साढ़े छह करोड़ के घोटाले में 10 पंचायत सचिव निलंबित, एक के खिलाफ शासन को संस्तुति; मचा हड़कंप

देवरिया में साढ़े छह करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता मामले में 10 पंचायत सचिवों के निलंबन और एक के खिलाफ शासन को संस्तुति को दर्शाती फीचर इमेज, साथ में रिपोर्टर इरफान अली लारी की तस्वीर।

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इरफान अली लारी की रिपोर्ट

देवरिया: जिले की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन के इस्तेमाल में सामने आई भारी वित्तीय अनियमितता ने पंचायत विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2018-19 के दौरान सलेमपुर, बनकटा और बैतालपुर विकासखंड की विभिन्न ग्राम पंचायतों में सड़क, नाली समेत कई विकास कार्यों के लिए निकाली गई धनराशि के लेखा-जोखा की जांच में करीब साढ़े छह करोड़ रुपये की अनियमितता सामने आई है।

लेखा परीक्षा के दौरान सामने आए इस मामले में 11 ग्राम पंचायत सचिवों को दोषी पाया गया है। इनमें से 10 सचिवों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई है, जबकि एक सचिव के एडीओ पद पर पदोन्नत हो जाने के कारण उसके निलंबन की संस्तुति शासन को भेजी गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत राज अधिकारी को भी प्रतिकूल प्रविष्टि दिए जाने की बात सामने आई है।

करीब सात साल पुराने इस मामले में अब कार्रवाई होने से पंचायत विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि दोषी कर्मचारियों की संपत्तियों की जांच कराई जाएगी और सरकारी धन की वसूली के लिए भी आगे की कार्रवाई संभव है।

सात साल पुरानी फाइल खुलने से सामने आया मामला

दरअसल, वर्ष 2018-19 में देवरिया जिले के सलेमपुर, बनकटा और बैतालपुर विकासखंड की ग्राम पंचायतों में विभिन्न विकास योजनाओं के तहत सड़क, नाली और अन्य निर्माण कार्य कराए गए थे। इन कार्यों के लिए ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों के स्तर से सरकारी धनराशि का आहरण किया गया था।

बाद में इन विकास कार्यों और खर्च की गई धनराशि की लेखा परीक्षा कराई गई। ऑडिट के दौरान कई ग्राम पंचायतों में खर्च की गई रकम का समुचित हिसाब-किताब नहीं मिला। दस्तावेजों और अभिलेखों की जांच में वित्तीय अनियमितताओं के कई मामले सामने आए।

जांच आगे बढ़ी तो मामला सामान्य गड़बड़ी तक सीमित नहीं रहा। ऑडिट रिपोर्ट में सरकारी धन के इस्तेमाल में बड़े पैमाने पर अनियमितता सामने आई और कुल रकम करीब साढ़े छह करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इसके बाद संबंधित ग्राम पंचायत सचिवों की जिम्मेदारी तय की गई।

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लंबे समय तक दबा रहा करोड़ों की अनियमितता का मामला

इस प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यह है कि कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आने के बावजूद करीब सात वर्षों तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। इतनी बड़ी धनराशि से जुड़ा मामला लंबे समय तक फाइलों में दबा रहा और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई।

शासन स्तर पर पुराने प्रकरण को दोबारा संज्ञान में लिए जाने के बाद संबंधित रिकॉर्ड और फाइलों को खंगाला गया। दस्तावेजों की जांच के बाद दोषी पाए गए पंचायत सचिवों के खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई।

जिलाधिकारी मधुसूदन हुल्गी ने मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों को दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद जिला पंचायत राज अधिकारी की ओर से निलंबन की कार्रवाई की गई।

इन पंचायत सचिवों पर लगी वित्तीय अनियमितता की जिम्मेदारी

जांच में जिन पंचायत सचिवों को जिम्मेदार माना गया है, उनमें बैतालपुर विकासखंड के संजय सिंह पर करीब 29 लाख रुपये, धनंजय यादव पर करीब 35 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता का आरोप सामने आया है।

सलेमपुर विकासखंड के नागेश सिंह के मामले में करीब 93 लाख रुपये की अनियमितता बताई गई है। वहीं मो. उमर पर करीब 1.23 लाख रुपये और संजय द्विवेदी पर करीब 55 लाख रुपये की धनराशि से संबंधित अनियमितता का उल्लेख किया गया है।

