16 अक्टूबर 2026 7:07 अपराह्न

सादगी से सिनेमा रचने वाले ‘ऋषि दा’, जिनकी फिल्मों में धड़कती थी आम आदमी की जिंदगी

ऋषिकेश मुखर्जी जन्मदिवस पर उनकी फिल्मों और कलाकारों के साथ फीचर इमेज, रिपोर्टर रजनी वर्मा

सुनने के लिए यहां क्लिक करें

The specified slider id does not exist.

रजनी वर्मा की रिपोर्ट

30 सितंबर का दिन हिंदी सिनेमा के उन फिल्मकारों को याद करने का अवसर है, जिन्होंने फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि आम आदमी की जिंदगी, उसके रिश्तों, उसकी परेशानियों और उसकी छोटी-छोटी खुशियों को पर्दे पर बेहद सहजता से उतारा। इन्हीं फिल्मकारों में एक बड़ा नाम था ऋषिकेश मुखर्जी, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री प्यार से ‘ऋषि दा’ कहती थी।

आज अगर हिंदी सिनेमा की उन फिल्मों की बात की जाए, जिन्हें देखकर दर्शक अपने आसपास के लोगों, अपने घर और अपनी जिंदगी को पर्दे पर महसूस कर सके, तो ऋषिकेश मुखर्जी का नाम सबसे पहले याद आता है। उन्होंने नायक को हमेशा असाधारण बनाने की कोशिश नहीं की। उनके नायक-नायिका अक्सर हमारे बीच के लोग थे। वे नौकरी करते थे, परिवार चलाते थे, प्रेम करते थे, नाराज होते थे, हंसते थे और कभी-कभी जिंदगी की कठिन परिस्थितियों से जूझते भी थे।

लेकिन ‘ऋषि दा’ की सरलता के पीछे काम के प्रति जबरदस्त अनुशासन था। इसका एक चर्चित उदाहरण फिल्म ‘नमक हराम’ की शूटिंग से जुड़ा है।

जब अमिताभ और राजेश खन्ना फोन में व्यस्त हो गए

साल 1973 के आसपास फिल्म ‘नमक हराम’ की शूटिंग चल रही थी। सेट पर एक गाने की शूटिंग हो रही थी। सामने उस दौर के दो बड़े सितारे—अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना—मौजूद थे। लेकिन शूटिंग के बीच दोनों फोन पर बातचीत में व्यस्त हो गए।

ऋषिकेश मुखर्जी को जब इसका पता चला तो उन्होंने दोनों को बुलाया। दोनों सामने बैठे तो ऋषि दा ने नाराजगी जाहिर करते हुए पूछा—यहां काम करने आए हो या फोन करने?

इसके बाद उन्होंने चौकीदार को बुलाया और स्टूडियो का गेट बंद करा दिया। साफ निर्देश था कि जब तक गाने की शूटिंग पूरी नहीं होगी, कोई बाहर नहीं जाएगा।

रात करीब साढ़े 12 बजे तक शूटिंग चलती रही। न कोई बाहर गया और न किसी को अंदर आने दिया गया। यह घटना बताती है कि ऋषिकेश मुखर्जी के लिए सितारे कितने भी बड़े क्यों न हों, शूटिंग के समय काम सबसे ऊपर था।

उनकी यही कार्यशैली शायद उनके सिनेमा की पहचान भी बनी—कम दिखावा, अधिक अनुशासन और कहानी के प्रति पूरी निष्ठा।

गणित और विज्ञान पढ़ाने से शुरू हुआ सफर

ऋषिकेश मुखर्जी का जन्म 30 सितंबर 1922 को तत्कालीन कलकत्ता में हुआ था। उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में स्नातक की पढ़ाई की। फिल्मों की दुनिया में आने से पहले उन्होंने कुछ समय तक गणित और विज्ञान भी पढ़ाया।

फिल्मों के प्रति उनका झुकाव उन्हें कलकत्ता के मशहूर न्यू थिएटर्स तक ले गया। वहां उन्होंने कैमरा और एडिटिंग के काम को करीब से समझा। यह अनुभव आगे चलकर उनके फिल्मी नजरिए की महत्वपूर्ण नींव बना।

