दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
मिर्जापुर। सरकारी योजनाओं की सफलता अक्सर आंकड़ों और फाइलों में दर्ज उपलब्धियों से आंकी जाती है, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी होती हैं जो प्रशासन की संवेदनशीलता, नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति का जीवंत उदाहरण बन जाती हैं। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के दूरस्थ पहाड़ी गांव लहुरिया दह की कहानी भी ऐसी ही है। यह वह गांव था जहां दशकों तक पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करना ग्रामीणों की नियति बन गया था। हालात इतने कठिन थे कि लोग अपनी बेटियों की शादी इस गांव में करने से हिचकिचाते थे और कई युवक विवाह योग्य आयु पार करने के बाद भी अविवाहित रह जाते थे।
करीब 75 वर्षों तक पेयजल संकट से जूझते रहे इस गांव में जब पहली बार घर-घर नलों से स्वच्छ पानी पहुंचा तो यह केवल एक सरकारी परियोजना की सफलता नहीं थी, बल्कि उन हजारों लोगों के जीवन में उम्मीद की नई शुरुआत थी। इस परिवर्तन के पीछे तत्कालीन जिलाधिकारी और 2013 बैच की आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के नेतृत्व में किए गए सतत प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
पहाड़ी की चोटी पर बसा गांव, जहां पानी सबसे बड़ी चुनौती था
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के निकट स्थित मिर्जापुर जिले का लहुरिया दह गांव भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में स्थित है। यहां लगभग 1,500 लोगों की आबादी निवास करती है, जिनमें अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर और दलित परिवार हैं।
ऊंचाई पर बसे इस गांव तक पानी पहुंचाना वर्षों से प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता रहा। गांव में नियमित जलापूर्ति की व्यवस्था न होने के कारण लोगों को टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता था। सीमित मात्रा में मिलने वाले पानी का वितरण भी तय नियमों के अनुसार होता था, जबकि ग्राम सभा टैंकरों का खर्च उठाते-उठाते आर्थिक दबाव में आ चुकी थी।
महिलाओं के संघर्ष ने झकझोर दी थी व्यवस्था
गांव की महिलाएं प्रतिदिन कई किलोमीटर दूर पथरीले और कठिन रास्तों से पानी ढोने के लिए मजबूर थीं। एक-एक बाल्टी पानी जुटाने में घंटों का समय और भारी शारीरिक श्रम लगता था। गर्मियों में यह संकट और भी विकराल रूप ले लेता था।
पानी की कमी ने केवल दैनिक जीवन को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी गहरा असर डाला। आसपास के क्षेत्रों के लोग इस गांव में अपनी बेटियों का विवाह करने से बचते थे। परिणामस्वरूप अनेक युवक विवाह से वंचित रह जाते थे। पानी का संकट गांव के सामाजिक और आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बन गया था।
पहली यात्रा में बदल गया नजरिया
जब दिव्या मित्तल ने मिर्जापुर की जिलाधिकारी के रूप में पहली बार लहुरिया दह का दौरा किया, तो वहां की वास्तविक स्थिति देखकर वे भावुक हो उठीं। ग्रामीणों की पीड़ा इतनी गहरी थी कि उन्होंने स्वयं भी उनके सामने अपनी पानी की बोतल से पानी पीना उचित नहीं समझा।
जांच के दौरान सामने आया कि वर्षों से सरकारी अभिलेखों में यही दर्ज था कि गांव की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण वहां तक पानी पहुंचाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। कई योजनाएं बनीं, सर्वे हुए, लेकिन प्रत्येक प्रयास फाइलों तक ही सीमित रह गया।
‘असंभव’ को चुनौती देने का लिया निर्णय
