16 अक्टूबर 2026 6:00 अपराह्न

कॉकरोच का हमला, कहीं भी हो सकता है जनाब!…

कॉकरोच कहीं भी हमलावर हो सकता है जनाब शीर्षक वाली फीचर इमेज में राजनीतिक नेताओं, सर्वोच्च न्यायालय के प्रतीकात्मक दृश्य और रिपोर्टर दुर्गा प्रसाद शुक्ला की तस्वीर के साथ राजनीतिक व्यंग्य प्रस्तुत किया गया है।

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विशेष राजनीतिक व्यंग्य | जनगणदूत

प्रस्तुति: दुर्गा प्रसाद शुक्ला

कॉकरोच कहीं भी हमलावर हो सकता है जनाब!

कॉकरोच का हमला कब, कहाँ और किस दिशा से होगा, इसका अनुमान दुनिया के बड़े-बड़े रणनीतिकार नहीं लगा सकते। वह न किसी राजनीतिक दल का घोषणापत्र पढ़ता है, न अदालत की कार्यवाही समझने के लिए वकील रखता है और न ही संसद में प्रश्नकाल का इंतजार करता है। उसे न चुनाव आयोग से अनुमति चाहिए, न किसी प्रवक्ता की बाइट और न ही किसी चैनल की प्राइम टाइम बहस में जगह। वह बस परिस्थिति देखता है, अपनी मूँछें ऐंठता है और उचित अवसर मिलते ही प्रकट हो जाता है।

जनाब, कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अंधेरे में जितना सहज रहता है, रोशनी में उतना ही चर्चित हो जाता है। आदमी की दुनिया में भी कुछ दृश्य ऐसे ही हैं। कोई बात बंद कमरे में कही जाए तो सामान्य बातचीत, वही बात माइक पर आ जाए तो राष्ट्रीय बहस! कोई मार्च सड़क पर निकले तो राजनीतिक कार्यक्रम, वही मार्च सर्वोच्च न्यायालय के नाम पर निकले तो लोकतंत्र की मर्यादा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव जैसे भारी-भरकम शब्द हवा में तैरने लगते हैं।

और फिर किसी कोने से आवाज आती है—साहब, कॉकरोच कहीं भी हमलावर हो सकता है!

अब इस वाक्य को हल्के में मत लीजिए। इसमें जीवविज्ञान भी है, राजनीति विज्ञान भी, मनोविज्ञान भी और हमारे सार्वजनिक जीवन की वह अद्भुत कला भी, जिसमें छोटी-सी चीज देखते-देखते राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन जाती है।

अदालत के नाम पर मार्च और राजनीति की लंबी परिक्रमा

हाल ही में अयोध्या में पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय के नाम पर निकाले गए इंडिया ब्लॉक के मार्च पर सवाल उठाए। उन्होंने इसे देश में पहली बार इस प्रकार की घटना बताते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय पर भी दबाव बनाने की कोशिश हो रही है।

उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर भी कटाक्ष किया और आशंका जताई कि इसके पीछे किसी विदेशी उद्योगपति का सहयोग हो सकता है। यह उनकी ओर से व्यक्त की गई आशंका है; इसे अपने आप में किसी विदेशी आर्थिक मदद का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

बस, यहीं से व्यंग्य का दरवाजा खुलता है।

लोकतंत्र में हर मार्च का अपना अर्थ होता है। कोई न्याय की मांग करता है, कोई न्यायिक फैसले पर सवाल उठाता है, कोई फैसले का समर्थन करता है और कोई केवल इसलिए सड़क पर उतर आता है कि कहीं लोग उसे घर बैठा हुआ न समझ लें।

राजनीति में उपस्थिति भी एक उपलब्धि है। कभी-कभी मुद्दे से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कैमरे में कौन आया, किसके पीछे कितने लोग थे और किसकी तस्वीर शाम की बहस में सबसे देर तक दिखाई गई।

ऐसे माहौल में अदालत का नाम आते ही सबकी आवाज गंभीर हो जाती है। चेहरे पर संवैधानिक चिंता उतर आती है। शब्दों में लोकतंत्र की गरिमा झलकने लगती है। लेकिन जनता मन ही मन पूछती है—जनाब, अदालत का सम्मान तो सबको करना चाहिए, मगर अदालत के नाम पर होने वाली राजनीति का हिसाब कौन करेगा?