1951 में वे मुंबई पहुंचे और महान फिल्मकार बिमल रॉय के साथ फिल्म एडिटर तथा असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम करने लगे। बिमल रॉय से उन्हें केवल तकनीकी ज्ञान ही नहीं मिला, बल्कि कहानी और चरित्र को मानवीय दृष्टि से देखने की समझ भी विकसित हुई।

पहली फिल्म असफल, दूसरी ने दिलाई पहचान

ऋषिकेश मुखर्जी ने 1957 में ‘मुसाफिर’ से बतौर निर्देशक अपना सफर शुरू किया। फिल्म अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी। लेकिन असफलता ने ऋषि दा को रोका नहीं।

1959 में उनकी फिल्म ‘अनाड़ी’ आई और इसी फिल्म ने उन्हें पहचान दिलाई। फिल्म को पांच फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। ऋषिकेश मुखर्जी स्वयं भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक की दौड़ में थे, लेकिन यह पुरस्कार उनके गुरु बिमल रॉय को ‘सुजाता’ के लिए मिला।

इसके बाद ऋषिकेश मुखर्जी ने जिस तरह का सिनेमा रचा, उसने हिंदी फिल्मों में एक अलग धारा को मजबूत किया।

आम आदमी की जिंदगी बना उनका सबसे बड़ा विषय

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में बड़े-बड़े सेटों की जरूरत कम थी। उनकी कहानियों को प्रभावी बनाने के लिए हर दृश्य में स्टारडम का प्रदर्शन भी जरूरी नहीं था। वे छोटी घटनाओं में बड़ी मानवीय बात तलाशते थे।

उनके सिनेमा में परिवार था, नौकरी थी, रिश्तों की उलझन थी, प्रेम था, बीमारी थी, दोस्ती थी और सबसे बढ़कर इंसान था।

‘अनुराधा’, ‘छाया’, ‘असली-नकली’, ‘अनुपमा’, ‘आशीर्वाद’, ‘सत्यकाम’, ‘गुड्डी’, ‘आनंद’, ‘बावर्ची’, ‘अभिमान’, ‘नमक हराम’, ‘मिली’, ‘चुपके-चुपके’, ‘गोलमाल’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्मों ने उनके सिनेमा की विविधता को सामने रखा।

उनकी फिल्मों में सामाजिक मुद्दे भी आए, लेकिन प्रस्तुति अक्सर घरेलू और सहज रही। यही कारण है कि उनकी फिल्मों के पात्र दर्शकों को अपने घर, मोहल्ले और आसपास के लोगों जैसे लगते थे।

‘आनंद’ में राजेश खन्ना की जगह पहले किशोर कुमार का नाम

ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे चर्चित फिल्मों में ‘आनंद’ का नाम हमेशा लिया जाता है। राजेश खन्ना का आनंद सहगल आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार पात्रों में शामिल है। मगर इस भूमिका के लिए शुरुआत में किशोर कुमार का नाम सामने आया था।

किशोर कुमार के फिल्म में शामिल न होने को लेकर अलग-अलग किस्से मिलते हैं।

एक किस्सा उनके बेटे अमित कुमार से जुड़ा है। उनके मुताबिक, किशोर कुमार का एक बंगाली इवेंट मैनेजर से पैसों को लेकर विवाद हुआ था और उन्होंने अपने गार्ड को निर्देश दिया था कि किसी बंगाली व्यक्ति को अंदर न आने दिया जाए। इसी दौरान ऋषिकेश मुखर्जी उनके घर पहुंचे। गार्ड ने उन्हें गलतफहमी में रोक दिया और ऋषि दा बिना मुलाकात किए लौट गए।

दूसरा वर्जन गीतकार गुलजार की किताब ‘एक्चुअली… आई मेट देम: ए मेमॉयर’ में मिलता है। इसके मुताबिक किशोर कुमार शायद गंभीर भूमिका निभाने के मूड में नहीं थे। एक दिन वह पूरी तरह गंजे होकर ऋषिकेश मुखर्जी के ऑफिस पहुंचे और उन्हें चिढ़ाते हुए नाचने-गाने लगे। कहा जाता है कि उन्होंने ऋषि दा से पूछा—अब क्या करोगे ऋषि?

