संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में बाढ़ का पानी कई जगह भले ही उतरने लगा हो, लेकिन उसकी छोड़ी हुई तबाही अभी भी गांवों की जिंदगी में साफ दिखाई दे रही है। कहीं घरों की दीवारें दरक गई हैं, कहीं कच्चे मकान धराशायी हो चुके हैं, कहीं खेतों में खरीफ की फसल बर्बाद होने के बाद किसान अगली बोआई को लेकर चिंतित हैं तो कहीं बिजली, पेयजल और सड़क संपर्क की समस्या ने ग्रामीण जीवन को और कठिन बना दिया है। बरदहा नदी के बार-बार उफान ने पाठा क्षेत्र की उस पुरानी समस्या को फिर सामने ला दिया है, जिसमें बारिश के दिनों में कई गांव मुख्य मार्ग और तहसील मुख्यालय से कटने के खतरे में आ जाते हैं।
अगस्त के अंतिम सप्ताह से सितंबर तक चित्रकूट में बाढ़ और अतिवृष्टि ने अलग-अलग चरणों में गंभीर असर डाला। मंदाकिनी की बाढ़ ने चित्रकूट धाम और उसके आसपास के इलाकों को प्रभावित किया तो पाठा क्षेत्र में बरदहा और वाल्मीकि जैसी नदियों तथा स्थानीय जलधाराओं के उफान ने मानिकपुर क्षेत्र के ग्रामीणों की मुश्किल बढ़ा दी। 25 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार बरदहा नदी के बढ़े जलस्तर से टिकरिया के पास मानिकपुर-इटवा डुडैला मार्ग का रपटा फिर बह गया और एक दर्जन से अधिक गांवों का आवागमन प्रभावित हुआ।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यही रपटा 29 अगस्त की बाढ़ में पहले भी बह चुका था। नदी का पानी उतरने के बाद वैकल्पिक तौर पर आवागमन बहाल किया गया, लेकिन सितंबर के अंतिम सप्ताह में दोबारा आई तेज बारिश ने उस व्यवस्था की कमजोरी उजागर कर दी। सवाल केवल एक रपटे के बहने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या हर साल बाढ़ आने वाले इस क्षेत्र में अस्थायी मरम्मत ही ग्रामीणों की स्थायी नियति बन चुकी है?
पाठा में बरदहा नदी का उफान और कटता संपर्क
पाठा का भूगोल सामान्य मैदानी इलाकों से अलग है। विंध्य क्षेत्र की पहाड़ियों, जंगलों और ऊंच-नीच वाले भूभाग के कारण मध्य प्रदेश के हिस्सों में होने वाली तेज बारिश का पानी भी कई बार बरदहा जैसी नदियों और स्थानीय जलधाराओं में तेजी से पहुंचता है। यही वजह है कि भारी वर्षा के कुछ घंटों के भीतर नदी का स्वरूप बदल जाता है।
29 अगस्त को बरदहा नदी में आए उफान के दौरान दर्जनों गांवों में पानी पहुंचने और कई कच्चे मकानों के गिरने की खबर सामने आई थी। छेरिहा खुर्द के गजाधर का पुरवा में घरों में पानी भरने तथा कच्चे मकानों के गिरने की रिपोर्ट दर्ज हुई। उसी दौर में पाठा क्षेत्र में नदी के उफान से गांवों के संपर्क मार्गों पर भी गंभीर असर पड़ा।
17 अगस्त की एक रिपोर्ट में बरदहा नदी के उफान से 12 से अधिक गांवों के प्रभावित होने और करीब 50 हजार ग्रामीणों के संपर्क संकट में आने का उल्लेख किया गया था। यह आंकड़ा अलग बाढ़-घटना से संबंधित है, इसलिए इसे सितंबर की प्रभावित आबादी के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन यह जरूर बताता है कि पाठा में बाढ़ कोई अचानक पैदा हुई एक-दो दिन की समस्या नहीं, बल्कि बार-बार लौटने वाला संरचनात्मक संकट है।
सितंबर के अंतिम सप्ताह में भी यही तस्वीर सामने आई। बरदहा नदी के ऊपर बने रपटों पर पानी बहने से चमरौंहा सहित कई स्थानों पर लगभग एक दर्जन गांवों का आवागमन प्रभावित हुआ। प्रशासन ने नदी किनारे बसे गांवों और मजरों में निगरानी बढ़ाई तथा पुलिस ने कुछ संवेदनशील स्थानों पर आवागमन रोकने के लिए बैरिकेडिंग की।
बिजली गई तो पानी का संकट भी गहराया
बाढ़ का प्रभाव केवल सड़क और मकान तक सीमित नहीं रहता। पाठा क्षेत्र के कई गांवों में बिजली आपूर्ति प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई। कल्याणपुर, बराहमाफी, रामपुर, करौहा, जारो माफी और लक्ष्मणपुर जैसे गांवों में बिजली बाधित होने से ग्रामीणों को अंधेरे में रहना पड़ा। बिजली की आपूर्ति बाधित होने का सीधा असर पेयजल व्यवस्था पर भी पड़ा।
