16 अक्टूबर 2026 8:39 अपराह्न

राणा का मसखरा: राजनीति में काक्रोच जिंदा, गिरगिट आबाद और जनता फिर बर्बाद!

जनगणदूत के व्यंग्य स्तंभ राणा का मसखरा की फीचर इमेज, जिसमें संपादक संजय सिंह राणा और चित्रकूट जिला ब्यूरो सूरज सिंह राणा की फोन पर बातचीत, गिरगिट के जरिए राजनीति के बदलते रंग और जनता की बुनियादी समस्याओं को दर्शाया गया है।

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राजनीति में कभी नाम बदलता है, कभी निशान और कभी पूरी पार्टी का रंग-ढंग! मगर जनता की किस्मत है कि बदलने का नाम ही नहीं लेती। काक्रोच की तरह हर संकट में जिंदा रहने वाली राजनीति और गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले सियासी किरदारों के बीच आम आदमी आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहा है।

जनगणदूत के व्यंग्य स्तंभ ‘राणा का मसखरा’ में संपादक और पाठा के संजय सिंह राणा की काल्पनिक टेलीफोनिक बातचीत के बहाने सियासत के इसी बहुरूपिएपन पर चोट की गई है। पंजाबी ठसक, पाठा की ठेठ बोली और देसी हास्य के तड़के के साथ यह व्यंग्य पूछता है—जब नाम, नारे और रंग बदलने से राजनीति चमक सकती है, तो जनता की जिंदगी बदलने की बारी आखिर कब आएगी?

प्रस्तुति- सूरज सिंह राणा

राजनीति का नाम बदलते ही चमकने लगता है भाग्य, या जनता की आंखों में धूल झोंकने का है यह नया कारोबार?

राणा, काक्रोच पार्टी तो बन गई, अब गिरगिट की बारी है!

संपादक जी का फोन उठा तो दूसरी ओर से राणा की चिरपरिचित आवाज आई। नमस्कार, राम-राम, सत श्री अकाल और हालचाल के कुछ औपचारिक पुल पार करने के बाद संपादक जी ने बिना भूमिका बांधे सीधे राजनीति की उस प्रयोगशाला का दरवाजा खोल दिया, जहां जनता के भविष्य से ज्यादा नेताओं के नाम, निशान और कुर्सियों की उम्र पर शोध होता है।

“राणा, ओए राणा! एक गल दस्स। काक्रोच तो पार्टी बन गई, अब गिरगिट बची हुई है। क्यों न हम गिरगिट पार्टी बनाकर जंतर-मंतर पर मंतर लेने दिल्ली चलें? आखिर राजनीति में चमकने के लिए अब विचारधारा चाहिए या कोई ऐसा नाम, जिसे सुनकर जनता दो मिनट के लिए चौंक जाए?”

उधर चित्रकूट के पाठा की तरफ बैठे संजय सिंह राणा ने पहले तो अपनी हंसी को गले में रोका, फिर बोले, “संपादक जी, आप भी गजबै करत हौ! अरे, इहां पाठा मा आदमी के पास खेती-बारी का झंझट, पानी का टंटा, सड़क का रोना अउर रोजी-रोटी का सवाल है। उधर दिल्ली मा नाम धरि के राजनीति चमकावे का खेल चलत है। अब काक्रोच पार्टी बन गई तो गिरगिट पार्टी काहे न बनिहै? आखिर गिरगिट भी रंग बदलत है, अउर राजनीति मा रंग बदले बिना केहू के पूछ होत है का?”

संपादक जी ने पंजाबी अंदाज में ठहाका लगाया, “वाह भई वाह! तुस्सी तां सीधे दिल पर हाथ रख दित्ता। राजनीति का असली घोषणापत्र तो राणा ने दो लाइन में लिख दिया। रंग बदलना हुनर है, नाम बदलना कारोबार है और जनता को भरोसा दिलाना कि इस बार सब कुछ बदल जाएगा—यह चुनावी संस्कार है!”

राणा बोले, “मगर संपादक जी, एक बात बतावा। जब पार्टी के नाम से आदमी चमक सकत है, तौ आदमी के काम से पार्टी काहे न चमकै? ई उलटी गंगा कब तक बहिहै?”

