मंच पर राष्ट्र निर्माता, व्यवस्था में उपेक्षित क्यों शिक्षक?

शिक्षक दिवस विशेष संपादकीय में राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका और शिक्षा व्यवस्था में उनकी उपेक्षा को दर्शाती तस्वीर

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— अनिल अनूप

पांच सितंबर आते ही अचानक हमें शिक्षक याद आने लगते हैं। विद्यालयों में मंच सजते हैं, बच्चे हाथों में फूल लेकर खड़े होते हैं, शिक्षक के सम्मान में भाषण होते हैं और माइक से बार-बार यह घोषणा की जाती है कि शिक्षक राष्ट्र का निर्माता है। कोई उसे समाज का मार्गदर्शक कहता है, कोई भविष्य का शिल्पकार और कोई देश की नींव मजबूत करने वाला कर्मयोगी।

तालियां बजती हैं। तस्वीरें खिंचती हैं। सोशल मीडिया पर शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं तैरती हैं। फिर समारोह समाप्त हो जाता है। मंच उतर जाता है। फूल मुरझा जाते हैं। और शिक्षक अगले दिन फिर उसी व्यवस्था में लौट जाता है, जहां उससे अपेक्षा होती है कि वह बच्चों को पढ़ाए भी, परिणाम सुधारे भी, अभिलेख तैयार करे भी, आंकड़े जुटाए भी, प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाए भी और हर परिस्थिति में मुस्कुराता हुआ दिखाई भी दे।

यहीं से शिक्षक दिवस का सबसे जरूरी सवाल पैदा होता है— मंच पर राष्ट्र निर्माता कहलाने वाला शिक्षक व्यवस्था के भीतर इतना उपेक्षित क्यों दिखाई देता है? यह सवाल किसी शिक्षक के पक्ष में भावुक अपील नहीं है। यह शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ बुनियादी सवाल है। क्योंकि शिक्षक केवल अपना भविष्य नहीं बनाता। वह हजारों बच्चों के भविष्य को आकार देता है। फिर उसके अपने वर्तमान को लेकर इतनी उदासीनता क्यों?

गुरु को भगवान के बाद स्थान दिया, शिक्षक को कर्मचारी बना दिया

भारतीय परंपरा में गुरु का स्थान अत्यंत ऊंचा रहा है। गुरु केवल पाठ नहीं पढ़ाता था, वह जीवन की दिशा देता था। ज्ञान के साथ विवेक, अनुशासन के साथ संवेदना और शिक्षा के साथ संस्कार उसके दायित्व का हिस्सा थे।

लेकिन आधुनिक व्यवस्था में शिक्षक धीरे-धीरे एक पदनाम में बदलता दिखाई दे रहा है। ‘शिक्षक’ के साथ अब पद, वेतनमान, उपस्थिति, लक्ष्य, रिपोर्ट, पोर्टल, आंकड़े और परिणाम जुड़ गए हैं। निश्चित रूप से व्यवस्था को नियम चाहिए। जवाबदेही भी चाहिए। शिक्षक भी जवाबदेही से बाहर नहीं हो सकता।

लेकिन सवाल यह है कि जवाबदेही क्या एकतरफा हो सकती है? यदि शिक्षक से परिणाम मांगा जाता है तो क्या उसे परिणाम देने के लिए पर्याप्त संसाधन भी दिए जाते हैं? यदि उससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा है तो क्या उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण का समय मिलता है? यदि उसे बच्चों की प्रतिभा पहचाननी है तो क्या उसके पास हर बच्चे को समझने का पर्याप्त अवसर है? यदि उससे नई शिक्षा पद्धति अपनाने की उम्मीद है तो क्या उसे उसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता मिलती है?

