बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन उजड़े परिवारों का दर्द कौन समेटेगा?

उत्तर प्रदेश में बाढ़ से प्रभावित परिवारों, डूबे घरों और खेतों के बीच राहत एवं बचाव कार्य की तस्वीर, साथ में कमलेश कुमार चौधरी की प्रस्तुति

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प्रस्तुति : कमलेश कुमार चौधरी

माननीय संपादक महोदय,

सादर प्रणाम।

उत्तर प्रदेश में बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्राकृतिक आपदा से निपटने की हमारी तैयारियां आखिर कितनी मजबूत हैं और राहत के सरकारी दावों के बीच उस आम आदमी की जिंदगी कितनी सुरक्षित है, जिसके घर में पानी घुसते ही उसकी पूरी दुनिया अस्त-व्यस्त हो जाती है। बाढ़ का पानी भले कुछ दिनों बाद उतर जाए, लेकिन जिन परिवारों के घर, खेत, पशुधन, रोजी-रोटी और वर्षों की जमा पूंजी इस पानी की भेंट चढ़ जाती है, उनके जीवन में संकट बहुत लंबे समय तक बना रहता है।

यह चिट्ठी उन्हीं बाढ़ पीड़ितों की आवाज है, जिनकी पीड़ा सरकारी आंकड़ों से कहीं बड़ी है। यह उस किसान की चिंता है जिसकी खड़ी फसल डूब गई, उस मजदूर की विवशता है जिसकी रोजी बंद हो गई, उस मां की बेचैनी है जो बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर हुई और उस बुजुर्ग की बेबसी है जिसके सामने जीवनभर की कमाई पानी में बहती दिखाई दी।

बाढ़ के समय राहत और बचाव कार्य निश्चित रूप से जरूरी हैं, लेकिन असली सवाल पानी उतरने के बाद शुरू होता है—उजड़े घरों का पुनर्निर्माण कौन करेगा, नष्ट फसल का वास्तविक मुआवजा कब मिलेगा, बच्चों की पढ़ाई कैसे पटरी पर लौटेगी और जिन परिवारों की आजीविका छिन गई है, उन्हें फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?

इसलिए बाढ़ को केवल एक मौसमी आपदा मानकर कुछ दिनों की राहत के बाद भूल जाना पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसी दीर्घकालिक नीति की है, जिसमें राहत के साथ पुनर्वास, मुआवजे के साथ आजीविका और बचाव के साथ भविष्य की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।

क्योंकि बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन उजड़े परिवारों का दर्द अपने आप नहीं उतरेगा।

इसी मानवीय पीड़ा, प्रशासनिक जवाबदेही और स्थायी समाधान की जरूरत को सामने रखती है यह विशेष चिट्ठी।

उत्तर प्रदेश में मानसून की बारिश ने एक बार फिर प्रकृति की ताकत और हमारी तैयारियों की सीमाओं को सामने ला दिया है। नदियां उफान पर हैं, गांव पानी से घिरे हैं, खेत जलमग्न हैं, सड़कें टूट रही हैं और अनेक परिवार सुरक्षित ठिकानों की तलाश में अपने घर-द्वार छोड़ने को मजबूर हैं। लेकिन बाढ़ की सबसे भयावह तस्वीर पानी में डूबे मकानों की नहीं है।

सबसे भयावह तस्वीर उस आदमी की है, जो पानी के बीच खड़ा होकर सोच रहा है—अब घर कैसे चलेगा?