संपादक जी कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “ओए राणा, तू पत्रकार आदमी है, ऐसे सवाल पूछेगा तो राजनीति की दुकान कैसे चलेगी? यहां काम पूछना मना नहीं है, बस काम का सवाल सही समय पर नहीं पूछना चाहिए। चुनाव के समय पूछोगे तो नेता कहेगा—विकास हो रहा है। चुनाव के बाद पूछोगे तो कहेगा—विकास प्रक्रिया में है। पांच साल बाद पूछोगे तो कहेगा—विकास का नया नामकरण होने वाला है!”

“तब तक हमार गांव का नल सूख जाई, सड़क उखड़ जाई अउर नौजवान परदेस कमाय चला जाई,” राणा ने पाठाई ठसक में कहा, “लेकिन पोस्टर मा विकास मुस्कात रही!”

“बिल्कुल, पुत्तर!” संपादक जी बोले, “पोस्टर वाला विकास कभी बूढ़ा नहीं होता। उसके बाल हमेशा काले, कपड़े हमेशा सफेद और मुस्कान हमेशा ऐसी रहती है, जैसे अभी-अभी जनता के खाते में खुशहाली जमा करके आया हो। असली विकास बेचारा दफ्तर की फाइलों में चप्पल घिसता रहता है।”

राजनीति में नाम बड़ा या काम?

राणा ने पूछा, “संपादक जी, ई बतावा कि राजनीति के नाम मा अइसन कौन जादू है कि कल तक जे आदमी गली मा पहचान खातिर तरसत रहा, उ पार्टी का झंडा उठावत ही नेता बन जात है? अउर जे बरिसन से जनता के बीच काम करत है, ओकरा के कोई पूछत तक नाहीं?”

संपादक जी बोले, “राणा, राजनीति में नाम की महिमा समझनी है तो पहले नामकरण संस्कार समझ। बच्चे का नाम रखते समय मां-बाप सोचते हैं कि बड़ा होकर यह नेक इंसान बनेगा, डॉक्टर बनेगा, इंजीनियर बनेगा या कम से कम घर का नाम रोशन करेगा। लेकिन राजनीतिक पार्टी का नाम रखते समय संस्थापक सोचता है कि ऐसा नाम हो, जिसमें आधा देश समा जाए, आधा इतिहास समा जाए और बचा हुआ आधा भविष्य की गारंटी बनकर चमक उठे।”

“लेकिन आधा देश तौ एक नाम मा समाइ न सकत, संपादक जी!”

“ओए, इसीलिए तो नाम के आगे बड़े-बड़े शब्द लगाए जाते हैं! जनता, जन, लोक, राष्ट्र, समाज, परिवर्तन, विकास, न्याय, क्रांति—इनमें से दो-चार शब्द जोड़ दो, फिर ऐसा लगेगा जैसे पार्टी नहीं, पूरा ब्रह्मांड चुनाव लड़ने उतर आया है।”

राणा हंस पड़े। बोले, “तौ का हमहूं ‘पाठा जन-जन क्रांति विकास परिवर्तन पार्टी’ बना लीं?”

“बना ले, पुत्तर! मगर नाम थोड़ा छोटा रखना। चुनाव आयोग के फॉर्म में जगह कम पड़ गई तो पार्टी का जन्म होने से पहले ही उसका नाम कट जाएगा।”

“फिर ‘पाठा विकास पार्टी’ कैसा रही?”

“बढ़िया है। लेकिन ध्यान रखना, अगर विकास अभी तक नहीं हुआ है तो विरोधी पूछेंगे कि पार्टी का नाम विकास पार्टी है, फिर विकास कहां है? और अगर विकास हो गया तो जनता पूछेगी कि अब पार्टी की जरूरत क्या है? राजनीति में नाम ऐसा होना चाहिए, जिसका हिसाब कभी पूरा न करना पड़े।”

राणा ने कहा, “तब तौ संपादक जी, सबसे बढ़िया नाम ‘कल विकास होगा पार्टी’ रही। आज कोई काम न करौ, कल का वादा करत रहौ!”

संपादक जी बोले, “ओए कमाल कर दित्ता! यह नाम तो इतना व्यावहारिक है कि घोषणा-पत्र में केवल एक वाक्य लिखना पड़ेगा—हम आएंगे तो कल जरूर आएगा। जनता पूछेगी कि कौन-सा कल? तो जवाब मिलेगा—आपके विश्वास वाला कल!”