यही असली प्रश्न हैं।

‘तनख्वाह तो अच्छी है’—यह धारणा शिक्षक को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाती है

शिक्षक की समस्याओं पर बात शुरू होते ही एक वाक्य अक्सर सामने आता है—‘इनकी तो अच्छी-खासी तनख्वाह है।’ मानो वेतन मिल जाने के बाद शिक्षक को किसी कठिनाई का अधिकार ही नहीं बचता। यह कैसी सोच है? वेतन शिक्षक के श्रम का मूल्य है, किसी का उपकार नहीं।

क्या किसी कर्मचारी को वेतन देने के बाद उसके कार्यस्थल की समस्याओं पर चर्चा बंद कर देनी चाहिए? क्या एक डॉक्टर को वेतन या फीस मिलने के बाद अस्पताल की कमियों की शिकायत नहीं करनी चाहिए? क्या इंजीनियर को वेतन मिलने के बाद कार्यस्थल की अव्यवस्थाओं पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं होना चाहिए?

फिर शिक्षक के लिए यह अलग मापदंड क्यों? शिक्षक को भी सम्मानजनक कार्य-परिस्थितियां चाहिए। उसे भी मानसिक शांति चाहिए। उसे भी अपने पेशेवर निर्णयों में विश्वास चाहिए। उसे भी यह महसूस होना चाहिए कि जिस समाज के भविष्य के लिए वह अपना समय दे रहा है, वह समाज उसके श्रम को समझता है।

शिक्षक का काम स्कूल की छुट्टी के साथ समाप्त नहीं होता

शिक्षक विद्यालय में निर्धारित समय तक रहता है। लेकिन क्या शिक्षक का काम वहीं समाप्त हो जाता है?

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बिल्कुल नहीं। कक्षा में पढ़ाए गए पाठ की तैयारी, प्रश्नपत्र तैयार करना, विद्यार्थियों की कॉपियां जांचना, परीक्षा परिणाम का विश्लेषण करना, कमजोर विद्यार्थियों की पहचान करना, अभिभावकों से संवाद करना और अगले दिन की शिक्षण रणनीति बनाना—इन सबके लिए समय चाहिए।

एक अच्छे शिक्षक का काम केवल पाठ्यपुस्तक समाप्त करना नहीं है। उसे देखना होता है कि बच्चा समझा या केवल याद कर गया। उसे यह भी देखना होता है कि जो बच्चा लगातार चुप बैठता है, वह वास्तव में शांत है या किसी समस्या से गुजर रहा है।

उसे यह समझना पड़ता है कि किसी बच्चे की लगातार गिरती उपस्थिति के पीछे पढ़ाई से अरुचि है या घर की कोई परिस्थिति। यह काम किसी मशीन से नहीं कराया जा सकता। इसके लिए शिक्षक को समय चाहिए। और समय ही आज शिक्षक की सबसे बड़ी कमी बनता जा रहा है।

जब शिक्षक पढ़ाने से अधिक कागज भरने लगे

शिक्षा व्यवस्था में दस्तावेज जरूरी हैं। आंकड़े जरूरी हैं। पारदर्शिता जरूरी है। लेकिन कागजी और डिजिटल प्रक्रियाओं का विस्तार उस सीमा तक नहीं होना चाहिए जहां शिक्षक का मूल काम पीछे छूट जाए। आज शिक्षक को अनेक प्रकार के रिकॉर्ड, रिपोर्ट, सूचनाएं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

कभी सर्वेक्षण। कभी आंकड़े। कभी विभिन्न योजनाओं का विवरण। कभी चुनाव संबंधी दायित्व। कभी अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां। प्रश्न यह नहीं कि इनमें से कौन-सा कार्य जरूरी है। प्रश्न यह है कि इन कार्यों का सबसे उपयुक्त व्यक्ति कौन है?

यदि हर सार्वजनिक व्यवस्था की जिम्मेदारी शिक्षक के कंधे पर डाल दी जाएगी तो कक्षा में खड़े शिक्षक से हम किस ऊर्जा की अपेक्षा करेंगे? जिस शिक्षक का समय प्रशासनिक काम में चला गया, उससे अगले दिन बच्चे के सीखने की कमी पर सवाल करना कितना न्यायपूर्ण है? व्यवस्था को यह समझना होगा कि शिक्षक का सबसे मूल्यवान समय उसकी कक्षा का समय है।

शिक्षक मशीन नहीं है

हमने शिक्षा व्यवस्था में लक्ष्य तय किए। फिर परिणाम तय किए। फिर परिणामों की तुलना शुरू हुई। फिर रैंकिंग आई।

