भदोही

23 साल की उम्र में कचहरी में बरसाईं गोलियां, फिर बना चार बार विधायक ; 46 साल बाद गैंगस्टर विजय मिश्रा को उम्रकैद

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे नाम रहे हैं, जिनकी पहचान केवल जनप्रतिनिधि के रूप में नहीं बल्कि बाहुबली छवि के कारण भी बनी। उन्हीं नामों में एक प्रमुख नाम है विजय मिश्रा का। भदोही जिले की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से चार बार विधायक रहे विजय मिश्रा को प्रयागराज की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने 46 वर्ष पुराने हत्या के मामले में कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला उस हत्याकांड से जुड़ा है, जिसने वर्ष 1980 में पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था।

करीब आधी सदी तक अदालतों में लंबित रहे इस मामले में फैसला आने के बाद एक बार फिर विजय मिश्रा का राजनीतिक और आपराधिक सफर चर्चा का विषय बन गया है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर एक हत्या के आरोपी ने कैसे राजनीति में इतनी लंबी पारी खेली और लगातार चुनाव जीतकर विधानसभा तक पहुंचता रहा।

1980 में कचहरी परिसर में हुई थी सनसनीखेज हत्या

यह मामला 11 फरवरी 1980 का है। उस समय विजय मिश्रा की उम्र लगभग 23 वर्ष बताई जाती है। प्रयागराज के जिला न्यायालय परिसर में उस दिन अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी थी। आरोप है कि विश्वविद्यालय छात्र प्रकाश नारायण पांडे की अदालत परिसर के भीतर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

प्रकाश नारायण पांडे अपने खिलाफ दर्ज एक मामले में जमानत की प्रक्रिया पूरी करने के लिए अदालत पहुंचे थे। बताया जाता है कि उनकी कुछ लोगों से पुरानी रंजिश चल रही थी। इसी विवाद के चलते अदालत परिसर में उन पर हमला किया गया। आरोपियों में संतराम, बलराम, विजय मिश्रा और जीत नारायण के नाम सामने आए थे।

दिनदहाड़े हुई इस गोलीबारी में केवल प्रकाश नारायण पांडे ही नहीं, बल्कि पांच अन्य लोग भी घायल हो गए थे। अदालत परिसर जैसे संवेदनशील स्थान पर हुई इस घटना ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।

चार दशक से अधिक समय तक चलता रहा मुकदमा

हत्या का मामला दर्ज होने के बाद कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन विभिन्न कारणों से मुकदमा वर्षों तक लंबित रहा। गवाहों, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच यह मामला अदालतों में चलता रहा।

आखिरकार 46 वर्ष बाद प्रयागराज की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए विजय मिश्रा को दोषी करार दिया और कठोर आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत के फैसले ने यह संदेश दिया कि कानून की प्रक्रिया भले लंबी हो सकती है, लेकिन गंभीर अपराधों में न्याय अंततः अपना रास्ता बना ही लेता है।

अपराध के आरोपों के बीच राजनीति में बढ़ता प्रभाव

विजय मिश्रा का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। हत्या और अन्य आपराधिक मामलों के आरोपों के बावजूद उन्होंने पूर्वांचल की राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी।

ज्ञानपुर विधानसभा क्षेत्र में उनका प्रभाव इतना मजबूत माना जाता था कि वे लगातार चुनाव जीतते रहे। स्थानीय राजनीति में उनकी पकड़ और समर्थकों के बड़े नेटवर्क ने उन्हें एक प्रभावशाली नेता के रूप में स्थापित कर दिया।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पूर्वांचल की राजनीति में जातीय समीकरण, स्थानीय प्रभाव और व्यक्तिगत नेटवर्क कई बार उम्मीदवारों की लोकप्रियता तय करते रहे हैं। विजय मिश्रा भी इसी राजनीतिक संस्कृति के प्रमुख उदाहरणों में गिने जाते हैं।

