16 अक्टूबर 2026 5:25 अपराह्न

आर्टिलरी रेजिमेंट के 200 वर्ष पूरे, मेरठ में गूंजा ‘सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल’ का गौरव

आर्टिलरी रेजिमेंट के 200 वर्ष पूरे होने पर मेरठ में आयोजित कार्यक्रम में डीन प्रो. डॉ. अनिल कुमार दीक्षित और रिपोर्टर कमलेश कुमार चौधरी

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मेरठ। भारतीय सेना की आर्टिलरी रेजिमेंट ने 28 सितंबर 2026 को अपने गौरवशाली 200 वर्ष पूरे कर लिए। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के विभिन्न सैन्य कैंट क्षेत्रों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में मेरठ में रिसर्च फाउंडेशन ऑफ डिफेन्स एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से आयोजित सेमिनार में भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास, सैन्य अनुशासन, कानून और आर्टिलरी रेजिमेंट की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई।

सेमिनार का विषय भारतीय सशस्त्र सेना के लिए संसद द्वारा बनाए गए सेना अधिनियम, 1950 और सेना नियम, 1954 के तहत अनुशासन, आचरण, कोर्ट-मार्शल तथा सेवा संबंधी प्रशासनिक कार्यों के नियंत्रण में सैनिक अदालत की भूमिका पर केंद्रित रहा। इस विषय पर देवभूमि उत्तराखंड यूनिवर्सिटी, देहरादून के डीन लॉ प्रो. (डॉ.) अनिल कुमार दीक्षित ने व्याख्यान दिया।

‘सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल’ आर्टिलरी की पहचान

प्रो. डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने आर्टिलरी रेजिमेंट के आदर्श वाक्य “सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल” का उल्लेख करते हुए कहा कि यह केवल एक सैन्य आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि गनरों के साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने वाले प्रत्येक गनर पर देश का प्रत्येक नागरिक गर्व करता है।

28 सितंबर 1827 से शुरू हुई 200 वर्षों की यात्रा

भारतीय सेना की वर्तमान आर्टिलरी रेजिमेंट की संगठित सैन्य परंपरा की नींव 28 सितंबर 1827 को रखी गई थी। इसी कारण 28 सितंबर को आर्टिलरी रेजिमेंट का स्थापना दिवस और गनर्स डे के रूप में मनाया जाता है। दो शताब्दियों की इस यात्रा में भारतीय तोपखाने ने संगठन, प्रशिक्षण, तकनीक और युद्धक क्षमता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास किया है। शुरुआती दौर की अपेक्षाकृत छोटी क्षमता वाली तोपों से आगे बढ़ते हुए भारतीय आर्टिलरी आज आधुनिक हथियार प्रणालियों और तकनीकी क्षमताओं से लैस सैन्य शाखा के रूप में विकसित हुई है।

गनर का मतलब केवल बंदूक चलाने वाला नहीं

आम बोलचाल में ‘गनर’ शब्द सुनकर अक्सर बंदूक के साथ सुरक्षा में तैनात व्यक्ति की तस्वीर सामने आती है, लेकिन सेना के संदर्भ में इसका अर्थ अलग है। भारतीय सेना में ‘गन’ का संबंध मुख्य रूप से तोप से है। तोपखाने की प्रणालियों पर काम करने और उन्हें संचालित करने वाले सैनिकों को गनर या तोपची कहा जाता है। सेना की विभिन्न संबंधित इकाइयों में गनर की भूमिका सैन्य अभियान के अनुरूप निर्धारित होती है।

पानीपत से आधुनिक तोपखाने तक का इतिहास

भारत में तोपों के सैन्य इस्तेमाल का इतिहास कई सदियों पुराना है। भारतीय इतिहास में 1526 के प्रथम पानीपत युद्ध का विशेष उल्लेख मिलता है। इस युद्ध में बाबर ने इब्राहिम लोदी के विरुद्ध तोपखाने का इस्तेमाल किया था। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में भारतीय उपमहाद्वीप में इससे पहले भी तोपों के इस्तेमाल के संदर्भ मिलते हैं। हालांकि आधुनिक सैन्य संगठन के रूप में भारतीय आर्टिलरी का क्रमिक विकास औपनिवेशिक काल में हुआ और स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय सेना की महत्वपूर्ण लड़ाकू शाखा बन गई।

बॉम्बे आर्मी से रॉयल इंडियन आर्टिलरी तक

भारतीय आर्टिलरी के संगठित इतिहास में 28 सितंबर 1827 का विशेष महत्व है। इसी दिन बॉम्बे प्रेसीडेंसी की सेना यानी बॉम्बे आर्मी के हिस्से के रूप में आर्टिलरी संगठन की आधारभूत शुरुआत हुई। समय के साथ संगठनात्मक बदलाव हुए और इसके नाम तथा स्वरूप में भी परिवर्तन आया। आगे चलकर यही सैन्य परंपरा स्वतंत्र भारत की आर्टिलरी रेजिमेंट के विकास का आधार बनी।