यह स्थिति पाठा जैसे क्षेत्र में अधिक गंभीर हो जाती है, जहां पहले से ही गर्मी के मौसम में पेयजल की समस्या की खबरें आती रही हैं। बाढ़ के दौरान एक तरफ घरों के आसपास पानी जमा है और दूसरी तरफ पीने योग्य पानी की उपलब्धता बाधित हो जाती है। यानी बाढ़ का विरोधाभास यह है कि चारों तरफ पानी होने के बावजूद सुरक्षित पेयजल की कमी पैदा हो सकती है।
खेतों में खड़ी फसल और किसानों के सामने अगली चुनौती
बाढ़ का सबसे लंबा असर किसान झेलते हैं। पाठा क्षेत्र में तिल, उड़द, मूंग, ज्वार, अरहर और बाजरा जैसी खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचने की रिपोर्ट सामने आई है। अब किसान इस बात को लेकर चिंतित हैं कि खेतों में जमा पानी कब तक निकलेगा और रबी की बुवाई समय पर हो पाएगी या नहीं। सरसों, चना, मसूर और अलसी की अगली फसल की तैयारी भी इसी पर निर्भर करेगी।
यह नुकसान केवल एक मौसम की आय का नुकसान नहीं है। छोटे और सीमांत किसान के लिए खरीफ फसल खराब होने का अर्थ बीज, खाद, मजदूरी और घरेलू खर्च के लिए उपलब्ध नकदी का संकट भी है। यदि खेत लंबे समय तक पानी में डूबे रहते हैं तो अगली फसल की तैयारी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि बाढ़ के बाद नुकसान का वास्तविक आकलन केवल मकान और सड़क की क्षति तक सीमित नहीं होना चाहिए।
मकान गिरे, दीवारें दरकीं, परिवारों की गृहस्थी बिखरी
चित्रकूट जिले में अगस्त-सितंबर की बारिश और बाढ़ के दौरान मकानों को हुए नुकसान के आंकड़े अलग-अलग चरणों में सामने आए। 1 सितंबर की एक रिपोर्ट में करीब एक सौ कच्चे मकानों के गिरने और 563 मकानों के आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त होने की जानकारी दी गई थी। इसमें मंदाकिनी और बरदहा की बाढ़ को प्रमुख कारणों में बताया गया।
बाद की रिपोर्टों में जिले में क्षतिग्रस्त मकानों की संख्या और बढ़ी हुई दिखाई दी। 2 सितंबर की एक रिपोर्ट में 475 घरों के क्षतिग्रस्त होने और 50 से अधिक मकानों के गिरने का उल्लेख था, जबकि 4 सितंबर की रिपोर्ट में 565 मकानों के गिरने की जानकारी प्रकाशित हुई। अलग-अलग तारीखों और सर्वे चरणों के कारण इन आंकड़ों को एक ही अंतिम सरकारी आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।
यही अंतर तहकीकात का एक महत्वपूर्ण बिंदु है। बाढ़ जैसी तेजी से बदलने वाली आपदा में प्रारंभिक आंकड़े लगातार बदल सकते हैं। इसलिए पीड़ितों को राहत और मुआवजा देने से पहले अद्यतन, ग्रामवार और परिवारवार सत्यापन जरूरी है।
जान-माल की हानि: आंकड़े से कहीं बड़ा मानवीय संकट
बाढ़ और लगातार बारिश ने चित्रकूट में जान-माल को भी नुकसान पहुंचाया। 28 अगस्त की बाढ़ संबंधी रिपोर्ट में चित्रकूट में दीवार गिरने से एक महिला की मौत की जानकारी सामने आई थी। बाद में 30 अगस्त की रिपोर्ट में बाढ़ में फंसकर दो लोगों की मौत का उल्लेख किया गया।
इन घटनाओं के आंकड़े अलग-अलग समय और घटनाओं से जुड़े हैं, इसलिए कुल मृतकों की संख्या निर्धारित करने के लिए आधिकारिक समेकित जिला आंकड़े को आधार बनाना आवश्यक होगा। लेकिन इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि बाढ़ का जोखिम केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहा।
विशेष चिंता उन परिवारों की है जिनके घर कच्चे हैं, जिनके पास सुरक्षित स्थान पर जाने का विकल्प सीमित है या जिनमें बुजुर्ग, बच्चे अथवा दिव्यांग सदस्य हैं। ऐसी आबादी के लिए शुरुआती चेतावनी, सुरक्षित निकासी और स्थानीय स्तर पर नाव/बचाव साधनों की उपलब्धता निर्णायक हो जाती है।
राहत पहुंची, लेकिन क्या हर प्रभावित परिवार तक पहुंची?
