अरमान अली की रिपोर्ट
श्रीनगर। नेपाल में ग्लेशियर और चट्टानों से जुड़ी हालिया भयावह बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे की ओर ध्यान खींचा है। इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर में भी ग्लेशियर झीलों, तेजी से पिघलते ग्लेशियरों, भूस्खलन और भूकंप को लेकर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में नेपाल जैसी घटना होने की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन यहां मौजूद कुछ ग्लेशियर झीलें GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood के लिहाज से संवेदनशील हैं। ऐसे में निगरानी और आपदा तैयारी को मजबूत करना समय की जरूरत है।
155 ग्लेशियर झीलों का हुआ जोखिम आकलन
कश्मीर हिमालय में किए गए एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन में 155 ग्लेशियर झीलों का GLOF जोखिम के लिहाज से आकलन किया गया। इनमें ब्रमसार, नंडकोल, भागसर, चिरसार और गंगाबल को बहुत अधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।
अध्ययन के अनुसार इन पांच झीलों से संभावित GLOF की स्थिति में करीब 2,704 इमारतें और 15 प्रमुख पुल प्रभावित हो सकते हैं। सड़क नेटवर्क के साथ एक जलविद्युत परियोजना पर भी संभावित असर का आकलन किया गया है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ये झीलें फिलहाल फटने वाली हैं। वैज्ञानिक जोखिम आकलन का उद्देश्य संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान कर समय रहते तैयारी करना है।
GLOF आखिर कितना खतरनाक है?
ग्लेशियर के पीछे हटने से कई बार उसके आसपास पानी जमा होकर झील का रूप ले लेता है। इन झीलों को कई बार बर्फ, चट्टान और मलबे से बने प्राकृतिक बांध रोककर रखते हैं।
यदि अचानक भारी भूस्खलन हो, चट्टान या बर्फ का बड़ा हिस्सा झील में गिरे या प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाए, तो झील का पानी तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। यही ग्लेशियर झील फटने से आने वाली बाढ़ यानी GLOF है।
ऐसी बाढ़ की खासियत यह है कि पानी के साथ मलबा, चट्टान और बर्फ भी नीचे की ओर आ सकते हैं। इसलिए नदी घाटियों में रहने वाले लोगों और वहां मौजूद पुल, सड़क तथा अन्य बुनियादी ढांचे के लिए खतरा बढ़ जाता है।
नेपाल की त्रासदी ने बढ़ाई चिंता
नेपाल में अगस्त 2026 के अंतिम सप्ताह में हुई ग्लेशियर-जनित बाढ़ ने हिमालयी आपदा के इसी स्वरूप को सामने ला दिया। अचानक आई बाढ़ से कई इलाकों में सड़कें और पुल प्रभावित हुए तथा जलविद्युत परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा।
इस घटना ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली कितनी मजबूत है।
जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भी विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील झीलों की पहचान होने के बाद अगला कदम उनकी नियमित निगरानी और संभावित बाढ़ के रास्तों का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।
भूकंप से जुड़ा खतरा भी नजरअंदाज नहीं
जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक स्थिति इसे भूकंप और भूस्खलन के लिहाज से भी संवेदनशील बनाती है। सरकारी भूकंपीय वर्गीकरण के अनुसार कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र के कुछ हिस्से सीस्मिक जोन V में आते हैं।
भूकंप की स्थिति में पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन हो सकता है। अगर बड़ी मात्रा में चट्टान या बर्फ किसी ग्लेशियर झील में गिरती है तो झील में अचानक पानी का विस्थापन हो सकता है और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
इसीलिए विशेषज्ञों के लिए ग्लेशियर, ग्लेशियर झील, भूस्खलन और भूकंप को अलग-अलग जोखिम के बजाय एक जुड़े हुए प्राकृतिक खतरे के रूप में देखना ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
ग्लेशियरों का तेजी से बदलता स्वरूप
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियरों के पीछे हटने और उनके आकार में बदलाव को लेकर वैज्ञानिक लगातार अध्ययन कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के पर्वतीय क्षेत्रों में हजारों ग्लेशियर मौजूद हैं।
ग्लेशियरों के पिघलने से जहां नई या बड़ी ग्लेशियर झीलों के बनने की संभावना बढ़ सकती है, वहीं लंबे समय में इसका असर नदियों के प्रवाह और पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
इसका प्रभाव केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। घाटियों में कृषि, पेयजल और जलविद्युत परियोजनाएं भी बदलते हिमनद तंत्र से प्रभावित हो सकती हैं।
संवेदनशील इलाकों में चेतावनी तंत्र जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने की जरूरत है।
सैटेलाइट तस्वीरों के साथ झीलों में जलस्तर मापने वाले सेंसर, नदी जलस्तर निगरानी और मौसम संबंधी आंकड़ों को एक साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि किसी झील में अचानक बदलाव दिखाई दे तो नीचे बसे इलाकों तक तुरंत चेतावनी पहुंचाई जा सके।
इसके अलावा स्थानीय लोगों को यह जानकारी होना भी जरूरी है कि बाढ़ की चेतावनी मिलने पर किस दिशा में जाना है और कौन से सुरक्षित स्थान निर्धारित हैं।
नेपाल से सबक, जम्मू-कश्मीर के लिए तैयारी
नेपाल की घटना को जम्मू-कश्मीर में होने वाली किसी निश्चित आपदा की भविष्यवाणी मानना उचित नहीं होगा। दोनों क्षेत्रों की स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। लेकिन यह घटना हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते ग्लेशियर और जलवायु संबंधी जोखिमों की गंभीर याद जरूर दिलाती है।
जम्मू-कश्मीर में पहले से ही संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान हो चुकी है। अब जरूरत है कि इन वैज्ञानिक निष्कर्षों को आपदा प्रबंधन की व्यावहारिक योजना से जोड़ा जाए।
समय रहते निगरानी, चेतावनी और निकासी की व्यवस्था मजबूत कर ली जाए तो प्राकृतिक आपदा को रोका भले न जा सके, लेकिन उससे होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
नेपाल की तबाही इसलिए सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक चेतावनी है—पहाड़ों के बदलते मिजाज को समझिए, क्योंकि तैयारी का समय आपदा आने के बाद नहीं, उससे पहले होता है।
