काक्रोच और गिरगिट का राजनीतिक गठबंधन

अब तक बातचीत का रंग चढ़ चुका था। संपादक जी ने अपनी कुर्सी पर थोड़ा सीधा बैठते हुए कहा, “राणा, मेरी बात ध्यान से सुन। काक्रोच पार्टी और गिरगिट पार्टी का गठबंधन हो जाए तो भारतीय राजनीति को नई दिशा मिल सकती है।”

राणा ने पूछा, “कइसे, संपादक जी? काक्रोच तौ अंधेरा मा भी जिंदा रहि जात है अउर गिरगिट रंग बदलि लेत है। इनकर मेल से कौन-सा विकास होई?”

“देख पुत्तर, काक्रोच की सबसे बड़ी खूबी है कि परिस्थितियां कितनी भी खराब हों, वह बच निकलता है। गिरगिट की खूबी है कि परिस्थितियों के हिसाब से अपना रंग बदल लेता है। अब दोनों मिल जाएं तो एक ऐसा राजनीतिक मॉडल बनेगा, जो हर मौसम में टिकाऊ होगा।”

“माने सरकार बदले तौ रंग बदलि ल्या, सरकार गिरै तौ काक्रोच बनि के बचि जावा?”

“बिल्कुल! और अगर टिकट नहीं मिला तो स्वतंत्र विचारधारा का चोला पहन लेना। अगर मंत्री पद मिल जाए तो स्थिरता की बात करना। अगर पद छिन जाए तो लोकतंत्र खतरे में बताना। अगर गठबंधन टूट जाए तो सिद्धांतों की दुहाई देना। और अगर फिर से गठबंधन हो जाए तो राष्ट्रहित सर्वोपरि!”

राणा ने जोर से ठहाका लगाया, “अरे दद्दा! ई तौ वही बात भई कि बरखा मा छाता, गरमी मा पंखा अउर जाड़ा मा रजाई! नेता जी का सिद्धांत मौसम विभाग से चलत है का?”

संपादक जी बोले, “ओए, मौसम विभाग कम से कम अपनी गलती स्वीकार कर लेता है कि बारिश का अनुमान गलत निकला। राजनीति में अनुमान गलत निकले तो कहा जाता है कि जनता ने जनादेश की नई व्याख्या की है।”

“तौ हमार गिरगिट पार्टी के चुनाव चिन्ह मा का बनवाई? गिरगिट, काक्रोच कि दोनों के हाथ मा हाथ?”

“अभी चुनाव चिन्ह की बात मत कर। पहले पार्टी का विचारधारात्मक आधार तय कर।”

“उ का होत है?”

“विचारधारात्मक आधार मतलब ऐसा विचार, जो हर मंच पर सुनने में बहुत गंभीर लगे, मगर जरूरत पड़ने पर उसका मतलब बदला जा सके।”

राणा बोले, “तब तौ लिख देत हैं—हम जनता के साथ हैं, चाहे जनता किधरै हो!”

संपादक जी ने माथा पीट लिया। “ओए राणा, तू तो पार्टी बनने से पहले ही उसका सबसे खतरनाक प्रवक्ता बन गया!”

नाम बदलते ही चमक क्यों उठती है राजनीति?

कुछ देर बाद संपादक जी ने गंभीरता का चोला ओढ़ लिया। बोले, “राणा, मजाक अपनी जगह है, मगर एक सवाल सचमुच बड़ा है। आखिर राजनीति किसी भी नाम से चमक क्यों जाती है? कोई नया नाम सामने आता है, कोई नया चेहरा मंच पर खड़ा होता है, कोई नया नारा हवा में उछलता है और देखते ही देखते चर्चा शुरू हो जाती है। क्या जनता को नामों से इतना प्रेम है, या राजनीति ने हमारी उम्मीदों को नामों के सहारे बांधना सीख लिया है?”

राणा की आवाज भी कुछ गंभीर हुई। बोले, “संपादक जी, पाठा मा एक कहावत चलत है—पुरान लोटा धो-पोंछ के चमका द्या, तौ दूर से नया लागत है। राजनीति मा भी कुछ ऐसै होत होई। नाम नया, झंडा नया, टोपी नई, नारा नया; लेकिन भीतर वही पुरान हिसाब-किताब।”

संपादक जी बोले, “वाह! पुराना लोटा और नया लोकतंत्र। इस पर तो पूरा संपादकीय लिखा जा सकता है।”

