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बांदा क्यों बनता जा रहा ‘तंदूर’? नदियों के सीने से मौरंग, पहाड़ों पर ब्लास्टिंग और गायब होते पेड़ों ने बढ़ाई बुंदेलखंड की तपिश

संजय सिंह राणा और संतोष कुमार सोनी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र इन दिनों भीषण गर्मी की मार झेल रहा है, लेकिन बांदा जिले की स्थिति सबसे अधिक भयावह होती जा रही है। कभी केन और यमुना जैसी नदियों के कारण प्राकृतिक संतुलन और जल संपदा के लिए पहचाना जाने वाला बांदा आज देश के सबसे गर्म जिलों में गिना जाने लगा है। हालात यह हैं कि जिले का तापमान 47 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच चुका है और दोपहर में सड़कें भट्ठी की तरह तपने लगी हैं।

मौसम विशेषज्ञ इसे केवल जलवायु परिवर्तन का असर मानने को तैयार नहीं हैं। स्थानीय जानकारों और पर्यावरण से जुड़े लोगों का कहना है कि बांदा में बढ़ती गर्मी के पीछे इंसानी हस्तक्षेप और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन सबसे बड़ा कारण बन चुका है। पेड़ों की लगातार कमी, नदियों से बेहिसाब मौरंग खनन, पहाड़ों की अवैध कटाई और खेतों का महीनों खाली पड़े रहना जिले को धीरे-धीरे “तंदूर” में बदल रहा है।

तापमान बढ़ने के पीछे छिपी असली वजह

गर्मी बढ़ना एक वैश्विक समस्या है, लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर बांदा ही बार-बार देश के सबसे गर्म जिलों में क्यों शामिल हो रहा है? मौसम विज्ञानियों और पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो इसके पीछे तीन प्रमुख कारण हैं—पहला, हरियाली का तेजी से खत्म होना; दूसरा, नदियों और पहाड़ों का अवैध दोहन; और तीसरा, गर्मी के मौसम में खेतों का खाली छोड़ दिया जाना।

बांदा का भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 4408 वर्ग किलोमीटर है। यहां की जलवायु उपोष्णकटिबंधीय मानी जाती है, जहां गर्मियां बेहद तीखी और सर्दियां कड़ाके की होती हैं। मई और जून में यहां का तापमान कई बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड के करीब पहुंच जाता है। बीते दिनों जिले का तापमान लगातार बढ़ता गया। शनिवार को 44.8 डिग्री, रविवार को 46.4 डिग्री और सोमवार को 46.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह स्थिति केवल इंसानों के लिए ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों और जल स्रोतों के लिए भी गंभीर संकट बन चुकी है।

करोड़ों पौधे कागजों में, जमीन पर सूखा सच

हर वर्ष वन विभाग जिले में 60 से 70 लाख पौधे लगाने का दावा करता है। बड़े-बड़े अभियान चलाए जाते हैं, जनप्रतिनिधियों के हाथों पौधरोपण कराया जाता है और तस्वीरें भी खूब खिंचती हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद इन पौधों का अस्तित्व कहीं नजर नहीं आता।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि पौधरोपण अधिकतर कागजों तक सीमित रह जाता है। जिन क्षेत्रों में कभी घने पेड़ हुआ करते थे, वहां अब सूखी जमीन और पत्थर दिखाई देते हैं। हरियाली खत्म होने से जमीन की नमी कम होती जा रही है और सूरज की गर्मी सीधे धरती को झुलसा रही है। इसका सीधा असर तापमान पर पड़ रहा है।

नदियों का सीना चीर रहा मौरंग खनन

बांदा की पहचान कभी केन, यमुना, बागेन और चंद्रावल जैसी नदियों से होती थी। इन नदियों ने पूरे बुंदेलखंड को जीवन दिया, लेकिन अब इन्हीं नदियों का अस्तित्व खनन माफियाओं के कारण संकट में पड़ गया है।

