16 अक्टूबर 2026 6:01 अपराह्न

बेटियां कब होंगी सुरक्षित?

संपादक अनिल अनूप की तस्वीर के साथ बेटियों की सुरक्षा, कानून व्यवस्था, न्याय और महिला सुरक्षा को दर्शाती संपादकीय फीचर इमेज

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संपादक अनिल अनूप

बिहार का एक सुनसान पहाड़ी इलाका और राजधानी दिल्ली का एक व्यस्त धार्मिक क्षेत्र। दोनों जगहों के बीच दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं है। एक तरफ छोटे शहर और ग्रामीण परिवेश से जुड़ा इलाका है, जहां संसाधनों और निगरानी की सीमाएं दिखाई देती हैं। दूसरी तरफ देश की राजधानी है, जहां आधुनिक परिवहन, बड़े बाजार, मेट्रो, कैमरों और विशाल पुलिस तंत्र की मौजूदगी है। लेकिन सितंबर 2026 में सामने आई दो घटनाओं ने इन तमाम भिन्नताओं के बीच एक बेहद गंभीर समानता खड़ी कर दी है।

एक घटना में कोचिंग से लौट रहे दो नाबालिगों को सुनसान पहाड़ी क्षेत्र में युवकों के एक समूह ने रोककर उनके साथ मारपीट और लड़की के साथ कथित यौन दुर्व्यवहार किया। घटना का वीडियो बनाया गया और उसके सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई तेज की। पुलिस के अनुसार मामले में तीन नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया और शेष संदिग्धों की पहचान तथा तलाश के लिए विशेष जांच दल बनाया गया। घटना 19 सितंबर की शाम की बताई गई है।

दूसरी ओर दिल्ली के कालकाजी क्षेत्र स्थित आस्था कुंज पार्क में 17 वर्षीय लड़की के साथ तीन लोगों द्वारा कथित सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। पुलिस के मुताबिक आरोपियों ने खुद को पुलिसकर्मी बताकर लड़की और उसके 17 वर्षीय मित्र को डराया-धमकाया और फिर लड़की को निशाना बनाया। बाद में पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी दी।

दोनों घटनाओं की कानूनी प्रकृति और परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए इन्हें एक ही अपराध की श्रेणी में रखकर देखना उचित नहीं होगा। लेकिन इनके पीछे छिपे कुछ सवाल समान हैं—सार्वजनिक स्थान कितना सुरक्षित है? पुलिस की मौजूदगी अपराध रोकने के लिए कितनी प्रभावी है? कानून का डर अपराधी तक कितनी जल्दी पहुंचता है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या हम लड़कियों की सुरक्षा का भार केवल लड़कियों के कंधों पर डालकर समाज को जिम्मेदारी से मुक्त कर सकते हैं?

सवाल बिहार बनाम दिल्ली का नहीं है

ऐसी घटनाओं के बाद बहस अक्सर तुरंत दो खेमों में बंट जाती है। कोई इसे किसी राज्य की कानून-व्यवस्था की विफलता बताता है तो कोई राजधानी में बढ़ती असुरक्षा का उदाहरण। राजनीतिक बयान आते हैं, प्रशासन सक्रिय होता है और सोशल मीडिया पर आक्रोश का दौर शुरू हो जाता है।

लेकिन कुछ दिनों बाद क्या होता है? एक नई खबर पुरानी खबर को पीछे छोड़ देती है। यही वह चक्र है जिसे तोड़ने की जरूरत है।

जमुई की घटना में पुलिस के मुताबिक पीड़ित किशोर-किशोरी कोचिंग के बाद पहाड़ी इलाके में गए थे। लौटते समय एक समूह ने उन्हें रोक लिया। वीडियो में कथित तौर पर युवकों द्वारा दोनों को घेरने, मारपीट और लड़की के साथ आपत्तिजनक व्यवहार के दृश्य सामने आए। पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की और जांच के लिए एसआईटी गठित की।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि घटना का वीडियो सामने आया। वीडियो ने पुलिस कार्रवाई को तेज करने में भूमिका निभाई। लेकिन हमें यह सवाल भी पूछना चाहिए कि यदि वीडियो नहीं बनता, यदि वह वायरल नहीं होता, यदि सोशल मीडिया पर आक्रोश पैदा नहीं होता, तो क्या जांच की रफ्तार वही रहती?

