17 अक्टूबर 2026 10:00 अपराह्न

‘मछली में प्याज-लहसुन डालो तो नॉन-वेज, नहीं तो वेज’ : बयान से गरमाई सियासत

ओम प्रकाश राजभर और संजय निषाद की तस्वीरों के साथ मछली, प्याज-लहसुन और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर वाली यूपी राजनीतिक खबर की फीचर इमेज

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दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों मछली को लेकर दिए जा रहे बयानों ने एक अलग ही बहस छेड़ दी है। धार्मिक आस्था, खान-पान की परंपरा और राजनीतिक बयानबाजी के बीच अब उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री एवं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का बयान चर्चा के केंद्र में आ गया है। राजभर ने मछली को लेकर ऐसा तंज कसा, जिसने पहले से चल रही राजनीतिक बहस को और हवा दे दी।

राजभर का कहना है कि मछली को किस श्रेणी में रखा जाए, इस पर बहस करने से पहले यह देखना चाहिए कि उसे किस तरह पकाया गया है। उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर मछली में प्याज और लहसुन डाला गया है तो उसे नॉन-वेज माना जाएगा, जबकि बिना प्याज-लहसुन के बनाई गई मछली को वेज माना जा सकता है। उनके इस बयान को कैबिनेट मंत्री संजय निषाद के हालिया मछली संबंधी बयान के समर्थन के तौर पर भी देखा जा रहा है।

संजय निषाद के बयान का किया समर्थन

ओम प्रकाश राजभर ने मछली को लेकर संजय निषाद की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संजय निषाद जो कह रहे हैं, वह सही ही कह रहे हैं। राजभर ने इस पूरे विवाद को राजनीतिक रंग देते हुए कांग्रेस पर भी सवाल खड़े किए।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि जिस मछली को लेकर चर्चा हो रही है, वह आखिर किस तरह तैयार की गई थी। क्या उसमें प्याज और लहसुन का इस्तेमाल किया गया था या फिर उसे बिना प्याज-लहसुन के बनाया गया था? राजभर का यह बयान सीधे तौर पर उस राजनीतिक बहस पर कटाक्ष माना जा रहा है, जिसमें नेताओं के खान-पान और उससे जुड़ी मान्यताओं को लेकर लगातार बयान सामने आ रहे हैं।

राजभर ने अपने अंदाज में सवाल को भोजन की सामग्री से जोड़ दिया। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई कि आखिर मछली को शाकाहारी बताने का तर्क किस आधार पर दिया जा रहा है।

‘मछली को वेज कैसे मान सकते हैं?’

जब ओम प्रकाश राजभर से यह सवाल पूछा गया कि मछली आखिर शाकाहारी कैसे हो सकती है, तो उन्होंने इस सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय संजय निषाद की विशेषज्ञता का हवाला दिया।

राजभर ने कहा कि मछली के मामले में संजय निषाद उनसे ज्यादा जानकारी रखते हैं और इस बारे में वही बेहतर तरीके से बता सकते हैं। उनका यह जवाब भी राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन गया। दरअसल, संजय निषाद लंबे समय से निषाद समाज और मछली से जुड़े मुद्दों को लेकर मुखर रहे हैं। ऐसे में राजभर ने भी इस विषय पर टिप्पणी करते हुए गेंद संजय निषाद के पाले में डाल दी।

राजनीतिक विश्लेषकों के लिहाज से देखें तो राजभर का बयान केवल खान-पान से जुड़ा विषय नहीं है। इसमें मौजूदा राजनीतिक माहौल पर कटाक्ष भी दिखाई देता है। भोजन को लेकर नेताओं की टिप्पणियां अक्सर धार्मिक भावनाओं, क्षेत्रीय परंपराओं और राजनीतिक विचारधाराओं से जोड़कर देखी जाती हैं।

बंगाल की परंपरा का दिया उदाहरण

मछली को लेकर उठे सवालों पर ओम प्रकाश राजभर ने पश्चिम बंगाल की परंपराओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग राज्यों में खान-पान और सामाजिक परंपराएं अलग-अलग हैं। किसी एक क्षेत्र की परंपरा को दूसरे क्षेत्र पर उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

राजभर के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में मछली भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहां पूजा-पाठ और धार्मिक अवसरों से जुड़ी कुछ परंपराओं में भी मछली के सेवन का उल्लेख मिलता है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं में खान-पान को लेकर अलग मान्यताएं हैं।

उन्होंने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि हर राज्य की परिस्थितियां और व्यवस्थाएं अलग होती हैं। इसलिए किसी राज्य के खान-पान की परंपरा को दूसरे राज्य के संदर्भ में देखकर सवाल उठाना उचित नहीं होगा।

