यात्रा वृत्तांत
चित्रकूट से केदारनाथ तक : एक पत्रकार की आंखों से भारत दर्शन
आस्था, विकास, पर्यावरण और जनजीवन के बीच भारत की आत्मा को खोजती संजय सिंह राणा की दृष्टि-यात्रा
कभी-कभी यात्राएं केवल पैरों से नहीं, दृष्टि से भी की जाती हैं। कुछ लोग तीर्थों तक पहुंचते हैं और लौट आते हैं, जबकि कुछ लोग रास्तों को पढ़ते हैं। वे पहाड़ों की चट्टानों पर लिखी इबारतें पढ़ते हैं, नदी की आवाज़ में छिपे प्रश्न सुनते हैं और भीड़ के शोर में व्यवस्था की खामोशी तलाशते हैं।उत्तर प्रदेश के एक सुदूर ग्रामीण अंचल से निकला युवा पत्रकार संजय सिंह राणा भी ऐसा ही व्यक्ति है। उसके पास न बड़े मीडिया घरानों का संसाधन है, न महानगरों की चमक-दमक। उसकी पत्रकारिता गांव की पगडंडियों से शुरू होती है और खेतों, जंगलों, नदियों तथा आम लोगों के जीवन से होकर गुजरती है।जब ऐसा पत्रकार बाबा केदारनाथ की यात्रा पर निकलता है तो उसकी यात्रा श्रद्धालु की यात्रा भर नहीं रह जाती। वह एक चलती-फिरती रिपोर्ट बन जाती है।
संजय सिंह राणा
चित्रकूट की भोर हमेशा कुछ अलग होती है।
मंदाकिनी के तट पर उगता सूरज केवल प्रकाश नहीं बिखेरता, वह इतिहास, आस्था और भारतीय जनजीवन की हजारों वर्षों पुरानी स्मृतियों को भी उजागर करता है। कामदगिरि की परिक्रमा पर निकले श्रद्धालु, घाटों पर गूंजती रामधुन, मंदिरों की घंटियां और दूर किसी चाय की दुकान से उठती भाप—यह सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं जिसमें भारत की सांस्कृतिक आत्मा सांस लेती हुई प्रतीत होती है।
इसी चित्रकूट की माटी से निकलता है युवा पत्रकार संजय सिंह राणा।
उसके पास है तो केवल एक नोटबुक, कुछ सवाल, एक जिज्ञासु मन और अपने समाज को समझने की बेचैनी।
चित्रकूट से केदारनाथ की यात्रा उसके लिए केवल भगवान शिव के दर्शन का कार्यक्रम नहीं है। यह उस भारत को देखने की यात्रा है जो गांवों, कस्बों, पहाड़ों, नदियों, सड़कों, धर्मशालाओं और लाखों साधारण लोगों के जीवन में बसता है।
जब वह चित्रकूट से निकलता है तो सबसे पहले उसकी नजर अपने ही क्षेत्र की विडंबनाओं पर जाती है। राम की तपोभूमि कहे जाने वाले इस क्षेत्र में आज भी अनेक गांव विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। कहीं सड़क अधूरी है, कहीं अस्पताल दूर है, कहीं युवाओं को रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता है।
बस की खिड़की से बाहर देखते हुए राणा सोचता है कि भारत की सबसे बड़ी कहानी महानगरों में नहीं, इन छोटे कस्बों और गांवों में लिखी जा रही है।
प्रयागराज की ओर बढ़ते हुए गंगा-यमुना का संगम दिखाई देता है। यहां उसे आस्था की विराटता दिखती है। स्टेशन पर यात्रियों की भीड़, धार्मिक पुस्तकों की दुकानें, तीर्थयात्रियों के चेहरे और आधुनिक रेलवे सुविधाओं के बीच वह भारत के दो चेहरों को साथ-साथ चलते देखता है—परंपरा और आधुनिकता।
हरिद्वार पहुंचते ही उसे लगता है कि वह मैदानों के भारत से पहाड़ों के भारत में प्रवेश कर चुका है। गंगा अब अधिक चंचल दिखाई देती है। हवा में ठंडक घुलने लगती है।