यह सवाल किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं है। यह पूरी व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का सवाल है। कानून-व्यवस्था का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस सक्रिय हो। आदर्श व्यवस्था वह है जिसमें अपराध होने से पहले पुलिस की मौजूदगी और निगरानी अपराधी को रोकने का काम करे।

दिल्ली की घटना ने दूसरी तरह की कमजोरी दिखाई

दिल्ली की घटना इस समस्या का दूसरा चेहरा सामने लाती है।

यहां आरोपियों ने कथित तौर पर पुलिस की वर्दी और अधिकार का भय पैदा किया। यानी अपराध करने वालों ने पुलिस से बचने के बजाय पुलिस होने का झूठा दावा करके उसी व्यवस्था के डर का इस्तेमाल किया जिसे नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। पुलिस के अनुसार लड़की और उसके मित्र को धमकाया गया और फिर लड़की के साथ अपराध किया गया। तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी पुलिस ने दी है।

यह घटना इसलिए भी गंभीर है कि यहां सवाल सिर्फ किसी पार्क में पुलिस की मौजूदगी का नहीं है। सवाल यह भी है कि नागरिकों को वास्तविक पुलिस और नकली पुलिस के बीच फर्क करने, आपात स्थिति में तुरंत सहायता लेने और सार्वजनिक स्थानों की निगरानी व्यवस्था पर कितना भरोसा है।

राजधानी में बड़ी पुलिस व्यवस्था होने के बावजूद यदि कोई व्यक्ति पुलिस का नाम लेकर किसी नाबालिग को भयभीत कर सकता है, तो यह पुलिसिंग के एक अलग पहलू की ओर संकेत करता है—कानून का अधिकार केवल वर्दी में नहीं, बल्कि नागरिक के भरोसे में भी दिखाई देना चाहिए।

कानून कठोर हैं, लेकिन क्या उनकी गति भी कठोर है?

भारत ने महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों से निपटने के लिए पिछले वर्षों में कानूनी ढांचा मजबूत किया है। पॉक्सो कानून बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में विशेष सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया का प्रावधान करता है। दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट भी स्थापित किए गए हैं।

लेकिन कानून की किताब में मौजूद सख्ती और अदालत में होने वाली वास्तविक प्रक्रिया के बीच दूरी अब भी बड़ी चुनौती है।

अप्रैल 2026 तक उपलब्ध संसदीय शोध के अनुसार दुष्कर्म और पॉक्सो मामलों के लिए 775 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट काम कर रहे थे, जिनमें 398 विशेष रूप से पॉक्सो मामलों के लिए थे। इसके बावजूद इन अदालतों में लंबित मामलों की संख्या दो लाख से अधिक रही। 2025 के अंत तक इन फास्ट ट्रैक अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 2,45,579 तक पहुंच गई थी।

अगस्त 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विभिन्न राज्यों में फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों में पॉक्सो मामलों के निपटारे में औसत समय काफी अलग-अलग रहा। आंध्र प्रदेश में यह औसत 257 दिन था, जबकि दिल्ली में 1,717 दिन तक पहुंच गया। यहां सवाल फास्ट ट्रैक अदालतों के अस्तित्व का नहीं, उनकी वास्तविक क्षमता का है।

यदि किसी बच्चे के साथ अपराध होता है और न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं, तो कानून की कठोरता का सामाजिक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। अपराधी के लिए सजा की निश्चितता और समयबद्धता, केवल सजा की अधिकतम अवधि से कम महत्वपूर्ण नहीं है।

कानून का डर तभी पैदा होता है जब व्यक्ति को यह विश्वास हो कि अपराध के बाद जांच होगी, गिरफ्तारी होगी, मुकदमा चलेगा और उचित प्रक्रिया के बाद सजा भी होगी।

फास्ट ट्रैक का मतलब सिर्फ अदालत का नाम नहीं

फास्ट ट्रैक अदालत बनाना पहला कदम है। उसके बाद कई कड़ियां जुड़ती हैं।

पुलिस को समय पर जांच पूरी करनी है। फोरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित करने हैं। गवाहों के बयान दर्ज करने हैं। अभियोजन को मजबूत तरीके से पैरवी करनी है। अदालत को पर्याप्त न्यायिक और प्रशासनिक संसाधन मिलने चाहिए। गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है। पीड़ित बच्चे या महिला को बार-बार मानसिक दबाव से बचाना है। इनमें से किसी एक कड़ी के कमजोर होने पर पूरी प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।