दिव्या मित्तल ने इस धारणा को स्वीकार करने के बजाय समस्या का तकनीकी समाधान खोजने का निर्णय लिया। जल निगम के इंजीनियरों के साथ विस्तृत अध्ययन किया गया और पूरे प्रोजेक्ट का नए सिरे से मूल्यांकन हुआ।
विशेषज्ञों ने लिफ्ट जलापूर्ति प्रणाली को पुनः डिज़ाइन किया। पूरी योजना को चार प्रमुख चरणों—जल स्रोत, पम्पिंग, भंडारण और वितरण—में विभाजित किया गया ताकि प्रत्येक स्तर पर निगरानी और गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।
बैठकों से ज्यादा भरोसा जमीनी निरीक्षण पर
इस परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसकी निगरानी केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रही। प्रशासनिक अधिकारियों और तकनीकी टीम ने नियमित रूप से गांव पहुंचकर कार्यों की समीक्षा की।
‘हर घर जल’ अभियान के अंतर्गत दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में पाइपलाइन बिछाने का कार्य लगातार निगरानी में पूरा कराया गया। जिन स्थानों को पहले तकनीकी रूप से असंभव बताया जाता था, वहीं इंजीनियरिंग समाधान और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के बल पर जलापूर्ति व्यवस्था तैयार कर दी गई।
नौ महीने की मेहनत ने बदल दी 75 वर्षों की तस्वीर
लगातार लगभग नौ महीने तक चले प्रयासों के बाद वह ऐतिहासिक दिन आया जब गांव के लगभग 125 घरों में पहली बार नलों से स्वच्छ पेयजल पहुंचा।
जब दिव्या मित्तल दोबारा गांव पहुंचीं और ग्रामीणों ने अपने घरों में पानी बहते देखा, तो पूरा गांव भावुक हो उठा। एक बुजुर्ग महिला ने उनका हाथ पकड़कर अपनी खुशी व्यक्त की। उस क्षण की भावनाएं स्वयं जिलाधिकारी भी नहीं रोक सकीं। उन्होंने बाद में स्वीकार किया कि अपने प्रशासनिक जीवन में उन्हें शायद ही कभी इतनी आत्मिक संतुष्टि मिली हो।
प्रशासनिक नेतृत्व की बनी मिसाल
इस अनुभव को साझा करते हुए दिव्या मित्तल ने कहा कि सरकारी व्यवस्था में ‘असंभव’ शब्द अक्सर वास्तविक कठिनाई से अधिक जिम्मेदारी लेने की कमी को दर्शाता है। यदि किसी समस्या का गंभीरता से अध्ययन किया जाए, नवीन तकनीकी समाधान खोजे जाएं और अधिकारी स्वयं मैदान में उतरकर काम करें, तो कठिन से कठिन लक्ष्य भी प्राप्त किए जा सकते हैं।
उनका मानना है कि योजनाओं की सफलता केवल बजट स्वीकृत होने से नहीं होती, बल्कि तब होती है जब अधिकारी किसी समस्या को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानकर उसके समाधान तक डटे रहते हैं।
समाज और प्रशासन के लिए तीन महत्वपूर्ण संदेश
लहुरिया दह की इस कहानी से कई महत्वपूर्ण सीख निकलती हैं। पहली, विकास की सबसे अधिक आवश्यकता उन्हीं क्षेत्रों में होती है जहां पहुंचना सबसे कठिन होता है। दूसरी, तकनीकी चुनौतियां इच्छाशक्ति और नवाचार के सामने स्थायी बाधा नहीं बनतीं। तीसरी, किसी भी सरकारी योजना की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
आज लहुरिया दह केवल एक गांव नहीं, बल्कि इस बात का उदाहरण बन चुका है कि संवेदनशील प्रशासन, मजबूत नेतृत्व और सतत प्रयास मिलकर दशकों पुरानी समस्याओं का भी समाधान निकाल सकते हैं।
प्रेरणा बन गई लहुरिया दह की कहानी
लहुरिया दह की बदलती तस्वीर यह संदेश देती है कि प्रशासन यदि केवल फाइलों तक सीमित न रहकर लोगों के बीच पहुंचे, उनकी समस्याओं को समझे और समाधान के लिए प्रतिबद्ध होकर काम करे, तो विकास की राह में खड़ी सबसे बड़ी बाधाएं भी दूर की जा सकती हैं। यही कारण है कि यह गांव अब केवल पानी मिलने की कहानी नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन, प्रभावी नेतृत्व और जनसेवा की मिसाल के रूप में याद किया जा रहा है।