कहानी जो भी रही हो, आखिरकार ‘आनंद’ राजेश खन्ना तक पहुंची।

शशि कपूर के बाद राजेश खन्ना बने ‘आनंद’

किशोर कुमार के साथ बात नहीं बनी तो ऋषिकेश मुखर्जी ने शशि कपूर के बारे में सोचा। लेकिन उस समय शशि कपूर के पास फिल्म के लिए जरूरी तारीखें नहीं थीं।

इसी बीच राजेश खन्ना ऋषिकेश मुखर्जी से मिलने पहुंचे। उन्हें पता चला था कि ऋषि दा एक अच्छी कहानी पर फिल्म बनाने जा रहे हैं। उन्होंने कहानी सुनने की इच्छा जताई।

ऋषि दा अपनी फिल्मों की कहानी हर किसी को नहीं सुनाते थे। उन्होंने शर्त रखी कि अगर राजेश खन्ना फिल्म के लिए पर्याप्त और लगातार तारीखें दे सकते हैं, तभी वह कहानी सुनाएंगे।

राजेश खन्ना तैयार हो गए। कहानी सुनी और किरदार उन्हें पसंद आ गया। इस तरह ‘आनंद’ के आनंद सहगल का जन्म हुआ।

बताया जाता है कि राजेश खन्ना ने फिल्म के लिए सामान्य फीस लेने के बजाय मुंबई क्षेत्र के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स लिए थे।

धर्मेंद्र ने शराब पीकर रातभर फोन किया

‘आनंद’ से जुड़ा एक और दिलचस्प किस्सा धर्मेंद्र ने खुद साझा किया था। ऋषिकेश मुखर्जी ने एक फ्लाइट में उन्हें ‘आनंद’ की कहानी सुनाई थी। धर्मेंद्र को लगा कि वह फिल्म का हिस्सा बनने वाले हैं।

लेकिन बाद में जब उन्हें पता चला कि फिल्म राजेश खन्ना के साथ शुरू हो चुकी है, तो वह नाराज हो गए।

धर्मेंद्र के मुताबिक, उन्होंने शराब पीने के बाद रातभर ऋषिकेश मुखर्जी को फोन किया। उनका सवाल था कि जब उन्हें कहानी सुनाई गई थी और भूमिका के बारे में बताया गया था तो फिल्म राजेश खन्ना के साथ क्यों शुरू हुई?

ऋषि दा उन्हें शांत करते हुए कहते रहे—‘धरम, सो जा, सुबह बात करेंगे।’

लेकिन फोन कटते ही धर्मेंद्र फिर फोन कर देते।

इस नाराजगी के बावजूद दोनों के पेशेवर संबंध खराब नहीं हुए। बाद में धर्मेंद्र ने ऋषिकेश मुखर्जी की ‘गुड्डी’ और ‘चुपके-चुपके’ जैसी फिल्मों में काम किया।

‘गुड्डी’ से अमिताभ बच्चन को क्यों हटाया गया?

1971 की फिल्म ‘गुड्डी’ जया भादुड़ी की बतौर मुख्य अभिनेत्री महत्वपूर्ण शुरुआत थी। इस फिल्म से अमिताभ बच्चन से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी सामने आता है।

अमिताभ बच्चन ने बताया था कि उन्हें ‘गुड्डी’ में जया के साथ हीरो बनाया गया था और फिल्म की शूटिंग भी शुरू हो चुकी थी। लेकिन करीब दस दिन बाद ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें फिल्म से हटा दिया।

उस समय ‘गुड्डी’ के साथ ‘आनंद’ पर भी काम चल रहा था। ऋषि दा को उम्मीद थी कि ‘आनंद’ बड़ी फिल्म बनेगी। ‘गुड्डी’ में जया का किरदार धर्मेंद्र का बहुत बड़ा प्रशंसक था।

ऋषिकेश मुखर्जी नहीं चाहते थे कि जया के सामने ऐसा चेहरा हो जिसकी अपनी मजबूत स्टार पहचान बनने लगी हो। उन्हें लगता था कि इससे किरदार की मासूमियत प्रभावित हो सकती है।