अदालतों में देरी के कई कारण सामने आते रहे हैं—आरोपियों या गवाहों की अनुपस्थिति, पुलिस द्वारा आरोपियों को समय पर पेश न कर पाना, बार-बार स्थगन, अदालतों और कर्मचारियों की कमी तथा केस मैनेजमेंट से जुड़ी समस्याएं।

इसलिए अब सवाल यह होना चाहिए कि फास्ट ट्रैक अदालतें कितनी हैं, इसके साथ यह भी पूछा जाए कि वे कितनी तेजी से काम कर रही हैं और उनकी क्षमता के अनुपात में उनके सामने कितने मामले हैं।

महिला पुलिस की संख्या बढ़ी, लेकिन सवाल खत्म नहीं हुआ

महिलाओं की सुरक्षा पर चर्चा करते समय महिला पुलिसकर्मियों की संख्या का सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।

बिहार इस मामले में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। बिहार पुलिस के आंकड़ों के अनुसार राज्य में महिला पुलिसकर्मियों की संख्या लगभग 30 हजार तक पहुंच चुकी है। 2024 में तत्कालीन डीजीपी आरएस भट्टी ने बताया था कि करीब 30 हजार महिलाएं बिहार पुलिस में काम कर रही थीं और उनमें 223 महिलाएं विभिन्न थानों में थाना प्रभारी या अतिरिक्त थाना प्रभारी के रूप में तैनात थीं।

केंद्र सरकार और पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो के उपलब्ध आंकड़ों में भी बिहार की महिला पुलिस हिस्सेदारी कई राज्यों की तुलना में अधिक दिखाई देती है। 1 जनवरी 2023 के आंकड़ों के अनुसार बिहार पुलिस में महिला पुलिसकर्मियों की वास्तविक संख्या 24,295 और कुल पुलिस बल में उनकी हिस्सेदारी 23.66 प्रतिशत थी। इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है।

महिला पुलिस की संख्या बढ़ना जरूरी है, लेकिन केवल संख्या बढ़ जाने से महिलाओं के खिलाफ अपराध अपने आप खत्म नहीं हो जाते।

पुलिस बल में महिलाओं की मौजूदगी शिकायत दर्ज कराने और पीड़ितों से संवाद में मदद कर सकती है। लेकिन अपराध रोकने के लिए गश्त, जांच की गुणवत्ता, प्रतिक्रिया का समय, संवेदनशीलता, तकनीकी निगरानी और अभियोजन की मजबूती भी उतनी ही आवश्यक हैं। यानी महिला पुलिसकर्मी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, पूरी व्यवस्था नहीं।

जमुई हमें विजिबल पुलिसिंग का पाठ पढ़ाता है

सुनसान जगहों की सुरक्षा के लिए सिर्फ थाने में बैठी पुलिस पर्याप्त नहीं है।

जहां लोग कम आते-जाते हैं, वहां अपराधी को अवसर मिलता है। ऐसे स्थानों पर नियमित गश्त, स्थानीय पुलिस की जानकारी, संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था और जरूरत के मुताबिक सीसीटीवी जैसी तकनीक उपयोगी हो सकती है। जमुई की घटना ने यह सवाल सामने रखा है कि ऐसे इलाकों में पुलिस की गश्ती व्यवस्था कैसी थी।

यह सवाल किसी एक पुलिस अधिकारी पर दोष मढ़ने के लिए नहीं, बल्कि पुलिसिंग के मॉडल की समीक्षा के लिए है।

हर शहर और जिले में कुछ ऐसे स्थान होते हैं जहां स्कूल-कॉलेज से लौटने वाले बच्चे, कामकाजी महिलाएं, पर्यटक या स्थानीय लोग नियमित रूप से आते-जाते हैं। ऐसे स्थानों को केवल नक्शे पर मौजूद सड़क या पार्क मानना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सुरक्षा के नजरिए से भी चिन्हित करना होगा।

विजिबल पुलिसिंग का अर्थ केवल सड़क पर पुलिस की गाड़ी खड़ी करना नहीं है।

इसका अर्थ है कि नागरिक को यह दिखाई दे कि क्षेत्र निगरानी में है और आपात स्थिति में सहायता कुछ मिनटों में पहुंच सकती है।

बच्चों को सुरक्षा की शिक्षा कौन देगा?

