मधुबनी। मिथिला की धरती केवल अपनी चित्रकला, लोकगीतों, नाट्य परंपराओं और साहित्यिक विरासत के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यहां की सांस्कृतिक चेतना ने समय-समय पर समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी किया है। इसी सांस्कृतिक परंपरा के बीच भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा), बिहार का 17वां राज्य सम्मेलन सह सांस्कृतिक समारोह आगामी 25, 26 और 27 दिसंबर 2026 को मधुबनी में आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन की तैयारियों को लेकर क्रिएटिव पब्लिक स्कूल, मधुबनी में आयोजित महत्वपूर्ण बैठक में आयोजन की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा की गई और स्वागत समिति का गठन किया गया।
मधुबनी में होने जा रहा यह आयोजन केवल संगठनात्मक सम्मेलन भर नहीं होगा, बल्कि रंगमंच, साहित्य, लोककला, संगीत और सामाजिक सरोकारों के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण अवसर बनने की दिशा में बढ़ रहा है। इप्टा की परंपरा में कला को समाज और आमजन के जीवन से जोड़कर देखने की दृष्टि रही है। ऐसे में मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि इस आयोजन को एक अलग ही अर्थ प्रदान करती है।
सांस्कृतिक चेतना के बीच जुटे शिक्षाविद, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता
क्रिएटिव पब्लिक स्कूल में आयोजित बैठक में मधुबनी शहर के शिक्षाविदों, व्यवसायियों, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, कलाकारों तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। बैठक की अध्यक्षता अरविंद प्रसाद, रामश्रृंगार पांडे, एस. एन. लाल एवं सुरेश बैरोलिया के चार सदस्यीय अध्यक्ष-मंडल ने की।
बैठक में इप्टा की राष्ट्रीय और बिहार इकाई के पदाधिकारियों की उपस्थिति ने आयोजन की गंभीरता और व्यापकता को रेखांकित किया। इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव तनवीर अख्तर, बिहार इप्टा के कार्यवाहक महासचिव फिरोज अशरफ खां तथा संयुक्त सचिव नीरज कुमार रंजन विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन बिहार इप्टा के सचिव मंडल के साथी इन्द्र भूषण रमन ‘बमबम’ ने किया।
बैठक का वातावरण केवल सम्मेलन की व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें उस सांस्कृतिक दृष्टि पर भी चर्चा हुई जिसके केंद्र में समाज, मनुष्य और उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति है। मिथिला की धरती पर इप्टा के राज्य सम्मेलन का आयोजन इसी दृष्टि से सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
गठित हुई स्वागत समिति, समीर महासेठ बने अध्यक्ष
सम्मेलन को व्यापक जनभागीदारी और सांस्कृतिक सहयोग के साथ आयोजित करने के उद्देश्य से बैठक में स्वागत समिति का गठन किया गया। समिति के अध्यक्ष के रूप में समीर महासेठ, महासचिव के रूप में इन्द्र भूषण रमन ‘बमबम’ तथा कोषाध्यक्ष के रूप में अमित महासेठ का निर्वाचन किया गया।
स्वागत समिति के गठन के साथ ही आयोजन की तैयारियों को व्यवस्थित रूप देने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बैठक में सम्मेलन और सांस्कृतिक समारोह से जुड़ी संभावित रूपरेखा पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। आयोजन को ऐसा स्वरूप देने पर चर्चा हुई जिसमें बिहार की विविध लोक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मिथिला की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान भी प्रभावी ढंग से सामने आ सके।
तीन दिनों तक संस्कृति और रंगकर्म का संगम
बिहार इप्टा का 17वां राज्य सम्मेलन सह सांस्कृतिक समारोह 25, 26 और 27 दिसंबर 2026 को आयोजित होगा। तीन दिवसीय आयोजन को लेकर अभी से सांस्कृतिक हलकों में उत्सुकता देखी जा रही है। इप्टा के आयोजनों की प्रकृति को देखते हुए सम्मेलन में संगठनात्मक विमर्श के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, रंगकर्म और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों को स्थान मिलने की संभावना है।