बाद में अमिताभ की जगह समित भंजा को फिल्म में लिया गया। ऋषि दा ने अमिताभ से आगे साथ काम करने का भरोसा भी दिया—और यह वादा बाद में ‘आनंद’ और कई दूसरी फिल्मों के जरिए सच हुआ।

‘गोलमाल’ सिर्फ 40 दिनों में बनी

1979 की ‘गोलमाल’ ऋषिकेश मुखर्जी की सबसे लोकप्रिय फिल्मों में गिनी जाती है। अमोल पालेकर, उत्पल दत्त, बिंदिया गोस्वामी और दीना पाठक जैसे कलाकारों वाली इस फिल्म का बड़ा हिस्सा ऋषि दा के बांद्रा स्थित बंगले ‘अनुपमा’ में फिल्माया गया।

घर के अलग-अलग हिस्सों को फिल्म के अलग-अलग स्थानों में बदल दिया गया। हॉल भवानी शंकर के ऑफिस में बदल गया, ड्रॉइंग रूम राम प्रसाद के घर की तरह इस्तेमाल हुआ और गार्डन में पार्टी का दृश्य फिल्माया गया।

सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि फिल्म करीब 40 दिनों में पूरी कर ली गई।

ऋषिकेश मुखर्जी बजट और कलाकारों की तारीखों को लेकर बेहद अनुशासित थे। उनका मानना था कि फिल्म किसी और के पैसे से बन रही है तो निर्माता के संसाधनों की जिम्मेदारी निर्देशक की भी है।

बीमारी ने शरीर को रोका, काम को नहीं

1961 में ऋषिकेश मुखर्जी को गंभीर आर्थराइटिस अटैक आया। बीमारी ने उनकी शारीरिक क्षमता को प्रभावित किया, लेकिन काम के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ।

उन्होंने ‘अनुपमा’ और ‘असली-नकली’ का निर्देशन व्हीलचेयर पर बैठकर किया।

यह प्रसंग ऋषिकेश मुखर्जी के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष सामने लाता है। उनके लिए निर्देशन केवल पेशा नहीं था। वह उनके जीवन का ऐसा हिस्सा था, जिसे परिस्थितियां रोक नहीं सकीं।

अमिताभ और जया की शादी की खबर भी ऋषि दा को मिली

अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी का रिश्ता भी ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों से जुड़ा रहा। दोनों ‘गुड्डी’ के दौरान करीब आए।

अमिताभ ने अपने ब्लॉग में बताया था कि जब उन्होंने और जया ने शादी का फैसला किया तो अपने माता-पिता के बाद जिन लोगों को इसकी जानकारी दी, उनमें ऋषिकेश मुखर्जी भी शामिल थे।

यह रिश्ता बताता है कि ऋषि दा और उनके कलाकारों के बीच संबंध केवल कैमरे और शूटिंग तक सीमित नहीं थे।

राज कपूर और ऋषिकेश मुखर्जी की दोस्ती

ऋषिकेश मुखर्जी और राज कपूर की दोस्ती भी फिल्म इंडस्ट्री के चर्चित रिश्तों में रही। दोनों सोवियत संघ के दौरे के दौरान करीब आए और वहां रात-रातभर शतरंज खेलने की यादें ऋषि दा ने साझा की थीं।

जब ‘मुसाफिर’ असफल हुई और ऋषिकेश मुखर्जी को काम मिलने में मुश्किल आने लगी, तब राज कपूर और देव आनंद ने निर्माता एल.बी. लछमन से उनके लिए अवसर देने की बात की। इसके बाद ऋषि दा को ‘अनाड़ी’ जैसी फिल्म मिली।

राज कपूर की बीमारी के दौरान भी ऋषिकेश मुखर्जी उनके बेहद करीब रहे। एक प्रसंग में राज कपूर ने लंदन में ऋषि दा की तबीयत खराब होने पर उनकी देखभाल की थी।

