20 अक्टूबर 2026 6:02 पूर्वाह्न

लाखों रुपये खर्च, फिर भी गांवों की बदहाली बरकरार; कीचड़युक्त रास्ते और बजबजाती नालियां खोल रहीं विकास की पोल

संजय सिंह राणा की रिपोर्ट में गांवों की कीचड़युक्त सड़कों, गंदगी से भरी नालियों और जलभराव के बीच ग्रामीण विकास की जमीनी स्थिति

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संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

चित्रकूट। गांवों के विकास पर हर साल लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि ग्रामीणों को अपने घरों तक पहुंचने के लिए कीचड़ और गंदगी से होकर गुजरना पड़े, नालियां कचरे से अटी पड़ी हों और बारिश होते ही रास्ते जलभराव में बदल जाएं, तो सवाल केवल सुविधाओं की कमी का नहीं बल्कि विकास कार्यों की निगरानी और जवाबदेही का भी उठता है। ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही बदहाल सड़कों, गंदगी से बजबजाती नालियों और जलनिकासी की समस्या ने विकास कार्यों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कागजों पर विकास की योजनाएं लगातार आगे बढ़ रही हैं, लेकिन गांव की गलियों में हालात कई जगह इसके उलट दिखाई दे रहे हैं।

जिले में 339 ग्राम पंचायतें और 653 गांव हैं। इतने बड़े ग्रामीण क्षेत्र में सड़क, नाली, सफाई और जलनिकासी जैसी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त रखना निश्चित रूप से बड़ी जिम्मेदारी है। इसके लिए ग्राम पंचायतों को अलग-अलग योजनाओं और वित्तीय स्रोतों से धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। इसके बावजूद यदि किसी गांव की मुख्य गली में बरसात के दिनों में घुटनों तक कीचड़ हो जाए अथवा घरों के सामने गंदा पानी जमा रहे, तो यह व्यवस्था की नियमित निगरानी पर सवाल खड़ा करता है।

विकास कार्यों पर खर्च का असर जमीन पर क्यों नहीं?

ग्राम पंचायतों में सड़क, नाली, खड़ंजा, इंटरलॉकिंग, जलनिकासी और स्वच्छता जैसे कार्यों के लिए लगातार धन खर्च किया जाता है। पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य भी यही है कि गांव की स्थानीय जरूरतों के मुताबिक विकास कार्य कराए जाएं और ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं उनके घर के आसपास उपलब्ध हों।

वित्तीय वर्ष 2026-27 में प्रदेश स्तर पर पंचायती राज से संबंधित योजनाओं के लिए करीब 32 हजार करोड़ रुपये से अधिक की व्यवस्था की गई है। वहीं ग्रामीण स्वच्छता व्यवस्था को मजबूत करने के लिए स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के दूसरे चरण के तहत भी हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इतनी बड़ी वित्तीय व्यवस्था के बावजूद गांवों में यदि नाली की सफाई, जलनिकासी और रास्तों की समस्या बनी हुई है, तो स्थानीय स्तर पर योजना के क्रियान्वयन और निगरानी की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

सवाल यह नहीं है कि विकास के लिए धन उपलब्ध है या नहीं। सवाल यह है कि जो धन स्वीकृत हुआ, उसका कितना हिस्सा वास्तविक काम में लगा और उस काम का लाभ ग्रामीणों को कितना मिला?

नाली बनी, लेकिन पानी फिर भी रास्ते पर

गांवों में सबसे गंभीर समस्या जलनिकासी की दिखाई देती है। कई जगह नालियां तो बना दी जाती हैं, लेकिन उनमें नियमित सफाई नहीं होने से कुछ ही समय में कचरा जमा हो जाता है। प्लास्टिक, घरेलू कचरा, मिट्टी और अन्य अपशिष्ट नालियों को बंद कर देते हैं। परिणामस्वरूप पानी नाली से निकलने के बजाय सड़क और गलियों में फैलने लगता है।

बरसात के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है। पानी और कीचड़ के कारण ग्रामीणों का आवागमन प्रभावित होता है। पैदल चलना मुश्किल हो जाता है और दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। सबसे अधिक परेशानी बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार लोगों को उठानी पड़ती है।