प्रशासन की ओर से राहत और बचाव अभियान चलाए जाने की जानकारी लगातार सामने आई। 3 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार चित्रकूट में 36 गांव प्रभावित हुए थे और 13,913 लोग बाढ़ की चपेट में आए थे। उसी रिपोर्ट में 240 राहत किट और 250 लंच पैकेट बांटे जाने की जानकारी दी गई थी।
एक अन्य रिपोर्ट में 36 प्रभावित गांवों में राहत अभियान के दौरान 28,803 लंच पैकेट और 2,065 राहत किट वितरित किए जाने तथा 688 लोगों को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी दी गई।
मुख्यमंत्री के 6 सितंबर के दौरे के दौरान भी राहत एवं पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की गई और प्रभावित लोगों को राहत सामग्री वितरित की गई। मुख्यमंत्री ने क्षति का सर्वे कराकर प्रभावितों को तत्काल राहत देने तथा राहत किट वितरण में तेजी लाने के निर्देश दिए थे।
इन आंकड़ों से प्रशासनिक स्तर पर हुए राहत प्रयासों का पता चलता है। लेकिन तहकीकात का दूसरा पहलू ग्रामीणों तक पहुंचने वाली वास्तविक मदद है।
राहत किट और मुआवजे को लेकर ग्रामीणों की शिकायतें
7 सितंबर को मानिकपुर तहसील परिसर में करीब 500 ग्रामीणों के पहुंचने की खबर सामने आई। ग्रामीणों को सूचना मिली थी कि तहसील में राहत किट और मुआवजा मिलेगा। कई गांवों से आए लोगों ने शिकायत की कि उनके गांवों में अभी तक सर्वे टीम नहीं पहुंची थी।
यह घटना राहत व्यवस्था की पारदर्शिता पर महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है। यदि प्रभावित परिवारों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही कि उनका सर्वे कब होगा, राहत किट कहां और किस आधार पर मिलेगी तथा मुआवजे के लिए कौन-से दस्तावेज जरूरी हैं, तो अफवाहें और भ्रम स्वाभाविक रूप से बढ़ेंगे।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन शिकायतों से राहत वितरण में व्यापक अनियमितता स्वतः सिद्ध नहीं होती। लेकिन बड़ी संख्या में ग्रामीणों का तहसील पहुंचना और सर्वे को लेकर शिकायत सामने आना प्रशासन के लिए यह संकेत अवश्य है कि सूचना तंत्र को अधिक पारदर्शी और ग्राम स्तर पर सक्रिय करने की आवश्यकता है।
ऊंचाडीह के पयासी पुरवा से उठे सवाल
13 सितंबर की एक रिपोर्ट में मानिकपुर तहसील क्षेत्र के ऊंचाडीह गांव के पयासी पुरवा में बाढ़ प्रभावित परिवारों को लेकर विवाद और शिकायत का उल्लेख सामने आया। प्रशासनिक पक्ष की ओर से बताया गया कि जिन परिवारों के मकान गिरे हैं, उनका सर्वे किया गया है और जो प्रभावित परिवार बच गए हैं, उनका भी सर्वे कराया जा रहा है।
यहीं पर तहकीकात का असली प्रश्न सामने आता है—सर्वे की सूची कितनी व्यापक है? क्या उसमें केवल दिखाई देने वाले मकान नुकसान में शामिल हैं या घर के भीतर बर्बाद हुई गृहस्थी, अनाज, पशुओं के चारे, फसल और रोजगार के नुकसान का भी आकलन हो रहा है?