राणा ने बात आगे बढ़ाई, “लेकिन हर नया नाम धोखा थोड़े होत है। कभी-कभी लोग पुरानी पार्टी से निराश होके नया रास्ता खोजत हैं। जब पुरान लोग उनकी बात नाहीं सुनत, तब नया संगठन बनावत हैं। सवाल नाम नया होय का नाहीं, सवाल ई है कि सोच नई है कि नाहीं।”

संपादक जी ने हामी भरी। “बिल्कुल सही। नई पार्टी बनना अपने आप में बुरी बात नहीं है। लोकतंत्र में नए विचारों, नए नेतृत्व और नई राजनीतिक पहलों की जगह होनी चाहिए। लेकिन नाम बदलना और व्यवस्था बदलना दो अलग-अलग बातें हैं। दरवाजे पर नया बोर्ड लगा देने से भीतर बैठे लोगों की नीयत अपने आप नहीं बदलती।”

“तौ संपादक जी, अगर पुरान दुकान मा नया बोर्ड लगाय दिहिन—‘ईमानदारी जनरल स्टोर’—तौ ग्राहक पहिले उधारी का पुरान हिसाब पूछिहै कि नाहीं?”

“पूछेगा क्यों नहीं, पुत्तर! और अगर दुकानदार कहे कि अब दुकान का नाम बदल गया है, इसलिए पुरानी उधारी खत्म, तो ग्राहक कहेगा—वाह जी वाह! नाम बदलने से अगर कर्ज माफ हो सकता है तो कल से मेरी पहचान भी बदल दो। मैं रामलाल से राजा साहब बन जाता हूं!”

दोनों हंस पड़े।

फिर संपादक जी बोले, “राजनीति में चमक के कई कारण हैं। नया नाम खबर बनता है। नया चेहरा उम्मीद पैदा करता है। नया नारा पुरानी निराशा पर पर्दा डाल देता है। मीडिया को नई कहानी मिलती है, समर्थकों को नया उत्साह और विरोधियों को नया निशाना। मगर असली परीक्षा तब शुरू होती है, जब पार्टी को जनता के सवालों का जवाब देना पड़ता है।”

राणा ने कहा, “यानी नाम से दरवाजा खुल सकत है, लेकिन भीतर टिके खातिर काम चाही!”

“बिल्कुल, पुत्तर। नाम परिचय देता है, काम पहचान बनाता है और चरित्र भरोसा पैदा करता है। इन तीनों में फर्क भूल गए तो लोकतंत्र भी विज्ञापन का पोस्टर बन जाएगा।”

जनता भी कम खिलाड़ी नहीं!

राणा ने अचानक पूछा, “संपादक जी, एक बात अउर बतावा। नेता लोग जनता को सपना दिखावत हैं, लेकिन जनता भी हर चुनाव मा नया सपना खोजत है। का जनता भी नाम के चमक मा फंस जात है?”

संपादक जी बोले, “ओए, जनता को दोष देना आसान है। लेकिन जनता की जिंदगी में समस्याएं भी तो असली हैं। किसी को रोजगार चाहिए, किसी को इलाज, किसी को बच्चों की पढ़ाई, किसी को सड़क, किसी को पानी और किसी को अपनी जमीन पर चैन से जीने का हक। जब लंबे समय तक समस्याओं का समाधान नहीं मिलता, तो नया चेहरा उम्मीद बनकर आता है।”

“माने आदमी दुखी होय तो नई नाव देख के बैठ जात है?”

“हां, लेकिन नाव का रंग देखकर नदी पार नहीं होती, राणा! नाव की मजबूती, खेने वाले की क्षमता और नदी की गहराई भी देखनी पड़ती है।”

राणा बोले, “हमरे इहां पाठा मा बरसात के बाद नाला चढ़ जात है। तब गांव वाला नाव पर बैठत समय नाव के रंग नाहीं देखत, ई देखत है कि नाविक के हाथ-पांव चलत हैं कि नाहीं। राजनीति मा भी जनता को नेता का पोस्टर छोड़ के ओकर काम देखे का चाही।”

संपादक जी ने कहा, “बिल्कुल। लेकिन राजनीति की कला देखो। नेता कहता है कि जनता ही मालिक है। फिर जनता को पांच साल बाद बुलाकर बताता है कि मालिक साहब, आपने पिछली बार जो आदेश दिया था, उसकी व्याख्या हमने अपने हिसाब से कर ली है। अब अगले पांच साल के लिए नया आदेश जारी कर दीजिए।”

“तौ जनता कहै—पहिले पुरान आदेश का हिसाब द्या!”