यहां बहस कानून और पुलिस से आगे बढ़ती है। जमुई मामले में गिरफ्तार किए गए तीन आरोपी नाबालिग बताए गए हैं। पुलिस और मीडिया रिपोर्टों में उनकी उम्र 14 से 17 वर्ष के बीच बताई गई है। यह तथ्य समाज के लिए एक अलग तरह की चेतावनी है।

यदि कम उम्र के बच्चे किसी लड़की को घेरना, उसे अपमानित करना, उसके शरीर को अपनी इच्छा से छूना या उसकी बेबसी को मनोरंजन समझना सीख रहे हैं, तो केवल पुलिस कार्रवाई से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। हमें घर, स्कूल और समाज में लड़कों की परवरिश के तरीके पर भी बात करनी होगी।

हम बेटियों को बताते हैं— कहां जाना है, कहां नहीं जाना। किससे बात करनी है। किस समय घर लौटना है। कपड़े कैसे पहनने हैं। अकेले बाहर नहीं निकलना है। मोबाइल साथ रखना है। लोकेशन साझा करनी है।

लेकिन क्या हम बेटों से उतनी ही गंभीरता से कहते हैं— किसी की अनुमति के बिना उसे छूना अपराध हो सकता है। ‘ना’ का अर्थ हमेशा ‘ना’ है।

किसी लड़की के साथ खड़े होने, घूमने या बात करने से उसे अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं मिलता।

किसी की निजी तस्वीर या वीडियो बनाना मनोरंजन नहीं है। किसी को घेर लेना बहादुरी नहीं, भीड़ की ताकत का दुरुपयोग है। किसी लड़की की असहमति पर उसका पीछा करना प्रेम नहीं है। यही वह शिक्षा है जिसे घर और स्कूल दोनों जगह सामान्य बातचीत का हिस्सा बनाना होगा।

अपराध के वीडियो को वायरल करना दूसरी हिंसा है

जमुई की घटना में वीडियो ने पुलिस जांच में मदद की, लेकिन इसी घटना ने सोशल मीडिया की एक भयावह भूमिका भी सामने रखी।

पीड़ित बच्चों की पहचान उजागर करने वाले वीडियो का प्रसार उनके लिए दूसरी पीड़ा बन सकता है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी मामले में वीडियो के प्रसार और पीड़िता की पहचान सुरक्षित रखने की जरूरत पर जोर दिया था। यहां समाज को समझना होगा कि किसी अपराध का वीडियो देखना और उसे आगे भेजना दो अलग बातें हैं।

पहला कभी-कभी सूचना पाने की मजबूरी हो सकता है। दूसरा किसी पीड़ित की गरिमा को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।

जिस लड़की के साथ अपराध हुआ, वह जिंदगी भर उस घटना के साथ जी सकती है। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो उसके लिए उस घटना को बार-बार दोहराने जैसा हो सकता है।

इसलिए पत्रकारिता और नागरिक व्यवहार दोनों में यह जिम्मेदारी जरूरी है कि अपराध की सूचना दी जाए, लेकिन पीड़ित की पहचान और गरिमा की रक्षा की जाए।

पुलिस का डर और पुलिस पर भरोसा—दोनों जरूरी हैं

कानून-व्यवस्था की चर्चा में अक्सर कहा जाता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का डर होना चाहिए।

बिल्कुल होना चाहिए। लेकिन जनता के मन में पुलिस का भरोसा भी उतना ही जरूरी है। डर अपराधी के लिए होना चाहिए, पीड़ित के लिए नहीं। दिल्ली की घटना में आरोपियों द्वारा कथित तौर पर पुलिस बनकर धमकाने का आरोप सामने आया।

यह हमें इस मूल सिद्धांत की याद दिलाता है कि वर्दी का सम्मान तभी कायम रहता है जब उसका इस्तेमाल कानून की रक्षा के लिए हो। नकली पुलिस बनकर अपराध करना उस सम्मान को ही हथियार बनाने जैसा है।

इसलिए पुलिसिंग का अगला चरण केवल अधिक पुलिसकर्मी नियुक्त करना नहीं, बल्कि नागरिकों को यह भरोसा दिलाना भी होना चाहिए कि वास्तविक पुलिस की पहचान, सहायता और प्रतिक्रिया व्यवस्था स्पष्ट और विश्वसनीय है।