जिस किसान की महीनों की मेहनत खेत में खड़ी थी, उसके लिए बाढ़ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि पूरी आर्थिक व्यवस्था के डूब जाने का नाम है। जिस मजदूर की रोज की कमाई बंद हो गई, उसके लिए राहत शिविर में मिला एक पैकेट भोजन अगले दिन की चिंता खत्म नहीं करता। जिस परिवार का घर कच्चा था, उसके लिए पानी उतरने के बाद भी संकट खत्म नहीं होगा।

यही वह सच्चाई है, जिसे बाढ़ की सरकारी रिपोर्टों और आंकड़ों के बीच कहीं खो जाने से बचाना जरूरी है।

बाढ़ का असली हिसाब आंकड़ों में नहीं, उजड़े घरों में है

बाढ़ आने पर प्रशासन प्रभावित गांवों, परिवारों, हेक्टेयर फसल और राहत सामग्री के आंकड़े जारी करता है। आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन क्या वे उस बूढ़ी आंख का हिसाब बता सकते हैं, जो अपने घर की दीवार गिरते देख रही है?

क्या कोई सरकारी रिपोर्ट उस बच्चे की चिंता दर्ज कर सकती है, जिसकी किताबें बाढ़ के पानी में बह गईं?

क्या किसी आंकड़े में उस किसान की बेचैनी दिखाई दे सकती है, जिसने बीज, खाद, मजदूरी और उम्मीद—सब कुछ खेत में लगाया था?

नहीं।

इसलिए बाढ़ का मूल्यांकन केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि कितने गांव प्रभावित हुए। यह भी पूछा जाना चाहिए कि कितने परिवारों की आय प्रभावित हुई, कितने घर रहने लायक नहीं रहे, कितने किसानों की अगली फसल संकट में है और कितने बच्चों की शिक्षा बाधित हुई। यही बाढ़ का वास्तविक सामाजिक और आर्थिक हिसाब है।

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राहत की नाव पहुंच रही है, लेकिन क्या उम्मीद भी पहुंच रही है?

सरकार और प्रशासन द्वारा राहत एवं बचाव के लिए नावें, राहत चौकियां, स्वास्थ्य दल और शिविर लगाए जाना आवश्यक और स्वागतयोग्य कदम है। आपदा के समय प्रशासन की सक्रियता हजारों जिंदगियां बचा सकती है।

लेकिन असली परीक्षा आदेश जारी करने की नहीं, अंतिम व्यक्ति तक मदद पहुंचाने की है। किसी जिला मुख्यालय से यह घोषणा कर देना कि राहत सामग्री भेज दी गई, पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है—

क्या वह राहत उस गांव तक पहुंची? क्या वहां के हर जरूरतमंद परिवार तक पहुंची? क्या सबसे कमजोर परिवार तक पहले पहुंची? क्या किसी बुजुर्ग, अकेली महिला, बच्चे या बीमार व्यक्ति को राहत पाने के लिए घंटों कतार में खड़ा तो नहीं होना पड़ा? आपदा के समय व्यवस्था की गुणवत्ता का पता उसके सबसे कमजोर नागरिक की स्थिति से चलता है।

किसान की फसल डूबी तो केवल खेत नहीं डूबा

बाढ़ प्रभावित इलाकों में किसान का नुकसान सबसे गंभीर विषयों में से एक है। खेत में खड़ी फसल नष्ट होने का अर्थ है—कई महीनों की मेहनत का अंत। लेकिन इसके साथ बीज का खर्च, खाद का खर्च, सिंचाई का खर्च, मजदूरी और कर्ज की किस्त भी जुड़ी होती है। इसलिए फसल क्षति का सर्वे केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए।

जिस खेत में पानी है, वहां कागज देखकर नुकसान का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।

अधिकारी जमीन पर जाएं। वास्तविक स्थिति देखें। किसान से बात करें। नुकसान दर्ज करें। और मुआवजे की प्रक्रिया इतनी सरल हो कि पीड़ित किसान राहत पाने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाते-लगाते दूसरी बार परेशान न हो। बाढ़ से फसल नष्ट होने के बाद किसान को केवल मुआवजा नहीं, अगली फसल के लिए भी सहायता चाहिए। अन्यथा एक बाढ़ का असर कई महीनों और कई मौसमों तक चलता रहेगा।

पशुधन बचाना भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था बचाना है

बाढ़ की खबरों में मनुष्यों की चिंता स्वाभाविक रूप से केंद्र में रहती है, लेकिन ग्रामीण परिवारों की अर्थव्यवस्था में पशुधन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गाय, भैंस, बकरी या अन्य पशु किसी गरीब परिवार के लिए संपत्ति होते हैं।