जिले में करीब 26 वैध मौरंग खदानें संचालित हैं, लेकिन इसके अलावा बड़ी संख्या में अवैध खनन भी जारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि रात-दिन लिफ्टर मशीनों के जरिए नदी के भीतर से मौरंग निकाली जाती है। कई जगहों पर एनजीटी के नियमों को पूरी तरह दरकिनार कर नदी की धारा तक को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

खनन के कारण नदियों का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। जहां पहले पानी दिखाई देता था, वहां अब चट्टानें और सूखी सतह नजर आने लगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पानी कम होने और पत्थरों के ज्यादा गर्म होने से आसपास का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। यही कारण है कि बांदा में गर्मी का असर सामान्य से कहीं अधिक महसूस किया जा रहा है।

अवैध ब्लास्टिंग से टूट रहे पहाड़

मौरंग खनन के साथ-साथ जिले में पत्थर और गिट्टी का कारोबार भी तेजी से फैल रहा है। नरैनी और गिरवां क्षेत्र में कई क्रेशर संचालित हैं, जहां पहाड़ों को ब्लास्टिंग कर तोड़ा जा रहा है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि दिन-रात होने वाली धमाकेदार ब्लास्टिंग से न केवल पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, बल्कि आसपास के गांवों में रहने वाले लोग भी परेशान हैं। कई बार प्रशासन से शिकायतें की गईं, लेकिन प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ प्राकृतिक तापमान संतुलन बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। जब इन्हें लगातार काटा और तोड़ा जाता है तो इलाके की गर्मी बढ़ने लगती है। बांदा में यही स्थिति अब भयावह रूप ले चुकी है।

डीएम ने लगाया था करोड़ों का जुर्माना

बीते दिनों तत्कालीन जिलाधिकारी जे. रीभा ने निर्धारित क्षेत्रफल से अधिक खनन करने वाली कई खदानों पर करीब एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। इससे यह साफ हो गया कि जिले में मानकों से अधिक खनन हो रहा है।

हालांकि जानकारों का कहना है कि केवल जुर्माना लगाने से समस्या खत्म नहीं होगी। जब तक अवैध खनन और पर्यावरण विनाश पर सख्ती से रोक नहीं लगेगी, तब तक बांदा की जलवायु और अधिक खतरनाक होती जाएगी।

खाली खेत भी बढ़ा रहे गर्मी

बांदा का अधिकांश किसान परंपरागत खेती पर निर्भर है। किसान नवंबर-दिसंबर में गेहूं, चना, अरहर और मटर जैसी फसलों की बुवाई करते हैं और मार्च-अप्रैल में कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं।

गर्मी के दिनों में जब तेज धूप इन खाली खेतों पर पड़ती है तो जमीन तेजी से गर्म होती है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि इन खेतों में दूसरी फसलें या हरियाली बनी रहे तो जमीन का तापमान कम रहेगा और वातावरण में नमी बनी रहेगी। लेकिन सूखे और खाली खेत गर्म हवाओं को और तेज बना रहे हैं।

इंसानी लालच ने बिगाड़ा प्राकृतिक संतुलन

बांदा की मौजूदा स्थिति केवल मौसम की मार नहीं है, बल्कि यह विकास और पर्यावरण के बीच असंतुलन का परिणाम भी है। नदियों से मौरंग निकालने, पहाड़ तोड़ने और जंगल खत्म करने की कीमत अब पूरा जिला चुकाने को मजबूर है।

आज हालत यह है कि तीन बड़ी नदियों वाला जिला पानी और हरियाली के बावजूद भीषण गर्मी से बेहाल है। लोग दोपहर में घरों से निकलने से बच रहे हैं। पशु-पक्षी प्यास और गर्म हवाओं से परेशान हैं।

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते पर्यावरण संरक्षण की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में बांदा की स्थिति और अधिक खतरनाक हो सकती है। जरूरत इस बात की है कि खनन पर नियंत्रण, वास्तविक वृक्षारोपण और जल संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए, ताकि बुंदेलखंड का यह जिला फिर से संतुलित पर्यावरण की ओर लौट सके।

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