मिथिला स्वयं एक जीवंत सांस्कृतिक पाठशाला है। यहां की लोकभाषाएं, लोकगीत, लोकनाट्य, चित्रकला, पर्व-परंपराएं और साहित्यिक धारा सदियों से जीवन और कला के बीच संबंध स्थापित करती रही हैं। इसलिए मधुबनी में होने वाला यह सम्मेलन इप्टा की जनसांस्कृतिक परंपरा और मिथिला की लोक-सांस्कृतिक विरासत के बीच संवाद का अवसर भी बन सकता है।
‘भोगेन्द्र झा महानगर’ नाम से पहचाना जाएगा मधुबनी शहर
बैठक में आयोजन को विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान देने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण नामकरण संबंधी निर्णय भी लिए गए। इस अवसर पर मधुबनी शहर का नामकरण ‘भोगेन्द्र झा महानगर’ करने पर सहमति बनी।
इसके अलावा मुख्य मंच का नाम ‘राज कुमार महासेठ सांस्कृतिक मंच’, सभाकक्ष का नाम ‘नचारी झा सभाकक्ष’ तथा कला दीर्घा का नाम ‘विमला दत्त कला दीर्घा’ रखने का निर्णय लिया गया।
इन नामकरणों के माध्यम से आयोजन से जुड़े सांस्कृतिक व्यक्तित्वों और परंपराओं को स्मरण करने की कोशिश दिखाई देती है। किसी सांस्कृतिक आयोजन के मंच, सभाकक्ष और कला दीर्घा का नाम केवल पहचान का माध्यम नहीं होता; वह अपने पीछे किसी व्यक्ति, परंपरा या सांस्कृतिक योगदान की स्मृति भी लेकर चलता है। इस लिहाज से सम्मेलन स्थल के प्रस्तावित नाम आयोजन की स्मृति को भविष्य से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं।
80वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है बिहार इप्टा
इस आयोजन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 15 अगस्त 2026 को बिहार इप्टा ने अपनी स्थापना के गौरवशाली 80वें वर्ष में प्रवेश किया है। आठ दशकों की यात्रा किसी भी सांस्कृतिक संस्था के लिए महज समय की गणना नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश में कला और संस्कृति की भूमिका की एक लंबी कहानी होती है।
इप्टा का इतिहास भारतीय जनजीवन, रंगमंच और सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़ी एक व्यापक परंपरा का हिस्सा रहा है। बिहार जैसे सांस्कृतिक रूप से बहुल राज्य में इस परंपरा ने लोकजीवन, रंगकर्म और सामाजिक सरोकारों को मंच देने का प्रयास किया है। इसलिए 80वें वर्ष में आयोजित होने वाला राज्य सम्मेलन संगठन के लिए अपनी यात्रा, वर्तमान और भविष्य पर विचार करने का अवसर भी है।
मिथिला की धरती पर संस्कृति का नया संवाद
मधुबनी का चयन इस आयोजन के लिए अपने आप में सांस्कृतिक अर्थ रखता है। मिथिला की पहचान यहां की चित्रकला तक सीमित नहीं है। विद्यापति की काव्य परंपरा से लेकर लोकगीतों की मौखिक विरासत और गांव-गांव में जीवित रंग-रूपों तक, मिथिला की संस्कृति ने भारतीय साहित्य और कला को समृद्ध किया है।
ऐसे परिवेश में इप्टा का राज्य सम्मेलन जब रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर मधुबनी पहुंचेगा तो यह आयोजन स्थानीय सांस्कृतिक स्मृतियों और समकालीन जनसांस्कृतिक विमर्श के बीच संवाद की जमीन तैयार कर सकता है। सम्मेलन में बिहार के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले रंगकर्मी, कलाकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता मिथिला की स्थानीय परंपराओं से भी रूबरू होंगे।
दरअसल, संस्कृति तभी जीवंत रहती है जब वह संग्रहालय की वस्तु बनने के बजाय समाज के वर्तमान जीवन से संवाद करती रहे। इप्टा की जनसांस्कृतिक परंपरा और मिथिला की लोकधर्मी सांस्कृतिक चेतना का मेल इसी संवाद को एक व्यापक मंच दे सकता है।
दिसंबर में मधुबनी बनेगा सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र
25 से 27 दिसंबर तक आयोजित होने वाला यह सम्मेलन बिहार के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण आयोजन के रूप में सामने आने की तैयारी में है। स्वागत समिति के गठन के साथ आयोजन की तैयारियों को संस्थागत रूप मिल गया है। आने वाले समय में कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा और उससे जुड़ी अन्य गतिविधियां सामने आने की उम्मीद है।
फिलहाल इतना तय है कि दिसंबर में मधुबनी की धरती पर इप्टा के 17वें राज्य सम्मेलन के बहाने कला, साहित्य, रंगमंच और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना एक साझा मंच पर दिखाई देगी। मिथिला की सांस्कृतिक मिट्टी में होने वाला यह आयोजन बिहार इप्टा के 80वें वर्ष की यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में दर्ज होने जा रहा है।