फिर आंकड़ों का दबाव आया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कहीं न कहीं यह भूल जाने का खतरा पैदा हुआ कि शिक्षक और विद्यार्थी दोनों इंसान हैं। हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। हर शिक्षक भी एक जैसा नहीं होता। एक विद्यालय दूसरे विद्यालय से अलग हो सकता है।

एक गांव की शैक्षिक परिस्थिति किसी शहर के विद्यालय से अलग हो सकती है। एक बच्चे के घर में पढ़ाई का वातावरण है, दूसरे के घर में नहीं। एक बच्चे के पास डिजिटल साधन हैं, दूसरे के पास नहीं। फिर केवल आंकड़ों से शिक्षा की पूरी तस्वीर कैसे बनाई जा सकती है? शिक्षा को केवल परिणामों की तालिका में बदल देना शिक्षा के मानवीय पक्ष को छोटा करना है।

नई पीढ़ी के सामने शिक्षक की चुनौती पहले से बड़ी है

आज का विद्यार्थी उस दौर का विद्यार्थी नहीं है जिसमें जानकारी का सबसे बड़ा स्रोत शिक्षक और पुस्तक हुआ करते थे। आज उसके हाथ में स्मार्टफोन है। इंटरनेट है। वीडियो प्लेटफॉर्म हैं। सर्च इंजन हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साधन हैं। वह कुछ ही क्षण में किसी विषय पर हजारों सूचनाएं देख सकता है। लेकिन यही स्थिति शिक्षक की भूमिका को समाप्त नहीं करती। बल्कि उसे और गंभीर बनाती है।

क्योंकि जानकारी और ज्ञान में अंतर है। जानकारी और सत्य में अंतर है। उत्तर और समझ में अंतर है। शिक्षक को अब केवल यह नहीं बताना कि क्या पढ़ना है; उसे यह भी सिखाना है कि क्या मानना है, क्यों मानना है और कैसे परखना है।

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यह शिक्षक के लिए आसान चुनौती नहीं है। इसके लिए उसे स्वयं भी लगातार सीखना होगा। और जो शिक्षक लगातार सीखता रहेगा, तभी वह नई पीढ़ी को सीखने की आदत दे पाएगा।

शिक्षक से आदर्श की अपेक्षा, लेकिन सुविधाओं की कमी

समाज शिक्षक से चाहता है कि वह बच्चों में अनुशासन पैदा करे। नैतिकता सिखाए। संवेदनशीलता सिखाए। देशभक्ति सिखाए। वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करे। अच्छे नागरिक बनाए। लेकिन इसके लिए शिक्षक को किस तरह का वातावरण दिया जा रहा है? क्या विद्यालय में पर्याप्त पुस्तकें हैं? क्या प्रयोगशालाएं पर्याप्त हैं? क्या डिजिटल संसाधन हर विद्यार्थी तक समान रूप से पहुंचते हैं? क्या शिक्षक को नियमित और सार्थक प्रशिक्षण मिलता है? क्या विद्यालयों में पर्याप्त मानव संसाधन है? क्या एक शिक्षक पर विद्यार्थियों की संख्या संतुलित है? इन प्रश्नों का उत्तर केवल भाषणों से नहीं मिलेगा।

निजी विद्यालयों के शिक्षक की पीड़ा भी चर्चा मांगती है

शिक्षक की समस्या को केवल सरकारी विद्यालयों तक सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। निजी विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक भी शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनसे भी बेहतर परिणाम, अनुशासन, अभिभावक संवाद और अतिरिक्त गतिविधियों की अपेक्षा की जाती है। कई जगह शिक्षक का काम कक्षा तक सीमित नहीं रहता।

विद्यालय की छवि, कार्यक्रम, प्रतियोगिताएं, अतिरिक्त गतिविधियां और विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियां भी उसके काम का हिस्सा बन जाती हैं।