बाढ़ पीड़ितों की वास्तविक समस्या का मूल्यांकन केवल यह देखकर नहीं किया जा सकता कि घर की दीवार खड़ी है या गिर गई। कई परिवारों के घर खड़े रह जाते हैं, लेकिन उनका अनाज, कपड़ा, बिस्तर, घरेलू सामान और खेती की उपज बर्बाद हो जाती है। ऐसे परिवार भी आर्थिक रूप से गंभीर संकट में पहुंच जाते हैं।
पाठा में राहत वितरण की सबसे बड़ी चुनौती—दूरी और भूगोल
पाठा की समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू उसकी भौगोलिक स्थिति है। पहाड़ी और वन क्षेत्र में बसे मजरों तक राहत सामग्री पहुंचाना मैदानी गांवों की तुलना में कठिन है। जिस समय मुख्य सड़क पर वाहन पहुंच सकता है, उसी समय नदी का रपटा या पुलिया डूब जाने पर अंतिम कुछ किलोमीटर का रास्ता पूरी राहत व्यवस्था को रोक सकता है।
यही कारण है कि राहत वितरण के आंकड़े और वास्तविक पहुंच में अंतर पैदा हो सकता है। तहसील मुख्यालय में राहत सामग्री उपलब्ध होना और किसी दूरस्थ मजरे में प्रभावित परिवार तक वह सामग्री पहुंचना दो अलग बातें हैं।
पाठा के 25 सितंबर के हालात इसका उदाहरण हैं। बरदहा नदी का जलस्तर बढ़ने पर टिकरिया का रपटा बह गया और कई गांवों का आवागमन बाधित हो गया। चमरौंहा और अन्य स्थानों पर रपटों के ऊपर से पानी बहने की सूचना भी सामने आई।
बार-बार टूटते रपटे विकास के मॉडल पर सवाल हैं
यदि कोई रपटा एक ही मौसम में बार-बार बह जाता है तो केवल उसे दोबारा बना देना पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। पाठा में बरदहा नदी पर स्थायी पुल और बेहतर संपर्क मार्ग की मांग लंबे समय से उठती रही है। गर्भवती महिलाओं, मरीजों, विद्यार्थियों, किसानों और रोजमर्रा के काम के लिए बाजार जाने वाले ग्रामीणों के लिए नदी पार करना केवल असुविधा नहीं, बल्कि जोखिम का प्रश्न है।
बाढ़ के दिनों में एक गांव का सड़क संपर्क टूटने का अर्थ है—एंबुलेंस की देरी, बच्चों की पढ़ाई में बाधा, कृषि उपज बाजार तक न पहुंचना, जरूरी दवाओं की उपलब्धता में समस्या और राहत दलों के लिए भी कठिनाई।
इसलिए पाठा में बाढ़ नियंत्रण की चर्चा केवल बांध और नदी की निगरानी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें स्थायी पुल, ऊंचे संपर्क मार्ग, जल निकासी, विद्युत आपूर्ति की वैकल्पिक व्यवस्था और गांव स्तर पर आपदा प्रतिक्रिया तंत्र भी शामिल होना चाहिए।
मंदाकिनी की बाढ़ ने जिले की दूसरी तस्वीर भी दिखाई
पाठा की बरदहा नदी और चित्रकूट धाम की मंदाकिनी अलग-अलग भौगोलिक हिस्सों को प्रभावित करती हैं, लेकिन दोनों घटनाएं एक साझा समस्या की ओर इशारा करती हैं—अत्यधिक बारिश की स्थिति में जिले का नदी तंत्र कितनी तेजी से संकट पैदा कर सकता है।
मंदाकिनी का जलस्तर सितंबर की शुरुआत में खतरे के निशान से काफी ऊपर चला गया था। एक रिपोर्ट के अनुसार जलस्तर 135.20 मीटर के उच्चतम स्तर तक पहुंचा और बाद में घटकर 128 मीटर हुआ। उसी दौरान 36 प्रभावित गांवों में राहत एवं बचाव अभियान चलाया गया।
4 सितंबर को पानी उतरने के बाद रामघाट और अन्य इलाकों में मलबे तथा क्षति की तस्वीर सामने आई। यानी नदी का पानी उतरना संकट की समाप्ति नहीं था; असली पुनर्वास उसके बाद शुरू हुआ।
60 गांवों का पुराना संकट और बाढ़-सूखे का विरोधाभास
सितंबर की एक ग्राउंड रिपोर्ट में मंदाकिनी किनारे बसे करीब 60 गांवों के बाढ़ और सूखे के दोहरे संकट का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार बंधोइन बांध और उससे जुड़ी जल परियोजनाएं सिंचाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, लेकिन बाढ़ के दौरान आसपास के गांवों के लिए खतरा भी पैदा होता है और गर्मियों में पानी की कमी अलग समस्या बनती है।
