पुण्यतिथि

पृथ्वीराज कपूर: रंगमंच का सम्राट, जिसने भारतीय सिनेमा को विरासत दी, लेकिन जिसकी सबसे बड़ी कहानी बहुत कम लोग जानते हैं

पुण्यतिथि

नयन ज्योति की विशेष रिपोर्ट

भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी महान हस्तियों का नाम लिया जाता है, तो सबसे पहले जिन नामों का स्मरण होता है उनमें पृथ्वीराज कपूर का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें केवल अभिनेता कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे अभिनेता, रंगकर्मी, थिएटर आंदोलन के अग्रदूत, सामाजिक चिंतक और भारतीय फिल्म उद्योग के ऐसे स्तंभ थे जिनकी नींव पर आगे चलकर कपूर खानदान की कई पीढ़ियों ने सफलता के शिखर छुए।

29 मई 1972 को पृथ्वीराज कपूर का निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि पर अक्सर लोग उनकी फिल्मों, थिएटर और कपूर परिवार की विरासत की चर्चा करते हैं। लेकिन उनके जीवन से जुड़ा एक ऐसा तथ्य है, जिसे आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। यह तथ्य न केवल उनके व्यक्तित्व की गहराई को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि वे केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि अपने समय के एक असाधारण राष्ट्रनिर्माता भी थे।

वह तथ्य जिसे बहुत कम लोग जानते हैं

बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि पृथ्वीराज कपूर स्वतंत्र भारत के पहले वर्षों में संसद के सदस्य भी रहे थे और उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी अपनी कला और सामाजिक प्रतिबद्धताओं को कभी नहीं छोड़ा।

उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। उस समय सरकार चाहती थी कि कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े प्रतिष्ठित लोग संसद में पहुंचकर देश के सांस्कृतिक विकास की दिशा तय करें। पृथ्वीराज कपूर ने इस जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया।

लेकिन इससे भी अधिक रोचक बात यह है कि राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद वे अपने थिएटर समूह “पृथ्वी थिएटर्स” के साथ लगातार देशभर में यात्राएं करते रहे। कई बार ऐसा होता था कि दिन में संसद की कार्यवाही में भाग लेते और रात में मंच पर अभिनय करते थे। आज के समय में शायद ही कोई सांसद इस प्रकार कला और जनसेवा दोनों क्षेत्रों में समान सक्रियता दिखाता हो।

पेशावर से मुंबई तक का सफर

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पेशावर में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में स्थित है। उनके पिता दीवान बशेश्वरनाथ कपूर प्रशासनिक सेवा में कार्यरत थे। परिवार शिक्षित और प्रतिष्ठित था। प्रारंभिक शिक्षा पेशावर में हुई। बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई भी शुरू की, लेकिन उनका मन अभिनय और रंगमंच की ओर अधिक आकर्षित था।

उस समय अभिनय को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। समाज के संभ्रांत परिवार अपने बच्चों को फिल्मों में जाने की अनुमति नहीं देते थे। इसके बावजूद पृथ्वीराज कपूर ने अपने सपनों का पीछा किया।

सिर्फ कुछ रुपये जेब में लेकर वे मुंबई पहुंचे। वहां उन्हें संघर्षों का लंबा दौर देखना पड़ा। कई दिनों तक उन्हें छोटे-छोटे रोल करने पड़े। कभी भीड़ का हिस्सा बने, कभी मूक फिल्मों में छोटे पात्र निभाए। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि जल्द ही लोग उनकी ओर आकर्षित होने लगे।

मूक फिल्मों से बोलती फिल्मों तक

पृथ्वीराज कपूर ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत मूक फिल्मों से की थी। जब भारतीय सिनेमा में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ तो उनकी गहरी और प्रभावशाली आवाज उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। उनकी ऊंची कद-काठी, प्रभावशाली चेहरा और दमदार संवाद अदायगी उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती थी।

1931 में आई फिल्म आलम आरा भारतीय सिनेमा की पहली टॉकी फिल्म थी। यद्यपि उसमें उनकी भूमिका सीमित थी, लेकिन यह भारतीय फिल्म इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय था।

‘सिकंदर’ ने बनाया राष्ट्रीय पहचान का सितारा

1941 में आई फिल्म सिकंदर पृथ्वीराज कपूर के करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने सिकंदर महान का किरदार निभाया। उनकी दमदार प्रस्तुति ने पूरे देश में उन्हें लोकप्रिय बना दिया।

ब्रिटिश शासन के दौरान यह फिल्म भारतीयों में आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना जगाने वाली मानी गई। कई इतिहासकारों का मानना है कि फिल्म के कुछ संवादों ने स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थकों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित किया।

पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना: एक सांस्कृतिक क्रांति

1944 में उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना की। यही वह निर्णय था जिसने उन्हें केवल अभिनेता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आंदोलन का नेता बना दिया। उस दौर में थिएटर आर्थिक रूप से लाभदायक नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने अपना अधिकांश धन और समय थिएटर को समर्पित कर दिया। पृथ्वी थिएटर्स का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था। यह सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता का माध्यम भी था।

देशभर में घूमता था उनका थिएटर

बहुत कम लोग जानते हैं कि पृथ्वी थिएटर्स के कलाकार ट्रेन, बस और ट्रकों से पूरे देश में घूमते थे। एक समय ऐसा था जब यह थिएटर समूह साल में लगभग 250 से अधिक शो करता था। कई छोटे शहरों और कस्बों में पहली बार पेशेवर रंगमंच पहुंचाने का श्रेय पृथ्वीराज कपूर को जाता है। उनका मानना था कि कला केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