कई स्थानों पर स्थिति ऐसी हो जाती है कि ग्रामीणों को अपने घर से मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए गंदे पानी और कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है। लंबे समय तक पानी जमा रहने से सड़क भी टूटने लगती है और समस्या एक बार फिर वहीं पहुंच जाती है जहां से शुरुआत हुई थी।

सफाई व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित न रहे

गांवों में सफाई व्यवस्था के लिए कर्मचारियों की तैनाती और कचरा उठाने की व्यवस्था की गई है। ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर भी अलग-अलग स्तर पर योजनाएं संचालित हैं। सरकारी डिजिटल व्यवस्था में ग्राम पंचायतों के स्तर पर कचरा प्रबंधन, सेग्रीगेशन शेड, कचरा संग्रहण और ग्रे-वाटर प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं का विवरण दर्ज किया जाता है।

उपलब्ध आंकड़ों में जिले की बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतों और राजस्व गांवों को इन व्यवस्थाओं से जोड़ा गया है। लेकिन आंकड़ों में किसी गांव का नाम दर्ज होना और जमीन पर व्यवस्था का प्रभावी ढंग से चलना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही वजह है कि वास्तविक स्थिति की नियमित जांच बेहद जरूरी है। यदि किसी गांव में कचरा संग्रहण वाहन दर्ज है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि वह वास्तव में कितने दिन गांव में पहुंचता है। यदि नाली निर्माण पूरा बताया गया है तो यह भी जांचना जरूरी है कि उसमें पानी का प्रवाह हो रहा है या नहीं। यदि सफाई व्यवस्था संचालित है तो गांव की गलियों और नालियों में उसकी मौजूदगी दिखाई भी देनी चाहिए।

बरसात में सामने आती है असली तस्वीर

ग्रामीण विकास कार्यों की वास्तविक परीक्षा बारिश के मौसम में होती है। गर्मी में जिस सड़क की खराबी किसी तरह नजरअंदाज हो जाती है, वही बारिश में कीचड़ और जलभराव के कारण ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या बन जाती है।

सड़क निर्माण के दौरान यदि उचित ढलान नहीं है या दोनों किनारों पर जलनिकासी की व्यवस्था नहीं है तो बारिश का पानी सड़क पर जमा होता रहता है। इससे सड़क की सतह कमजोर होती है और धीरे-धीरे गड्ढे बनने लगते हैं। नाली में पानी का प्राकृतिक बहाव बाधित होने पर वही पानी आसपास के घरों की ओर पहुंच सकता है।

ऐसी स्थिति में केवल सड़क बनाना विकास नहीं कहा जा सकता। सड़क के साथ नाली, जलनिकासी और नियमित रखरखाव की व्यवस्था भी जरूरी है।

ग्रामीणों के घरों तक पहुंचना भी विकास की कसौटी

विकास की सबसे बड़ी कसौटी यह है कि उसका लाभ आम आदमी के जीवन में दिखाई दे। गांव में सड़क बनी है तो ग्रामीणों को सालभर सुरक्षित आवागमन मिलना चाहिए। नाली बनी है तो घरों और रास्तों का पानी उसमें बहना चाहिए। सफाई कर्मचारी तैनात हैं तो नियमित सफाई होनी चाहिए और कचरा संग्रहण की व्यवस्था है तो कचरा खुले में जमा नहीं होना चाहिए।

यदि किसी गांव में विकास कार्य कराने के बाद भी ग्रामीण उसी तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनसे उन्हें पहले परेशानी होती थी, तो कार्यों की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों का कहना है कि विकास कार्यों की घोषणा और कागजी प्रक्रिया के साथ-साथ उनके रखरखाव पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। एक बार सड़क या नाली बना देने के बाद उसे वर्षों तक छोड़ देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

ग्राम सभा में सामने आए विकास कार्यों का पूरा हिसाब

विकास कार्यों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए ग्राम सभा को अधिक प्रभावी बनाया जाना जरूरी है। ग्रामीणों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि उनके गांव में किस कार्य के लिए कितनी राशि स्वीकृत हुई, कितना भुगतान किया गया, कार्य कब पूरा हुआ और उसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई।

