राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?

रानीगंज में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा हटाए जाने के विवाद पर आधारित फीचर इमेज, जिसमें लेखिका मालिनी भट्टाचार्य, अनुवादक संजय पराते, राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर केंद्रित संपादकीय प्रस्तुति दिखाई गई है।

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संपादकीय टिप्पणी :- यह लेख लेखिका मालिनी भट्टाचार्य के निजी विचारों पर आधारित है। इसमें व्यक्त ऐतिहासिक, राजनीतिक और वैचारिक मत उनके अपने हैं। समाचार संस्था का उद्देश्य इस लेख के माध्यम से एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक विमर्श को पाठकों तक पहुंचाना है; लेख में व्यक्त विचारों से संस्था का सहमत होना आवश्यक नहीं है। पाठकों से अपेक्षा है कि वे विषय को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझते हुए अपने स्वतंत्र विचार निर्मित करें।

लेखिका: मालिनी भट्टाचार्य English
अंग्रेज़ी से Hindi अनुवाद: संजय पराते

रानीगंज (पश्चिम बंगाल) के एक प्रमुख चौराहे पर स्थापित महापंडित राहुल सांकृत्यायन की आदमकद प्रतिमा को 20 जुलाई की आधी रात कुछ अज्ञात लोगों ने हटा दिया। अगले दिन सुबह वहां ईंटों और पत्थरों के मलबे के अलावा कुछ नहीं बचा था। स्थानीय लोगों ने तत्काल पुलिस को सूचना दी, लेकिन अब तक न तो दोषियों की पहचान हो सकी है और न ही प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई सामने आई है।

लेखिका का कहना है कि इस घटना पर न तो राज्य सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया दी और न ही स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने प्रतिमा पुनर्स्थापना या दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसके विपरीत, प्रतिमा हटाए जाने के विरोध में आयोजित सभा के बाद कुछ राजनीतिक कार्यकर्ताओं द्वारा स्थानीय वामपंथी कार्यकर्ताओं को धमकियां दिए जाने के आरोप भी सामने आए।

प्रतीकों की राजनीति और इतिहास पर नियंत्रण

लेखिका इस घटना को केवल एक प्रतिमा हटाए जाने तक सीमित नहीं मानतीं। उनके अनुसार, सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित वैचारिक और ऐतिहासिक प्रतीकों को हटाना उन राजनीतिक प्रवृत्तियों का हिस्सा है, जो इतिहास की स्मृतियों को बदलकर अपनी विचारधारा के अनुरूप नए प्रतीक स्थापित करना चाहती हैं। उनका मानना है कि इतिहास के सार्वजनिक स्थलों पर नियंत्रण स्थापित करना फासीवादी राजनीति की एक पहचान रही है।

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रानीगंज की प्रतिमा का इतिहास

रानीगंज में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा कोई सामान्य स्मारक नहीं थी। वर्ष 1993 में उनकी जन्मशती के अवसर पर कोयला क्षेत्र के मजदूर संगठनों, प्रगतिशील लेखकों, कलाकारों और शिक्षकों ने वर्षभर चलने वाले कार्यक्रम आयोजित किए थे। इन आयोजनों का उद्देश्य राहुल सांकृत्यायन को केवल एक महान विद्वान, भाषाविद् और दार्शनिक के रूप में नहीं, बल्कि जनसंघर्षों से जुड़े विचारक और सामाजिक परिवर्तन के पक्षधर के रूप में स्थापित करना था।

कार्यक्रमों के अंतर्गत मजदूर बस्तियों और किसान समूहों में बैठकों, चर्चाओं और जनसंवादों का आयोजन किया गया। इसी अभियान के समापन पर वर्ष 1994 में रानीगंज चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई, जिसका अनावरण किसान आंदोलन के वरिष्ठ नेता एवं तत्कालीन मंत्री बिनॉयकृष्ण चौधरी ने किया था। इस अवसर पर राहुल सांकृत्यायन के परिवार, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और बड़ी संख्या में आम नागरिकों की उपस्थिति रही।

तब से प्रत्येक वर्ष 9 अप्रैल को ‘पश्चिमबंग गणतांत्रिक लेखक शिल्पी संघ’ द्वारा उसी स्थान पर उनकी जयंती मनाई जाती रही है।

कौन थे राहुल सांकृत्यायन?

