़की को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि “अब यह तुम्हारा घर है” और लड़के से केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “अब तुम्हें परिवार की जिम्मेदारी उठानी है।” दोनों को यह समझाना होगा कि विवाह में कोई एक व्यक्ति दूसरे पर शासन करने नहीं जा रहा। दोनों को अपनी-अपनी स्वतंत्रता के साथ-साथ साझा जिम्मेदारी भी निभानी होगी। पति को पत्नी की नौकरी, शिक्षा और व्यक्तिगत सम्मान को स्वीकार करना होगा, जबकि पत्नी को भी पति के व्यक्तित्व, जिम्मेदारियों और परिवार के प्रति उसके दायित्वों को समझना होगा। इसी तरह दोनों परिवारों को भी यह स्वीकार करना होगा कि विवाह के बाद नवदंपती को अपना स्वतंत्र संसार बनाने का अवसर चाहिए। माता-पिता का प्रेम अपनी जगह है, लेकिन हर निर्णय में हस्तक्षेप प्रेम नहीं होता।

महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता को विवाह टूटने का कारण बताना भी एकतरफा दृष्टिकोण होगा। आर्थिक रूप से सक्षम महिला यदि अपने पैरों पर खड़ी है तो यह सामाजिक प्रगति है। इसी तरह पुरुष का आर्थिक रूप से सक्षम होना भी विवाह में उसे मनमाना अधिकार नहीं देता। असली प्रश्न यह है कि आर्थिक स्वतंत्रता का इस्तेमाल रिश्ते में बराबरी, सहयोग और आत्मसम्मान के लिए हो रहा है या शक्ति प्रदर्शन के लिए। विवाह में बराबरी का अर्थ यह नहीं कि दोनों हर चीज में एक जैसे हों; इसका अर्थ यह है कि दोनों को इंसान और जीवनसाथी के रूप में समान सम्मान मिले। जहां सम्मान है, वहां मतभेद भी बातचीत से सुलझ सकते हैं; जहां सम्मान नहीं है, वहां छोटी-सी बात भी संघर्ष का कारण बन सकती है।

विवाह से पहले हमें अपने बच्चों से कुछ कठिन लेकिन जरूरी सवाल पूछने चाहिए। वे करियर को किस तरह देख रहे हैं? दोनों की आर्थिक प्राथमिकताएं क्या हैं? घर के खर्च की व्यवस्था कैसे होगी? बच्चों के बारे में दोनों की क्या राय है? वृद्ध माता-पिता की जिम्मेदारी किस तरह निभाई जाएगी? घरेलू काम का बंटवारा कैसे होगा? दोनों परिवारों का हस्तक्षेप किस सीमा तक स्वीकार्य होगा? व्यक्तिगत मित्रता और निजी समय को लेकर दोनों की क्या सोच है? यदि किसी मुद्दे पर गंभीर मतभेद हो जाए तो वे किस तरह समाधान खोजेंगे? इन सवालों पर बातचीत रोमांस को खत्म नहीं करती, बल्कि भविष्य के भ्रम को कम करती है। विवाह जितना बड़ा जीवन निर्णय है, उसके लिए उतनी ही गंभीर बातचीत जरूरी है।

हमारी पारंपरिक व्यवस्था में विवाह को जीवनभर का रिश्ता माना गया है। इसमें स्थायित्व का महत्व है, लेकिन स्थायित्व का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि व्यक्ति किसी भी तरह की हिंसा, शोषण या असहनीय परिस्थितियों में जीवनभर रहने के लिए बाध्य हो। दूसरी तरफ, हर सामान्य मतभेद को विवाह खत्म करने का कारण मान लेना भी रिश्तों को कमजोर कर सकता है। विवाह में मतभेद होंगे, क्योंकि दो अलग व्यक्तित्वों की पसंद और सोच हमेशा एक जैसी नहीं हो सकती। सवाल यह है कि उन मतभेदों को किस तरह संभाला जाता है। जहां संवाद, धैर्य और सम्मान बचा रहता है, वहां रिश्ते कठिन दौर से निकल सकते हैं। जहां संवाद बंद हो जाता है और हर बात प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है, वहां वर्षों पुराना रिश्ता भी भीतर से खोखला हो सकता है।