जब बाढ़ आती है तो परिवार अपने बच्चों को बचाने के साथ-साथ पशुओं को भी सुरक्षित रखने की कोशिश करता है। लेकिन सुरक्षित चारा, पानी और स्थान की कमी उनके लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। इसलिए बाढ़ राहत केंद्रों में पशुओं के लिए भी—

चारा, पानी, चिकित्सा और सुरक्षित स्थान की व्यवस्था होनी चाहिए। किसी किसान का पशु बचाना उसके परिवार की भविष्य की आय बचाना है।

पानी उतरने के बाद शुरू होगी असली परीक्षा

हम अक्सर बाढ़ की सबसे बड़ी खबर पानी के बढ़ते स्तर को मानते हैं। लेकिन सच यह है कि बाढ़ का दूसरा अध्याय पानी उतरने के बाद शुरू होता है। जब घरों में कीचड़ भर जाता है। जब अनाज खराब हो जाता है। जब हैंडपंप दूषित हो जाते हैं। जब मच्छरों का प्रकोप बढ़ता है। जब पशु बीमार पड़ते हैं। जब सड़कें टूट जाती हैं। जब बिजली व्यवस्था बाधित होती है। जब स्कूलों की इमारतें प्रभावित होती हैं। और जब परिवार के सामने सवाल खड़ा होता है—अब वापस जाकर रहेंगे कहां?

इसलिए बाढ़ राहत की अवधि केवल नदी का जलस्तर सामान्य होने तक नहीं होनी चाहिए। पुनर्वास तब तक चलना चाहिए, जब तक प्रभावित परिवार अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए।

बच्चों की किताबें भी राहत सामग्री का हिस्सा बननी चाहिए

बाढ़ में बच्चों की शिक्षा सबसे पहले बाधित होती है। किताबें खराब हो जाती हैं। कॉपी बह जाती है। स्कूल बंद हो जाते हैं। कई बार परिवार सुरक्षित स्थान की तलाश में दूसरी जगह चला जाता है।

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ऐसे में यदि बाढ़ के बाद बच्चों को फिर उसी गति से स्कूल तक पहुंचाना है तो प्रशासन को राहत योजना में शैक्षणिक सामग्री को भी शामिल करना चाहिए। बच्चे की किताब वापस देना भी पुनर्वास है।

एक स्कूल बैग, कुछ किताबें, कॉपियां और जरूरी शैक्षणिक सामग्री किसी परिवार के लिए छोटी चीज लग सकती है, लेकिन बच्चे के भविष्य के लिए यह बहुत बड़ी सहायता है।

स्वास्थ्य संकट को अभी से रोकना होगा

बाढ़ के पानी के साथ बीमारी का खतरा भी आता है। दूषित पानी, गंदगी, मच्छर और खराब स्वच्छता व्यवस्था संक्रमण का कारण बन सकते हैं। इसलिए राहत शिविरों में भोजन के साथ साफ पेयजल, शौचालय, दवाइयां और स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था होनी चाहिए। सिर्फ बीमारी फैलने के बाद इलाज करना पर्याप्त नहीं है। बीमारी को फैलने से पहले रोकना ही बेहतर आपदा प्रबंधन है। स्वास्थ्य विभाग को प्रभावित गांवों में नियमित निगरानी करनी चाहिए और बच्चों तथा बुजुर्गों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

टूटी सड़क और पुल सिर्फ निर्माण की समस्या नहीं

बाढ़ के दौरान सड़क और पुल टूटना केवल यातायात बाधित होने की खबर नहीं है। किसी गांव का मुख्य मार्ग टूटने का मतलब है— बीमार व्यक्ति अस्पताल तक कैसे पहुंचेगा? किसान बाजार तक कैसे जाएगा? बच्चा स्कूल कैसे पहुंचेगा? राहत सामग्री गांव तक कैसे पहुंचेगी? और गर्भवती महिला को आपात स्थिति में अस्पताल कौन ले जाएगा? इसलिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में क्षतिग्रस्त सड़क और पुलों की मरम्मत को केवल निर्माण विभाग की सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं देखा जा सकता। यह जीवन बचाने से जुड़ा आपातकालीन काम है।

हर साल बाढ़ आएगी तो हर साल वही कहानी क्यों?