यही दोस्ती आगे चलकर ‘आनंद’ की भावनात्मक पृष्ठभूमि से भी जुड़ी। कहा जाता है कि राज कपूर के जिंदादिल स्वभाव ने आनंद के चरित्र को आकार देने में प्रेरणा दी, जबकि अमिताभ बच्चन का डॉक्टर भास्कर वाला किरदार ऋषिकेश मुखर्जी के व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है।

बीमारी में भी ‘यस बॉस’ देखते थे

ऋषिकेश मुखर्जी के व्यक्तित्व का एक बेहद भावुक पक्ष अभिनेता राकेश बेदी के संस्मरण में सामने आता है।

राकेश बेदी के मुताबिक, ऋषि दा उनके टीवी शो ‘यस बॉस’ को पसंद करते थे और समय-समय पर फोन कर उसकी तारीफ करते थे। बीमारी के दौरान जब वह बिस्तर पर थे, तब भी टीवी पर शो देखते और राकेश बेदी को फोन करते।

उनके आखिरी दिनों से जुड़ी एक बात राकेश बेदी ने बेहद भावुक होकर साझा की थी। ऋषि दा ने कहा था कि कार्यक्रम रात नौ से साढ़े नौ बजे आता है और वह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें कम से कम उस आधे घंटे तक न उठाया जाए।

यह वाक्य उनके भीतर जीवन और कला के प्रति आखिरी समय तक बने लगाव को दर्शाता है।

सिर्फ फिल्मकार नहीं, संस्थाओं की जिम्मेदारी भी संभाली

ऋषिकेश मुखर्जी ने फिल्म निर्देशन के अलावा भारतीय फिल्म जगत की संस्थागत जिम्मेदारियां भी निभाईं। वे केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) के अध्यक्ष रहे और नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NFDC) से भी जुड़े रहे।

इससे स्पष्ट होता है कि उनका योगदान केवल फिल्मों के निर्देशन तक सीमित नहीं था। वह भारतीय सिनेमा के विकास और उसकी संस्थागत व्यवस्था से भी जुड़े रहे।

चार दशक से ज्यादा का सफर और 42 फिल्मों की विरासत

ऋषिकेश मुखर्जी ने चार दशक से अधिक लंबे करियर में करीब 42 फिल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने हिंदी सिनेमा को यह दिखाया कि किसी कहानी को बड़ा बनाने के लिए हमेशा बड़ा बजट, भव्य सेट या चकाचौंध जरूरी नहीं होती।

एक साधारण घर, कुछ रिश्ते, थोड़े से संवाद और जीवन की सच्ची परिस्थितियां भी दर्शकों के दिल में लंबे समय तक जगह बना सकती हैं।

उनकी फिल्मों में हंसी थी तो उसके पीछे संवेदना भी थी। दुख था तो उसके भीतर उम्मीद भी थी। बीमारी थी तो जीवन के प्रति जिजीविषा भी थी। परिवार था तो उसकी खटास-मीठास भी थी।

यही कारण है कि ‘आनंद’, ‘बावर्ची’, ‘चुपके-चुपके’, ‘गोलमाल’, ‘अभिमान’ और ‘खूबसूरत’ जैसी फिल्में अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों से संवाद करती रही हैं।

27 अगस्त 2006 को मुंबई में 83 वर्ष की उम्र में ऋषिकेश मुखर्जी का निधन हुआ। लेकिन उनका सिनेमा आज भी जीवित है।

ऋषि दा की सबसे बड़ी खूबी शायद यही थी कि उन्होंने फिल्मों में असाधारण बनने की कोशिश नहीं की। उन्होंने साधारण जीवन को ही असाधारण संवेदना के साथ पर्दे पर उतारा।

आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें याद करना सिर्फ एक महान निर्देशक को याद करना नहीं है। यह उस दौर के सिनेमा को याद करना भी है, जिसमें कहानी सितारों से बड़ी होती थी और इंसान कहानी का केंद्र।

ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा हमें बार-बार यही एहसास कराता है कि जिंदगी बहुत बड़ी चीजों से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी मानवीय घटनाओं से बनती है। शायद इसी वजह से ऋषि दा की फिल्में पुरानी होकर भी पुरानी नहीं लगतीं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Read More

Cricket Live Score

Rashifal

और पढ़ें