“और नेता कहे—हिसाब देने के लिए ही तो फिर आए हैं!”

राणा हंसते हुए बोले, “ई तौ अइसन भवा जैसे परीक्षार्थी कॉपी खाली छोड़ के मास्टर से कहै—गुरुजी, अगली परीक्षा मा जरूर लिखब!”

संपादक जी बोले, “और मास्टर जी उसे फिर से परीक्षा में बैठने की अनुमति भी दे दें, क्योंकि बच्चे का भविष्य बहुत महत्वपूर्ण है!”

घोषणापत्र में गिरगिट के सात रंग

अब राणा का उत्साह सातवें आसमान पर था। बोले, “संपादक जी, अगर गिरगिट पार्टी बनानी ही है, तौ ओकर घोषणापत्र भी बनवा द्या। कम से कम जनता हंसी-हंसी मा राजनीति का पाठ तौ पढ़ि लेई।”

संपादक जी ने कहा, “ठीक है पुत्तर, लिख। पहला सिद्धांत—हम हर परिस्थिति में जनता के साथ रहेंगे, बशर्ते परिस्थिति हमारे अनुकूल हो।”

राणा ने तुरंत टोका, “अरे, इत्ते साफ लिख देब तौ जनता हमका वोट काहे देई?”

“तो लिख दे—हम जनता के साथ हैं और जनता की हर समस्या के प्रति गंभीर हैं। समाधान के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का प्रयास किया जाएगा।”

राणा बोले, “समिति का काम का रही?”

“समिति यह पता लगाएगी कि समस्या कितनी पुरानी है, कितनी गंभीर है और किस विभाग के अधीन आती है। उसके बाद दूसरी समिति यह तय करेगी कि पहली समिति की रिपोर्ट पर विचार कब किया जाए।”

“तब तक जनता का बच्चा जवान होइ जाई!”

“ओए, तू हर बात में जनता को क्यों ले आता है? राजनीति में धैर्य भी तो जरूरी है!”

राणा ने कहा, “अच्छा, दूसरा सिद्धांत बतावा।”

संपादक जी बोले, “दूसरा—हम दल-बदल को अवसरवाद नहीं, लोकतांत्रिक पुनर्समायोजन मानेंगे।”

राणा ने कहा, “तीसरा—वादे पूरे न होय पाएं तो उनका नाम बदलकर उपलब्धि रख दिहा जाए।”

“चौथा—विरोधी सवाल पूछे तो उसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताओ, मगर अपने लोग सवाल पूछें तो पहले उनकी निष्ठा की जांच कराओ।”

“पांचवां—चुनाव से पहिले जनता भगवान, चुनाव के बाद जनता परिवार!”

“छठा—जो काम पूरा हो जाए, उसका उद्घाटन करेंगे; जो अधूरा हो, उसका शिलान्यास करेंगे; और जो शुरू ही न हो, उसकी विस्तृत कार्ययोजना का विमोचन करेंगे।”

राणा की हंसी रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बोले, “संपादक जी, सातवां भी लिखि द्या—जो काम किसी से न होय, ओकर नाम ऐतिहासिक परिवर्तन रख द्या!”

संपादक जी ने पंजाबी अंदाज में कहा, “वाह मेरे शेर! अब तो इस पार्टी को चुनाव आयोग से पहले साहित्य अकादमी में पंजीकृत कराना चाहिए। व्यंग्य का घोषणापत्र तैयार है!”

राणा बोले, “मगर ई घोषणापत्र जनता के सामने रखब तौ नेता लोग नाराज न होइहैं?”

“नाराज क्यों होंगे? जब तक कोई अपने ऊपर इसे लागू न समझे, हर व्यंग्य उसे दूसरे पर लिखा हुआ लगता है।”

जंतर-मंतर पर मंतर या जनता के सवाल?

बात अब दिल्ली पहुंच चुकी थी। संपादक जी ने कहा, “राणा, अब तय रहा। हम गिरगिट पार्टी बनाकर जंतर-मंतर जाएंगे। वहां मांग करेंगे कि राजनीति में नाम बदलने से पहले काम का हिसाब देना अनिवार्य हो।”

राणा बोले, “संपादक जी, मांग मा ई भी जोड़ द्या कि हर नेता के पोस्टर के नीचे पिछला काम लिखल जाय। जेतना काम पूरा, ओतना बड़ा अक्षर; जेतना अधूरा, ओतना छोटा अक्षर; अउर जेतना वादा हवा मा, ओकरा नीचे साफ लिखल जाय—अभी कल्पना के स्तर पर।”

“ओए, फिर तो पोस्टर पर नेता की तस्वीर के लिए जगह ही नहीं बचेगी!”