लगातार चार बार पहुंचे विधानसभा

विजय मिश्रा ने पहली बड़ी राजनीतिक सफलता वर्ष 2002 में हासिल की, जब वे समाजवादी पार्टी के टिकट पर ज्ञानपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वर्ष 2002

समाजवादी पार्टी के टिकट पर पहली बार विधानसभा पहुंचे।

वर्ष 2007

दूसरी बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे और क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की।

वर्ष 2012

लगातार तीसरी जीत दर्ज करते हुए उन्होंने अपना प्रभाव बरकरार रखा।

वर्ष 2017

समाजवादी पार्टी से टिकट न मिलने के बाद उन्होंने निषाद पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरकर जीत हासिल की और चौथी बार विधायक बने।

हालांकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उनकी राजनीतिक यात्रा को झटका लगा और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही लगभग दो दशक तक चले उनके विधानसभा सफर पर विराम लग गया।

पूर्वांचल की राजनीति का चर्चित चेहरा

विजय मिश्रा का नाम केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा। उनका नाम अक्सर पूर्वांचल के बाहुबली नेताओं की सूची में लिया जाता रहा है। राजनीतिक विरोधियों और समर्थकों के बीच उन्हें लेकर हमेशा तीखी बहस होती रही।

जहां समर्थक उन्हें क्षेत्र के विकास और जनसंपर्क के लिए याद करते हैं, वहीं आलोचक उन पर लगे गंभीर आपराधिक आरोपों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। यही कारण है कि उनका नाम उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे विवादित नेताओं में शामिल रहा।

मुलायम सिंह यादव और हेलीकॉप्टर वाला चर्चित किस्सा

विजय मिश्रा से जुड़ा एक किस्सा वर्षों से राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह घटना वर्ष 2009 की बताई जाती है, जब उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी और पुलिस विजय मिश्रा की तलाश कर रही थी।

कहा जाता है कि एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान विजय मिश्रा सीधे मंच पर पहुंचे और तत्कालीन समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव से मदद की गुहार लगाई। चर्चाओं के अनुसार उन्होंने अपनी पत्नी के सिंदूर का हवाला देते हुए सुरक्षा की मांग की थी।

राजनीतिक हलकों में प्रचलित कथाओं के अनुसार, इसके बाद मुलायम सिंह यादव उन्हें अपने हेलीकॉप्टर में बैठाकर वहां से ले गए और पुलिस कुछ नहीं कर सकी। हालांकि इस घटना को लेकर अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आती रही हैं, लेकिन यह किस्सा आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति के चर्चित प्रसंगों में शामिल है।

बाहुबल और राजनीति का पुराना रिश्ता

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय ऐसा रहा है जब कई बाहुबली नेताओं का चुनावी प्रभाव काफी मजबूत माना जाता था। विजय मिश्रा भी उसी दौर के नेताओं में शामिल रहे। उनके राजनीतिक जीवन की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार आपराधिक मामलों में आरोपित व्यक्ति भी लंबे समय तक लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बना रह सकता है।

हाल के वर्षों में न्यायालयों और चुनाव आयोग द्वारा अपराध और राजनीति के संबंधों पर लगातार सख्ती की गई है। ऐसे में विजय मिश्रा के मामले को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा रहा है।

अदालत के फैसले का राजनीतिक संदेश

46 वर्ष पुराने हत्या मामले में सजा सुनाए जाने के बाद यह मामला केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है। यह फैसला उन सभी मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो वर्षों से अदालतों में लंबित हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया है कि समय कितना भी बीत जाए, गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अपना निष्कर्ष तक पहुंच सकती है। साथ ही यह राजनीति और अपराध के गठजोड़ पर भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।

विजय मिश्रा की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसने एक ओर चुनावी राजनीति में उल्लेखनीय सफलता हासिल की, तो दूसरी ओर गंभीर आपराधिक मामलों के कारण लगातार विवादों में भी बना रहा। अब अदालत के फैसले के बाद उनका नाम एक बार फिर प्रदेश की राजनीति और न्यायिक इतिहास की चर्चाओं के केंद्र में आ गया है।

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