बाढ़ की चुनौती से अवसर की ओर: किसानों को सिखाए गए बांस खेती और नर्सरी प्रबंधन के आधुनिक गुर
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में आजीविका बढ़ाने और भूमि संरक्षण के लिए तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संपन्न
इरफान अली लारी की रिपोर्ट
देवरिया। पूर्वांचल का गंडक नदी क्षेत्र हर वर्ष बाढ़ और कटान की समस्या से जूझता है। बाढ़ के कारण हजारों किसानों की फसलें प्रभावित होती हैं और कृषि योग्य भूमि भी धीरे-धीरे कटकर नदी में समाहित हो जाती है। ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी आजीविका को सुरक्षित रखने की होती है। इसी समस्या का स्थायी और व्यावहारिक समाधान तलाशने के उद्देश्य से बाढ़ प्रभावित किसानों के लिए बांस खेती, नर्सरी स्थापना एवं क्षमता विकास पर आधारित तीन दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
सेंटर फॉर इंडियन बैम्बू रिसोर्स एंड टेक्नोलॉजी (सीबार्ट) तथा सस्टेनेबल ह्यूमन डेवलपमेंट एसोसिएशन (एसएचडीए) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम को टाटा ट्रस्ट समर्थित समुदाय आधारित बाढ़ अनुकूलन क्लस्टर मॉडल परियोजना के अंतर्गत संचालित किया गया। 28 से 30 मई तक चले इस प्रशिक्षण शिविर में ग्राम नरकहवा और कटाई भरपूरवा पंचायत भवनों में खड्डा क्षेत्र के 85 से अधिक किसानों ने भाग लिया। विशेष बात यह रही कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिला किसानों की भी सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
बांस खेती को बताया भविष्य की टिकाऊ कृषि
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को बांस की खेती के विभिन्न पहलुओं से अवगत कराया। सीबार्ट के वरिष्ठ अनुसंधान सलाहकार डॉ. क्षितिज मल्होत्रा ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में बांस केवल एक वन उत्पाद नहीं बल्कि किसानों के लिए आय का मजबूत स्रोत बनकर उभर रहा है।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा बांस को घास की श्रेणी में शामिल किए जाने के बाद इसकी खेती और विपणन के रास्ते काफी आसान हुए हैं। अब किसान बांस को अन्य कृषि फसलों की तरह अपने खेतों में उगा सकते हैं और बाजार में बेचकर अच्छा लाभ कमा सकते हैं।
डॉ. मल्होत्रा ने कहा कि बांस की मांग निर्माण कार्यों, फर्नीचर उद्योग, हस्तशिल्प, कागज उद्योग और पर्यावरण संरक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही है। ऐसे में इसकी व्यावसायिक खेती किसानों के लिए दीर्घकालिक आय का सशक्त माध्यम बन सकती है।
नर्सरी तैयार करने की तकनीक का दिया व्यावहारिक प्रशिक्षण
कार्यक्रम के दौरान किसानों को केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं दी गई, बल्कि नर्सरी स्थापना और पौध तैयार करने की पूरी प्रक्रिया का व्यावहारिक प्रदर्शन भी कराया गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि गुणवत्तापूर्ण पौध तैयार करने के लिए उचित बीज चयन, मिट्टी की तैयारी, सिंचाई प्रबंधन और पौध संरक्षण के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना आवश्यक है। किसानों को यह भी सिखाया गया कि किस प्रकार कम लागत में बांस की नर्सरी स्थापित कर अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।
प्रशिक्षण में शामिल किसानों ने नर्सरी प्रबंधन से जुड़े विभिन्न तकनीकी पहलुओं को समझा और विशेषज्ञों से सीधे संवाद कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया।
बाढ़ और कटान रोकने में बांस की अहम भूमिका