यही कारण है कि प्रेम की कहानी केवल एक युवक के शादी न करने की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज के सामने रखा हुआ एक आईना है। प्रेम ने अपने भाई का जीवन देखा और अपने लिए अलग रास्ता चुन लिया। हम उसके फैसले से सहमत हों या असहमत, लेकिन उसकी मनःस्थिति को समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। किसी युवक या युवती को विवाह के लिए मजबूर करने से पहले यह पूछना चाहिए कि वह विवाह से क्यों डर रहा है। संभव है उसके भीतर किसी पुराने पारिवारिक अनुभव की चोट हो। संभव है उसने अपने माता-पिता का संघर्ष देखा हो। संभव है उसने रिश्तों में विश्वास टूटते देखा हो। और संभव है कि उसे केवल यह भरोसा चाहिए कि विवाह उसके लिए कैद नहीं, साझेदारी होगा।

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मेरे विचार से विवाह को बचाने का सबसे पहला रास्ता विवाह को फिर से उसके वास्तविक अर्थ में समझना है। शादी केवल एक दिन का समारोह नहीं है। वह उस समारोह के बाद शुरू होने वाला लंबा जीवन है। बारात कुछ घंटों की होती है, लेकिन गृहस्थी दशकों तक चलती है। शादी के मंच पर सजावट कुछ समय के लिए होती है, लेकिन जीवन की कठिन परिस्थितियां वर्षों तक साथ चल सकती हैं। कैमरे के सामने मुस्कुराना आसान है, लेकिन बीमारी, बेरोजगारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक समस्या या मानसिक तनाव के समय एक-दूसरे के साथ खड़ा होना ही वास्तविक वैवाहिक परीक्षा है। इसलिए शादी को जितना सुंदर बनाने की कोशिश हम समारोह में करते हैं, उससे कहीं अधिक प्रयास हमें रिश्ते को सुंदर बनाने में करना चाहिए।

प्रेम के भाई और भाभी की कहानी का अंत चाहे जिस रूप में हुआ हो, उसके भीतर एक सीख जरूर छिपी है। आर्थिक संपन्नता विवाह को सुखी नहीं बना सकती, यदि आपसी सम्मान नहीं है। अच्छी नौकरी विवाह को सुरक्षित नहीं कर सकती, यदि विश्वास नहीं है। संपत्ति परिवार को जोड़ नहीं सकती, यदि संबंधों की सीमाओं का सम्मान नहीं है। कुंडली का अच्छा मिलान भी जीवन की हर परिस्थिति का समाधान नहीं है, यदि पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। और भव्य शादी भी उस रिश्ते को नहीं बचा सकती जो शादी के बाद संवादहीनता, अहंकार और बाहरी हस्तक्षेप के बोझ तले दब जाए।

शायद हमें अपने बच्चों से शादी के पहले यह कहना चाहिए कि विवाह किसी पर अधिकार पाने का नाम नहीं है। यह दूसरे व्यक्ति के जीवन में जिम्मेदारी के साथ प्रवेश करने का नाम है। पति पत्नी का मालिक नहीं और पत्नी पति की अधीनस्थ नहीं। दोनों एक-दूसरे के जीवन के सहयात्री हैं। दोनों को अपने-अपने परिवारों का सम्मान करना है, लेकिन अपने वैवाहिक जीवन की गरिमा और निजता की रक्षा भी करनी है। परिवारों को साथ देना है, रिश्ते का संचालन अपने हाथ में नहीं लेना। और पति-पत्नी को यह समझना है कि हर असहमति युद्ध नहीं होती तथा हर समझौता हार नहीं होता।

