प्राइम न्यूज़

पंचायत चुनाव पर बढ़ता सस्पेंस! क्या यूपी में इस साल नहीं होंगे त्रिस्तरीय चुनाव?

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर अब बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सस्पेंस खड़ा हो गया है। प्रदेश की ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों और जिला पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह संभावना बेहद कम दिखाई दे रही है कि राज्य में इस साल पंचायत चुनाव कराए जा सकें।

योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से हाल ही में समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी दिए जाने के बाद चुनावी प्रक्रिया एक बार फिर लंबी होती नजर आ रही है। सरकार का कहना है कि पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण का निर्धारण आयोग की रिपोर्ट के आधार पर किया जाएगा। ऐसे में अब चुनाव की पूरी प्रक्रिया आयोग की रिपोर्ट, आरक्षण निर्धारण और आपत्तियों के निस्तारण पर निर्भर हो गई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आयोग को अपनी रिपोर्ट देने में छह महीने का समय लगता है, तो पंचायत चुनाव अगले साल विधानसभा चुनाव के बाद ही संभव हो पाएंगे।

ओबीसी आयोग के गठन से बढ़ी चुनाव में देरी की आशंका

प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई और अवमानना की कार्रवाई के बीच समर्पित ओबीसी आयोग के गठन को मंजूरी दी। यह कदम ऐसे समय उठाया गया जब पंचायत चुनाव को लेकर सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा था।

दरअसल, पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है। इसी वजह से सरकार ने आयोग गठित किया है, जो पंचायत स्तर पर पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी का अध्ययन करेगा और अपनी सिफारिशें देगा।

सरकार ने आयोग को छह महीने का कार्यकाल दिया है। यानी आयोग को सर्वे, आंकड़ों के विश्लेषण और रिपोर्ट तैयार करने में लंबा समय लग सकता है। इसके बाद सरकार आरक्षण सूची जारी करेगी, फिर उस पर आपत्तियां मांगी जाएंगी और उनका निस्तारण होगा। पूरी प्रक्रिया कई महीनों तक खिंच सकती है।

हाई कोर्ट की सख्ती के बाद तेज हुई सरकारी गतिविधियां

पंचायत चुनाव में हो रही देरी को लेकर कई ग्राम प्रधान संगठनों और सामाजिक संगठनों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इसी क्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौरभ लावणिया ने पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव को अवमानना नोटिस जारी किया था।

अदालत ने सरकार से पूछा था कि ओबीसी आयोग के गठन में देरी क्यों हो रही है और पंचायत चुनाव की प्रक्रिया कब तक पूरी की जाएगी। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को प्रस्तावित थी।

माना जा रहा है कि इसी दबाव के चलते सरकार ने सुनवाई से ठीक पहले आयोग गठन का फैसला लिया। हालांकि आयोग बनने के बाद चुनाव की प्रक्रिया और लंबी हो गई है।

पंचायत प्रतिनिधियों में बढ़ी बेचैनी

प्रदेश भर के ग्राम प्रधान, बीडीसी सदस्य और जिला पंचायत प्रतिनिधि लंबे समय से समय पर चुनाव कराने की मांग कर रहे थे। कई संगठनों ने लखनऊ में धरना-प्रदर्शन भी किया और सरकार को ज्ञापन सौंपे।

वर्तमान जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि समय पर चुनाव नहीं हो पाते हैं तो सरकार को मध्य प्रदेश और राजस्थान की तर्ज पर कार्यवाहक व्यवस्था लागू करनी चाहिए। उनकी मांग है कि मौजूदा ग्राम प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों को प्रशासकीय और वित्तीय अधिकारों के साथ कार्य जारी रखने दिया जाए।

सूत्रों के मुताबिक पंचायती राज विभाग ने शासन को एक प्रस्ताव भेजा है, जिसमें प्रशासक समिति गठित करने और वर्तमान प्रतिनिधियों को अस्थायी जिम्मेदारी देने पर विचार किया गया है।

यूपी में पंचायत व्यवस्था कितनी बड़ी?