हर निजी विद्यालय की स्थिति एक जैसी नहीं है, लेकिन जहां शिक्षक की नौकरी असुरक्षा, अत्यधिक कार्यभार और सीमित पेशेवर स्वतंत्रता से घिरी है, वहां भी शिक्षक की गरिमा पर बहस होनी चाहिए। क्योंकि बच्चे को पढ़ाने वाला शिक्षक चाहे किसी भी संस्थान में काम करता हो, उसकी भूमिका छोटी नहीं हो जाती।

अभिभावक भी अपनी भूमिका पर विचार करें

शिक्षक की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है, लेकिन अभिभावकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं। आज कई बार बच्चे की हर समस्या का समाधान विद्यालय और शिक्षक से अपेक्षित होता है। बच्चा पढ़ नहीं रहा—शिक्षक जिम्मेदार। बच्चा अनुशासनहीन है—शिक्षक जिम्मेदार। बच्चा मोबाइल में डूबा है—शिक्षक जिम्मेदार। बच्चा परीक्षा में कम अंक लाया—शिक्षक जिम्मेदार।

लेकिन बच्चे के घर का वातावरण, उसका मोबाइल उपयोग, उसकी दिनचर्या, उसकी नींद और अभिभावकों का उसके साथ संवाद—इनका भी तो प्रभाव पड़ता है। बच्चे की शिक्षा विद्यालय और परिवार की साझी जिम्मेदारी है। सारा भार शिक्षक पर डाल देना आसान है, न्यायपूर्ण नहीं।

शिक्षक की गलती पर कार्रवाई हो, लेकिन हर शिक्षक को संदेह की नजर से क्यों देखा जाए?

यह भी साफ होना चाहिए कि शिक्षक को जवाबदेही से मुक्त करने की मांग नहीं की जा रही। यदि कोई शिक्षक लापरवाही करता है, अपने दायित्व का निर्वहन नहीं करता या विद्यार्थियों के साथ अनुचित व्यवहार करता है तो कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन कुछ लोगों की गलतियों का भार पूरे शिक्षक समुदाय पर डालना भी उचित नहीं। हर पेशे में अच्छे और खराब दोनों प्रकार के लोग होते हैं। किसी एक व्यक्ति की गलती के आधार पर पूरी बिरादरी को कठघरे में खड़ा करना किसी भी पेशे के साथ न्याय नहीं। विश्वास और जवाबदेही साथ-साथ चलने चाहिए।

शिक्षक का सम्मान पुरस्कार से बड़ा प्रश्न है

कितने शिक्षकों को पुरस्कार मिला, यह महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन उससे बड़ा प्रश्न यह है कि कितने शिक्षक अपने विद्यालय में सम्मानजनक वातावरण में काम कर रहे हैं? कितनों की बात सुनी जाती है? कितनों को अपने अनुभव के आधार पर निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है?

कितनों को केवल आदेश प्राप्त करने वाला कर्मचारी समझा जाता है? शिक्षा नीति बनाने वालों के लिए शिक्षक की आवाज कितनी महत्वपूर्ण है? जो व्यक्ति रोज बच्चों के सामने खड़ा होता है, उसकी जमीन से जुड़ी समझ को शिक्षा संबंधी फैसलों में जगह मिलनी ही चाहिए।

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शिक्षक को सम्मानित करने का सबसे अच्छा तरीका

यदि वास्तव में शिक्षक दिवस मनाना है तो केवल पुष्प और प्रशस्ति-पत्र पर्याप्त नहीं। शिक्षक को उसका समय लौटाइए। अनावश्यक कार्यभार कम कीजिए। उसे पर्याप्त संसाधन दीजिए। विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराइए। प्रशिक्षण को औपचारिकता नहीं, उपयोगी प्रक्रिया बनाइए।

शिक्षक की पेशेवर गरिमा की रक्षा कीजिए। उसकी समस्याओं को सुनिए। और सबसे बढ़कर—उसे केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी मत समझिए। क्योंकि जो शिक्षक निर्णय लेने, सोचने और समझाने की क्षमता रखता है, वही विद्यार्थी में भी यह क्षमता विकसित कर सकता है।

शिक्षक दिवस वास्तव में किसका दिन है?