“तौ तस्वीर छोटी कर द्या। जनता का काम बड़ा दिखना चाही कि नेता का चेहरा?”

संपादक जी कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “राणा, तूने तो पूरे चुनावी विज्ञापन उद्योग की अर्थव्यवस्था हिला दी। नेता का चेहरा छोटा होगा तो कैमरा किस पर टिकेगा?”

राणा ने जवाब दिया, “कैमरा सड़क पर टिके, अस्पताल पर टिके, स्कूल पर टिके, खेत पर टिके। आखिर जनता के टैक्स का पैसा जनता के काम आवत है कि फोटो खिंचवावे मा?”

“ओए, अब तू सच बोलने लगा है। संभलकर! व्यंग्य में इतनी सच्चाई डाल देगा तो लोग उसे घोषणा-पत्र समझ बैठेंगे।”

राणा बोले, “हम तो बस इतना कहत हैं कि जंतर-मंतर पर मंतर पढ़े से पहिले जनता के मन की बात सुन ली जाय। वहां नारा कम, सवाल ज्यादा होय।”

संपादक जी ने कहा, “और अगर कोई पूछे कि गिरगिट पार्टी का नेता कौन है?”

राणा ने बिना देर किए कहा, “जवाब दिहा—नेता कोई एक नाहीं, परिस्थिति के हिसाब से बदलत रही!”

संपादक जी फिर ठहाका लगाकर हंसे। “ओए, तू तो पार्टी का संविधान ही बदल देगा!”

राजनीति का असली रंग कौन-सा है?

फोन पर बातचीत लंबी हो चुकी थी। लेकिन व्यंग्य के पीछे छिपा सवाल अभी बाकी था।

संपादक जी ने धीमे स्वर में कहा, “राणा, एक बात बता। अगर काक्रोच पार्टी, गिरगिट पार्टी, मेंढक मोर्चा, हाथी दल, शेर संगठन और उल्लू परिषद सब बन जाएं, तो क्या देश की राजनीति सचमुच बदल जाएगी?”

राणा ने जवाब दिया, “नाहीं संपादक जी। जब तक काम करे वाला मन नाहीं बदलत, तब तक नाम बदले से का होई? काक्रोच होय कि गिरगिट, हाथी होय कि शेर—जनता का पेट, बच्चन की पढ़ाई, मरीज का इलाज अउर किसान का खेत तौ जानवरन के नाम से न चलिहैं।”

“वाह राणा! यही तो बात है। प्रतीक राजनीति का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन प्रतीक ही राजनीति नहीं हैं। नाम से पहचान बन सकती है, पर जनता का विश्वास अर्जित करना पड़ता है। झंडा ऊंचा करने से पहले अपने काम का स्तर ऊंचा करना पड़ता है।”

राणा बोले, “हमरे पाठा मा लोग कहत हैं—खेत मा बीज न बोवैं, पानी न देवैं, अउर फसल काटे का सपना देखैं, तौ पेट कैसे भरिहै? राजनीति मा भी मेहनत की खेती चाही। खाली नारा बोय के विकास की फसल न उगिहै।”

संपादक जी बोले, “बिल्कुल पुत्तर। और एक बात याद रखना—लोकतंत्र में जनता केवल वोट डालने वाली मशीन नहीं है। वह सवाल पूछने वाली नागरिक है। नेता को पसंद करना उसका अधिकार है, नेता से जवाब मांगना उसका कर्तव्य नहीं बल्कि उसका लोकतांत्रिक हक है।”

“तौ संपादक जी, हम गिरगिट पार्टी के बैनर पर लिखब—‘रंग चाहे जितने बदलें, जनता से किया वादा नहीं बदलेगा।’”

संपादक जी कुछ पल ठहरे। फिर बोले, “राणा, यह नारा तो गिरगिट पार्टी के लिए कुछ ज्यादा ही ईमानदार हो गया। इसे दूसरी पार्टी को दे दे। हमारी पार्टी का नाम ही संकट में पड़ जाएगा!”