चार मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा।

पहला मोर्चा है कानून। कानून स्पष्ट, कठोर और पीड़ित-केंद्रित होना चाहिए। दूसरा मोर्चा है पुलिस। एफआईआर से लेकर जांच और गश्त तक पूरी व्यवस्था जवाबदेह होनी चाहिए। तीसरा मोर्चा है न्यायपालिका। फास्ट ट्रैक अदालतों का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब पर्याप्त न्यायिक क्षमता, अभियोजन और प्रशासनिक संसाधन उपलब्ध हों। चौथा और सबसे कठिन मोर्चा है परवरिश और सामाजिक मानसिकता।

यही वह क्षेत्र है जहां किसी सरकारी आदेश का सीधा असर नहीं होता। यहां परिवार, स्कूल, समाज, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म सभी की भूमिका है।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि अपराधी पकड़े गए या नहीं

जमुई में पुलिस ने तीन नाबालिग आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी है और एसआईटी जांच कर रही है। दिल्ली में पुलिस ने तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की जानकारी दी है। यह कार्रवाई जरूरी है। लेकिन किसी भी घटना के बाद हमारी सफलता का पैमाना सिर्फ गिरफ्तारियों की संख्या नहीं होना चाहिए।

सवाल यह होना चाहिए— क्या पीड़िता सुरक्षित है?

क्या उसकी पहचान सुरक्षित रखी गई? क्या मेडिकल और मनोवैज्ञानिक सहायता मिली? क्या जांच समय पर पूरी होगी? क्या मुकदमा वर्षों तक लंबित रहेगा? क्या गवाहों की सुरक्षा होगी? क्या उस स्थान पर दोबारा ऐसी घटना रोकने के लिए व्यवस्था बदली जाएगी? क्या स्कूलों और परिवारों में बच्चों को लैंगिक सम्मान की शिक्षा मिलेगी?

और सबसे अहम—

क्या अगली लड़की को सुरक्षित रखने के लिए उस घटना से कोई संस्थागत सीख निकाली गई?

विकास की असली परीक्षा सड़क और इमारत से आगे है

हम अक्सर विकास को सड़क, पुल, मेट्रो, बाजार, इंटरनेट और बड़ी इमारतों से मापते हैं। लेकिन किसी समाज की वास्तविक प्रगति का एक पैमाना यह भी है कि वहां एक लड़की कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के साथ सार्वजनिक स्थान पर जा सकती है।

यदि सुनसान पहाड़ी पर लड़की असुरक्षित है तो वहां पुलिसिंग की समस्या है। यदि राजधानी के पार्क में लड़की असुरक्षित है तो वहां सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा की समस्या है। यदि स्कूल जाते समय बच्ची असुरक्षित है तो रास्ते और समुदाय की समस्या है। यदि शिकायत करने के बाद पीड़िता डरती है तो संस्थागत भरोसे की समस्या है।

और यदि अपराध करने वाले कम उम्र के बच्चे हैं, तो यह समाज की परवरिश की समस्या भी है। इसलिए इसे बिहार बनाम दिल्ली की बहस बनाना आसान है, लेकिन अधूरा भी।

असली बहस यह होनी चाहिए कि भारत के किसी भी गांव, कस्बे, शहर, पार्क, मंदिर, स्कूल मार्ग या सार्वजनिक स्थल को महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने की हमारी सामूहिक क्षमता कितनी है।

बेटियों से सवाल पूछना बंद, बेटों से सवाल शुरू

किसी लड़की के साथ अपराध होने के बाद समाज अक्सर पूछता है— वह वहां क्यों गई? इतनी देर से क्यों निकली? उसके साथ कौन था? उसने मदद क्यों नहीं मांगी? उसने विरोध क्यों नहीं किया?

इन सवालों में कुछ व्यावहारिक सुरक्षा संदर्भ हो सकते हैं, लेकिन इन्हें अपराध का कारण नहीं बनाया जा सकता। मूल प्रश्न हमेशा यह होना चाहिए—

अपराध करने वाले ने अपराध क्यों किया?