यह सबसे असहज लेकिन सबसे जरूरी सवाल है। हम हर साल बाढ़ देखते हैं। हर साल राहत अभियान शुरू होता है। हर साल नुकसान का आकलन होता है। हर साल मुआवजे की घोषणाएं होती हैं। हर साल तस्वीरें छपती हैं। और फिर पानी उतर जाता है। कुछ महीनों बाद सब सामान्य दिखाई देने लगता है। फिर अगली बरसात आती है। और कहानी दोबारा शुरू हो जाती है। क्या हमें केवल बाढ़ से लड़ना है या बाढ़ के कारणों और उससे होने वाले नुकसान को भी कम करना है?

नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र पर अतिक्रमण, जल निकासी की कमजोरी, कमजोर तटबंध, अनियोजित निर्माण, स्थानीय जल स्रोतों की उपेक्षा और बाढ़ पूर्व चेतावनी की सीमाएं—इन सब पर गंभीरता से विचार करना होगा। आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल आपदा आने के बाद दौड़ना नहीं है। सच्चा आपदा प्रबंधन वह है, जिसमें आपदा आने से पहले तैयारी पूरी हो।

बाढ़ प्रभावित गांवों की डिजिटल सूची क्यों नहीं?

आज तकनीक हमारे हाथ में है। प्रशासन के पास गांवों का रिकॉर्ड है। मोबाइल नेटवर्क और डिजिटल संचार उपलब्ध हैं। ऐसे में प्रत्येक संवेदनशील गांव के लिए पहले से आपदा प्रोफाइल तैयार की जा सकती है।

कितने परिवार? कितने बुजुर्ग? कितने बच्चे? कितने दिव्यांग? कितने पशु? निकटतम सुरक्षित स्थान कौन सा? नाव कहां उपलब्ध है? स्वास्थ्य केंद्र कितनी दूरी पर है? किस रास्ते से राहत वाहन पहुंच सकता है? यदि यह जानकारी पहले से उपलब्ध हो तो संकट के समय निर्णय लेने में कीमती समय बचाया जा सकता है। बाढ़ में एक-एक मिनट जिंदगी बचा सकता है।

मीडिया को भी सिर्फ पानी नहीं दिखाना चाहिए

यहां पत्रकारिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बाढ़ की तस्वीरों में डूबे खेत, सड़क पर बहता पानी और नाव में बैठे लोग दिखाई देते हैं। ये दृश्य जरूरी हैं, लेकिन कहानी इससे आगे जाती है।

मीडिया को पूछना चाहिए— राहत कहां पहुंची? कहां नहीं पहुंची? किसे मुआवजा मिला? किसका सर्वे छूटा? किस गांव का संपर्क टूटा है? किस स्कूल में पढ़ाई बाधित है? कहां पीने के पानी की समस्या है? कहां पशुओं के लिए चारा नहीं है? किस परिवार को पुनर्वास की जरूरत है?

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यही सवाल पत्रकारिता को केवल घटना का वर्णन करने से आगे ले जाकर जनता की आवाज बनाते हैं।

सरकार की आलोचना नहीं, जवाबदेही जरूरी है

आपदा के समय प्रशासन की आलोचना करना आसान है, लेकिन राहत कार्यों की वास्तविक चुनौतियों को समझना भी जरूरी है। अधिकारी भी कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। कई कर्मचारी अपने घरों से दूर रहकर राहत कार्य में लगे होते हैं।