आज जब विवाह को लेकर युवाओं में कई तरह की आशंकाएं दिखाई देती हैं, तब प्रेम का वह वाक्य और अधिक अर्थपूर्ण लगता है—“अगर शादी ऐसी होती है तो मेरे लिए कुंवारा ही मर जाना अच्छा है।” मैं इस वाक्य को विवाह संस्था के खिलाफ फैसला नहीं मानता। मैं इसे एक ऐसे युवक की पीड़ा मानता हूं जिसने विवाह का सुख देखने से पहले विवाह का संघर्ष देख लिया था। इसलिए हमें प्रेम जैसे युवाओं को केवल यह कहकर चुप नहीं कराना चाहिए कि “शादी तो करनी ही पड़ती है।” बल्कि उनसे पूछना चाहिए कि उन्हें शादी से डर क्यों लगता है और फिर यह प्रयास करना चाहिए कि उनके सामने विवाह की ऐसी तस्वीर रखी जाए जिसमें प्रेम के साथ सम्मान हो, अधिकार के साथ जिम्मेदारी हो, परिवार के साथ स्वतंत्रता हो और मतभेदों के बीच संवाद की गुंजाइश हो।

आखिरकार शादी जिंदगी का सबसे बड़ा इवेंट नहीं है। यह जिंदगी की सबसे लंबी साझेदारियों में से एक है। इसे केवल दिखाने के लिए नहीं, निभाने के लिए किया जाना चाहिए। विवाह का मूल्य इस बात से नहीं तय होना चाहिए कि शादी में कितने मेहमान आए, कितना पैसा खर्च हुआ, कितनी बड़ी सजावट हुई या तस्वीरें सोशल मीडिया पर कितनी पसंद की गईं। विवाह की असली सफलता तो उस दिन दिखाई देती है जब उत्सव समाप्त हो चुका हो, मेहमान लौट चुके हों, सजावट उतर चुकी हो और पति-पत्नी जीवन की वास्तविक कठिनाइयों के बीच भी एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े हों।

इसलिए अगली बार जब किसी घर में शादी की बात चले तो केवल यह मत पूछिए कि लड़का क्या कमाता है और लड़की कितनी पढ़ी-लिखी है। यह भी पूछिए कि दोनों एक-दूसरे का सम्मान कितना करते हैं। केवल यह मत देखिए कि परिवार कितना संपन्न है। यह भी देखिए कि उस परिवार में रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता कितनी है। केवल कुंडली के ग्रह-नक्षत्र मत मिलाइए। दोनों की सोच, अपेक्षाएं और जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी मिलाने की कोशिश कीजिए। क्योंकि विवाह के बाद ग्रहों से अधिक महत्वपूर्ण वे दो इंसान होते हैं जो एक ही छत के नीचे जीवन बिताने वाले हैं।

प्रेम ने अपने भाई के जीवन को देखा और शादी से दूरी बना ली। शायद उसने सही फैसला किया, शायद नहीं—यह निर्णय उसका अपना था। लेकिन उसकी कहानी हमें यह सोचने के लिए जरूर मजबूर करती है कि कहीं हमारी विवाह व्यवस्था में हम समारोह को रिश्ते से बड़ा तो नहीं बना रहे? कहीं हम शादी करवाने की तैयारी में शादी निभाने की तैयारी तो नहीं भूल रहे? कहीं हम अपने बच्चों को जीवनसाथी चुनना तो सिखा रहे हैं, लेकिन जीवनसाथी का साथ निभाना नहीं सिखा रहे?

यदि इन सवालों पर हम गंभीरता से विचार कर सकें तो शायद आने वाली पीढ़ी के प्रेम को यह कहने की जरूरत न पड़े कि “अगर शादी ऐसी होती है तो कुंवारा मर जाना अच्छा है।”

क्योंकि अच्छी शादी वह नहीं जिसमें कभी झगड़ा न हो। अच्छी शादी वह है जिसमें झगड़े के बाद बातचीत की गुंजाइश बची रहे, गलती के बाद माफी की जगह हो, संकट में साथ खड़े होने का साहस हो और सबसे बढ़कर, दो इंसानों के बीच सम्मान जिंदा रहे।

अगले सप्ताह फिर मिलेंगे।

अलविदा!

केवल कृष्ण पनगोत्रा
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