निजी जीवन का बड़ा दुख

लोग कपूर परिवार की सफलता को देखते हैं, लेकिन पृथ्वीराज कपूर का जीवन अनेक दुखों से भी भरा रहा। उनके सबसे बड़े पुत्र का बचपन में निधन हो गया था। इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बावजूद उन्होंने अपने परिवार और कला के प्रति जिम्मेदारियों को निभाना जारी रखा। उनका मानना था कि कलाकार का जीवन केवल निजी भावनाओं तक सीमित नहीं होता; उसे समाज के लिए भी जीना पड़ता है।

राज कपूर के गुरु थे पृथ्वीराज कपूर

अक्सर लोग राज कपूर को महान फिल्मकार के रूप में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके पहले गुरु स्वयं उनके पिता थे। पृथ्वीराज कपूर अपने बच्चों को अभिनय की बारीकियां सिखाने में अत्यंत अनुशासित थे। वे परिवार के किसी सदस्य को विशेष छूट नहीं देते थे। राज कपूर को भी शुरुआती दिनों में स्टूडियो में साधारण कर्मचारियों की तरह काम करना पड़ा।

जब आर्थिक संकट में आ गया पृथ्वी थिएटर्स

थिएटर के प्रति प्रेम के कारण पृथ्वीराज कपूर ने कई बार आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया। फिल्मों से जो कमाई होती, उसका बड़ा हिस्सा थिएटर पर खर्च हो जाता। कई अवसरों पर मित्रों ने उन्हें थिएटर बंद करने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया। उनका कहना था कि यदि थिएटर समाप्त हो गया तो भारतीय अभिनय कला की आत्मा कमजोर पड़ जाएगी।

मुगल-ए-आजम में अमर अभिनय

1960 में रिलीज हुई मुगल-ए-आजम में उन्होंने सम्राट अकबर की भूमिका निभाई। आज भी इस भूमिका को भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनय प्रदर्शनों में गिना जाता है। उनकी आवाज, व्यक्तित्व और संवाद अदायगी ने अकबर के चरित्र को अमर बना दिया। दिलचस्प बात यह है कि कई संवादों की प्रस्तुति उन्होंने अपने थिएटर अनुभव के आधार पर विकसित की थी।

कला के लिए सम्मान, धन के लिए नहीं

पृथ्वीराज कपूर का एक सिद्धांत था कि कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका सम्मान है। उन्होंने कई बार ऐसे प्रोजेक्ट अस्वीकार किए जिनमें अच्छा पैसा था लेकिन कलात्मक गुणवत्ता नहीं थी। आज के व्यावसायिक दौर में यह दृष्टिकोण दुर्लभ माना जाता है।

पद्म भूषण और राष्ट्रीय सम्मान

भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। उनके निधन के बाद उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी नवाजा गया। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि उनका योगदान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं था।

अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे

जीवन के अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ गई थीं, लेकिन उन्होंने कला से दूरी नहीं बनाई। वे कलाकारों से मिलते, नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करते और थिएटर के भविष्य पर चर्चा करते रहते थे। 29 मई 1972 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय रंगमंच और सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।

पृथ्वीराज कपूर की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

यदि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि पूछी जाए तो उत्तर केवल उनकी फिल्मों में नहीं मिलेगा। उनकी सबसे बड़ी विरासत वह सांस्कृतिक सोच है जिसमें कला को राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना गया। उन्होंने साबित किया कि कलाकार केवल मनोरंजनकर्ता नहीं होता, वह समाज का मार्गदर्शक भी हो सकता है।

पृथ्वीराज कपूर की पुण्यतिथि केवल एक महान अभिनेता को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस विचार को याद करने का भी दिन है जिसने भारतीय रंगमंच और सिनेमा को नई दिशा दी।

बहुत कम लोग जानते हैं कि राज्यसभा सदस्य रहते हुए भी वे देशभर में थिएटर करते रहे, कला और सार्वजनिक जीवन दोनों में समान समर्पण दिखाते रहे। यही तथ्य उन्हें अपने समय के अन्य कलाकारों से अलग बनाता है।

आज जब भारतीय सिनेमा विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है, तब यह याद रखना आवश्यक है कि इसकी मजबूत नींव रखने वालों में पृथ्वीराज कपूर का स्थान सबसे अग्रणी स्तंभों में है। उनकी आवाज भले आज मौन हो चुकी हो, लेकिन भारतीय रंगमंच, सिनेमा और संस्कृति में उनकी गूंज हमेशा सुनाई देती रहेगी।

FAQ: क्लिक करें और उत्तर पढ़ें

पृथ्वीराज कपूर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पेशावर में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में स्थित है।

पृथ्वीराज कपूर से जुड़ा कम ज्ञात तथ्य क्या है?

बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि पृथ्वीराज कपूर स्वतंत्र भारत के पहले वर्षों में संसद के सदस्य भी रहे थे और उन्होंने राजनीति में रहते हुए भी अपनी कला और सामाजिक प्रतिबद्धताओं को कभी नहीं छोड़ा।

पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना कब हुई थी?

1944 में उन्होंने पृथ्वी थिएटर्स की स्थापना की। यही वह निर्णय था जिसने उन्हें केवल अभिनेता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आंदोलन का नेता बना दिया।

पृथ्वीराज कपूर की सबसे बड़ी विरासत क्या मानी जाती है?

उनकी सबसे बड़ी विरासत वह सांस्कृतिक सोच है जिसमें कला को राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना गया। उन्होंने साबित किया कि कलाकार केवल मनोरंजनकर्ता नहीं होता, वह समाज का मार्गदर्शक भी हो सकता है।

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