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा पंचायत ढांचा रखने वाला राज्य है। यहां त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के तहत बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों का चुनाव होता है।

प्रदेश में वर्तमान समय में:

  • 75 जिला पंचायतें
  • 3,051 जिला पंचायत सदस्य
  • 826 क्षेत्र पंचायतें
  • 75,855 बीडीसी सदस्य
  • 57,695 ग्राम पंचायतें मौजूद हैं।

इन सभी पंचायतों का कार्यकाल 27 मई 2021 से शुरू हुआ था, जो 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है। इतने विशाल स्तर पर चुनाव कराने के लिए मतदाता सूची, आरक्षण, बूथ निर्धारण और प्रशासनिक तैयारियों की लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होती है। लेकिन फिलहाल इनमें से अधिकांश कार्य अधूरे हैं।

मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन भी अधर में

राज्य निर्वाचन आयोग अभी तक पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित नहीं कर पाया है। आयोग ने अंतिम प्रकाशन के लिए 10 जून की तारीख तय की है, लेकिन इस पर भी संशय बना हुआ है।

दरअसल प्रदेश में 22 मई से जनगणना के पहले चरण की शुरुआत हो रही है, जो 20 जून तक चलेगा। इस दौरान मकानों की गणना और सूचीकरण का काम किया जाएगा। इसमें बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी लगाए जाएंगे।

चूंकि पंचायत चुनाव और जनगणना दोनों प्रक्रियाओं में प्रशासनिक मशीनरी की जरूरत पड़ती है, इसलिए संभावना जताई जा रही है कि मतदाता सूची का प्रकाशन फिर टल सकता है।

क्या विधानसभा चुनाव बन रहे हैं बड़ी वजह?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत चुनाव में देरी के पीछे सिर्फ प्रशासनिक कारण ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति भी शामिल हो सकती है।

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों ही पंचायत चुनाव के राजनीतिक असर को लेकर सतर्क दिखाई दे रहे हैं। पंचायत चुनाव को अक्सर विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जाता है।

यदि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव से पहले होते हैं और किसी दल को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, तो उसका असर बड़े चुनावों पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि राजनीतिक दल फिलहाल पंचायत चुनाव को टालने में नुकसान नहीं देख रहे।

सरकार की प्राथमिकता में जनगणना और विधानसभा चुनाव

वर्तमान हालात को देखकर ऐसा लगता है कि राज्य सरकार की प्राथमिकता फिलहाल पंचायत चुनाव नहीं, बल्कि जनगणना और आगामी विधानसभा चुनाव हैं।

एक तरफ ओबीसी आयोग की प्रक्रिया लंबी है, दूसरी तरफ मतदाता सूची और प्रशासनिक तैयारियां अधूरी हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव इस साल कराना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यदि आयोग छह महीने बाद अपनी रिपोर्ट देता है, तो उसके बाद आरक्षण प्रक्रिया और चुनावी तैयारियों में अतिरिक्त समय लगेगा। तब तक विधानसभा चुनाव का माहौल पूरी तरह बन चुका होगा।

अगले साल तक खिंच सकता है पंचायत चुनाव

मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए यह माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव अब 2027 विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं।

हालांकि सरकार की ओर से अभी तक चुनाव टालने को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन प्रशासनिक संकेत यही बता रहे हैं कि पंचायत चुनाव की राह फिलहाल आसान नहीं है।

अब सबकी निगाहें ओबीसी आयोग की कार्यप्रणाली, हाई कोर्ट की अगली सुनवाई और राज्य निर्वाचन आयोग की आगामी तैयारियों पर टिकी हैं। आने वाले महीनों में ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि उत्तर प्रदेश की पंचायतों में नए जनप्रतिनिधि कब चुने जाएंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button