और यहीं से शुरू होती है वह यात्रा जहां एक श्रद्धालु के कदमों के साथ-साथ एक पत्रकार की आंखें भी लगातार सक्रिय रहती हैं…
ऋषिकेश से केदारनाथ : जहां रास्ते केवल दूरी नहीं, सभ्यता भी नापते हैं
ऋषिकेश में एक रात ठहरने के बाद अगली सुबह संजय सिंह राणा ने अपनी यात्रा का नया अध्याय शुरू किया। सामने हिमालय था। वह हिमालय, जिसे भारतीय संस्कृति ने देवताओं का निवास कहा और वैज्ञानिकों ने पृथ्वी का सबसे युवा पर्वत। बस धीरे-धीरे ऊंचाई की ओर बढ़ रही थी।
एक ओर गंगा का अथाह वेग, दूसरी ओर आसमान को छूती पहाड़ों की दीवारें। सड़कें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक चौड़ी और सुरक्षित दिखाई दे रही थीं। कई स्थानों पर आधुनिक इंजीनियरिंग के अद्भुत नमूने नजर आते थे। सुरंगें, रिटेनिंग वाल, पहाड़ों को बांधने वाले लोहे के जाल और जगह-जगह आपदा चेतावनी बोर्ड।
राणा ने नोटबुक में लिखा— “भारत ने पहाड़ों तक पहुंचने के रास्ते आसान किए हैं, लेकिन पहाड़ों को समझने की यात्रा अभी भी कठिन है।” देवप्रयाग पहुंचकर उसकी दृष्टि कुछ देर के लिए ठहर गई। जहां भागीरथी और अलकनंदा मिलकर गंगा बनती हैं, वहां खड़े होकर उसे लगा मानो दो अलग-अलग संस्कृतियां एक नई धारा का जन्म दे रही हों।
लेकिन उसी घाट के किनारे कुछ प्लास्टिक की बोतलें भी पड़ी थीं। भारत की यही विडंबना है। हम नदियों को मां कहते हैं, लेकिन उनके आंचल को स्वच्छ रखने का संस्कार अभी पूरी तरह विकसित नहीं कर पाए हैं।
श्रीनगर, रुद्रप्रयाग और पहाड़ों का बदलता अर्थशास्त्र
रास्ता आगे बढ़ा।
श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बाजारों में तीर्थ पर्यटन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। नई दुकानें खुली थीं। होटल बन रहे थे। युवाओं के हाथों में रोजगार के अवसर थे।
एक चाय की दुकान पर बैठकर राणा ने स्थानीय युवक से बातचीत की। “पहले नौकरी के लिए देहरादून या दिल्ली जाना पड़ता था। अब सीजन में यहीं काम मिल जाता है।” युवक ने मुस्कुराते हुए कहा। लेकिन बातचीत आगे बढ़ी तो तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने आया। “सीजन खत्म होते ही आधा बाजार खाली हो जाता है।” यह उत्तर सुनकर राणा कुछ देर तक चुप रहा। उसे लगा विकास केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है। विकास वह है जो पूरे साल जीवन को स्थिरता दे सके।
अगस्त्यमुनि के बाद : प्रकृति का विराट विद्यालय
अगस्त्यमुनि पार करते ही मौसम का मिजाज बदलने लगा। पहाड़ अब और करीब दिखाई देने लगे थे। मंदाकिनी नदी सड़क के साथ-साथ बह रही थी। कभी शांत, कभी उग्र। उसकी लहरें मानो हर यात्री को 2013 की त्रासदी की कहानी सुना रही थीं। राणा ने देखा कि नदी किनारे कई स्थानों पर सुरक्षा कार्य हुए हैं। तटबंध बने हैं। आपदा प्रबंधन केंद्र स्थापित किए गए हैं। लेकिन पहाड़ों की आंखों में अभी भी एक सावधानी दिखाई देती है। मानो वे कह रहे हों— “मनुष्य विकास करे, लेकिन अहंकार न करे।”
