रंगों में निखर रही चित्रकूट की पहचान, बुंदेलखंड की लोक संस्कृति को दीवारों पर मिला नया जीवन
धार्मिक पर्यटन के साथ अब सांस्कृतिक पर्यटन का भी बनेगा बड़ा केंद्र, चित्रकूट की दीवारों पर उभर रही बुंदेली विरासत
संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
धर्म नगरी चित्रकूट अब केवल आस्था और अध्यात्म का केंद्र भर नहीं रह गया है, बल्कि यह शहर अपनी सांस्कृतिक विरासत को नए अंदाज में दुनिया के सामने पेश करने की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। प्रभु श्रीराम की तपोस्थली के रूप में प्रसिद्ध चित्रकूट की दीवारें अब रंगों और लोक कलाओं से सजाई जा रही हैं। शहर के प्रमुख फ्लाईओवर, चौराहे और सार्वजनिक स्थान बुंदेलखंड की पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और ऐतिहासिक पहचान को अपने भीतर समेटते दिखाई दे रहे हैं।
चित्रकूट प्रशासन की इस अनूठी पहल ने पूरे शहर को एक खुली कला दीर्घा में बदलने का काम शुरू कर दिया है। लगभग 10 लाख रुपये की लागत से चल रही इस परियोजना के तहत कलाकार शहर की दीवारों पर बुंदेली जीवन शैली, पारंपरिक नृत्य, ग्रामीण परिवेश, लोक वाद्य यंत्र, लोक देवी-देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं को आकर्षक पेंटिंग्स के जरिए जीवंत कर रहे हैं।
बदलते समय में खो रही थी बुंदेली संस्कृति की चमक
बुंदेलखंड की पहचान सदियों से उसकी लोक संस्कृति, लोक गीत, पारंपरिक नृत्य और मिट्टी से जुड़ी कलाओं के कारण रही है। यहां की आल्हा गायकी, राई नृत्य, पारंपरिक चित्रकला और लोक जीवन भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते रहे हैं। लेकिन आधुनिकता और बदलती जीवन शैली के बीच यह परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती जा रही थी।
नई पीढ़ी का झुकाव आधुनिक मनोरंजन और डिजिटल संस्कृति की ओर बढ़ने के कारण बुंदेली लोक कलाएं पहले जैसी लोकप्रियता नहीं पा रही थीं। गांवों तक सीमित होती लोक संस्कृति को अब एक ऐसे मंच की जरूरत महसूस की जा रही थी, जहां उसे नई पहचान मिल सके।
इसी चुनौती को देखते हुए चित्रकूट प्रशासन ने शहर की दीवारों को संस्कृति के कैनवास में बदलने की पहल शुरू की। प्रशासन का मानना है कि जब कोई पर्यटक चित्रकूट पहुंचे तो उसे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की सांस्कृतिक आत्मा के भी दर्शन हों।
शहर की दीवारों पर उभर रही लोक जीवन की झलक
चित्रकूट के ट्रैफिक चौराहे, शंख चौराहा, कर्वी-पहाड़ी मार्ग स्थित फ्लाईओवर और अन्य प्रमुख स्थानों पर बनाई जा रही पेंटिंग्स लोगों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इन चित्रों में बुंदेलखंड के ग्रामीण जीवन को बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है।
कहीं महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में लोक नृत्य करती दिखाई दे रही हैं, तो कहीं किसान खेतों में मेहनत करते नजर आ रहे हैं। कुछ पेंटिंग्स में लोक वाद्य यंत्रों की झलक है, तो कुछ में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को प्रमुखता दी गई है।
इन रंगीन चित्रों ने शहर के सार्वजनिक स्थानों को नया जीवन देने का काम किया है। जहां पहले केवल साधारण दीवारें दिखाई देती थीं, अब वहां कला और संस्कृति की कहानी नजर आने लगी है।
धार्मिक पर्यटन को मिलेगा सांस्कृतिक विस्तार
चित्रकूट देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन और धार्मिक पर्यटन के लिए पहुंचते हैं। प्रशासन का मानना है कि इस परियोजना से आने वाले पर्यटकों को एक नया अनुभव मिलेगा।