सवाल पूछना गलत नहीं। विरोध करना भी गलत नहीं। मगर किसी भी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा को राजनीतिक हथियार बना देना उचित है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है। न्यायपालिका को राजनीतिक दबाव से मुक्त रहना चाहिए और राजनीतिक आलोचना को भी तथ्यों तथा जिम्मेदारी की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। यहाँ किसी को असहमति का अधिकार है, लेकिन किसी की आशंका को बिना प्रमाण अंतिम सत्य घोषित करने का अधिकार नहीं।

और कॉकरोच? वह इन सारी बहसों के बीच दीवार से चिपका सोच रहा है—मेरे नाम पर इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, कम से कम कोई मुझे भी पक्ष रखने का अवसर दे देता!

कॉकरोच जनता पार्टी का राजनीतिक दर्शन

राजनीतिक दलों के नामों का भी अपना भाग्य होता है। किसी दल का नाम सुनते ही राष्ट्रवाद याद आता है, किसी का नाम सुनते ही समाजवाद, किसी से धर्मनिरपेक्षता की चर्चा शुरू होती है और किसी के नाम पर लोग पहले हँसते हैं, फिर पूछते हैं कि इसका चुनाव चिह्न क्या है।

कॉकरोच जनता पार्टी का नाम सुनकर स्वाभाविक है कि कल्पनाशील नागरिकों के चेहरे पर मुस्कान आ जाए। आखिर कॉकरोच वह प्राणी है, जो जूते की आहट से पहले भागता है और फिर भी मानव सभ्यता के साथ अपनी उपस्थिति बनाए रखता है।

मनुष्य ने महल बनाए, संसदें बनाईं, अदालतें बनाईं, आधुनिक तकनीक विकसित की; मगर कॉकरोच ने भी अपनी प्रजाति की ओर से किसी तरह का इस्तीफा नहीं दिया।

अब कल्पना कीजिए कि कॉकरोच जनता पार्टी अपना घोषणापत्र जारी करती है। पहला वादा—हर अंधेरे कोने में समान अवसर। दूसरा वादा—रसोई से लेकर बैठक तक सबकी भागीदारी। तीसरा वादा—किसी भी संकट में भागने का मौलिक अधिकार। चौथा वादा—हमलावर होने की स्थिति में पहले शोर मचाने वाले को भी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जाएगा।

और पाँचवाँ वादा सबसे महत्वपूर्ण—यदि कोई हमें विदेशी उद्योगपति का समर्थित घोषित करे, तो पहले प्रमाण प्रस्तुत करे; केवल हमारी तेज चाल देखकर विदेशी फंडिंग का अनुमान न लगाए।

यह काल्पनिक घोषणापत्र है, लेकिन इसकी आखिरी पंक्ति में सार्वजनिक जीवन की एक वास्तविक जरूरत छिपी है। आरोप लगाने और आरोप साबित करने के बीच उतनी ही दूरी होती है, जितनी रसोई में कॉकरोच देखकर पूरे मकान को कीटनाशक से भर देने और वास्तविक समस्या का स्रोत खोजने के बीच।

राजनीति में नाम विचित्र हो सकता है, विचार असहज हो सकते हैं और प्रदर्शन विवादास्पद हो सकता है। लेकिन निर्णय का आधार नाम नहीं, तथ्य होना चाहिए। कोई संगठन मजाकिया नाम रख ले तो उसके तर्क अपने आप गलत नहीं हो जाते। उसी तरह गंभीर नाम रख लेने से हर तर्क सत्य नहीं हो जाता।

जनाब, लोकतंत्र में नाम की पट्टी देखकर फैसला मत कीजिए। भीतर क्या लिखा है, वह भी पढ़िए।

विदेशी उद्योगपति का हाथ या अपनी कल्पना की उड़ान?

हमारे सार्वजनिक जीवन में किसी विवाद के सामने आते ही एक सवाल तेजी से उभरता है—इसके पीछे कौन है?