यह तथ्य नीति-निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है। यदि एक ही जल संरचना बाढ़ के समय खतरा और गर्मी में जीवनरेखा दोनों बन रही है तो समाधान केवल पानी रोकना या छोड़ना नहीं हो सकता। जल प्रबंधन, जलाशय संचालन, नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बाढ़ क्षेत्र की पहचान और गांवों की सुरक्षा को एक साथ देखना होगा।
प्रशासन के सामने अब तीन स्तर की चुनौती
बाढ़ का तत्काल संकट गुजरने के बाद चित्रकूट प्रशासन के सामने अब तीन बड़ी चुनौतियां हैं।
पहली चुनौती है—सही क्षति का सर्वे। किस परिवार का मकान गिरा, किसका आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुआ, किस किसान की कितनी फसल नष्ट हुई और किन परिवारों की गृहस्थी बर्बाद हुई, इसका ग्रामवार और परिवारवार रिकॉर्ड जरूरी है।
दूसरी चुनौती है—राहत की पारदर्शी पहुंच। किस गांव में कितनी राहत किट पहुंची, कितने परिवारों को मिली और कौन पात्र परिवार छूट गया, इसकी सार्वजनिक सूची या ग्राम स्तर पर सत्यापन व्यवस्था भरोसा बढ़ा सकती है।
तीसरी चुनौती है—अगली बाढ़ से पहले स्थायी तैयारी। यदि टिकरिया, चमरौंहा और अन्य रपटे हर बार बहते हैं तो अगली बारिश तक स्थायी समाधान की योजना तैयार करनी होगी।
बाढ़ उतर गई, लेकिन संकट नहीं
पाठा क्षेत्र की मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि बाढ़ को केवल नदी का जलस्तर बढ़ने की घटना मानना अधूरा होगा। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आवागमन, बिजली, पेयजल, कृषि, मकान, स्वास्थ्य और प्रशासनिक पहुंच—सभी को प्रभावित करने वाली श्रृंखलाबद्ध आपदा है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार एक ओर प्रशासन ने राहत किट, भोजन, बचाव दल और सर्वे की व्यवस्था की, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों के एक हिस्से ने सर्वे में देरी, राहत और मुआवजे की जानकारी के अभाव तथा सहायता तक पहुंच को लेकर शिकायतें उठाईं।
इन दोनों पक्षों को साथ रखकर देखने पर तस्वीर अधिक स्पष्ट होती है। यह कहना उचित नहीं होगा कि राहत पूरी तरह विफल रही, क्योंकि हजारों भोजन पैकेट, राहत किट और सैकड़ों लोगों के सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी उपलब्ध है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जिन परिवारों ने सर्वे या राहत न मिलने की शिकायत की है, उनकी शिकायत का ग्रामवार सत्यापन किया जाए।
बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में सबसे बड़ी जरूरत केवल तत्काल खाद्यान्न या राहत किट नहीं, बल्कि विश्वसनीयता है। पीड़ित परिवार को पता होना चाहिए कि उसका सर्वे कब होगा, नुकसान दर्ज हुआ या नहीं, मुआवजे की प्रक्रिया क्या है और शिकायत करने पर किस अधिकारी से संपर्क करना है।
पाठा के लिए दीर्घकालिक समाधान का रास्ता भी स्पष्ट है—बार-बार बहने वाले रपटों की जगह स्थायी पुल, संवेदनशील गांवों के लिए ऊंचे संपर्क मार्ग, नदी किनारे बस्तियों का जोखिम मानचित्रण, ग्राम स्तर पर आपदा स्वयंसेवी तंत्र, बिजली-पेयजल की वैकल्पिक व्यवस्था और बाढ़ के बाद कृषि पुनर्वास की योजना।
क्योंकि पाठा की असली कहानी सिर्फ यह नहीं कि बरदहा नदी कब उफनी और कब उतरी। असली कहानी यह है कि नदी उतरने के बाद भी कितने घरों में चूल्हा नहीं जला, कितने खेत अगली फसल का इंतजार कर रहे हैं, कितने परिवार मुआवजे की सूची में अपना नाम खोज रहे हैं और कितने गांव अगली बारिश में फिर उसी रपटे के किनारे खड़े होंगे।
सवाल अब बाढ़ के पानी का नहीं, बाढ़ के बाद बची जिंदगी को सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से दोबारा खड़ा करने का है।