सोनप्रयाग : जहां आस्था कतारों में खड़ी मिलती है
सोनप्रयाग पहुंचते ही तीर्थयात्रा का वास्तविक स्वरूप सामने आने लगा। देश के कोने-कोने से आए लोग। कोई तमिल बोल रहा था। कोई बंगाली। कोई गुजराती। कोई भोजपुरी। लेकिन सबकी जुबान पर एक ही नाम था— “हर-हर महादेव।” राणा ने देखा कि व्यवस्थाएं पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सुव्यवस्थित थीं। ऑनलाइन पंजीकरण। सुरक्षा जांच। चिकित्सा शिविर। परिवहन नियंत्रण। लेकिन भीड़ बढ़ने के साथ कुछ समस्याएं भी सामने आती थीं। कहीं लंबा इंतजार। कहीं सूचना का अभाव। कहीं बुजुर्ग यात्रियों के लिए अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता। पत्रकार की आंखों ने इसे भी दर्ज किया। क्योंकि पत्रकारिता केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, सुधार की संभावनाओं की खोज भी है।
गौरीकुंड : जहां से शुरू होती है परीक्षा
गौरीकुंड में पहुंचकर राणा को लगा कि अब तक की यात्रा प्रस्तावना थी। असली कहानी अब शुरू होगी। यहां से आगे वाहन नहीं जाते। आगे केवल मनुष्य की इच्छा शक्ति जाती है। कंधों पर बैग टांगे हजारों लोग चढ़ाई की तैयारी कर रहे थे। कोई घोड़े पर जाने वाला था। कोई डंडी-कंडी का सहारा लेने वाला था। कोई पैदल ही शिव के द्वार तक पहुंचने का संकल्प लिए खड़ा था। राणा ने देखा कि यहां रोजगार का एक विशाल संसार मौजूद है।
घोड़ा संचालक। पालकी वाहक। दुकानदार। चाय विक्रेता। हजारों परिवारों की आजीविका इस तीर्थ से जुड़ी हुई थी। लेकिन उसे यह भी लगा कि इन लोगों की सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं पर शायद अभी और गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।
पैदल मार्ग : जहां हर कदम एक कहानी है
केदारनाथ का पैदल मार्ग केवल रास्ता नहीं, मनुष्य की सीमाओं और संभावनाओं की परीक्षा है। पहले कुछ किलोमीटर तक उत्साह साथ चलता है। फिर शरीर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगता है। सांसें तेज होती हैं। पैर भारी होने लगते हैं। लेकिन आश्चर्य यह कि जितनी थकान बढ़ती है, उतना ही “जय बाबा केदार” का उद्घोष भी तेज होता जाता है।
राणा ने देखा कि रास्ते में कई जगह चिकित्सा केंद्र बनाए गए हैं। ऑक्सीजन की व्यवस्था है। विश्राम स्थल हैं। यह सब सकारात्मक परिवर्तन थे। लेकिन कुछ स्थानों पर भीड़ के दबाव के कारण स्वच्छता प्रभावित होती दिखाई दी। कुछ जगह यात्रियों द्वारा छोड़ा गया कचरा भी दिखा।
उसने नोटबुक में लिखा— “समस्या व्यवस्थाओं की नहीं, संस्कारों की भी है।”
रास्ते में मिले भारत के चेहरे
एक वृद्ध दंपति महाराष्ट्र से आया था। एक परिवार असम से। कुछ युवा पंजाब से। एक समूह तमिलनाडु से। सभी अलग-अलग भाषाएं बोलते थे। लेकिन शिव के दरबार में पहुंचने की आकांक्षा उन्हें एक सूत्र में बांध रही थी। राणा को लगा कि संविधान भारत को कानूनी रूप से जोड़ता है, लेकिन तीर्थ भारत को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं।
यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है।
केदारनाथ : पुनर्जन्म की गाथा
और फिर वह क्षण आया जब दूर से केदारनाथ मंदिर का शिखर दिखाई दिया। थका हुआ शरीर अचानक हल्का हो गया। सामने बर्फ से ढकी चोटियां थीं। उनके मध्य खड़ा था सदियों का इतिहास समेटे बाबा केदारनाथ का मंदिर। राणा कुछ क्षणों के लिए पत्रकार नहीं रहा। वह केवल एक भारतीय था।एक श्रद्धालु। एक साधारण मनुष्य। लेकिन कुछ देर बाद उसकी पत्रकारिता फिर जाग गई। उसने पुनर्निर्मित परिसर को देखा।
बेहतर रास्ते। सुरक्षित संरचनाएं। व्यवस्थित दर्शन व्यवस्था। त्रासदी के बाद हुए कार्यों की सफलता स्पष्ट दिखाई देती थी। यह केवल निर्माण नहीं था। यह आपदा के बाद पुनर्जीवन का उदाहरण था। मंदिर के सामने खड़े होकर उसने महसूस किया कि कुछ यात्राएं मंजिल तक पहुंचकर समाप्त नहीं होतीं, बल्कि वहीं से शुरू होती हैं।
और अब शुरू होने वाली थी वापसी की वह यात्रा, जिसमें उसे भारत का एक और चेहरा देखने वाला था।
वापसी की राह : जब ट्रेन के डिब्बे में दिखा भारत का असली चेहरा
केदारनाथ से लौटते समय संजय सिंह राणा के कदम हल्के थे, लेकिन मन भारी। बाबा केदारनाथ के दर्शन हो चुके थे। हिमालय की विराटता आंखों में उतर चुकी थी। विकास, पर्यावरण, आस्था और व्यवस्था के बीच चल रहे संघर्ष को उसने नजदीक से देखा था। नोटबुक के पन्ने भर चुके थे, कैमरे की मेमोरी लगभग समाप्त हो चुकी थी, लेकिन पत्रकार की दृष्टि अभी भी सक्रिय थी। क्योंकि एक पत्रकार की यात्रा मंजिल पर नहीं, वापसी के रास्ते में पूरी होती है।
ऋषिकेश से हरिद्वार और फिर रेलवे स्टेशन तक पहुंचते-पहुंचते शाम ढल चुकी थी। स्टेशन यात्रियों से भरा हुआ था। हर कोई अपने-अपने घर लौटने की जल्दी में था। कोई थका हुआ था, कोई उत्साहित। कोई मोबाइल पर यात्रा के फोटो दिखा रहा था, तो कोई टिकट की चिंता में परेशान था।
राणा भी प्लेटफॉर्म की एक बेंच पर बैठ गया। कुछ ही देर में उसे लगा कि भारत की सबसे बड़ी संसद शायद रेलवे स्टेशन ही है। यहां हर जाति है। हर धर्म है।हर भाषा है। हर वर्ग है। और सबसे बड़ी बात यह कि यहां कोई स्थायी वीआईपी नहीं होता।
प्लेटफॉर्म नंबर पांच पर बैठा भारत
ट्रेन आने में देर थी। घोषणाएं बार-बार हो रही थीं। एक ट्रेन तीन घंटे विलंबित थी। दूसरी चार घंटे। लोग झुंझला रहे थे।लेकिन रेलवे कर्मचारियों के चेहरे पर भी थकान साफ दिखाई दे रही थी।
राणा ने सोचा कि समाचारों में अक्सर केवल यात्रियों की परेशानी दिखाई जाती है, मगर उन कर्मचारियों की कठिनाइयों पर कम चर्चा होती है जो चौबीसों घंटे इस विशाल तंत्र को चलाते हैं।
पास ही फर्श पर बैठा एक परिवार भोजन कर रहा था। उनके कपड़ों से अनुमान लगाया जा सकता था कि वे किसी छोटे गांव से आए थे। मां बच्चों को पूड़ियां खिला रही थी। पिता बार-बार टिकट और बैग संभाल रहे थे। दूसरी ओर एक युवा आईटी प्रोफेशनल लैपटॉप खोले बैठा था। कुछ दूरी पर साधुओं का एक समूह भजन गा रहा था। और एक कोने में एक वृद्ध महिला चुपचाप अपनी गठरी से सिर टिकाकर सोने की कोशिश कर रही थी।