इसके पीछे कौन-सा नेता है? किस दल की रणनीति है? कौन-सा संगठन है? किसका आर्थिक सहयोग है? और यदि देश में जवाब न मिले तो नजर विदेश की ओर घूम जाती है।

कभी-कभी किसी आंदोलन के पीछे बाहरी प्रभाव की आशंका वास्तविक जांच का विषय हो सकती है। लोकतंत्र में वित्तीय पारदर्शिता और वैध राजनीतिक गतिविधियों की निगरानी महत्वपूर्ण हैं। मगर आशंका और प्रमाण को एक ही थाली में परोस देने से पत्रकारिता भी असहज होती है और न्याय की अवधारणा भी।

बृजभूषण शरण सिंह ने सीजेपी के प्रदर्शन को लेकर विदेश में बैठे किसी व्यापारी की भूमिका की आशंका व्यक्त की। इस बयान पर बहस हो सकती है, लेकिन केवल बयान के आधार पर किसी व्यक्ति, उद्योगपति या संगठन पर विदेशी सहायता लेने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

व्यंग्य की दुनिया में, हालांकि, कल्पना की उड़ान को कोई सीमा नहीं रोकती।

मान लीजिए कॉकरोच जनता पार्टी के दफ्तर में एक दिन अचानक विदेशी उद्योगपति का फोन आ जाता है। उधर से आवाज आती है—आपके संगठन की गतिविधियों से हम प्रभावित हैं।

इधर से जवाब आता है—धन्यवाद, मगर पहले यह बताइए कि आप हमारी रसोई की समस्या समझते हैं या केवल हमारे नाम से प्रभावित हुए हैं?

उद्योगपति कहता है—हम आपके अभियान को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना चाहते हैं।

कॉकरोच नेता पूछता है—पहचान दिलाने से पहले एक बात बताइए, आपके देश में लोग हमें देखकर चीखते हैं या हमें देखकर विचारधारा बदल लेते हैं?

फोन कट जाता है। पार्टी के कार्यकर्ता एक-दूसरे को देखते हैं। कोई कहता है—यह जरूर बड़ी साजिश थी। दूसरा कहता है—नहीं, शायद गलत नंबर था। तीसरा प्रेस विज्ञप्ति जारी करने लगता है।

और चौथा चुपचाप कोने में चला जाता है, क्योंकि उसे डर है कि कहीं उसकी चुप्पी को भी किसी विदेशी सहयोग का संकेत न मान लिया जाए!

यह कल्पना है, वास्तविक घटना नहीं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में बिना पर्याप्त प्रमाण के संदेह को निष्कर्ष बना देने की प्रवृत्ति पर विचार करना जरूरी है। आरोप गंभीर हो तो जांच भी गंभीर होनी चाहिए। प्रमाण सामने आएँ तो निष्कर्ष निकले। और प्रमाण न हों तो कम से कम शब्दों को इतना लंबा न दौड़ाया जाए कि वे तथ्यों से कई किलोमीटर आगे निकल जाएँ।

कॉकरोच और लोकतंत्र: असली डर किस बात का है?

कॉकरोच से डरने वाला व्यक्ति हमेशा कमजोर नहीं होता। कई बार वह इतना मजबूत होता है कि दुनिया की हर समस्या का सामना कर सकता है, लेकिन अचानक फर्श पर दौड़ते कॉकरोच को देखकर उसकी सारी बहादुरी दरवाजे के बाहर खड़ी मिलती है।

राजनीति में भी यही मनोविज्ञान काम करता है। बड़ा विरोध कभी-कभी सहन हो जाता है, लेकिन छोटा-सा सवाल असुविधा पैदा कर देता है। हजारों लोगों की भीड़ से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन एक अकेला नागरिक दस्तावेज लेकर खड़ा हो जाए तो पूरी व्यवस्था को फाइलें पलटनी पड़ सकती हैं।

यहाँ कॉकरोच केवल कीट नहीं, एक प्रतीक है। वह उस अनपेक्षित सवाल का प्रतीक है, जो तब सामने आता है जब सबको लगता है कि चर्चा समाप्त हो चुकी है। वह उस असुविधाजनक तथ्य का प्रतीक है, जिसे कालीन के नीचे छिपा दिया गया था और जो किसी रात अचानक बाहर निकल आता है।

इसलिए कॉकरोच कहीं भी हमलावर हो सकता है, जनाब—लेकिन हर हमले का मतलब षड्यंत्र नहीं होता और हर चीख इस बात का प्रमाण नहीं होती कि हमला कितना बड़ा था।