वर्ष 1857 का विद्रोह भारतीय सैन्य इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ रहा। 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुए विद्रोह में बंगाल आर्टिलरी के कई भारतीय सैनिकों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने भारतीय सैनिकों और तोपखाने की संगठनात्मक व्यवस्था में कई बदलाव किए।

द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय गनरों का योगदान

द्वितीय विश्व युद्ध भारतीय गनरों की सैन्य क्षमता और साहस की महत्वपूर्ण परीक्षा का दौर रहा। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इस दौरान भारतीय गनरों ने विभिन्न वीरता और सेवा सम्मानों के साथ युद्ध में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके योगदान को देखते हुए भारतीय तोपखाने को वर्ष 1945 में प्रतिष्ठित ‘रॉयल’ उपाधि प्रदान की गई।

स्वतंत्र भारत के गणराज्य बनने के साथ सैन्य संस्थाओं के औपनिवेशिक नामों और प्रतीकों में बदलाव किया गया। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद आर्टिलरी के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया और यह स्वतंत्र भारत की सेना का अभिन्न हिस्सा बन गई।

1947 से ऑपरेशन विजय तक निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

स्वतंत्रता के बाद भारतीय आर्टिलरी ने देश के सामने आई विभिन्न सैन्य चुनौतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1947-48 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तथा ऑपरेशन विजय जैसे सैन्य अभियानों में आर्टिलरी की भूमिका रही। समय के साथ बदलती सैन्य जरूरतों के अनुरूप भारतीय तोपखाने का पुनर्गठन भी होता रहा और विभिन्न क्षमताओं तथा जिम्मेदारियों का पुनर्विन्यास किया गया।

भारी गोलाबारी से सेना को आगे बढ़ने का अवसर

प्रो. डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने आर्टिलरी की युद्धक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जमीनी युद्ध के दौरान भारी गोलाबारी के माध्यम से तोपखाना विरोधी की युद्ध क्षमता पर दबाव बनाने और अपनी सेना को आगे बढ़ने के लिए आवश्यक परिस्थितियां तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी प्रभावी भूमिका के कारण सैन्य संदर्भ में आर्टिलरी को “युद्ध का भगवान” जैसे संबोधनों से भी जाना जाता है।

वीरता और बलिदान से गौरवान्वित आर्टिलरी

भारतीय आर्टिलरी रेजिमेंट का इतिहास केवल हथियारों और युद्ध अभियानों का इतिहास नहीं है, बल्कि सैनिकों के साहस, अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान की गाथा भी है। आर्टिलरी से जुड़े सैनिकों ने विभिन्न युद्धों और सैन्य अभियानों में अदम्य साहस का परिचय दिया है। रेजिमेंट के गौरवशाली इतिहास में विक्टोरिया क्रॉस, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र, युद्ध सेवा पदक, शौर्य चक्र और सेना पदक जैसे अनेक वीरता एवं सेवा सम्मान शामिल हैं।

सैनिक अदालत की भूमिका पर भी हुई चर्चा

सेमिनार में आर्टिलरी के गौरवशाली इतिहास के साथ सैन्य अनुशासन और कानून के महत्व पर भी विशेष चर्चा हुई। प्रो. डॉ. अनिल कुमार दीक्षित ने कहा कि भारतीय सशस्त्र सेनाओं में अनुशासन सैन्य व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। सेना अधिनियम, 1950 और सेना नियम, 1954 के प्रावधानों के तहत सैनिकों के आचरण, अनुशासन, सेवा संबंधी मामलों और कोर्ट-मार्शल जैसी प्रक्रियाओं के लिए निर्धारित कानूनी ढांचा मौजूद है।

उन्होंने सैनिक अदालत की भूमिका को सैन्य न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि सेना में अनुशासन और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। सैन्य सेवा की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित कानून और प्रक्रियाएं सेना की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

दो शताब्दियों बाद भी कायम है गनरों का गौरव

आर्टिलरी रेजिमेंट के 200 वर्ष पूरे होना भारतीय सैन्य इतिहास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। दो सौ वर्षों की इस यात्रा में तोपखाने ने बदलती युद्ध तकनीक, आधुनिक हथियार प्रणालियों और नई सैन्य चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को लगातार विकसित किया है। मेरठ में आयोजित यह सेमिनार इस ऐतिहासिक अवसर को सैन्य इतिहास, सैन्य कानून और अनुशासन के व्यापक संदर्भ से जोड़ने वाला कार्यक्रम रहा।

आर्टिलरी रेजिमेंट की यह दो शताब्दियों की यात्रा बताती है कि किसी सैन्य संगठन की ताकत केवल उसके हथियारों में नहीं, बल्कि उसके सैनिकों के प्रशिक्षण, अनुशासन, साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण में भी निहित होती है।

रिपोर्टर : कमलेश कुमार चौधरी

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