अपराध

महिलाओं के खिलाफ अपराध : आंकड़ों की हकीकत, कानूनों की चुनौती और सुरक्षा का अधूरा सफर

चुन्नीलाल प्रधान की रिपोर्ट

भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस कोई नई नहीं है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की वर्ष 2023 की रिपोर्ट ने एक बार फिर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट बताती है कि देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं अभी भी चिंताजनक स्तर पर बनी हुई हैं। सरकारें बदलती रहीं, कानून सख्त होते गए, न्यायिक प्रक्रियाओं में सुधार के दावे किए गए और सुरक्षा योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन आंकड़े यह संकेत देते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आ सके हैं।

वर्ष 2023 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,48,211 अपराध दर्ज किए गए। यह संख्या वर्ष 2022 के 4,45,256 मामलों और वर्ष 2021 के 4,28,278 मामलों से अधिक है। हालांकि वृद्धि बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि अपराधों का ग्राफ नीचे आने के बजाय लगातार ऊंचा बना हुआ है।

अपराध के आंकड़े क्या कहते हैं?

NCRB रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध की राष्ट्रीय दर प्रति एक लाख महिला आबादी पर 66.2 रही। यह दर्शाता है कि महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न अभी भी देश की सबसे बड़ी सामाजिक और कानूनी चुनौतियों में से एक है।

रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के साथ बलात्कार के 31,982 मामले दर्ज किए गए। वहीं महिलाओं की शील भंग करने के इरादे से हमले के 83,891 मामले दर्ज हुए। ये आंकड़े केवल दर्ज मामलों को दर्शाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा, पुलिस तक पहुंच की कमी और न्यायिक प्रक्रिया के डर के कारण बड़ी संख्या में मामले आज भी दर्ज नहीं हो पाते। यही कारण है कि वास्तविक स्थिति NCRB के आंकड़ों से कहीं अधिक गंभीर मानी जाती है।

किन राज्यों में सबसे अधिक बलात्कार के मामले?

रिपोर्ट के अनुसार बलात्कार के मामलों में महाराष्ट्र सबसे ऊपर रहा, जहां 3,970 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद मध्य प्रदेश में 3,619, तमिलनाडु में 2,999, दिल्ली में 2,278 और बिहार में 1,818 मामले सामने आए।

हालांकि केवल कुल संख्या के आधार पर किसी राज्य की कानून व्यवस्था का अंतिम मूल्यांकन करना उचित नहीं माना जाता, क्योंकि आबादी, रिपोर्टिंग की प्रवृत्ति और अपराध दर्ज करने की प्रशासनिक व्यवस्था भी आंकड़ों को प्रभावित करती है। फिर भी ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध देश के लगभग हर हिस्से में बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा महिला अपराध

महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश देश में सबसे ऊपर रहा। NCRB के अनुसार वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ 66,381 अपराध दर्ज किए गए। इसके बाद महाराष्ट्र में 47,101, राजस्थान में 45,450, पश्चिम बंगाल में 34,691 और मध्य प्रदेश में 32,342 मामले दर्ज हुए।

उत्तर प्रदेश की बड़ी आबादी निश्चित रूप से इन आंकड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बड़ी संख्या सामाजिक सुरक्षा तंत्र, महिला जागरूकता और कानून व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

क्या केवल आंकड़े बढ़े हैं या रिपोर्टिंग भी?

अपराध विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं द्वारा शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति बढ़ी है। सोशल मीडिया, महिला हेल्पलाइन, महिला पुलिस थाने और जागरूकता अभियानों के कारण अब कई महिलाएं चुप रहने के बजाय कानूनी कार्रवाई का रास्ता चुन रही हैं।

इसलिए दर्ज मामलों में वृद्धि का एक कारण बेहतर रिपोर्टिंग भी माना जा सकता है। लेकिन यह तर्क पूरी तस्वीर नहीं बताता। यदि रिपोर्टिंग बढ़ी है तो इसका अर्थ यह भी है कि समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराध अभी भी बड़े पैमाने पर हो रहे हैं।

UPA काल बनाम NDA काल: आंकड़ों की राजनीतिक व्याख्या

महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर राजनीतिक दल अक्सर एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 में बलात्कार के 16,075 मामले दर्ज हुए थे। उस समय अपराध दर अपेक्षाकृत कम थी। वर्ष 2014 तक यह संख्या बढ़कर 36,735 पहुंच गई। यानी एक दशक में बलात्कार के मामलों में लगभग 128 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।

इन आंकड़ों का उपयोग विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने पक्ष में करते हैं। हालांकि अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकार बदलने से अपराध की प्रवृत्ति का सीधा संबंध स्थापित करना कठिन है। सामाजिक परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि, शिकायत दर्ज कराने की संस्कृति और कानूनों में बदलाव भी इन आंकड़ों को प्रभावित करते हैं। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि किसी भी सरकार के कार्यकाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सके।

निर्भया के बाद बदली कानूनी व्यवस्था

वर्ष 2012 की निर्भया घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इसके बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर व्यापक कानूनी सुधार किए गए।

वर्ष 2018 में आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम लागू किया गया। इसके तहत 12 वर्ष से कम आयु की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया। गैंगरेप मामलों में सजा को और कठोर बनाया गया। सरकार का दावा है कि कठोर कानूनों ने अपराधियों के मन में भय पैदा किया है और सजा की दर में भी वृद्धि हुई है। हालांकि कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कठोर दंड पर्याप्त नहीं है। अपराध रोकने के लिए गिरफ्तारी, जांच और त्वरित न्याय की पूरी श्रृंखला का प्रभावी होना आवश्यक है।

निर्भया फंड: कितना सफल, कितना अधूरा?