कभी कॉकरोच सचमुच नुकसान पहुँचाने वाली समस्या का संकेत होता है। कभी वह केवल भय का कारण होता है। कभी उसके दिखाई देने से पहले ही लोग एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं। और कभी असली सवाल यह होता है कि कमरे की सफाई किसकी जिम्मेदारी थी।

लोकतंत्र में भी यही पूछना चाहिए। यदि किसी आंदोलन पर सवाल है, तो उसके आयोजकों से सवाल कीजिए। यदि वित्तीय मदद पर संदेह है, तो प्रमाण और जांच की बात कीजिए। यदि अदालत की प्रतिष्ठा का प्रश्न है, तो उसके संवैधानिक महत्व को समझिए। और यदि राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार लोकतंत्र की परिभाषा बदल रहे हैं, तो उनसे भी पूछिए कि नियम सबके लिए समान क्यों नहीं होने चाहिए।

किसी को सिर्फ इसलिए निर्दोष न मानिए कि वह आपका समर्थक है। किसी को केवल इसलिए दोषी न ठहराइए कि उसका नाम आपको पसंद नहीं है।

यह सिद्धांत जितना अदालत के लिए जरूरी है, उतना ही सड़क, संसद, मीडिया और सोशल मीडिया के लिए भी।

शिक्षा पर बयान: असली कॉकरोच तो यहाँ छिपा है!

बृजभूषण शरण सिंह ने शिक्षा की स्थिति पर भी चिंता जताई। सेवानिवृत्त शिक्षकों के विदाई एवं सम्मान समारोह में उन्होंने आशंका व्यक्त की कि कहीं ऐसी परिस्थिति तो नहीं बन रही, जिसमें आम आदमी के बच्चे शिक्षा से दूर होते जाएँ और अवसर केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रह जाएँ।

उन्होंने नेताओं के छात्र जीवन से लेकर सार्वजनिक जीवन तक पहुँचने पर भी सवाल उठाया कि ऐसे कितने नेता हैं, जो अपने कार्यों में से कोई एक काम गिना सकें।

यहाँ व्यंग्य को थोड़ी देर के लिए अपना चश्मा उतारकर गंभीर होना पड़ेगा, क्योंकि शिक्षा का सवाल किसी पार्टी का निजी मामला नहीं है। गरीब परिवार का बच्चा पढ़ पाएगा या नहीं, उसे अच्छी पाठ्यपुस्तक मिलेगी या नहीं, शिक्षक उपलब्ध होंगे या नहीं, विद्यालयों में सुविधाएँ होंगी या नहीं और पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर मिलेंगे या नहीं—ये सवाल किसी भी राजनीतिक मंच की सजावट से कहीं बड़े हैं।

यदि आम नागरिक के बच्चे की शिक्षा कमजोर होती है, तो उसका नुकसान केवल उस परिवार को नहीं होता। समाज की उत्पादकता, लोकतांत्रिक भागीदारी और आर्थिक प्रगति पर भी असर पड़ता है।

यहाँ असली कॉकरोच कौन है?

क्या वह संसाधनों की कमी है? क्या वह नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच की दूरी है? क्या वह सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की असमानता है? क्या वह शिक्षा के बढ़ते खर्च का दबाव है? या वह सोच है, जो अवसरों को कुछ लोगों की जागीर मान बैठती है?

संभव है कि इन सवालों के उत्तर अलग-अलग जगह अलग हों। लेकिन इतना तय है कि इन्हें किसी एक बयान से हल नहीं किया जा सकता। इनके लिए आंकड़े, नीतियों की समीक्षा, स्कूलों की वास्तविक स्थिति और जवाबदेही की जरूरत है।

कल्पना कीजिए कि एक सरकारी विद्यालय में निरीक्षण के लिए बड़े अधिकारी पहुँचते हैं। कमरा साफ है, दीवार पर नारा लिखा है—शिक्षा सबका अधिकार है। बच्चे कतार में खड़े हैं। रजिस्टर व्यवस्थित है। रिपोर्ट तैयार है।

तभी एक बच्चा हाथ उठाकर पूछता है—साहब, शिक्षा सबका अधिकार है तो हमारे स्कूल में शिक्षक पूरे क्यों नहीं हैं?