राणा को लगा कि शायद यही भारत है। यहां कोई पूरी तरह गरीब नहीं है क्योंकि उसके पास उम्मीद है। और कोई पूरी तरह अमीर नहीं है क्योंकि उसे भी किसी न किसी चीज की चिंता है।
ट्रेन आई, लेकिन कहानी तब शुरू हुई
रात लगभग दस बजे ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी। जैसे ही ट्रेन रुकी, सभ्यता की परत अचानक पतली पड़ गई। जो लोग कुछ देर पहले शांति से बैठे थे, वे अब सीटों की लड़ाई में बदल चुके थे। आरक्षित डिब्बों में अनारक्षित यात्रियों की भीड़ घुसने लगी। कुछ लोग खिड़की से बैग फेंककर सीट रोक रहे थे। कुछ यात्रियों के चेहरे पर असहायता थी। राणा अपनी सीट तक पहुंच गया, लेकिन उसके सामने का दृश्य किसी भी संपादकीय लेख से अधिक तीखा था।
देश अंतरिक्ष में पहुंच चुका है। डिजिटल क्रांति की बातें हो रही हैं। लेकिन ट्रेन में चढ़ते समय नागरिक अनुशासन अब भी संघर्ष कर रहा है। एक सीट और कई कहानियां सामने वाली बर्थ पर एक मजदूर बैठा था। वह पंजाब से लौट रहा था। पास ही एक छात्र था जो प्रतियोगी परीक्षा देकर घर जा रहा था। ऊपरी बर्थ पर एक फौजी जवान था। कुछ देर बाद बातचीत शुरू हुई।
मजदूर बोला— “साहब, गांव में काम नहीं मिलता। इसलिए छह महीने बाहर रहना पड़ता है।” छात्र ने कहा— “पढ़ाई तो कर रहे हैं, लेकिन नौकरी कब मिलेगी, पता नहीं।” फौजी जवान मुस्कुराया— “देश सुरक्षित है, लेकिन घर से दूर रहने का दर्द कोई नहीं समझता।”
राणा चुपचाप सुनता रहा। उसे लगा कि टीवी चैनलों पर दिखाई देने वाला भारत और इस डिब्बे में बैठा भारत अलग-अलग संसार हैं। एक में बहसें हैं। दूसरे में संघर्ष। एक में शोर है। दूसरे में जीवन।
रात की यात्रा और कटु यथार्थ
रात गहराने लगी। डिब्बे की लाइटें मंद हो गईं। लेकिन नींद सबकी आंखों में नहीं थी। कुछ यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। कुछ सीटों पर क्षमता से अधिक लोग बैठे थे। शौचालयों की स्थिति धीरे-धीरे खराब होती जा रही थी। कहीं पानी नहीं था। कहीं सफाई अधूरी थी। राणा ने सोचा कि यह आलोचना नहीं, वास्तविकता है। भारत का रेलवे नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में से एक है। हर दिन करोड़ों लोग यात्रा करते हैं। लेकिन इतनी विशाल व्यवस्था में अभी भी अनेक सुधारों की आवश्यकता है। सवाल केवल सरकार का नहीं है। सवाल यात्रियों का भी है। क्योंकि गंदगी पैदा करने वाला भी नागरिक है और उससे परेशान होने वाला भी।
सुबह का उजाला और खिड़की के बाहर का भारत
सुबह जब आंख खुली तो ट्रेन उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में प्रवेश कर चुकी थी। खिड़की के बाहर खेत दिखाई दे रहे थे। धान की हरियाली हवा में झूम रही थी। कहीं किसान हल चला रहा था। कहीं बच्चे स्कूल जा रहे थे। कहीं महिलाएं खेतों की ओर बढ़ रही थीं। राणा को लगा कि यही भारत की वास्तविक धड़कन है। राजधानी की बहसें महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन देश की आत्मा अब भी गांवों में सांस लेती है।
