18 अक्टूबर 2026 3:18 पूर्वाह्न

उन्नाव सदर विधानसभा: कांग्रेस से सपा और अब बीजेपी तक का राजनीतिक सफर

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कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

उन्नाव: उत्तर प्रदेश की उन्नाव सदर विधानसभा एक ऐसी सीट रही है, जहां मतदाताओं ने समय-समय पर अलग-अलग राजनीतिक दलों को मौका देकर लोकतंत्र की विविधता को मजबूत किया है। हालांकि, कांग्रेस पिछले छह दशकों से यहां अपना खाता नहीं खोल सकी है। कभी सपा का गढ़ मानी जाने वाली इस सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्जा है।

उन्नाव जिले की छह विधानसभा सीटों में से एक उन्नाव सदर सीट का राजनीतिक इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। 1952 में लीलाधर अस्थाना कांग्रेस के टिकट पर यहां से पहले विधायक चुने गए। इसके बाद 1957 में खजान सिंह ने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जीत दर्ज की। वर्ष 1962 और 1967 में जियाउर रहमान ने कांग्रेस को दोबारा सफलता दिलाई।

1967 के बाद कांग्रेस का नहीं खुल सका खाता

1967 के बाद से कांग्रेस इस सीट पर वापसी नहीं कर सकी। इसके बाद यह सीट भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, जनता पार्टी (सेकुलर), लोक दल और जनता दल जैसे दलों के बीच घूमती रही, जो यहां के मतदाताओं के बदलते रुझान को दर्शाता है।

सपा का रहा मजबूत प्रभाव

1990 के दशक में समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर मजबूत पकड़ बनाई। पार्टी ने 1993, 1996, 2000, 2007 और 2012 में जीत दर्ज कर इसे अपना गढ़ बना लिया।

बीजेपी का उभार

भारतीय जनता पार्टी ने 1991 में शिवपाल सिंह की जीत के साथ यहां खाता खोला। इसके बाद 2014 के उपचुनाव, 2017 और 2022 में लगातार जीत हासिल कर पार्टी ने इस सीट पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।

बसपा को एक बार मिली सफलता

बहुजन समाज पार्टी को इस सीट पर केवल एक बार सफलता मिली, जब 2002 में कुलदीप सिंह सेंगर विधायक चुने गए।

कुल चुनावी तस्वीर

  • कांग्रेस: 4 बार
  • समाजवादी पार्टी: 5 बार
  • बीजेपी: 4 बार
  • बसपा: 1 बार

निष्कर्ष

उन्नाव सदर विधानसभा की सबसे बड़ी खासियत यही रही है कि यहां किसी एक दल का स्थायी वर्चस्व नहीं रहा। मतदाताओं ने हमेशा बदलाव को तरजीह दी है। फिलहाल सीट बीजेपी के कब्जे में है, जबकि कांग्रेस के लिए यहां वापसी अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

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