कमरे में अचानक ऐसी शांति छा जाती है, जैसे किसी ने बैठक के बीच कॉकरोच छोड़ दिया हो।

अधिकारी फाइल देखते हैं। शिक्षक सिर झुका लेते हैं। प्रतिनिधि अगले कार्यक्रम के लिए निकलने की जल्दी दिखाते हैं। और बच्चा अपनी जगह खड़ा सोचता है कि शायद उसका सवाल पाठ्यक्रम से बाहर था।

जनाब, यही वह कॉकरोच है जिससे व्यवस्था को डरना नहीं चाहिए। उसे पकड़कर बाहर फेंकने से बेहतर है कि उस सवाल का उत्तर दिया जाए।

शिक्षा पर चिंता जताना अच्छी बात है, लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब चिंता बजट, शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, डिजिटल संसाधन और बच्चों के सीखने के परिणामों में दिखाई देती है। नेता कितने काम गिना सकते हैं, इसका हिसाब भी जनता पूछ सकती है। लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है कि बच्चों के भविष्य के लिए कितने ठोस काम हुए हैं।

राजनीति में उपलब्धियों की सूची लंबी हो सकती है। बच्चों की कॉपी में उत्तर सही होना उससे अधिक महत्वपूर्ण है।

गिलहरी का योगदान और नेताओं की बड़ी-बड़ी घोषणाएँ

बृजभूषण शरण सिंह ने राष्ट्र निर्माण में अपनी जिम्मेदारी तय करने की बात करते हुए रामसेतु निर्माण में गिलहरी के योगदान का उदाहरण दिया। उनका संदेश था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भूमिका तलाशनी चाहिए और राष्ट्र निर्माण में अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देना चाहिए।

यह विचार अपने आप में सकारात्मक है। राष्ट्र निर्माण केवल भाषणों, नारों और मंचों पर खड़े होकर हाथ हिलाने से नहीं होता। इसमें शिक्षक, किसान, मजदूर, वैज्ञानिक, सैनिक, चिकित्सक, पत्रकार, सफाईकर्मी और वे तमाम नागरिक शामिल होते हैं, जिनका नाम अखबार की सुर्खियों में कभी नहीं आता।

लेकिन राजनीति में गिलहरी का उदाहरण सुनते ही एक प्रश्न उठता है—जनाब, गिलहरी अपना योगदान दे रही है, इसमें संदेह नहीं; मगर जिनके पास पूरी निर्माण सामग्री, औजार और ठेके की फाइल है, वे क्या कर रहे हैं?

गिलहरी का काम रेत के कुछ कण लाना है। उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अकेले पुल बना देगी। इसी प्रकार आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाए, यह आवश्यक है; मगर सरकार और संस्थाओं को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं किया जा सकता।

नागरिक कर देते हैं, नियमों का पालन करते हैं, बच्चों को पढ़ाते हैं, मेहनत करते हैं और समाज को चलाते हैं। बदले में उनसे यह अपेक्षा करना उचित है कि वे भी राष्ट्र निर्माण में भाग लें। लेकिन नागरिकों की भागीदारी का अर्थ यह नहीं कि व्यवस्था अपनी कमियों का बोझ जनता के सिर रखकर स्वयं विश्राम करने लगे।

यदि सड़क टूटी है तो नागरिक की जिम्मेदारी गड्ढे में उतरकर सड़क बनाना नहीं है। यदि विद्यालय में शिक्षक नहीं हैं तो माता-पिता की देशभक्ति का प्रमाण यह नहीं कि वे बिना शिक्षक के बच्चों को पढ़ाने की व्यवस्था कर लें। यदि सार्वजनिक संस्थाओं में जवाबदेही की कमी है तो नागरिकों को केवल धैर्य का पाठ पढ़ाना पर्याप्त नहीं।

गिलहरी का योगदान प्रेरणा है, विकल्प नहीं। जनता की भागीदारी जरूरी है, लेकिन संस्थागत जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है।

और हाँ, कॉकरोच भी राष्ट्र निर्माण में योगदान देना चाहे तो उसे सबसे पहले सफाई अभियान में शामिल किया जा सकता है। आखिर जिस समस्या की उपस्थिति से सफाई की जरूरत समझ में आती है, वह अप्रत्यक्ष रूप से सफाई व्यवस्था का महत्व तो बता ही देती है!