बनकटा विकासखंड से जुड़े मामलों में तेज प्रताप पर करीब 58 लाख रुपये, अनिल कुमार सिंह पर करीब 14 लाख रुपये, सुरेश जायसवाल पर करीब 20 लाख रुपये, मोहम्मद जलील पर करीब 54 लाख रुपये, दीनदयाल पर करीब 62 लाख रुपये और मेहराब पर करीब 85 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आने की बात कही गई है।

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इन सभी मामलों में संबंधित पंचायत सचिवों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है। वहीं मोहम्मद उमर के एडीओ पद पर पदोन्नत हो जाने के कारण उनके निलंबन की संस्तुति शासन को भेजी गई है।

निलंबन के बाद संपत्ति की भी होगी जांच

मामले में कार्रवाई यहीं तक सीमित रहने के संकेत नहीं हैं। अधिकारियों के अनुसार दोषी पाए गए कर्मचारियों के खिलाफ आगे विभागीय कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही उनकी संपत्तियों की जांच कराने की बात भी कही गई है।

यदि जांच में सरकारी धन की हेराफेरी या अनियमित तरीके से संपत्ति अर्जित किए जाने की पुष्टि होती है तो संबंधित कर्मचारियों से सरकारी धन की वसूली और अन्य वैधानिक कार्रवाई का रास्ता भी खुल सकता है।

ऐसे में अब निगाह इस बात पर रहेगी कि निलंबन के बाद विभागीय जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और कथित वित्तीय अनियमितता से जुड़ी धनराशि की वसूली के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

अधिकारियों की भूमिका पर भी उठे सवाल

करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आने के बाद केवल पंचायत सचिव ही नहीं, बल्कि निगरानी और विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। मामले में जिला पंचायत राज अधिकारी को प्रतिकूल प्रविष्टि दिया जाना इसी गंभीरता की ओर संकेत करता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ऑडिट में इतनी बड़ी वित्तीय अनियमितता सामने आई थी तो समय रहते दोषी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लगभग सात वर्षों तक मामला लंबित रहने से सरकारी धन की वसूली और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया भी प्रभावित हुई होगी।

अब शासन और जिला प्रशासन के स्तर से इस पूरे प्रकरण में आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।

मुख्य विकास अधिकारी ने कही कार्रवाई की बात

इस पूरे मामले को लेकर मुख्य विकास अधिकारी राजेश कुमार सिंह ने बताया कि जांच में दोषी पाए गए ग्राम पंचायत सचिवों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई है। उन्होंने कहा कि संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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मुख्य विकास अधिकारी के मुताबिक दोषी पाए गए कर्मचारियों की संपत्तियों की भी जांच कराई जाएगी। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासन मामले को केवल विभागीय निलंबन तक सीमित रखने के बजाय वित्तीय जिम्मेदारी तय करने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।

पंचायतों में विकास कार्यों की निगरानी पर फिर उठे सवाल

देवरिया का यह मामला ग्रामीण विकास योजनाओं में पारदर्शिता और सरकारी धन के इस्तेमाल की निगरानी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्राम पंचायतों को सड़क, नाली, जल निकासी और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए बड़ी मात्रा में सरकारी धन उपलब्ध कराया जाता है। ऐसे में खर्च का सही लेखा-जोखा रखना और निर्धारित मानकों के अनुसार काम कराना पंचायत स्तर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

यदि विकास कार्यों के लिए जारी धनराशि का उचित अभिलेख उपलब्ध न हो या खर्च की गई रकम का हिसाब स्पष्ट न मिले तो इससे न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका पैदा होती है, बल्कि गांवों के विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं।

देवरिया में सामने आए इस पुराने प्रकरण में अब कार्रवाई शुरू होने के बाद उम्मीद की जा रही है कि जांच के जरिए पूरे मामले की जिम्मेदारी स्पष्ट होगी। साथ ही यदि सरकारी धन की वसूली निर्धारित होती है तो उसे भी प्रभावी ढंग से अमल में लाया जाएगा।

करीब सात साल पुराने इस प्रकरण में एक साथ कई पंचायत सचिवों पर हुई कार्रवाई ने जिले के पंचायत विभाग में हलचल पैदा कर दी है। अब देखना होगा कि विभागीय जांच और संपत्ति की जांच के बाद यह मामला किस निष्कर्ष तक पहुंचता है और कथित तौर पर अनियमित रूप से खर्च की गई करोड़ों रुपये की धनराशि की भरपाई किस प्रकार होती है।

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Author: यायावर

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