राहुल सांकृत्यायन का जन्म बिहार के पंदहा गांव में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में केदारनाथ पांडे के रूप में हुआ था। ज्ञान की अनवरत खोज ने उन्हें पारंपरिक शिक्षा संस्थानों से लेकर बौद्ध अध्ययन, तिब्बत, श्रीलंका और सोवियत संघ की यात्राओं तक पहुंचाया। बौद्ध भिक्षु बनने के बाद उन्होंने ‘राहुल सांकृत्यायन’ नाम धारण किया।

यद्यपि उन्हें आधुनिक विश्वविद्यालयों से औपचारिक डिग्री नहीं मिली, लेकिन वे भारतीय इतिहास के सबसे बड़े स्वाध्यायी विद्वानों में गिने जाते हैं। उन्होंने दर्शन, इतिहास, भाषा, पुरातत्व, यात्रा-वृत्तांत और समाज विज्ञान सहित अनेक विषयों पर महत्वपूर्ण लेखन किया।

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राहुल सांकृत्यायन केवल लेखक नहीं थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े, 1922 में गांधीवादी आंदोलन के दौरान पहली बार जेल गए और बाद में किसान आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े। 1938 में वे अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़े तथा आगे चलकर उसके अध्यक्ष बने। वे भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक दौर के सक्रिय कार्यकर्ताओं में भी शामिल रहे।

प्रतिमा हटाने के पीछे क्या संदेश?

लेखिका सवाल उठाती हैं कि क्या प्रतिमा हटाने वालों को राहुल सांकृत्यायन के विचारों और योगदान की जानकारी थी या यह केवल उस सार्वजनिक स्थल को निशाना बनाने का प्रयास था, जहां प्रगतिशील और वामपंथी संगठनों के कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।

उनके अनुसार, यदि वामपंथी विचारधारा को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है, तो भविष्य में भी ऐसी वैचारिक हस्तियों और उनके प्रतीकों पर हमले बढ़ सकते हैं।

आज भी क्यों प्रासंगिक हैं राहुल सांकृत्यायन?

लेखिका के अनुसार, आज राहुल सांकृत्यायन की सबसे बड़ी प्रासंगिकता उनके वैज्ञानिक और भौतिकवादी चिंतन में है। उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तिका ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ में धार्मिक कट्टरता और ऐतिहासिक भौतिकवाद पर उठाए गए सवालों का विस्तार से उत्तर दिया था।

उन्होंने सामाजिक अन्याय, जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी वर्चस्व, स्त्री उत्पीड़न और धार्मिक आस्था के राजनीतिक उपयोग की तीखी आलोचना की। लेखिका का मानना है कि आज जब समाज में अंधविश्वास, कट्टरता और वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तब राहुल सांकृत्यायन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्वतंत्र चिंतन को नए सिरे से पढ़ने और समझने की आवश्यकता है।

उनके शब्दों में, यदि किसी विचार से भय है, तो वह एक ऐसे स्वतंत्र, जिज्ञासु और वैज्ञानिक मानव मस्तिष्क का है, जिसका प्रतिनिधित्व महापंडित राहुल सांकृत्यायन करते हैं।

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(लेखिका परिचय)
मालिनी भट्टाचार्य संस्कृतिकर्मी, नाटककार, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, महिला आंदोलन की वरिष्ठ नेत्री तथा पूर्व सांसद हैं।

(अनुवादक परिचय)
संजय पराते, अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।

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Author: यायावर

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