महिलाओं की सुरक्षा के लिए निर्भया फंड को सबसे बड़ी योजनाओं में से एक माना जाता है। वर्ष 2014 से 2023 के बीच इस फंड के लिए सात हजार करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया गया।

इसी फंड के माध्यम से देशभर में वन स्टॉप सेंटर यानी “सखी केंद्र” स्थापित किए गए। यहां महिला पीड़ितों को चिकित्सा सहायता, कानूनी मदद और मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा महिला हेल्पलाइन 181, सीसीटीवी निगरानी, महिला पुलिस बूथ और अन्य सुरक्षा उपायों का विस्तार किया गया।

फिर भी कई राज्यों में इन योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाओं की कमी और कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

फास्ट ट्रैक कोर्ट: क्या न्याय अब तेज हुआ?

महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराधों की सुनवाई तेज करने के लिए वर्ष 2019 में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स की स्थापना शुरू की गई।

वर्ष 2023 तक देश में 700 से अधिक ऐसी अदालतें स्थापित की जा चुकी थीं। उद्देश्य था कि बलात्कार और POCSO मामलों का निपटारा कम समय में हो सके। हालांकि जमीनी स्तर पर अभी भी लाखों मामले लंबित हैं। कई राज्यों में न्यायाधीशों की कमी, फोरेंसिक रिपोर्ट में देरी और गवाहों के मुकर जाने जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इसलिए केवल अदालतों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

सामाजिक मानसिकता सबसे बड़ी चुनौती

महिलाओं के खिलाफ अपराध केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं है। यह सामाजिक सोच, लैंगिक असमानता और महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक परिवार, विद्यालय और समाज स्तर पर महिलाओं के सम्मान और समानता की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक केवल कानून अपराधों को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाएंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महानगरों तक महिलाओं को आज भी छेड़छाड़, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और ऑनलाइन अपराधों का सामना करना पड़ रहा है।

आगे का रास्ता क्या है?

NCRB की 2023 रिपोर्ट एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि महिलाओं के खिलाफ अपराध अब भी व्यापक हैं। अवसर इसलिए कि अब हमारे पास समस्या को समझने के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध हैं।

जरूरत है कि पुलिस तंत्र को अधिक संवेदनशील बनाया जाए, जांच की गुणवत्ता सुधारी जाए, फोरेंसिक ढांचे को मजबूत किया जाए और अदालतों में लंबित मामलों का तेजी से निपटारा हो।

साथ ही विद्यालयों में लैंगिक समानता की शिक्षा, डिजिटल सुरक्षा जागरूकता और महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।

NCRB की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। कानूनों को सख्त बनाने, फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना, निर्भया फंड और विभिन्न सुरक्षा योजनाओं के बावजूद अपराध पूरी तरह नियंत्रित नहीं हो सके हैं।

महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन लाखों परिवारों की पीड़ा की कहानी हैं जो न्याय, सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद में व्यवस्था की ओर देखते हैं। जब तक कानून, प्रशासन और समाज मिलकर इस चुनौती का सामना नहीं करेंगे, तब तक महिला सुरक्षा का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।

महिलाओं के खिलाफ अपराध: 5 जरूरी सवाल-जवाब

1. NCRB 2023 रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ कितने अपराध दर्ज हुए?

NCRB 2023 रिपोर्ट के अनुसार देशभर में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,48,211 अपराध दर्ज किए गए, जो 2022 और 2021 के आंकड़ों से अधिक हैं।

2. 2023 में बलात्कार के कितने मामले सामने आए?

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में महिलाओं के साथ बलात्कार के 31,982 मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।

3. महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कौन सा राज्य सबसे ऊपर रहा?

महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर रहा, जहां 2023 में 66,381 मामले दर्ज किए गए।

4. महिला सुरक्षा के लिए सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए?

महिला सुरक्षा के लिए आपराधिक कानून संशोधन, निर्भया फंड, वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन 181 और फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट जैसे कदम उठाए गए हैं।

5. क्या केवल कानून सख्त करने से महिला अपराध रुक सकते हैं?

केवल कानून सख्त करना पर्याप्त नहीं है। पुलिस जांच, त्वरित न्याय, सामाजिक जागरूकता, लैंगिक समानता और महिलाओं के प्रति सम्मानजनक सोच भी जरूरी है।

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