अब श्रद्धालु केवल मंदिरों और धार्मिक स्थलों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि शहर की दीवारों पर उकेरी गई बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित हो सकेंगे। इससे चित्रकूट की पहचान एक “कल्चरल टूरिज्म डेस्टिनेशन” के रूप में भी विकसित हो सकती है।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शहर की सांस्कृतिक प्रस्तुति पर्यटकों को लंबे समय तक आकर्षित करती है। यही वजह है कि देश के कई शहर अब स्ट्रीट आर्ट और थीम आधारित पेंटिंग्स के जरिए अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। चित्रकूट की यह पहल भी उसी दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।
जिलाधिकारी पुलकित गर्ग की पहल बनी चर्चा का विषय
इस पूरी परियोजना की पहल चित्रकूट के जिलाधिकारी पुलकित गर्ग द्वारा की गई है। चित्रकूट विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण के माध्यम से इस योजना को जमीन पर उतारा जा रहा है।
जिलाधिकारी का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य केवल शहर की दीवारों को सुंदर बनाना नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड की खोती हुई सांस्कृतिक धरोहर को फिर से जीवंत करना भी है।
उन्होंने बताया कि कर्वी-पहाड़ी मार्ग पर स्थित फ्लाईओवर को विशेष थीम आधारित पेंटिंग्स से सजाया गया है, जिस पर करीब 10 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। आने वाले समय में शहर के अन्य हिस्सों को भी इसी तरह विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।
प्रशासन का मानना है कि इस पहल से न केवल शहर की सुंदरता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय कलाकारों को भी अपनी प्रतिभा दिखाने का बड़ा मंच मिलेगा।
स्थानीय कलाकारों को मिला नया अवसर
इस परियोजना का सबसे सकारात्मक पहलू यह भी है कि इसमें स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता दी जा रही है। बुंदेलखंड की संस्कृति को सबसे बेहतर तरीके से वही लोग समझ सकते हैं, जो इस मिट्टी से जुड़े हुए हैं।
कलाकारों का कहना है कि इस पहल से उन्हें अपनी कला को बड़े स्तर पर प्रदर्शित करने का अवसर मिला है। कई कलाकार ऐसे हैं, जिन्हें पहले अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए उचित मंच नहीं मिल पाता था। अब उनकी कला सीधे हजारों लोगों तक पहुंच रही है। इससे युवाओं के भीतर भी लोक कला के प्रति रुचि बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।
दीवारें गंदी करने वालों पर होगी कार्रवाई
प्रशासन ने साफ किया है कि सार्वजनिक स्थलों पर बनाई जा रही इन पेंटिंग्स को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति गुटखा खाकर या अन्य तरीके से इन पेंटिंग्स को गंदा करने का प्रयास करेगा तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
दरअसल, अक्सर देखा जाता है कि सरकारी दीवारों पर पोस्टर चिपकाने, पान-गुटखा थूकने और लिखावट करने से सार्वजनिक सौंदर्य बिगड़ जाता है। प्रशासन चाहता है कि यह कला लंबे समय तक सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियां भी इसे देख सकें।
चित्रकूट को मिल रही नई पहचान
धार्मिक नगरी चित्रकूट अब आस्था के साथ-साथ कला और संस्कृति के रंगों में भी रंगता दिखाई दे रहा है। यह पहल न केवल शहर को खूबसूरत बना रही है, बल्कि बुंदेलखंड की लोक विरासत को नए दौर में नई पहचान देने का काम भी कर रही है।
यदि यह प्रयास लगातार जारी रहा तो आने वाले समय में चित्रकूट देश के उन चुनिंदा शहरों में शामिल हो सकता है, जहां धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक पर्यटन भी लोगों को आकर्षित करेगा।
बुंदेलखंड की मिट्टी की खुशबू, लोक जीवन की आत्मा और परंपराओं की रंगत अब चित्रकूट की दीवारों पर साफ दिखाई देने लगी है। यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता मानी जा रही है।