ग्राम सभा में कार्यों की प्राथमिकता भी ग्रामीणों की जरूरत के आधार पर तय होनी चाहिए। यदि किसी गांव में नई सजावटी परियोजना से ज्यादा जरूरी जलनिकासी और सड़क की मरम्मत है, तो पहले बुनियादी समस्या का समाधान होना चाहिए।

इसी तरह पुराने कार्यों की स्थिति का भी समय-समय पर मूल्यांकन जरूरी है। नई नाली बनाने के बजाय यदि पुरानी नाली की सफाई और मरम्मत से समस्या हल हो सकती है तो उसी दिशा में धन खर्च किया जाना अधिक उपयोगी हो सकता है।

निरीक्षण और सोशल ऑडिट से तय हो जवाबदेही

ग्रामीण विकास कार्यों की निगरानी केवल कार्यालयों में बैठकर नहीं हो सकती। अधिकारियों को मौके पर जाकर वास्तविक स्थिति देखनी होगी। सड़क की गुणवत्ता, नाली की स्थिति, जलनिकासी, सफाई व्यवस्था और कचरा प्रबंधन का भौतिक सत्यापन किया जाना चाहिए।

सोशल ऑडिट भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ग्रामीणों से सीधे पूछा जाए कि उनके गांव में कौन-कौन से काम हुए, कितने काम उपयोगी हैं और किन कार्यों में कमियां हैं। इससे कागजी रिकॉर्ड और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर सामने आ सकता है।

जहां काम में कमी मिले, वहां उसे ठीक कराया जाए। जहां निर्माण की गुणवत्ता खराब मिले, वहां संबंधित जिम्मेदारों से जवाब मांगा जाए। और यदि जांच में वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होती है तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।

सवाल सिर्फ सड़क और नाली का नहीं, भरोसे का भी है

गांव की टूटी सड़क और गंदी नाली दिखाई देने वाली समस्या है, लेकिन इसके पीछे ग्रामीणों का सरकारी व्यवस्था पर भरोसा भी जुड़ा है। जब किसी विकास कार्य पर पैसा खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों की समस्या जस की तस रहती है तो उनके मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास का लाभ उन तक क्यों नहीं पहुंच रहा।

गांवों की साफ-सफाई कोई असंभव काम नहीं है। नियमित निगरानी, जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण, समय पर सफाई, नालियों की सफाई और जलनिकासी की उचित व्यवस्था से बड़ी समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।

जरूरत इस बात की है कि विकास कार्यों को केवल निर्माण और भुगतान तक सीमित न माना जाए, बल्कि उनकी उपयोगिता और टिकाऊपन को भी विकास का हिस्सा बनाया जाए।

अब जमीन पर दिखना चाहिए विकास

ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए संसाधनों और योजनाओं की कमी नहीं है। चुनौती यह है कि इन योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी तरीके से पहुंचे। गांव की गलियों में कीचड़ न हो, नालियां कचरे से न बजबजाएं, बारिश का पानी घरों में न घुसे और ग्रामीणों को अपने घर से मुख्य सड़क तक पहुंचने में परेशानी न हो—यही वास्तविक विकास की बुनियादी पहचान है।

अब जरूरत है कि विकास कार्यों की नियमित समीक्षा के साथ जवाबदेही की व्यवस्था मजबूत की जाए। ग्राम पंचायत से लेकर विकासखंड और जिला स्तर तक जिम्मेदार अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि स्वीकृत कार्य केवल कागजों में पूरे न हों, बल्कि उनका असर गांव की जमीन पर भी दिखाई दे।

क्योंकि आखिरकार विकास की पहचान फाइलों में दर्ज आंकड़ों से नहीं, बल्कि गांव की साफ गलियों, मजबूत सड़कों, साफ नालियों और सुरक्षित आवागमन से होती है। ग्रामीणों को घोषणाओं से ज्यादा अपने आसपास बदलाव चाहिए। यही सवाल अब सबसे बड़ा है—जब विकास पर लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो उसका असर गांव की गलियों में कब दिखाई देगा?

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