बयान, बहस और मीडिया की प्लेट में परोसा गया कॉकरोच

आज के मीडिया संसार में किसी बयान का जीवन उसके अर्थ से नहीं, कई बार उसकी वायरल होने की क्षमता से तय होता है। एक वाक्य सामने आता है, उसका छोटा वीडियो बनता है, फिर शीर्षक तैयार होता है, फिर प्रतिक्रियाएँ आती हैं और अंत में मूल मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है।

शिक्षा पर की गई चिंता का कितना विश्लेषण हुआ? अदालत की गरिमा पर कितनी तथ्यपरक चर्चा हुई? प्रदर्शन के उद्देश्य और उसके औचित्य पर कितनी गंभीर बहस हुई? और विदेशी सहायता की आशंका के समर्थन में क्या प्रमाण हैं—इसकी पड़ताल कितनी हुई?

ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि लोकतंत्र में मीडिया का काम केवल बयान पहुँचाना नहीं, उसके संदर्भ को भी स्पष्ट करना है।

मान लीजिए किसी बहस में चार लोग बैठे हैं। पहले ने कहा—प्रदर्शन गलत है। दूसरे ने कहा—प्रदर्शन सही है। तीसरे ने पूछा—विदेशी मदद किसने दी? चौथे ने पूछा—बच्चों की पढ़ाई पर बात कब होगी?

पहले तीन वक्ताओं की आवाज तेज होती जाती है। चौथा व्यक्ति अपनी बात रखने की कोशिश करता है। तभी संचालक घोषणा करता है—अब एक छोटा-सा विराम!

विराम के बाद स्क्रीन पर फिर वही तीन लोग हैं। चौथे का कैमरा शायद तकनीकी कारणों से बंद है।

यह कल्पना मीडिया की उस प्रवृत्ति पर कटाक्ष है, जिसमें टकराव कभी-कभी समाधान से अधिक जगह घेर लेता है। हर विवाद महत्वपूर्ण नहीं होता और हर महत्वपूर्ण सवाल विवादास्पद नहीं होता। लोकतंत्र को बहस चाहिए, लेकिन बहस के साथ विवेक भी चाहिए।

पत्रकारिता की जिम्मेदारी है कि किसी आरोप को आरोप की तरह, किसी आशंका को आशंका की तरह और किसी प्रमाणित तथ्य को तथ्य की तरह प्रस्तुत करे। किसी के कथन को बिना जांच निष्कर्ष में बदल देना पाठक के साथ न्याय नहीं है।

कॉकरोच का नाम आकर्षक हो सकता है, मगर समाचार की असली गुणवत्ता इस बात से तय होगी कि पाठक को घटना, संदर्भ और तथ्य कितनी स्पष्टता से समझ आए।

शालीन राजनीति में भी तंज की जगह है

राजनीति में हास्य और व्यंग्य का स्थान हमेशा रहा है। व्यंग्य सत्ता का अपमान करने का दूसरा नाम नहीं; वह सत्ता, समाज और नागरिक व्यवहार के विरोधाभासों को उजागर करने की विधा है।

यदि कोई नेता अदालत की प्रतिष्ठा पर चिंता जताता है, तो उस चिंता पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। यदि कोई संगठन न्यायिक संस्था के नाम पर मार्च निकालता है, तो उसके उद्देश्य और संदेश का परीक्षण होना चाहिए। यदि किसी विदेशी आर्थिक सहयोग की आशंका व्यक्त की जाती है, तो तथ्य सामने आने चाहिए। यदि शिक्षा में असमानता का सवाल उठता है, तो उस पर ठोस बहस होनी चाहिए।

लेकिन यह सब करते हुए शालीनता छोड़े बिना भी तीखे सवाल पूछे जा सकते हैं।

किसी व्यक्ति की आलोचना उसके तर्कों के आधार पर कीजिए। उसके कथन में विरोधाभास है तो उसे सामने रखिए। दावा प्रमाण से आगे निकल रहा है तो उस दूरी को मापिए। और यदि कोई सही बात कह रहा है, तो केवल इसलिए उसे खारिज मत कीजिए कि वह आपका राजनीतिक विरोधी है।

व्यंग्य का उद्देश्य किसी को व्यक्तिगत रूप से नीचा दिखाना नहीं, बल्कि विचारों और व्यवहार की असंगतियों को सामने लाना है।