दोनों फिर हंस पड़े।

आखिर में राणा का आखिरी सवाल

फोन रखने से पहले राणा ने एक आखिरी सवाल दाग दिया।

“संपादक जी, ई बतावा। अगर राजनीति का नाम बदलने से ही चमक आ जात है, तौ हम ‘राणा का मसखरा’ का नाम बदल के ‘राष्ट्रीय जन-चिंतन एवं लोकतांत्रिक पुनर्जागरण संवाद’ रख देईं का? हो सकत है कि लेख पढ़े से पहिले ही हमार कॉलम राष्ट्रीय मुद्दा बनि जाय!”

संपादक जी ने पंजाबी अंदाज में कहा, “ओए राणा, नाम इतना लंबा रखेगा तो पाठक लेख पढ़ने से पहले ही थक जाएगा। और अगर नाम में राष्ट्रीय, जन, लोकतांत्रिक, चिंतन, पुनर्जागरण और संवाद सब डाल दिया तो लोग समझेंगे कि तू व्यंग्य नहीं, कोई सरकारी योजना लेकर आया है।”

राणा बोले, “तब नाम ‘राणा का मसखरा’ ही ठीक है। कम से कम लोग जानिहैं कि यहां हंसी के बहाने बात कही जात है।”

संपादक जी ने कहा, “बिल्कुल! मसखरा वह नहीं जो केवल दूसरों को हंसाए। असली मसखरा वह है, जो हंसाते-हंसाते आईना दिखा दे। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि नेता रंग बदलता है; संकट यह है कि कभी-कभी जनता रंग को ही चरित्र समझ बैठती है।”

राणा ने कहा, “तौ संपादक जी, जंतर-मंतर का कार्यक्रम फिलहाल स्थगित रखत हैं। पहिले जनता के बीच चलि के देखत हैं कि लोग काक्रोच पार्टी चाहत हैं कि गिरगिट पार्टी। अउर अगर लोग कहिहैं कि दोनों नहीं चाहिए, तौ?”

संपादक जी बोले, “तब पुत्तर, लोकतंत्र का सबसे खूबसूरत विकल्प सामने आएगा—ऐसी राजनीति, जिसमें पार्टी का नाम नहीं, उसका काम चमके; नेता की तस्वीर नहीं, जनता की तकदीर बदले; और घोषणापत्र के शब्द नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाले परिणाम बोलें।”

राणा ने कहा, “राम-राम संपादक जी। बात तो सही कहि दिहा। अब फोन रखत हैं, नहीं तौ गांव वाले समझिहैं कि हम सचमुच दिल्ली मा पार्टी बनावे की तैयारी करत हैं।”

संपादक जी ने हंसते हुए कहा, “सत श्री अकाल, राणा! और सुन—अगर कभी गिरगिट पार्टी बन भी जाए तो उसके झंडे का रंग रोज मत बदलना। जनता को कम से कम यह तो पता रहना चाहिए कि वह वोट किस रंग को दे रही है!”

फोन कट गया।

लेकिन सवाल हवा में तैरता रहा—राजनीति किसी भी नाम से चमक क्यों जाती है?

शायद इसलिए कि नाम उम्मीद जगाते हैं, नारे सपने बेचते हैं और चेहरे भरोसे का दावा करते हैं। मगर लोकतंत्र की असली चमक किसी पार्टी के नाम, झंडे, चुनाव चिह्न या नेता की लोकप्रियता में नहीं, बल्कि उस बदलाव में होती है जिसे आम आदमी अपने जीवन में महसूस कर सके।

सड़क पर चलते हुए गड्ढे कम हों, अस्पताल में इलाज मिले, स्कूल में पढ़ाई हो, नौजवान को काम मिले, किसान की मेहनत का सम्मान हो और आम नागरिक बिना सिफारिश के अपना अधिकार पा सके—तो राजनीति का नाम अपने आप चमक उठता है।

वरना काक्रोच हो या गिरगिट, हाथी हो या शेर, रंगीन पोस्टर हो या चमकदार नारा—जनता के हिस्से में अगर वही पुरानी परेशानी आए, तो नाम का नया रंग भी ज्यादा दिन नहीं टिकता।

और राणा का मसखरा यही कहता है—राजनीति में रंग बदलना आसान है, लेकिन जनता की जिंदगी का रंग बदलना ही असली परीक्षा है।

आलेख- संपादकीय विभाग

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