किसी लड़की का किसी स्थान पर होना अपराध का निमंत्रण नहीं है। किसी लड़की का किसी लड़के के साथ होना किसी तीसरे व्यक्ति को उसे अपमानित करने का अधिकार नहीं देता। किसी किशोरी का अकेले चलना उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी समाज से खत्म नहीं करता। और किसी बच्चे की उम्र अपराध को सामान्य नहीं बनाती। यही सोच हमें कानून से लेकर परिवार तक बदलनी होगी।

आखिरी सवाल : क्या हम सिर्फ घटना के बाद जागेंगे?

जमुई की पहाड़ी और दिल्ली का पार्क हमें एक साथ एक कठिन सवाल दे रहे हैं।

एक जगह पुलिस की गश्त पर सवाल उठता है। दूसरी जगह पुलिस की पहचान का इस्तेमाल करके अपराध किए जाने का आरोप सामने आता है। एक मामले में सोशल मीडिया वीडियो कार्रवाई का कारण बना। दूसरे में राजधानी की आधुनिकता के बीच सार्वजनिक स्थान की सुरक्षा पर प्रश्न खड़ा हुआ। दोनों मामलों में पीड़ित नाबालिग हैं। दोनों मामलों ने समाज के सामने एक ही बड़ी चिंता रखी है—बच्चियों की सुरक्षा आखिर किसकी जिम्मेदारी है?

जवाब है—सबकी। लेकिन ‘सबकी’ कह देने से जिम्मेदारी तय नहीं होती।

सरकार को पुलिसिंग सुधारनी होगी। पुलिस को गश्त और प्रतिक्रिया मजबूत करनी होगी। जांच एजेंसियों को समयबद्ध जांच करनी होगी। अदालतों को पर्याप्त संसाधन देने होंगे। स्कूलों को लैंगिक संवेदनशीलता की शिक्षा को व्यवहारिक बनाना होगा। परिवारों को बेटों और बेटियों के लिए अलग-अलग नैतिक पैमाने छोड़ने होंगे। सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को पीड़ित की गरिमा समझनी होगी।

और समाज को यह स्वीकार करना होगा कि किसी लड़की की सुरक्षा उसके कपड़े, समय, दोस्त या स्थान से तय नहीं होती।

सुरक्षा का अर्थ यह है कि कानून उसके साथ खड़ा हो, पुलिस समय पर पहुंचे, अदालत समय पर सुने और समाज अपराधी के बजाय पीड़ित से सवाल पूछने की आदत छोड़े।

जमुई और दिल्ली की घटनाओं के बीच जमीन, विकास, संसाधन और वातावरण का अंतर बहुत बड़ा है। लेकिन इन दोनों घटनाओं से निकलने वाला सामाजिक संदेश एक ही दिशा में जाता है—अपराध केवल अंधेरे और पिछड़े इलाकों में पैदा नहीं होता। वह आधुनिक शहर के भीतर भी रास्ता बना सकता है।

इसलिए समाधान भी केवल किसी एक राज्य, किसी एक सरकार या किसी एक पुलिस थाने में नहीं खोजा जा सकता। कानून की सख्ती जरूरी है। कानून की तेजी उससे भी जरूरी है। पुलिस की संख्या जरूरी है। पुलिस की दृश्य मौजूदगी और संवेदनशीलता उससे भी जरूरी है। महिला पुलिसकर्मियों की भागीदारी जरूरी है।

लेकिन इन सबसे ऊपर वह सामाजिक शिक्षा जरूरी है जिसमें लड़के को यह बचपन से समझाया जाए कि किसी लड़की की इच्छा, उसकी गरिमा और उसकी स्वतंत्रता पर उसका कोई अधिकार नहीं है।

जब यह बात घर में सामान्य होगी, स्कूल में सामान्य होगी, समाज में सामान्य होगी और कानून में निश्चित होगी—तभी शायद वह दिन आएगा जब किसी सुनसान पहाड़ी या राजधानी के किसी पार्क की खबर पढ़ते हुए हमें यह सवाल नहीं पूछना पड़ेगा कि “आखिर लड़कियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं?”

तब सवाल बदलेगा। तब समाज पूछेगा—“अपराध करने की हिम्मत किसी ने की कैसे?” और यही बदलाव केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, समाज की वास्तविक प्रगति का संकेत होगा।

संपादकीय टिप्पणी

महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर बहस केवल घटना के बाद होने वाला शोर नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक घटना से पुलिसिंग, न्याय व्यवस्था, सार्वजनिक स्थानों की निगरानी और सामाजिक परवरिश के स्तर पर स्थायी सुधार की सीख निकलनी चाहिए।

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