एक बुजुर्ग की बात
यात्रा के अंतिम चरण में एक बुजुर्ग यात्री ने राणा से पूछा— “बेटा, कहां से लौट रहे हो?” “केदारनाथ से।” राणा ने उत्तर दिया। बुजुर्ग मुस्कुराए। फिर बोले— “भगवान के दर्शन कर लिए?” “जी।” “अच्छा है। लेकिन एक बात याद रखना। भगवान मंदिरों में कम और लोगों के दुख-दर्द में ज्यादा मिलते हैं।” यह वाक्य सुनकर राणा कुछ क्षण मौन हो गया। उसे लगा कि पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संपादकीय शायद इसी एक वाक्य में छिपा हुआ है।
चित्रकूट की ओर लौटते हुए
जब ट्रेन चित्रकूट की दिशा में बढ़ रही थी, तब राणा के पास केवल यात्रा की स्मृतियां नहीं थीं। उसके पास एक नया भारत था। वह भारत जो केदारनाथ की घंटियों में भी था और रेलवे के भीड़भरे डिब्बों में भी। जो हिमालय की बर्फीली चोटियों में भी था और खेतों की मेड़ों पर भी। जो विकास की उपलब्धियों में भी था और व्यवस्था की कमियों में भी। जो श्रद्धा में भी था और संघर्ष में भी।
संपादकीय टिप्पणी
चित्रकूट से केदारनाथ और फिर केदारनाथ से चित्रकूट तक की यह यात्रा वस्तुतः एक पत्रकार की नहीं, भारत की आत्मा की यात्रा है। यह वृत्तांत हमें बताता है कि देश केवल राजधानी के गलियारों, सरकारी आंकड़ों और राजनीतिक विमर्शों में नहीं बसता, बल्कि उन पहाड़ी पगडंडियों, रेलवे प्लेटफॉर्मों, चाय की दुकानों, खेतों, घाटों और साधारण लोगों के जीवन में भी धड़कता है, जिनकी आवाज़ अक्सर मुख्यधारा के शोर में दब जाती है।
संजय सिंह राणा की आंखों ने इस यात्रा में जहां विकास की उपलब्धियों को देखा, वहीं उन छोटी-छोटी कमियों को भी दर्ज किया जिन्हें अनदेखा कर देना आसान था। यही पत्रकारिता का मूल धर्म है—प्रशंसा और आलोचना के बीच संतुलित सत्य की खोज।
बाबा केदारनाथ के विशाल धाम से लेकर रेलवे के भीड़भरे डिब्बे तक, इस यात्रा ने एक ही संदेश दिया कि भारत एक निरंतर निर्माणाधीन सभ्यता है। यहां उपलब्धियां हैं तो चुनौतियां भी हैं; आस्था है तो प्रश्न भी हैं; विकास है तो संवेदनशीलता की आवश्यकता भी है।
शायद इसी कारण ऐसी यात्राएं केवल तीर्थयात्राएं नहीं रह जातीं। वे समाज, व्यवस्था, प्रकृति और मनुष्य के बीच चल रहे संवाद का जीवंत दस्तावेज बन जाती हैं।
और अंततः, एक पत्रकार की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह लौटकर केवल यात्रा का वर्णन न करे, बल्कि पाठकों को अपने समय, अपने समाज और अपने देश के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर दे।
चित्रकूट लौटकर जब संजय सिंह राणा ने अपनी नोटबुक बंद की, तब उसके भीतर एक ही निष्कर्ष बचा था—भारत को समझने के लिए कभी-कभी केदारनाथ जाना पड़ता है, लेकिन भारत को महसूस करने के लिए एक साधारण रेल डिब्बे में बैठकर लोगों के बीच सफर करना ही काफी है।