सीबार्ट के विशेषज्ञ डॉ. बी.एम. त्रिपाठी ने बांस की पर्यावरणीय उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गंडक नदी के किनारे बसे गांवों में बाढ़ और भूमि कटान गंभीर समस्या बन चुकी है। हर वर्ष बड़ी मात्रा में कृषि भूमि नदी की धारा में समा जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि बांस के मजबूत और गहरे जड़ तंत्र के कारण यह मिट्टी को मजबूती प्रदान करता है तथा भूमि कटान को नियंत्रित करने में मदद करता है। यदि नदी किनारे बड़े पैमाने पर बांस रोपण किया जाए तो इससे कटान की गति को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि बांस खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने का भी प्रभावी उपाय है।
महिला किसानों को स्वरोजगार के लिए किया प्रेरित
सीबार्ट की निदेशक के. रत्ना ने कहा कि उत्तर प्रदेश में बांस की खेती की अपार संभावनाएं होने के बावजूद अभी इसका विस्तार सीमित है। उन्होंने किसानों से बंजर और अनुपयोगी भूमि पर भी बांस रोपण करने का आह्वान किया।
उन्होंने विशेष रूप से महिला किसानों और स्वयं सहायता समूहों को संबोधित करते हुए कहा कि बांस आधारित शिल्प उत्पादों का निर्माण ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार का सशक्त माध्यम बन सकता है। बांस से टोकरी, सजावटी वस्तुएं, घरेलू उपयोग के उत्पाद, फर्नीचर और अन्य हस्तशिल्प सामग्री तैयार कर बाजार में बेची जा सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि महिलाओं को उचित प्रशिक्षण और विपणन सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं तो वे बांस उद्योग के माध्यम से अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं।
भूमि संरक्षण के साथ बढ़ेगी किसानों की आय
सीबार्ट के मॉनिटरिंग ऑफिसर अरविंद कुमार ने कहा कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बांस खेती किसानों के लिए दोहरा लाभ प्रदान करती है। एक ओर यह भूमि संरक्षण का कार्य करती है, वहीं दूसरी ओर किसानों को नियमित आर्थिक लाभ भी देती है।
उन्होंने बताया कि बांस के पौधों के बीच किसान अंतरवर्ती खेती भी कर सकते हैं। इससे खेत की उत्पादकता बनी रहती है और किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलता है। सब्जियां, दलहन और अन्य नकदी फसलें बांस के साथ सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में ऐसी कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है जो पर्यावरणीय चुनौतियों के साथ-साथ किसानों की आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित कर सकें।
शिल्प निर्माण और उपकरणों का भी हुआ प्रदर्शन
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान मास्टर ट्रेनर मनोज यादव ने बांस कटिंग, प्रसंस्करण और शिल्प निर्माण से जुड़े विभिन्न उपकरणों का प्रदर्शन किया। किसानों और महिलाओं को यह बताया गया कि किस प्रकार साधारण उपकरणों की मदद से बांस से उपयोगी और आकर्षक उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
इस दौरान प्रतिभागियों ने बांस आधारित उद्यमों के बारे में जानकारी प्राप्त की तथा भविष्य में इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाने की संभावनाओं पर भी चर्चा की।
ग्रामीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में केवल राहत और पुनर्वास योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ऐसी आजीविका आधारित पहलें भी जरूरी हैं जो लोगों को आत्मनिर्भर बना सकें। बांस खेती और उससे जुड़े उद्योग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम ने किसानों को आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक खेती और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों से परिचित कराया। इससे न केवल बाढ़ प्रभावित किसानों में नई उम्मीद जगी है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।
कार्यक्रम में सागर कुमार, सुनील राव, तारा चंद कुशवाहा, मोहन कुशवाहा सहित अनेक किसान और ग्रामीण प्रतिनिधि उपस्थित रहे। विशेषज्ञों ने विश्वास जताया कि आने वाले समय में बांस आधारित खेती और उद्यमिता इस क्षेत्र के किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का माध्यम बनेगी।