नाव चालक, पुलिसकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी, सफाई कर्मचारी और स्थानीय स्वयंसेवक अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। उनके प्रयासों की सराहना होनी चाहिए। लेकिन सराहना और जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जहां व्यवस्था अच्छा काम कर रही है, वहां उसका उल्लेख होना चाहिए। जहां कमी है, वहां सवाल उठना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल व्यवस्था के दुश्मन नहीं होते; वे व्यवस्था को बेहतर बनाने का माध्यम होते हैं।

बाढ़ पीड़ित को दया नहीं, अधिकार चाहिए

सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यही है। बाढ़ पीड़ितों को केवल दया का पात्र बनाकर नहीं देखा जाना चाहिए। वे इस प्रदेश के नागरिक हैं। उन्हें राहत मिलना उनका अधिकार है। उन्हें नुकसान का निष्पक्ष आकलन मिलना उनका अधिकार है।

उन्हें मुआवजा मिलना उनका अधिकार है। उन्हें सुरक्षित पेयजल, स्वास्थ्य सेवा और पुनर्वास मिलना उनका अधिकार है। और यदि किसी परिवार का घर बाढ़ में नष्ट हो गया है तो उसे फिर से खड़ा होने का अवसर देना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। राहत की राजनीति नहीं, राहत का अधिकार चाहिए।

माननीय संपादक महोदय,

बाढ़ का पानी अंततः उतर जाएगा। मंदाकिनी, गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती और दूसरी नदियां अपने सामान्य प्रवाह में लौटेंगी। लोग घर लौटेंगे। सड़कें सुधरेंगी। बाजार खुलेंगे। स्कूल फिर चलेंगे। खेतों में फिर हरियाली दिखाई देगी। लेकिन क्या हम यह सुनिश्चित कर पाएंगे कि अगली बारिश में यही परिवार फिर उसी भय से न गुजरे? यही आज का सबसे बड़ा सवाल है।

बाढ़ को हर साल की नियति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।

उत्तर प्रदेश को ऐसी दीर्घकालिक बाढ़ नीति चाहिए जिसमें राहत के साथ रोकथाम, बचाव के साथ पुनर्वास और मुआवजे के साथ भविष्य की सुरक्षा शामिल हो।

सरकार को चाहिए कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की कमजोरियों का स्थायी समाधान तलाशे। प्रशासन को चाहिए कि राहत की हर घोषणा का जमीन पर सत्यापन करे। मीडिया को चाहिए कि बाढ़ पीड़ितों की आवाज पानी उतरने के बाद भी उठाता रहे। और समाज को चाहिए कि वह संकट की घड़ी में अपने सबसे कमजोर पड़ोसी का हाथ थामे। क्योंकि बाढ़ में डूबता हुआ घर केवल उस परिवार का घर नहीं है।

वह हमारे समाज की संवेदना की परीक्षा है। किसी किसान की डूबी फसल केवल उसका निजी नुकसान नहीं है। वह हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नुकसान है। किसी बच्चे की बहती हुई किताब केवल कागज नहीं है। वह उसके भविष्य का संकट है। और किसी बुजुर्ग का पानी से घिरा घर केवल एक मकान नहीं है। वह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का आईना है।

इसलिए आज जरूरत है कि हम बाढ़ को एक मौसमी समाचार बनाकर न छोड़ें। पानी उतरने के बाद भी सवाल उठते रहने चाहिए। राहत के बाद पुनर्वास की खबर आनी चाहिए। मुआवजे के बाद उसकी वास्तविक स्थिति सामने आनी चाहिए। टूटी सड़क बनने तक उसकी निगरानी होनी चाहिए। और अगले मानसून से पहले यह पूछा जाना चाहिए कि पिछली बाढ़ से हमने क्या सीखा? क्योंकि अगर हर साल हम केवल नुकसान गिनते रहे और समाधान नहीं खोज पाए, तो अगली बाढ़ में फिर वही सवाल हमारे सामने खड़ा होगा— “पानी तो उतर गया, लेकिन गरीब का दर्द कब उतरेगा?”

भवदीय

कमलेश कुमार चौधरी
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