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कार्यकाल खत्म, जिम्मेदारी बरकरार : जिला पंचायत अध्यक्ष अब प्रशासक के रूप में संभालेंगे कमान

उत्तर प्रदेश सरकार का बड़ा प्रशासनिक फैसला, नई व्यवस्था बनने तक 75 जिला पंचायत अध्यक्षों को सौंपी गई जिम्मेदारी, नीतिगत निर्णय लेने पर रहेगा प्रतिबंध।

रिपोर्ट: चुन्नीलाल प्रधान

उत्तर प्रदेश सरकार ने जिला पंचायतों के प्रशासनिक संचालन को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए राज्य के सभी 75 जनपदों के जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त कर दिया है। शासन की ओर से इस संबंध में शुक्रवार देर रात आदेश जारी किया गया। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब प्रदेश के सभी जिला पंचायत अध्यक्षों का पांच वर्षीय कार्यकाल 11 जुलाई को समाप्त हो रहा है।

सरकार के इस निर्णय के बाद अब नई जिला पंचायतों के गठन अथवा आगामी पंचायत चुनाव तक वर्तमान अध्यक्ष ही प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासक के रूप में कार्य करते हुए उन्हें किसी भी प्रकार के बड़े नीतिगत अथवा महत्वपूर्ण वित्तीय निर्णय लेने की अनुमति नहीं होगी।

कार्यकाल समाप्त होने से पहले जारी हुआ आदेश

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2021 में निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल शनिवार को पूरा हो रहा है। कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही शासन ने प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के उद्देश्य से सभी अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त करने का आदेश जारी कर दिया।

इस व्यवस्था के लागू होने से जिला पंचायतों में विकास कार्यों की गति प्रभावित नहीं होगी और प्रशासनिक कामकाज भी बिना किसी रुकावट के जारी रह सकेगा। शासन का मानना है कि यदि कार्यकाल समाप्त होते ही प्रशासनिक व्यवस्था में रिक्तता आ जाती, तो विकास योजनाओं और दैनिक कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।

पंचायती राज मंत्री ने दी जानकारी

प्रदेश के पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए बताया कि जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 11 जुलाई को समाप्त हो रहा था। ऐसी स्थिति में सरकार ने प्रशासनिक व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए उन्हें प्रशासक के रूप में नियुक्त करने का निर्णय लिया है।

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखना है, ताकि विकास कार्यों और जनहित की योजनाओं में किसी प्रकार का व्यवधान न आए।

प्रशासकों की शक्तियों पर रहेगा नियंत्रण

सरकार ने जिला पंचायत अध्यक्षों को प्रशासक नियुक्त करने के साथ-साथ उनकी शक्तियों की स्पष्ट सीमा भी तय कर दी है। नई व्यवस्था के अनुसार प्रशासक के रूप में कार्यरत जिला पंचायत अध्यक्ष—

  • कोई नया नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे।
  • बड़े वित्तीय या प्रशासनिक फैसलों को मंजूरी नहीं दे सकेंगे।
  • नई योजनाओं की स्वीकृति अथवा महत्वपूर्ण अनुबंधों पर अंतिम निर्णय नहीं ले पाएंगे।

हालांकि, नियमित प्रशासनिक कार्य, कर्मचारियों से जुड़े आवश्यक निर्णय, पहले से स्वीकृत विकास योजनाओं का संचालन, भुगतान प्रक्रिया और दैनिक कार्यालयी गतिविधियां पूर्व की तरह जारी रहेंगी। यानी जिला पंचायतों का नियमित संचालन बाधित नहीं होगा, लेकिन महत्वपूर्ण नीतिगत मामलों पर रोक रहेगी।

विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी

सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सड़क निर्माण, पेयजल, स्वच्छता, पंचायत भवन, ग्रामीण अधोसंरचना और अन्य विकास कार्य पहले की तरह चलते रहेंगे।

इसके अलावा राज्य सरकार और केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन में भी कोई प्रशासनिक बाधा नहीं आएगी, क्योंकि दैनिक कार्यों के लिए प्रशासकों को आवश्यक अधिकार दिए गए हैं।

आमतौर पर जिलाधिकारी को मिलती है जिम्मेदारी

प्रशासनिक परंपरा के अनुसार जब किसी निर्वाचित निकाय का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और नई कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाता, तब संबंधित जिले के जिलाधिकारी (डीएम) को प्रशासक नियुक्त किया जाता है।

लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश सरकार ने अलग व्यवस्था अपनाते हुए वर्तमान जिला पंचायत अध्यक्षों को ही प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया है। इससे निर्वाचित प्रतिनिधियों की प्रशासनिक भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं होगी और जिला पंचायतों का संचालन उनके माध्यम से ही जारी रहेगा।

यह निर्णय प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे स्थानीय निकायों में निर्वाचित नेतृत्व की निरंतरता बनी रहेगी।

राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय

सरकार के इस फैसले की राजनीतिक हलकों में भी व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। प्रदेश की 75 जिला पंचायतों में से बड़ी संख्या में अध्यक्ष भाजपा समर्थित हैं। ऐसे में इस निर्णय को राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि प्रशासक के रूप में जिलाधिकारियों की नियुक्ति होती, तो जिला पंचायतों में जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भूमिका समाप्त हो जाती। वर्तमान व्यवस्था में निर्वाचित अध्यक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े रहेंगे और स्थानीय स्तर पर उनकी सक्रियता बनी रहेगी।

हालांकि सरकार ने अपने आदेश में इसे पूरी तरह प्रशासनिक आवश्यकता और विकास कार्यों की निरंतरता बनाए रखने वाला निर्णय बताया है।

ब्लॉक प्रमुखों पर भी लागू हो सकती है यही व्यवस्था

सूत्रों के अनुसार सरकार जल्द ही प्रदेश के ब्लॉक प्रमुखों के संबंध में भी इसी प्रकार का निर्णय ले सकती है। यदि ऐसा होता है तो कार्यकाल समाप्त होने के बाद ब्लॉक प्रमुखों को भी प्रशासक बनाकर विकास खंडों का संचालन जारी रखा जा सकता है।

हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं हुआ है, लेकिन शासन स्तर पर इस संभावना पर चर्चा होने की जानकारी सामने आ रही है।

आगामी पंचायत चुनाव तक जारी रह सकती है व्यवस्था

सरकार की ओर से की गई यह नियुक्ति स्थायी नहीं है। यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक नई जिला पंचायतों का गठन नहीं हो जाता अथवा पंचायत चुनाव संपन्न होकर नए अध्यक्ष अपना कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेते।

इस बीच जिला पंचायतों का पूरा प्रशासनिक संचालन वर्तमान अध्यक्षों के माध्यम से ही चलता रहेगा, जबकि महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों पर शासन की निर्धारित सीमाएं लागू रहेंगी।

प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से अहम फैसला

उत्तर प्रदेश सरकार का यह निर्णय प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर इससे विकास योजनाओं के संचालन में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं आएगा, वहीं दूसरी ओर जिला पंचायतों में निर्वाचित नेतृत्व की भूमिका भी बनी रहेगी।

अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार ब्लॉक प्रमुखों के संबंध में क्या निर्णय लेती है और आगामी पंचायत चुनावों की समय-सीमा क्या तय होती है। फिलहाल इतना तय है कि प्रदेश की सभी जिला पंचायतों में प्रशासनिक जिम्मेदारी अब पूर्व निर्वाचित अध्यक्ष ही प्रशासक के रूप में निभाते रहेंगे, लेकिन उनके अधिकार निर्धारित सीमाओं के भीतर ही रहेंगे।

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