पांच सितंबर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की स्मृति से जुड़ा शिक्षक दिवस है। यह दिन हमें शिक्षक के महत्व की याद दिलाता है। लेकिन इसे केवल कैलेंडर की एक तारीख बना देना उसके उद्देश्य को छोटा करना होगा।

यह दिन हमसे पूछता है— क्या हम शिक्षक का सम्मान करते हैं या केवल सम्मान का प्रदर्शन करते हैं? क्या हम शिक्षक की समस्याएं सुनते हैं या केवल उसके पुरस्कार गिनते हैं? क्या हम उसकी जिम्मेदारियां बढ़ाते हैं तो उसके संसाधन भी बढ़ाते हैं? क्या हम उससे राष्ट्र निर्माण की अपेक्षा करते हैं तो उसके काम करने की परिस्थितियों को भी राष्ट्र निर्माण के योग्य बनाते हैं?

और सबसे बड़ा सवाल— यदि शिक्षक वास्तव में राष्ट्र निर्माता है तो राष्ट्र निर्माण की इस पहली पंक्ति के सिपाही को इतना अकेला क्यों छोड़ दिया गया है?

मंच से उतरकर शिक्षक के पास जाना होगा

शिक्षक दिवस के मंच पर खड़े होकर शिक्षक को महान बताना आसान है। मुश्किल यह है कि मंच से उतरकर उसकी वास्तविकता को समझा जाए। मुश्किल यह है कि उसके अतिरिक्त काम का हिसाब लगाया जाए। मुश्किल यह है कि उसके मानसिक दबाव को समझा जाए। मुश्किल यह है कि उसके पेशेवर सम्मान को व्यवस्था की प्राथमिकता बनाया जाए। और सबसे मुश्किल यह स्वीकार करना है कि शिक्षा सुधार केवल पाठ्यक्रम बदलने, नई इमारत बनाने या तकनीक लगाने से नहीं होगा। शिक्षा सुधार की शुरुआत शिक्षक को समझने से होगी।

जिस समाज ने गुरु को कभी भगवान के बाद स्थान दिया था, उसे कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि शिक्षक को अपने ही पेशे में सम्मान के लिए संघर्ष न करना पड़े।

पांच सितंबर को शिक्षक के हाथ में फूल देते समय हमें यह भी याद रखना चाहिए कि फूल की खुशबू एक दिन रहती है, लेकिन शिक्षक के श्रम का प्रभाव पीढ़ियों तक रहता है।

इसलिए शिक्षक को एक दिन की तालियां नहीं चाहिए। उसे चाहिए—विश्वास। उसे चाहिए—गरिमा। उसे चाहिए—समय। उसे चाहिए—संसाधन। उसे चाहिए—व्यवस्था का सहयोग।

और सबसे बढ़कर उसे चाहिए यह भरोसा कि जब वह बच्चों का भविष्य गढ़ने में अपना जीवन लगा रहा है, तब समाज भी उसके वर्तमान को समझने और बेहतर बनाने के लिए उसके साथ खड़ा है। मंच पर शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहना तभी सार्थक होगा, जब व्यवस्था में भी उसके साथ राष्ट्र निर्माता जैसा व्यवहार किया जाए।

वरना पांच सितंबर का समारोह केवल एक सुंदर मंच, कुछ फूल, कुछ तस्वीरें और कुछ भाषण बनकर रह जाएगा। और शिक्षक? वह अगले दिन फिर अपनी कक्षा में होगा। हाथ में किताब होगी। सामने बच्चे होंगे। और उसके पीछे खड़ी होगी वही व्यवस्था, जिससे वह हर दिन जूझते हुए भी अगली पीढ़ी को बेहतर बनाने की कोशिश करता रहेगा।

यही शिक्षक दिवस का सबसे बड़ा सच है—शिक्षक का सम्मान भाषण में नहीं, उसके रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देना चाहिए।

यायावर
Author: यायावर

यायावर

One Response

  1. शिक्षा औऱ शिक्षक के वास्तविक सत्य को परिलक्षित करता ते सम्पादक ज़ी का लेखक बेहद प्रासंगिक है औऱ सरकार को आत्ममंथन करने को विवस करता है

    संपादक ज़ी को साधुवाद ऐसे गंभीर विषय को उठाने के लिये

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