कॉकरोच की मिसाल इसी कारण उपयोगी है। वह हमें याद दिलाती है कि आकार छोटा होने से किसी चीज की उपस्थिति महत्वहीन नहीं हो जाती। कभी छोटा सवाल बड़ी बहस खोल देता है। कभी मामूली दिखने वाली कमी व्यवस्था की बड़ी विफलता की ओर संकेत करती है। और कभी कोई विवाद इतना फैल जाता है कि उसके बीच असली मुद्दा ही नजर नहीं आता।

इसलिए जब अगली बार किसी बहस में कॉकरोच का नाम आए, तो केवल हँसिए मत। यह भी देखिए कि कमरे में रोशनी कहाँ है, दरवाजा किसने बंद किया है और सफाई की जिम्मेदारी किसकी है।

आखिरी बात: जनाब, कॉकरोच से नहीं, अपने अंधेरे से सावधान रहिए!

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यहाँ सवाल पूछे जा सकते हैं। अदालत की स्वतंत्रता पर चिंता व्यक्त की जा सकती है, राजनीतिक प्रदर्शनों की आलोचना हो सकती है, नेताओं से उपलब्धियों का हिसाब माँगा जा सकता है और शिक्षा के भविष्य पर बहस की जा सकती है।

लेकिन इन सबके लिए तथ्य, तर्क और जिम्मेदारी जरूरी हैं।

यदि कोई प्रदर्शन करता है तो उसके उद्देश्य पर सवाल उठाइए। यदि कोई नेता उस प्रदर्शन की आलोचना करता है तो उसके तर्कों की पड़ताल कीजिए। यदि किसी विदेशी सहयोग का दावा या संदेह सामने आता है तो प्रमाण माँगिए। और यदि शिक्षा में असमानता की बात उठती है तो उसे राजनीतिक बयानबाजी के शोर में गुम मत होने दीजिए।

बृजभूषण शरण सिंह के बयान में अदालत के नाम पर मार्च, कॉकरोच जनता पार्टी को लेकर आशंका, राष्ट्र निर्माण में गिलहरी के योगदान और आम बच्चों की शिक्षा जैसे अलग-अलग विषय सामने आए हैं। इन सभी पर अलग-अलग गंभीरता से विचार होना चाहिए। किसी एक मुद्दे की चर्चा दूसरे मुद्दे की जांच का विकल्प नहीं हो सकती।

आखिर देश केवल राजनीतिक बयानों से नहीं चलता। वह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संस्थाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता, नागरिकों की भागीदारी और जवाबदेही से चलता है।

और कॉकरोच?

वह अब भी अपनी जगह मौजूद है। कभी रसोई में, कभी बैठक में और कभी हमारी कल्पना के उस कोने में, जहाँ हम अपने विरोधियों के लिए सबसे विचित्र उपमाएँ सुरक्षित रखते हैं।

वह कब भागेगा, कब रुकेगा और कब अचानक उड़कर सामने आएगा—यह उसकी मर्जी हो सकती है। लेकिन मनुष्य के पास उससे अधिक समझ है। हम चाहें तो शोर मचाने से पहले कारण खोज सकते हैं। आरोप लगाने से पहले प्रमाण माँग सकते हैं। और किसी समस्या को छिपाने के बजाय उसका समाधान कर सकते हैं।

इसलिए जनाब, कॉकरोच कहीं भी हमलावर हो सकता है—यह बात अपनी जगह सही है। मगर हर बार कॉकरोच को विदेशी साजिश का प्रतिनिधि घोषित कर देने से न रसोई साफ होगी, न अदालत की गरिमा सुरक्षित होगी और न बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलेगी।

हाँ, इतना जरूर होगा कि कॉकरोच का नाम इतिहास में दर्ज हो जाएगा और वह भी सोचने लगेगा—मैं तो बस दीवार पर चल रहा था, ये लोग मुझे राष्ट्रीय मुद्दा किसने बना दिया?

व्यंग्य का निष्कर्ष यही है: कॉकरोच को देखकर चीखना आसान है, कमरे की सफाई करना कठिन। लोकतंत्र में असली बहादुरी चीखने में नहीं, अंधेरे को पहचानकर रोशनी करने में है।

प्रस्तुति: दुर्गा प्रसाद शुक्ला | जनगणदूत

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