बंगाल और उत्तर प्रदेश की परंपराओं में अंतर

भारत की विविधता का सबसे बड़ा उदाहरण यहां की खान-पान की परंपराएं भी हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही खाद्य पदार्थ को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता और धार्मिक दृष्टिकोण अलग हो सकता है। कहीं मछली रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा है तो कहीं इसे धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से अलग नजरिए से देखा जाता है।

ओम प्रकाश राजभर ने इसी विविधता को राजनीतिक बहस से जोड़ते हुए बंगाल का उदाहरण दिया। उनका कहना था कि पश्चिम बंगाल में परिस्थितियां उत्तर प्रदेश से अलग हैं। वहां की सामाजिक व्यवस्था और खान-पान की परंपराओं को उसी संदर्भ में समझना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और वहां की परिस्थितियां तथा व्यवस्था अलग हैं। राजभर का यह बयान ऐसे समय आया है, जब राजनीतिक दलों के नेताओं के खान-पान को लेकर सार्वजनिक बहस लगातार तेज होती दिखाई दे रही है।

खान-पान से राजनीति तक पहुंचा विवाद

मछली को लेकर शुरू हुई यह चर्चा अब केवल भोजन तक सीमित नहीं रह गई है। राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान सामने आने के बाद यह मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। किसी नेता के मछली खाने, किसी विशेष तरीके से भोजन करने या किसी खाद्य पदार्थ को लेकर टिप्पणी करने पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आना अब नया नहीं है।

ओम प्रकाश राजभर ने भी इसी बहस के बीच अपने चुटीले अंदाज में प्रतिक्रिया दी। प्याज और लहसुन का उदाहरण देकर उन्होंने मछली से जुड़े विवाद पर व्यंग्य किया। उनके बयान का राजनीतिक संदेश यह भी माना जा रहा है कि खान-पान की आदतों को लेकर अलग-अलग राज्यों और समुदायों की अपनी-अपनी परंपराएं होती हैं।

हालांकि, मछली को शाकाहारी या मांसाहारी मानने का प्रश्न वैज्ञानिक और सामान्य खाद्य वर्गीकरण की दृष्टि से अलग विषय है। राजभर की टिप्पणी को इसी कारण मुख्यतः राजनीतिक तंज और बयानबाजी के संदर्भ में देखा जा रहा है।

बयान के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ओम प्रकाश राजभर अपनी बेबाक और कई बार चुटीली टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी उन्होंने मछली से जुड़े विवाद में सीधे तौर पर किसी लंबी बहस में जाने के बजाय अपने अंदाज में टिप्पणी की।

राजभर ने जहां संजय निषाद के बयान का समर्थन किया, वहीं कांग्रेस से सवाल करने की बात कहकर इस मुद्दे को राजनीतिक बहस की ओर मोड़ दिया। इससे साफ है कि मछली को लेकर चल रही चर्चा अब केवल खान-पान की पसंद या धार्मिक मान्यता का विषय नहीं रह गई है, बल्कि राजनीतिक दल एक-दूसरे पर टिप्पणी करने के लिए भी इसे इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्या है विवाद का व्यापक संदर्भ?

पूरे मामले को व्यापक संदर्भ में देखें तो भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में भोजन की आदतें क्षेत्र, समुदाय, परिवार और व्यक्तिगत पसंद के अनुसार बदलती हैं। किसी क्षेत्र में जिस भोजन को सामान्य माना जाता है, दूसरे क्षेत्र में उसे लेकर अलग धारणा हो सकती है।

यही वजह है कि मछली को लेकर ओम प्रकाश राजभर का बयान भी कई स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ उनके बयान को संजय निषाद के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, दूसरी तरफ कांग्रेस पर किया गया उनका कटाक्ष राजनीतिक संदेश दे रहा है। वहीं बंगाल की परंपरा का उदाहरण देकर उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि देश के अलग-अलग हिस्सों में भोजन और धार्मिक-सामाजिक परंपराओं की अपनी विशिष्टता है।

फिलहाल मछली को लेकर नेताओं के बीच शुरू हुई यह राजनीतिक बयानबाजी आगे किस दिशा में जाती है, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि ‘मछली में प्याज-लहसुन डालो तो नॉन-वेज, नहीं तो वेज’ वाली राजभर की टिप्पणी ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नए विवाद को जरूर जन्म दे दिया है।

इस बयान के बहाने एक बार फिर यह सवाल सामने आया है कि क्या नेताओं के खान-पान से जुड़े बयान राजनीतिक मुद्दा बनने चाहिए या फिर उन्हें अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं या नहीं, इस पर भी नजर रहेगी।

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